‘दिल्ली दूर है’ वाली कहावत झूठी साबित हो चुकी है. आम आदमी ने यह साबित कर दिखाया है कि उसे सिर्फ राजनीति का छिद्रान्वेषण करना ही नहीं, बल्कि लाइलाज हो चुके मर्ज का इलाज करना भी आता है. हालिया संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) को नयी दिल्ली में भले ही सिर्फ 28 सीटें ही मिल पायीं, पर उसने 15 वर्षो से सत्तासीन कांग्रेस को खदेड़ दिया. इस चक्कर में भाजपा कहीं की नहीं रह गयी. सबसे अधिक 32 सीटें हासिल करके भी भाजपा की स्थिति ‘सब धन 22 पसेरी’ वाली है. लेकिन यहां हम बात करेंगे ‘आप’ की. जी हां, आम आदमी पार्टी की. तमाम कयासों के बाद भी कांग्रेस और भाजपा ‘आप’ को वोटकटवा समझते रहे और जब रिजल्ट आया तो गच्चा खा गये. चुनाव परिणाम आने से पूर्व तक अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ‘को जीभर गरियानेवाली कांग्रेस अब उससे बिना शर्त समर्थन लेने की चिरौरी कर रही है. जाहिर सी बात है उसे दिल्ली के पब्लिक की चिंता नहीं बल्कि अपना हित दिख रहा है. कांग्रेस आप की सरकार बनवा कर दिल्ली के लोगों की सिम्पैथी हासिल करना चाहती है. साथ ही आप के प्रकोप से बचने का रास्ता भी ढूंढ रही है. पर केजरीवाल कांग्रेस की यह होशियारी खूब समझते हैं. वह सतर्क हैं. इधर कई टीवी चैनलों पर दिखाये जा रहे सरकार बनाने के फामरूले की तर्ज पर किरन बेदी ने भी अपनी मुफ्त सलाह हवा में उछाल दिया ‘भाजपा और आप मिल कर सरकार बनायें.’ पर इस फ्री सलाह को भी न तो भाजपा ने तवज्जो दी और न ही आप ने. इधर आयुर्वेद की महंगी दवाएं बेचने और मोटी फी लेकर योग सलाह देने वाले बाबा रामदेव ने भी केजरीवाल को एक मशविरा फ्री में दे दिया ‘जब कांग्रेस समर्थन दे रही है तो केजरीवाल को सरकार बनाने के लिए आगे आना चाहिए.’ इस सब चीजों को नजरअंदाज कर आप के लोग जंतर-मंतर पर जीत का जश्न मनाने में लगे रहे. दरअसल, राजनीति के आंगन में उतरने के बाद इसकी ‘टेढ़ी चाल’ और ‘ननु नच’ के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी आप वालों को भी हो गयी है. वे जानते हैं कि दूसरे के कंधे पर रखकर बंदूक चलाने वालों की यहां कोई कमी नहीं है. सच तो यह है कि कई राजनीतिक धुरंधरों को ‘दृष्टि दोष’ है, पर अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी अपने दूरदृष्टि का इस्तेमाल कर रही है. दिल्ली में जीत से दोगुने हुए जज्बे के साथ आप ने लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है. उन्हें पता है दिल्ली में दोबारा चुनाव ही अब एकमात्र विकल्प है. झाड़ू आप का राष्ट्रीय चुनाव चिन्ह बन गया है. अब आपका मिशन है ‘कश्मीर से कन्याकुमारी.’ सचमूच सफाई तो जरूरी है. इन दिनों कुछ गीत खासे लोकप्रिय हो रहे हैं- आप यहां आये किसलिए.., आप से भी खूबसूरत आप के अंदाज हैं.. आप भी इसका आनंद लीजिए.
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शनिवार, 14 दिसंबर 2013
सोमवार, 26 नवंबर 2012
आम आदमी (मैंगो मैन) की खास बातें
भले ही ‘खास’ लोगों की नजर में आम आदमी यानी ‘मैंगो मैन’ की कोई औकात नहीं होती हो, पर मुङो लगता है कि ‘मैंगो मैन’ होना कोई आसान बात नहीं है. अब देखिए न! अपनी गाढ़ी कमाई और काफी जुगाड़-जतन से जो उसने कभी रसोई गैस का कनेक्शन लिया था, उसका पंजीकरण बचाने के लिए अनिवार्य किये गये केवाईसी फॉर्म भरने के बाद वह खुद को ऐसा गौरवान्वित महसूस करता है मानो उसने केबीसी (कौन बनेगा करोड़पति) का एंट्री फॉर्म भर दिया हो. फ्री में मिलने वाला केवाईसी फॉर्म भी वह बगल की फोटोकॉपी सेंटर से पांच रुपये में खुशी-खुशी खरीदता है. जब उसे पता चलता है कि इस फॉर्म पर तो फोटो भी चिपकाना है, तो उसकी बांछे खिल उठती हैं. हां भई! आखिरी फोटो उसने शादी में खिंचवाई थी, जो अब घर के किसी कोने में पड़े-पड़े रंग से बदरंग हो चुकी है. अब फोटो स्टूडियो वाले की अपनी मरजी. वह भी सिर्फ एक फोटो तो खींचेगा नहीं. बोला- देखो जी! तीस रुपये में तीन फोटो दूंगा.‘मैंगो मैन’ खुश हो गया. इसी बहाने दो फोटो एक्सट्रा हो जायेंगे.
