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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

रोटी की जगह अब मोबाइल चबाएंगे!

रफू मियां जोर-जोर से खबर बांच रहे थे ताकि अगल-बगल बैठे उनके यार-दोस्त ठीक से सुन-समझ सकें. ‘रिटायर्ड’ लोगों की यह ‘मित्र मंडली’ प्रतिदिन झुमरू  चाय वाले के यहां पौ फटते ही इकट्ठी हो जाती है. रफू मियां इस टीम के मेठ (लीडर) हैं. क्योंकि उनको दूसरे का बोलना ‘अच्छा’ नहीं लगता इसलिए अखबार पढ़ कर सुनाने का काम लीडर होने का फायदा उठाते हुए वे खुद ही करते हैं. राजनीतिक खबरों में उनकी दिलचस्पी अधिक है. उच्चरण करते हुए शब्दों को लगभग चबाकर बोलते हैं. पहले पेज से शुरू  होकर अब वे देश-विदेश पेज तक पहुंच चुके हैं. उनकी आंखें अचानक से चमक उठी. पहले बांची जा चुकी खबरों पर चर्चा को बीच में ही रोकते हुए वह जोर-जोर से बोलने लगे- ‘‘नौ महीने पुरानी सरकार के प्रधानमंत्री ने फिर एक नयी घोषणा कर दी है. मोदी ने  मोबाइल फोन पर दुनिया ले आने का आह्वान करते हुए कहा है कि ई-गवर्नेस पर नजर डालते समय हमें पहले मोबाइल के बारे में सोचना चाहिए और इस प्रकार एम-गवर्नेस अर्थात ‘मोबाइल गवर्नेस’ को महत्व देना चाहिए.’’ मोबाइल की चर्चा सुनकर वहां बैठे रफू मियां की मित्र मंडली में ऐसी खलबली मच गयी मानो उन्हें किसी ने पत्थर दे मारा हो. झंझट दास कहने लगे ‘‘इस कलमुंहे मोबाइल ने तो जिंदगी हराम कर रखी है. चिट्ठी-पत्री और शुभकामना संदेश को इतिहास की ओर धकेल दिया है. वहीं प्रेमी-प्रेमिकाओं की तो चांदी हो गयी, जब चाहे तब इश्क लड़ाओ. कुछ लोग रहते कहीं हैं, बताते कहीं और हैं. ये उल्लू बनाविंग का मुख्य साधन हो गया है.’’ इतने में सबसे किनारे बैठे पोपट लाल ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा ‘‘सुना है आजकल मैसेज फॉरवर्ड करने से भगवान को प्रसन्न करने का प्रयोजन भी मोबाइल से होता है. लिखा रहता है - 11 या 21 लोगों को भेजो फिर देखो चमत्कार. चमत्कार तो होता है पर मैसेज फॉरवर्ड करने वाले के बैलेंस कम होने का.’’ मिसिर जी बोले ‘‘मोबाइल की माया तो इतनी निराली है कि लोगबाग मिस-कॉल देकर अपनी जवाबदेही से मुक्त हो जाते हैं. फोन लगाओ किसी को तो लगता है किसी और को. कभी नेटवर्क फेल तो कभी बेमतलब बैलेंस गायब. किसी भी कंपनी का सिम लो, हालत सबकी एक जैसी ही है. जब मोबाइल पर बात ही ठीक से नहीं हो पाती तो और क्या होगा भला?’’ सभी बोल रहे थे पर सबसे अधिक मुखर शख्स मौन था. रफू मियां की चुप्पी सबको खलने लगी. किसी को भी इसका कारण समझ में नहीं आ रहा था. पोपट लाल ने अपने अंदाज में छेड़ा ‘‘क्या हुआ मियां तुम्हारी जुबान क्यों खामोश है, किसी ने सिम लॉक कर दिया क्या?’’ रफू मियां धीरे से बस इतना बोले ‘‘पता नहीं नेता देश को कहां ले जायेंगे, रोटी की जगह गरीब अब मोबाइल चबायेंगे. नौ महीने में न तो विकास हुआ, न प्रगति. मोदी गवर्नमेंट कुछ नहीं कर पा रही अब मोबाइल गवर्नेस की बाट देखिये!’’

