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बुधवार, 10 जुलाई 2013

कर न सके हम सौदा पनीर का

कर न सके हम प्याज का सौदा, कीमत ही कुछ ऐसी थी/ लाल टमाटर छोड़ आये हम, किस्मत ही कुछ ऐसी थी.. आजकल हर ‘मैंगो मैन’ (आम आदमी) की व्यथा कुछ ऐसी ही है. कुछ दिन पहले तक दाल-चावल की महंगाई का रोना रोनेवाले लोग सब्जियों की कीमतों में भारी इजाफे के बाद अब उसी दाल की दुहाई दे रहे हैं, ‘‘शुक्र है कि दाल है, वरना शनिवार से गुरुवार तक उपवास ही करना पड़ता.’’
आज हर कोई भले ही महंगाई से परेशान हो, पर एक शख्स ऐसा है जिस पर कोई असर नहीं हो रहा. आप जानना चाहेंगे उसके बारे में? वह है ‘ईमानदार आदमी.’ उसे कल भी वस्तुएं महंगी लगती थीं, आज भी लगती हैं. वह कहता है, ‘‘जमीर बेच कर पनीर नहीं खरीद सकता. भले ही भूखा रहना पड़े. जब जमीर ही मर जायेगा तो शरीर जिंदा रह कर क्या करेगा? आखिर बापू का प्रिय भजन वैष्णवजन तो तेणो कहिए जो पीर परायी जाणो रे.. कब काम आयेगा.’’ बापू तो रहे नहीं, लाचारी में अन्ना हजारे को अपना आदर्श माननेवाला यह ईमानदार आदमी कभी अनशन, तो कभी उपवास, तो कभी धरना-प्रदर्शन के बहाने भोजन से मुक्ति पाने का बहाना ढूंढ़ता है. कल की ही बात है, एक टीवी चैनलवाले ने उसके मुंह में माइक ठूंसते हुए पूछा, ‘‘आपको भूख हड़ताल से इतना लगाव क्यूं है भला?’’ बोला, ‘‘आज भी जिस देश की एक चौथाई आबादी को भूखे पेट सोना पड़ता हो, उस देश में भूख हड़ताल से बेहतर विरोध का कोई साधन नहीं हो सकता. इस देश की सरकार सो रही है. हमारे ही वोटों से जीत कर ‘जन प्रतिनिधि’ का तमगा पहने ज्यादातर सांसद और विधायक संसद और विधानसभा की कैंटीनों में भयंकर सब्सिडीवाला खाना खाते हैं. इसलिए उन्हें लगता है कि जब इतना सस्ता खाना मिल रहा है, तो भला आम जनता महंगाई का हल्ला क्यों मचा रही है?’’
भले ही प्राकृतिक विपदा से तबाह उत्तराखंड को सरकार राहत न दिला सकी हो, पर बढती महंगाई और सब्जियों और दूध के दाम में हो रही बेतहाशा वृद्धि के मद्देनजर ‘कैलेंडर और पोस्टर योजना’ शुरू करने की योजना बना रही है. लोग सब्जियों की शक्ल न भूल जायें इसलिए इनके पोस्टर छपवा कर घर-घर पहुंचाये जायेंगे. दूध भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रहा है. बड़ों के लिए तो नहीं, पर बच्चों को इसकी खास जरूरत होती है. ऐसे में सरकार पोलियो ड्राप्स की तरह ‘दूध ड्राप्स’ पिलाने के लिए ‘मिशन दूध’ शुरू करने की तैयारी में है. महीने में एक दिन तय किया जायेगा, जब लोग अपने बच्चों को नजदीकी केंद्रों पर ले जा कर दूध ड्राप्स पिलवायेंगे. इसका स्लोगन भी ‘दो बूंद जिंदगी की’ रखा जायेगा. ये बात अलग है कि इससे बच्चों को जिंदगी मिले न मिले, सरकार को जरूर मिलेगी.

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

समंदर में सू-सू करने से सुनामी नहीं आती!


अभी कल की ही बात है मार्केट में रुसवा साहब मिल गये. मैंने खैर मकदब के बाद पूछा इधर कैसे आना हुआ चाचू? मुंह में पान की गिलौरी चबाते रुसवा साहब ने मुङो उपर से नीचे तक देखा. मानो आरबीआइ गवर्नर सुब्बाराव की तरह वे भी बढती महंगाई के लिये मुङो दोषी मान रहे हों. वे धीरे से बोले ‘बस यूं ही.’ मैंने पूछा- रांची में सब कैसा है, चाय पीना पसंद करेंगे? वे कुछ बोले तो नहीं पर मेरे साथ चाय की दुकान की तरफ हो लिये. चाय की पहली चुस्की के साथ ही मैंने पूछा-
चाचू, महंगाई के लिये आप किसे दोषी मानते हैं?
पब्लिक को. महंगाई सरकार ने नहीं बढ़ाई. महंगाई को बढ़ाया ज्यादा खाने-पीने वाले लोगों ने! अंट-संट कमाने वाले लोगों ने! हद है, खुद के पेट पर कंट्रोल है नहीं और सरकार से कहते हैं कि महंगाई को कंट्रोल करे. सरकार भला महंगाई को कैसे कंट्रोल कर सकती है. हालांकि सरकार की हरदम यह कोशिश रहती है कि वो जनता को महंगाई से मुक्त रखे मगर क्या करे, उसकी हर कोशिश पर विरोधी विरोध शुरू कर देते हैं. उसे जन-विरोधी करार देते हैं. उसे बाजारवाद और पूंजीवाद का हितैषी कहते हैं.
लेकिन चाचू ये पब्लिक इतना खाती क्यों है?
भतीजे, खाते रहना पब्लिक की जरूरत या मजबूरी नहीं, उसकी नियति होती है. पब्लिक अच्छा खाना खाये. यह सरकार की सेहत के लिए भी अच्छा नहीं माना जाता. इसलिए सरकार इतना चिंतित हो जाती है.
लेकिन चाचू पब्लिक के अच्छा खाने से सरकार को क्या नुकसान होता है?
दरअसल, पब्लिक के अच्छा खाने से सरकार का काम-धाम और उसकी जवाबदेही बढ़ जाती है. बाजार में दूध, मीट, दाल, फल और सब्जियों की कीमतों में भी इजाफा हो जाता है. शेयर बाजार के सूचकांक हिलोरे मारने लगते हैं.
लेकिन चाचू  सरकार महंगाई न सही भ्रष्टाचार तो रोक सकती थी?
भ्रष्टाचार को रोकने में सरकार फेल हुई लेकिन कथित ईमानदार लोग भी भ्रष्टाचार को कहां रोक पाए? जोर तो बहुत लगा लिया ईमानदारों ने कभी रामलीला मैदान, कभी जंतर-मंतर पर हो-हल्ला काटके मगर रहे ढाक के तीन पात. हो-हंगामे का असर इत्ता हुआ कि ईमानदारों ने अपना राजनीतिक दल खड़ा कर लिया.
  इतने में चाय खत्म हो गयी और रुसवा चाचू पान की दुकान की तरफ बढ लिये. मैंने पूछा चाचू-चाचू आप तो पूरी तरह संप्रग सरकार के पक्ष में खड़े दिखते हैं. कहीं 2014 का चुनाव लड़ने का इरादा तो नहीं? वे फिर मुङो उपर से नीचे तक देखते हुए बोले- बाल सफेद हो जाने से नादानी नहीं जाती और समंदर में सू-सू करने से सुनामी नहीं आती.

गुरुवार, 28 जून 2012

महंगाई की तपिश और मॉनसून के नखरे

महंगाई की तपिश में मानसून नखरे दिखा रहा है. नल में पानी नहीं है. बीज और उर्वरकों में बेतहासा मूल्यवृद्धि के बाद उदासीन हो चुके किसानों के खाली खेतों में घोटाले की घास उग आयी है. बाजार में बिक रहा ‘आम’ लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा है. बेइमानी की पानी से जला हुआ आदमी लस्सी भी फुंक-फुंक कर पी रहा है. यह बड़ा ही भयावह दौर है.
100 दिन में महंगाई को ‘मटियामेट’ कर द...ेने का दावा करने वाली सरकार आज कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं है. एक आंकड़ा देखिये- तब डीएपी 520 रुपये प्रति बोरी था आज 1000 रुपये है, पेट्रोल 49 रुपये प्रति लीटर से 79 रुपये और दाल 58 से 100 रुपये प्रति किलो बिक रहा है. अनाज के दाम भी अगर इसी रफ्तार में बढते रहे तो अभी हम बीन कर खाते हैं, आगे गिनकर खाना पड़ेगा. समझ में नहीं आ रहा इसके लिए सरकार दोषी है या पब्लिक? हर आदमी ‘आम’ हो गया है और परेशानियों से ‘पक’ गया है.
अभी कल की ही बात है. सब्जी मार्केट से लौटने के बाद श्रीमती जी का चेहरा लाल हुआ पड़ा था. सहमते हुए मैंने पूछा ‘क्या हुआ ‘भाग्यवान’? चेहरे पर गरमी का असर है या गरमी ही है.’ बोलीं- आप तो चुप ही रहिये. महंगाई का किस्सा अखबार में छाप-छाप के सबका दिमाग खराब कर रखा है. सब्जियों के दाम में आग लगी है, रिक्शे वाला 10 के बजाय 20 रुपये मांग रहा है. कहता है- मैडम, आपको पता नहीं क्या पेट्रोल का दाम बढ गया है. अब भला पेट्रोल के दाम बढने से रिक्शे का भाड़ा बढाने का क्या औचित्य?’ मन तो हुआ कि रिक्शे वाले के बचाव में दो शब्द कहूं पर श्रीमती जी के ‘शब्दबाण’ की डर से मेरी बात मेरे हलक में ही सूख गयी. मैंने एक गिलास ठंडा पानी उनकी खिदमत में पेश किया और बोला- छोड़ो जाने दो. पानी गला से जैसे-जैसे नीचे उतरा उनका गुस्सा कुछ कम हुआ. बोलीं ‘एक तो इतनी गरमी और उपर से इतनी महंगाई. आखिर कोई कैसे गुजर-बसर करे. सचमूच जिंदगी टफ हो गई है.’ मुझसे रहा नहीं गया ‘देखो, इतना भी निराश होने की जरू रत नहीं. यह महंगाई तो बस इस मौसम में चल रही तपिश की तरह है जो मॉनसून के आते ही छू मंतर हो जाएगी.’ जवाब था ‘पर मॉनसून भी तो नखरे दिखा रहा. लगता है सरकारी नीतियों से रू ठ गया है. कभी केरल तो कभी बंगाल में झलक दिखा कर कहीं छुप जा रहा. हमारी सरकार तो कुछ करने से रही. विपक्ष भी बावला हो गया है. यह कैसी व्यवस्था है जो दिन-रात मेहनत करने वाले मजदूर को या अन्न उपजाने वाले किसान को प्रतिदिन के 200 रुपए नहीं देती है, पर केवल क्रिकेट खेलने की काबिलियत के लिए किसी को 40 लाख रु पए देने को तैयार है?’