छठ-दीपावली मनाने लोगबाग अपने-अपने घर आये हुए हैं. कोलकाता-मुंबई हो या दिल्ली. बिहार आने-जाने वाली सभी ट्रेनें ठसाठस भरी हुई हैं. वैसे यह कालजयी परंपरा है. क्योंकि ‘मैंगो मैन’ ट्रेन में रिजव्रेशन (आरक्षण) नहीं करवाता. भई! ट्रेन हुई सार्वजनिक संपत्ति. मतलब जितनी तेरी उतनी ही मेरी तो भला इसमें आरक्षण क्या करवाना? वैसे भी ट्रेनों में जब तक भीड़ न हो सफर का मजा अधूरा रह जाता है. और जिसने बर्थ आरक्षित करा ही रखी है, उसको ही कौन से मजे आ रहे हैं. वह बेचारा किनारे हो कर दुबक कर बैठा है. बिना टिकट वाला उसी की बर्थ पर सो रहा है. आखिर छठ मइया का ठेकुआ खाना इतना आसान थोड़े ही न है!
‘मैंगो मैन’ की अपनी कुछ खासियत होती है. उसे सपने भी भीड़भाड़ के ही आते हैं. जैसे राशन के लिए लाइन लगा कर खड़ा है. बीमार बच्चे के इलाज के लिए अस्पताल में अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा है. रेलवे स्टेशन पर शौचालय का उपयोग करने के लिए सात लोगों के पीछे शांत हो कर पंक्तिबद्ध है..आदि-आदि. जब कोई ‘मैंगो मैन’ एक साथ इतनी जद्दोजहद कर रहा हो, तो वह भला खुद को स्विट्जरलैंड की वादियों में कटरीना कैफ के साथ गाना गाते हुए कैसे देख सकता है?
उसे तो सब्जी से लेकर शादी तक में सब्सिडी हासिल करने की लड़ाई लड़नी पड़ती है. घर से हजार-दो हजार किलोमीटर दूर रहनेवाला ‘मैंगो मैन’ ठेकुआ खाने के लिए छठ मइया के घाट पर नंगे पांव पहुंचता है. क्या यह खास बात नहीं है? इसीलिए ‘मैंगो मैन’ खास है.
छठ-दीपावली मनाने लोगबाग अपने-अपने घर आये हुए हैं. कोलकाता-मुंबई हो या दिल्ली. बिहार आने-जाने वाली सभी ट्रेनें ठसाठस भरी हुई हैं. वैसे यह कालजयी परंपरा है. क्योंकि ‘मैंगो मैन’ ट्रेन में रिजव्रेशन (आरक्षण) नहीं करवाता. भई! ट्रेन हुई सार्वजनिक संपत्ति. मतलब जितनी तेरी उतनी ही मेरी तो भला इसमें आरक्षण क्या करवाना? वैसे भी ट्रेनों में जब तक भीड़ न हो सफर का मजा अधूरा रह जाता है. और जिसने बर्थ आरक्षित करा ही रखी है, उसको ही कौन से मजे आ रहे हैं. वह बेचारा किनारे हो कर दुबक कर बैठा है. बिना टिकट वाला उसी की बर्थ पर सो रहा है. आखिर छठ मइया का ठेकुआ खाना इतना आसान थोड़े ही न है!
‘मैंगो मैन’ की अपनी कुछ खासियत होती है. उसे सपने भी भीड़भाड़ के ही आते हैं. जैसे राशन के लिए लाइन लगा कर खड़ा है. बीमार बच्चे के इलाज के लिए अस्पताल में अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा है. रेलवे स्टेशन पर शौचालय का उपयोग करने के लिए सात लोगों के पीछे शांत हो कर पंक्तिबद्ध है..आदि-आदि. जब कोई ‘मैंगो मैन’ एक साथ इतनी जद्दोजहद कर रहा हो, तो वह भला खुद को स्विट्जरलैंड की वादियों में कटरीना कैफ के साथ गाना गाते हुए कैसे देख सकता है?
उसे तो सब्जी से लेकर शादी तक में सब्सिडी हासिल करने की लड़ाई लड़नी पड़ती है. घर से हजार-दो हजार किलोमीटर दूर रहनेवाला ‘मैंगो मैन’ ठेकुआ खाने के लिए छठ मइया के घाट पर नंगे पांव पहुंचता है. क्या यह खास बात नहीं है? इसीलिए ‘मैंगो मैन’ खास है.
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