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

सवालों के इस मौसम में एक मासूम सवाल

आज कल देश में जिसे देखो सवाल पूछता नजर आ रहा है. बाबा रामदेव से शुरु हुई यह परंपरा अन्ना हजारे से होते हुए अरविंद केजरीवाल तक आ पहुंची. अब कुछ लोग अरविंद केजरीवाल से भी सवाल पूछ रहे हैं- बताओ, आंदोलनकारी हो या उदारवादी? इस पर केजरीवाल ने तपाक से कहा-मैं एनी कोहली (प्रश्नकर्ता) को नहीं जानता इसलिए मैं उनके सवालों के उत्तर देने को जवाबदेह नहीं हूं. मेरी बेटी अक्सर मुझसे सवाल पूछती है. शुक्र है भाई केजरीवाल के पास सवाल से बचने को एक विकल्प तो है पर मेरे पास तो वह भी नहीं है. मुङो मेरी बेटी के हर सवाल का जवाब देना पड़ता है वह भी ईमानदारी से और उसी समय. वरना वह नाराज हो जाती है, और मैं उसे नाराज या दुखी नहीं करना चाहता. सवाल कभी भोलेपन से भरे तो कभी शरारत से सराबोर.

खैर, रोजमर्रा की जदोजहद से दो-चार होते कुछ सवाल मेरे जेहन में भी उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं. कभी-कभी ये सवाल इतने घनीभूत हो उठते हैं कि जवाब पा लेने को मन आतूर हो उठता है. एक वाकया पेश है- दवा दुकान पर करीब 20 साल का एक युवक अपनी मां के साथ आया. दुकान में भीड़ थी. इतने में मोबाइल की घंटी बजी उसने जेब से जैसे ही अपना मोबाइल निकाला वह जमीन पर गिरा और बिखर गया. युवक बेचैन हो उठा, अपनी मां पर चिखने-चिल्लाने लगा. दुकान पर खड़े ग्राहक उसकी ओर देखने लगे. बीमार मां असहज हो उठी. उसे समझ में नहीं आ रहा था वह उसे कैसे शांत करे. थोड़ी देर बड़बड़ाने के बाद युवक वहां से बाहर आया और अपनी पल्सर बाइक से तेजी से कहीं निकल गया. उसकी मां निढाल हो कर दुकान में रखी एक टूटी प्लास्टिक चेयर पर बैठ गयी. मेरी जिज्ञासा बढ गयी थी. मैंने पास जाकर पूछा मैडम, वह आपको यूं छोड़कर कहां चला गया. जवाब मिला ‘वह मेरा इकलौता बेटा है. मैं एक सप्ताह से बीमार हूं. बहुत कहने पर वह मुङो डॉक्टर के पास लेकर आया था. यहां उसकी महंगी मोबाइल गिरने से टूट गयी. वह उसे बनवाने गया है.’ ‘और आप?’ ‘मेरा क्या, मैं ऑटो करके घर चली जाउंगी.’ मैं सोचने लगा- क्या जिंदगी में मोबाइल की अहमियत मां से ज्यादा है? वह युवक मोबाइल खराब होने से इतना बेचैन हो उठा पर मां की तबियत खराब होने से उस पर कोई अंतर क्यों नहीं पड़ा?

क्या मनुष्य केवल देह है जो मात्र भौतिक सुखों से संतुष्ट हो जाये? हमारे भीतर की चेतना, संवेदनशीलता, प्रेम, करुणा, दया, सहानुभूति कहां विलुप्त हो गयी? क्या भोगवादी इस अवधारणा में इन अनुभवों के लिए कोई जगह नहीं है? क्या यह केवल दैहिक सुखों पर टिकी है? इन हालात पर तो कवि प्रदीप की पंक्तियां याद आ रही हैं-देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान!