तुम एनएच 33 की तरह व्यस्त रहती हो और मैं तुम्हारे इंतजार में जुबिली पार्क हो गया हूं. जब मैं तुम्हारे इंतजार में थक जाता हूं तो उन 86 बस्तियों सा महसूस करने लगता हूं जिन्हें आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है. फिर भी नसों में उम्मीदों का उबाल इतना तगड़ा है कि सांसे टूटती नहीं हैं. हां, कभी-कभी यह भी लगता है कि हमारी जिंदगी में मानगो पुल सा जाम लगने के कारण ठहराव आ गया है और कभी-कभी गरमी की तपती दोपहरी में टेल्को एरिया की सड़कों जैसी वीरानगी छा जाती है. फिर भी मैं सालाना आयोजन ‘फ्लावर शो’ की ताजगी और रंगीनियों जैसी ही खुशी देने वाले तुम्हारे इंतजार में हर दिन संस्थापक दिवस मनाता रहता हूं. सच तो यह है कि जब तुम बिष्टुपुर में होती हो तब मैं मानगो सा महसूस करता हूं. यह ‘खास’ और ‘आम’ होने का अहसास नहीं बल्कि समयानुकूल सच्चाइयों का सामना करना भर है. तुम्हारे साथ जब छप्पनभोग में स्वादिष्ट मिठाइयां खा रहा होता हूं तो तुम मुङो रसगुल्ला जैसी लगती हो, पर तन्हाइयों के वक्त मैं गोलगप्पा के उस फुचके जैसा हो जाता हूं जिसकी वैल्यू मसाला पानी के बिना नहीं होती. तुम्हारा स्वभाव मुङो कभी-कभी जलेबी जैसा भी लगता है. जिसे गरम खाओ तो मुंह जलता है और ठंडा खाने पर बेस्वाद लगता है. सीरियसली, जुबली पार्क मुझमें इस कदर बस गया है कि मैं तुम्हारे साथ साकची जाते वक्त स्टेडियम की तरफ से न जाकर जुबिली पार्क की तरफ से ही जाता हूं. उसकी खुली हवाओं को अपने नथुनों में भरते हुए. हरे-भरे पेड़ों और फूलों की ताजगी को मन ही मन समेटते हुए. जब तुम मेरे साथ होती हो मेरा मन साकची के मंगल बाजार की तरह गुलजार रहता है. जिसमें महंगी और ब्रांडेड चीजें नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में काम आनेवाले जरूरी सामान बहुत किफायती दामों में मिल जाते हैं. क्या हमारा प्यार सचमुच जमशेदपुर जैसा है? इतने त्योहार, इतने सेलिब्रेशन, इतने आयोजन होते हैं कि पता ही नहीं चलता कि कौन असली है और कौन बनावटी. मिश्रित संस्कृति ने शहर की पहचान छीन ली है. न कोई अपनी भाषा, न कोई अपना स्वभाव. लोग यहां होकर भी यहां के नहीं होते. यहां सबका मालिक एक है, पर सब खुद भी मालिक हैं अपनी मरजी के. दिखने में आयरन, पर अंदर बज रहा सायरन! अब छोड़ो भी. क्या रखा है इन शिकवा-शिकायतों में. मेरे मन में तुम्हारे प्रति वैसी ही अगाध श्रद्धा है जितनी शहरवासियों के मन में जमशेदजी टाटा के लिए. हां, एक बात मैं जरू र कहूंगा कि तुम अपने पहनावे से बागबेड़ा जैसी लगती हो. सीएच एरिया से बिष्टुपुर वाले रोड जैसा नया लुक आजमा कर देखो. बेहद खूबसूरत लगने लगोगी. मुङो उम्मीद है कि तुम इस प्रपोजल को मेरीन ड्राइव के मॉल और मल्टीप्लेक्स जैसा लटकाने के बजाय टाटा वर्कर्स युनियन के चुनाव जैसा शीघ्र ही मूर्त रू प में परिणत कर दोगी.
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सोमवार, 23 मार्च 2015
शनिवार, 27 दिसंबर 2014
उत्सवधर्मिता को जीता है जमशेदपुर
यह शहर शानदार है. यहां के लोग अपनी विरासत और संस्कृति का सम्मान करते हैं और दूसरे के साथ इसे साझा करते हुए उसे भी अपने साथ शामिल कर लेते हैं. त्योहारों के केंद्र में कुछ लोगों के लिए भले ही धार्मिक मान्यताओं का महत्व होता हो पर एक बड़ा तबका ऐसा भी है, जो उत्सवधर्मिता को जीता है. दुर्गा पूजा से लेकर, ईद तक. दीवाली से लेकर गुरुपर्व तक. टुसू में भी यह शहर उतना ही शरीक होता है जितना रामनवमी और मुहर्रम के जुलूस में. लगता है यहां की नागरिकता उत्सवधर्मिता से बनी है.
अभी जमशेदपुर क्रिसमस के जश्न में डूबा है. गली-मोहल्ले की छोटी-छोटी दुकानें भी क्रिसमस के गिफ्ट (चॉकलेट, सांताक्लाज, क्रिसमस ट्री आदि) से सजी हुई हैं. तरह-तरह की टोपियां बिक रही हैं. किराने की दुकान और जनरल स्टोर तक विभिन्न वेराइटी के केक से भरे पड़े हैं. कुछ गिने-चुने लोगों के लिए क्रि समस का मतलब भले ही सिर्फ सरकारी छुट्टी भर रह गया हो पर जमशेदपुर के व्यवहार में क्रि समस सिर्फ ईसाई धर्म के अनुयायियों का त्योहार नहीं है. छठ, होली और पोंगल की तरह क्रि समस भी सबका है. राजनीति में हर बात भले ही राज सत्ता से तय होती हो लेकिन जमशेदपुर के लोगों ने ‘गुड गवर्नेंस’ के साथ-साथ ‘गुड क्रि समस’ भी मनाया. विशेषकर बच्चों के उत्साह से क्रि समस भी अन्य त्योहारों की तरह हो गया है. गोलमुरी स्थित चर्च में प्रभु यीशु को चरनी में देखने वालों की कतार में ललाट पर चंदन लगाये पंडित जी भी हैं और गाढ़ा नारंगी रंग की पगड़ी बांधे अपने बच्चे का हाथ पकड़े सरदार जी भी. हर किसी की आंखों में वही चमक, वही कौतुहल. कोई भेदभाव नहीं, वही पवित्रता. यही दृश्य सभी गिरिजाघरों की है.
उत्सव कोई भी हो, खाना-पीना जमशेदपुरवासियों की पहली पसंद होती है. बंगाली ब्रिगेड के लिए तो गोलगप्पा के बिना हर उत्सव अधूरा है. इडली-डोसा, चाट, पकौड़ी और नान वेज के शौकीनों की भी कमी नहीं है. जुबिली पार्क के गेट नंबर दो से निकलते ही स्ट्रीट फूड के कतारों की फेहरिश्त में उपरोक्त व्यंजनों के अलावा प्रॉन फिंगर, मोमो, चाउमिन, हॉट डॉग और लिट्टी-चोखा खाने के लिए यूथ ब्रिगेड की होड़ लगी है. इस भीड़ में न तो कोई हिंदू समझ में आ रहा है, न ही मुसलिम और ईसाई. सब खूबसूरत और संतुष्ट लग रहे हैं. हर कोई खुश है. इस खुशी के केंद्र में क्रिसमस है. ऐसा क्रिसमस जो प्रेम और सौहार्द लेकर आया है. बनावटी नहीं सच्च. थोड़े ही दिन में नया साल भी आने वाला है. जुबिली पार्क में पिकनिक, मिलना-जुलना चलता रहेगा.. इस साल से अगले साल तक. सच्चे मन से सालों-साल तक. प्रार्थना है कि हमारा जमशेदपुर सदैव ऐसा ही बना रहे. कोई ‘परिवर्तन’ न हो. हर उत्सव में, हर त्योहार में, हर व्यवहार में. हर साल में-हर हाल में.
अभी जमशेदपुर क्रिसमस के जश्न में डूबा है. गली-मोहल्ले की छोटी-छोटी दुकानें भी क्रिसमस के गिफ्ट (चॉकलेट, सांताक्लाज, क्रिसमस ट्री आदि) से सजी हुई हैं. तरह-तरह की टोपियां बिक रही हैं. किराने की दुकान और जनरल स्टोर तक विभिन्न वेराइटी के केक से भरे पड़े हैं. कुछ गिने-चुने लोगों के लिए क्रि समस का मतलब भले ही सिर्फ सरकारी छुट्टी भर रह गया हो पर जमशेदपुर के व्यवहार में क्रि समस सिर्फ ईसाई धर्म के अनुयायियों का त्योहार नहीं है. छठ, होली और पोंगल की तरह क्रि समस भी सबका है. राजनीति में हर बात भले ही राज सत्ता से तय होती हो लेकिन जमशेदपुर के लोगों ने ‘गुड गवर्नेंस’ के साथ-साथ ‘गुड क्रि समस’ भी मनाया. विशेषकर बच्चों के उत्साह से क्रि समस भी अन्य त्योहारों की तरह हो गया है. गोलमुरी स्थित चर्च में प्रभु यीशु को चरनी में देखने वालों की कतार में ललाट पर चंदन लगाये पंडित जी भी हैं और गाढ़ा नारंगी रंग की पगड़ी बांधे अपने बच्चे का हाथ पकड़े सरदार जी भी. हर किसी की आंखों में वही चमक, वही कौतुहल. कोई भेदभाव नहीं, वही पवित्रता. यही दृश्य सभी गिरिजाघरों की है.
उत्सव कोई भी हो, खाना-पीना जमशेदपुरवासियों की पहली पसंद होती है. बंगाली ब्रिगेड के लिए तो गोलगप्पा के बिना हर उत्सव अधूरा है. इडली-डोसा, चाट, पकौड़ी और नान वेज के शौकीनों की भी कमी नहीं है. जुबिली पार्क के गेट नंबर दो से निकलते ही स्ट्रीट फूड के कतारों की फेहरिश्त में उपरोक्त व्यंजनों के अलावा प्रॉन फिंगर, मोमो, चाउमिन, हॉट डॉग और लिट्टी-चोखा खाने के लिए यूथ ब्रिगेड की होड़ लगी है. इस भीड़ में न तो कोई हिंदू समझ में आ रहा है, न ही मुसलिम और ईसाई. सब खूबसूरत और संतुष्ट लग रहे हैं. हर कोई खुश है. इस खुशी के केंद्र में क्रिसमस है. ऐसा क्रिसमस जो प्रेम और सौहार्द लेकर आया है. बनावटी नहीं सच्च. थोड़े ही दिन में नया साल भी आने वाला है. जुबिली पार्क में पिकनिक, मिलना-जुलना चलता रहेगा.. इस साल से अगले साल तक. सच्चे मन से सालों-साल तक. प्रार्थना है कि हमारा जमशेदपुर सदैव ऐसा ही बना रहे. कोई ‘परिवर्तन’ न हो. हर उत्सव में, हर त्योहार में, हर व्यवहार में. हर साल में-हर हाल में.
सोमवार, 9 जून 2014
अगर मैं कवि नहीं होता तो ट्रेन चला रहा होता : अरुण कमल
अरुण कमल की गणना आधुनिक कवियों की पहली पंक्ति में की जाती है. उनकी कविताओं में नए बिंब, बोलचाल की भाषा, खड़ी बोली के अनेक लय-छंदों का समावेश है. इनकी कविता में वर्तमान शोषण मूलक व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश, नफरत और उसे उलट कर एक नई मानवीय व्यवस्था का निर्माण करने की आकुलता सर्वत्र दिखाई देती है. इन्हें कविताओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कारों से नवाजा चुका है. एक साहित्यिक आयोजन में शिरकत करने जमशेदपुर (झारखंड) आये हिंदी के इस ख्यातिलब्ध कवि से बात की अखिलेश्वर पांडेय ने. पेश हैं इस इंटरव्यू के मुख्य अंश.
अरुण कमल (जन्म :1954 रोहतास, बिहार)
प्रमुख कृतियां हैं : अपनी केवल धार, सबूत नए इलाके में, पुतली में संसार तथा कविता और समय.
पुरस्कार-सम्मान : भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार (1980), सोवियत भूमि पुरस्कार (1989), श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार (1990), रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (1996), शमशेर सम्मान (1997) एवं कविता संग्रह ‘नए इलाके में’ के लिए (1998) साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित.
खुद के अभी तक के रचनाकर्म से संतुष्ट हैं?
नहीं, कतई संतुष्ट नहीं हूं, क्योंकि संतोष हो जाएगा तो लिखना बंद हो जायेगा. मुङो हमेशा लगता है कि कविता बिल्कुल वैसी होनी चाहिए जैसे कबीर और तुलसीदास की कविता हैं, जिनकी पंक्तियां गांव-गांव, शहर-शहर में लोगों की जुबान पर हैं. जो लोगों के सुख-दुख की सहचर हो. अभी तक मैंने ऐसा नहीं लिखा है.
आप कवि नहीं होते तो क्या होते?
रघुवीर सहाय की एक कविता है-मैं तोता होता तो क्या होता. वैसे ही अगर मैं कवि नहीं होता तो तोता होता. हो सकता है कि मैं कोई बड़ा स्मगलर होता. कोई मंत्री या प्रधानमंत्री भी हो सकता था. जब हम कोई एक निर्णय लेते हैं तो फिर उसी पर अडिग रहना पड़ता है/रहना चाहिए. एक साथ बहुत काम नहीं कर सकते. जैसे मैं कविता लिखता हूं तो यह तो नहीं हो सकता कि मैं किसी दूसरे देश की खुफियागीरी करूं, हत्यारों के साथ पार्टियों में जाऊं. भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का शागिर्द बन जाऊं. जब आप सड़क पर चल पड़ते हैं तो आपका ध्यान सिर्फ पेड़-पौधों पर होता है, वही आपके सहचर होते हैं. वैसे तो मैं पेशे से शिक्षक हूं, पर मेरी दिली ख्वाहिश रही है कि काश मैं रेलगाड़ी चला पाता. तो मुङो यह लगता है कि अगर मैं कवि नहीं होता तो मैं रेलगाड़ी का ड्राइवर होता. दरअसल, मुङो बचपन से ही ट्रेन को देखकर बड़ा कौतूहल होता था. मैं सोचता था कि आखिर कोई इतनी बड़ी ट्रेन को कैसे चला पाता है?
क्या कवि कोई विशिष्ट प्राणी है?
कवि का काम है कविता लिखना. कविता लिखने के लिए उसे तमाम तरह के यत्न करने पड़ते हैं. उसे अपने तरह की जिंदगी जीनी पड़ती है. अगर वह हमेशा सजा-संवरा, माला-दुशाला में रहेगा तो उसका अजीब तरह का स्वांग होगा. कवि के लिए सबसे अच्छा तो यही होता है कि उसे कोई न जाने कि वह कवि है, लोग उसकी कविताओं को जानें, यही कवि की विशिष्टता है. मेरी एक पंक्ति है- सितारा बनने से अच्छा है, गंदी गली का लैंपपोस्ट बनो.
इसी साल आपने जिंदगी का 60वां पड़ाव पार किया है? कुछ स्पेशल लग रहा है?
हां, इसका एक रोचक वाकया है. जिस दिन मैंने 60 साल पूरे किये, उसी दिन मैं रेलवे स्टेशन गया और वरिष्ठ नागरिक वाला एक रियायती टिकट खरीदा. हालांकि मुङो कहीं जाना नहीं था, फिर भी मैंने रियायती टिकट खरीदा और फिर दूसरे दिन जाकर वापस कर आया. थोड़े दिन रियायती टिकट लेकर बनारस गया और अब जमशेदपुर आया हूं. मुङो अच्छा लगा कि चलो उम्र बढ़ने का यह फायदा तो हुआ. मैं इस बात का हिमायती नहीं हूं कि उम्र बढ़ने से कोई विशिष्ट या बड़ा हो जाता है. इंसान बड़ा होता है अपने कर्म से, अपने गुण से. जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु इतनी कम उम्र में गुजर गये, लेकिन लोग उनकी रचनाओं को याद करते हैं. अंग्रेजी में शेली, किट्स और फ्रांस में रैम्बो. रैम्बो की तो सारी बेहतर कविताएं 20-21 की उम्र तक आ चुकी थीं. मेरा मानना है कि उम्र का न तो विशिष्टता से संबंध है और न ही गुणवत्ता से.
अब आगे क्या प्लानिंग है, कोई इच्छा?
मेरी बहुत इच्छा है कि मैं कैलाश-मानसरोवर देखूं, माउंट एवरेस्ट जाऊं, लेकिन मुङो पता है कि मैं अब यह नहीं कर सकता. लेकिन मेरी यह इच्छा अवश्य है कि मैं दुनिया का वह श्रेष्ठ साहित्य अवश्य पढूं जो अब तक नहीं पढ़ पाया या ठीक से नहीं पढ़ पाया. जैसे-महाभारत, रामचरित मानस, कालीदास, भवभूति आदि को ध्यान से पढ़ने की प्रबल इच्छा है. शेक्सपीयर भी मेरे प्रिय रचनाकार हैं, उन्हें भी और पढ़ना चाहता हूं. हां, एक बात और है - मैं ऐसी जगह रहना चाहता हूं जहां सामने नदी और पीछे पहाड़ हो, आसपास पेड़ हों. लेकिन यह ऐसी इच्छा है जो पूरी होनी मुश्किल है. मैं घाटशिला भी इसीलिए जाना चाहता हूं-जहां विभूति भूषण बंदोपध्याय रहते थे.
नये रचनाकारों के लिए कोई संदेश?
कभी भी सत्ता के पीछे न जाएं. रोजी-रोटी के लिए ज्यादा चिंतित न हों. हमारे पुरखे जो कहते थे वही बात मैं भी दोहराऊंगा कि जब भगवान ने मुंह चीर दिया है तो आहार भी मिल जायेगा. सत्ता और धन के प्रति हिकारत तो होनी ही चाहिए, उसके बिना कविता नहीं लिखी जा सकती. जिंदगी को अच्छे से जीने के लिए एक उन्मुक्तता जरूरी है. अन्याय का प्रतिकार करना चाहिए. जो कुछ भी दुनिया में सर्वोत्तम है उसे हासिल करने का प्रयत्न करना चाहिए. आप चाहे जिस भी क्षेत्र में हों, वहां अपना सर्वश्रेष्ठ दें.
वर्तमान राजनीति को आप कैसे देखते हैं?
अभी जो कुछ भी बदलाव हुआ है उसे मैं इस रूप में देखता हूं कि आम आदमी की जिंदगी में क्या बदलाव आया है. अगर उसकी जिंदगी में अच्छा बदलाव आया है तो समङिाये अच्छा हो रहा है. लेकिन अगर सिर्फ अरबपतियों की जिंदगी में अच्छा बदलाव आ रहा है तो समङिाये अच्छा नहीं है. जैसा व्यवहार आप मनुष्य के साथ करते हैं वैसा ही व्यवहार आप प्रकृति के साथ भी करते हैं. सिर्फ कुर्सी बदलना बदलाव नहीं है. बदलाव इंसानों में होना चाहिए. सबसे कमजोर आदमी की जिंदगी बेहतर हुई है तो समङिाये बदलाव हुआ है. सबको रोजी-रोटी मिले, किसी को रोजगार की चिंता न सताये. जब इंसान अपनी नौकरी जाने की चिंता छोड़, इत्मीनान से मछली मारे, अच्छा म्यूजिक सुने, सुकून की जिंदगी जीये, तब समङिाये कि अच्छे दिन आ गये.
आदिवासी साहित्य को बढ़ावा दे टाटा समूह
झारखंड की संताली और मुंडा कविता भी मुङो बहुत पसंद है. खासकर जगदीश त्रिगुणायत ने आदिवासी लोकगीतों का संग्रह तैयार किया ‘बांसुरी बज रही है’ नाम से. वह बहुत अच्छी है. उसने मुङो प्रभावित किया. मेरा मानना है कि आदिवासी भाषाओं की कविता को और ज्यादा प्रचारित-प्रकाशित किया जाना चाहिए. यह काम सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं को भी करना चाहिए. टाटा समूह को भी इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी चाहिए.
मिठाइयां खाने का शौक
मुङो खाने का बहुत शौक है. मैं जब भी केरल जाता हूं, ढेर सारे मसाले ले आता हूं. आलू दम का तो मैं दीवाना हूं. मुङो सभी तरह की मिठाइयां भी बहुत पसंद हैं. खासकर पुरानी मिठाइयां जैसे- गुड़ से बनी जलेबी, लाई, शक्करपाला, लक्ठो.
आमंत्रित करता शहर है जमशेदपुर
मैं दूसरी बार जमशेदपुर आया हूं. इस बार लंबे अरसे बाद आना हुआ है. खुला-साफ शहर है यह. पटना में मैं जिस इलाके में रहता हूं वहां आप शाम को भीड़ के मारे निकल नहीं सकते. यहां खाली व साफ सुथरी सड़कें मुङो आकर्षित करती हैं. सुबह जब मैं स्टेशन पर उतरा तो मुङो बहुत अच्छा लगा. झारखंड-बिहार में ऐसा शहर दूसरा नहीं है. यह एक कॉस्मोपॉलिटन सिटी है, शुरू से ही है. खास बात यह है कि इस शहर ने आरंभ से ही अपनी गुणवत्ता बरकरार रखी है. हर तरीके से यह एक आमंत्रित करता शहर है.
रविवार, 9 सितंबर 2012
माई पापा इज माई एटीएम
माई पापा इज माई एटीएम.. बिष्टुपुर के कमानी सेंटर में एक हमउम्र युवक का हाथ पकड़ कर घूम रही युवती के टी-शर्ट पर यही लिखा था. सात वर्षीय मेरी बेटी ने उस स्लोगन को पढने के बाद मुस्कराते हुए मेरा ध्यान उसकी ओर आकृष्ट कराया तो मेरे चेहरे से मुस्कराहट गायब हो गई. पापा जो बचपन में हमारा ख्याल रखते हैं. पापा जो युवावस्था में हमें सही मार्ग दिखाते हैं और दुनिया से बचाते हैं. वही पापा एक दिन हमारे लिए ‘वस्तु’ हो जाते हैं. वस्तु, जी हां क्योंकि किसी वस्तु का ही हम उपयोग करते हैं. जिनसे हमें प्यार होता है, उनके लिए तो हमारे दिल में सम्मान और समर्पण की भावना होती है, लेकिन आधुनिकता की होड़ में शामिल युवा पीढी में मां-बाप को सिर्फ ‘वस्तु’ बनाने की होड़ है. मानसिकता सिर्फ पाने की, बदले में कुछ देने की नहीं. माई पापा इज माई एटीएम.. महज टी-शर्ट पर लिखा एक स्लोगन भर नहीं है. यह यंग जेनरेशन की सोच को प्रतिबिंबित करता एक वाक्य भी है जिसके गंभीर निहितार्थ हैं.
एक भयावह तथ्य से आपको वाकिफ कराता चलूं. केवल जमशेदपुर ही नहीं झारखंड व बिहार के दूसरे शहरों तथा कोलकाता के साथ-साथ दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई, पुणो, चेन्नई, कटक, भुवनेश्वर सब जगह युवाओं में आत्महत्या की प्रवृति में बेतहासा वृद्धि हो रही है. जमशेदपुर में तो महीने के तीसो दिन यानि, औसतन हर रोज आत्महत्या की कोई न कोई घटना जरू र होती है. कभी पॉकेटमनी के लिए, कभी खेलने से मना करने पर, कभी स्कूटी न खरीदने पर, कभी नये मोबाइल के लिए.. और न जाने कितने बेवजह कारण. हद तो यह कि मां-बाप की जरा-सी भी बात बरदाश्त नहीं होती. संवादहीनता का दायरा व्यापक होता जा रहा है. दोस्तों से फोन पर घंटों बातें करने में कोई गुरेज नहीं रखने वाले बच्चों को अपने अभिभावकों से बात करने में जाने कैसी हिचक होती है. हां, इनकी जिंदगी में सबसे अहम कोई चीज है तो वह है मनी (पैसा). पावर और पैसे के पीछे भाग रही यह पीढी रिश्ते-नाते सबको पीछे छोड़ती जा रही है. सोचा, आखिर यह दिशाभ्रम क्यों है? तभी टीवी पर आ रहे एक विज्ञापन का जिंगल मेरे कानों में गुंजने लगा- ‘हर एक फेंड्र जरू री होता है.’ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन आज खुशहाल जीवन के नुस्खे बांट रहे हैं, जिसकी कीमत एक निश्चित रकम से तय होती है. इन विज्ञापनों की कोशिश ‘पैसा बोलता है’ जैसे मुहावरे को जायज ठहराने के साथ उसे स्थापित करने की भी होती है. पैसे के बोलने का मतलब स्नेह, ममता, प्रेम जैसे शब्दों का बाजारीकरण है. क्या सचमूच हमारी जिंदगी में माता-पिता, दादा-दादी, भैया-दीदी, चाचा-चाची के लिए कोई स्थान नहीं रहा. यह क्षरण हमें कहां ले जाएगा? क्या 'पिज्जा' हमें ‘पकवान’ से दूर करता जा रहा है?
एक भयावह तथ्य से आपको वाकिफ कराता चलूं. केवल जमशेदपुर ही नहीं झारखंड व बिहार के दूसरे शहरों तथा कोलकाता के साथ-साथ दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई, पुणो, चेन्नई, कटक, भुवनेश्वर सब जगह युवाओं में आत्महत्या की प्रवृति में बेतहासा वृद्धि हो रही है. जमशेदपुर में तो महीने के तीसो दिन यानि, औसतन हर रोज आत्महत्या की कोई न कोई घटना जरू र होती है. कभी पॉकेटमनी के लिए, कभी खेलने से मना करने पर, कभी स्कूटी न खरीदने पर, कभी नये मोबाइल के लिए.. और न जाने कितने बेवजह कारण. हद तो यह कि मां-बाप की जरा-सी भी बात बरदाश्त नहीं होती. संवादहीनता का दायरा व्यापक होता जा रहा है. दोस्तों से फोन पर घंटों बातें करने में कोई गुरेज नहीं रखने वाले बच्चों को अपने अभिभावकों से बात करने में जाने कैसी हिचक होती है. हां, इनकी जिंदगी में सबसे अहम कोई चीज है तो वह है मनी (पैसा). पावर और पैसे के पीछे भाग रही यह पीढी रिश्ते-नाते सबको पीछे छोड़ती जा रही है. सोचा, आखिर यह दिशाभ्रम क्यों है? तभी टीवी पर आ रहे एक विज्ञापन का जिंगल मेरे कानों में गुंजने लगा- ‘हर एक फेंड्र जरू री होता है.’ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन आज खुशहाल जीवन के नुस्खे बांट रहे हैं, जिसकी कीमत एक निश्चित रकम से तय होती है. इन विज्ञापनों की कोशिश ‘पैसा बोलता है’ जैसे मुहावरे को जायज ठहराने के साथ उसे स्थापित करने की भी होती है. पैसे के बोलने का मतलब स्नेह, ममता, प्रेम जैसे शब्दों का बाजारीकरण है. क्या सचमूच हमारी जिंदगी में माता-पिता, दादा-दादी, भैया-दीदी, चाचा-चाची के लिए कोई स्थान नहीं रहा. यह क्षरण हमें कहां ले जाएगा? क्या 'पिज्जा' हमें ‘पकवान’ से दूर करता जा रहा है?
शुक्रवार, 20 जुलाई 2012
पापा जल्दी मत आना
रांची से टाटा आ रही एसी बस में यात्र कर रहा एक लड़का और एक लड़की एक-दूसरे के इतने करीब हैं कि उनकी सांस एक-दूसरे से टकरा रही है. आजू-बाजू के लोगों की नज़रें उन पर गड़ी हैं. पर वे बिल्कुल जमाने से बेपरवाह. चांडिल आ चुका है, तभी लड़की का मोबाइल बज उठता है. ‘पापा हैं’, युवती युवक से कहती है. ‘जी पापा, बस अभी-अभी खुली है. आप बस स्टैंड आराम से मुङो लेने आना.’ लोग आश्चर्य से उसे देखते हैं. उसने अपने पापा से झूठ बोला है. वह जमशेदपुर के इतने करीब पहुंच चुकी है और खुद को रांची में बता रही है. युवक, ‘तुमने पापा को अच्छा उल्लू बनाया.’ लड़की मुस्कुराती है.
यह महज एक वाकया नहीं बल्कि भविष्य का वह डरावना सच है जिसे स्वीकार करते हुए हमें हिचकिचाहट हो सकती है. क्योंकि हर पिता सिर्फ और सिर्फ यही सुनने का आदी है ‘पापा जल्दी आना.’ और नयी पीढी की यह सोच - पापा जल्दी मत आना..यहां तुमसे भी जरूरी कोई है. जिसके साथ मैं अधिक से अधिक समय गुजारना चाहती/चाहता हूं. तुम बाद में भी आओगे तो फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन उसके साथ एक-एक पल कीमती है. पापा तुम सचमुच जल्दी मत आना..
आप मानिये या न मानिये समाज बहुत आगे निकल चुका है. आज पांच बरस के बच्चे को भी गले लगाते हुए डर लगता है. एक शिक्षक ने बताया ‘क्लासरूम में बच्चियां कहती हैं कि आप हमें बेटा क्यों कहते हैं सर.’ रिश्ते असहज हो रहे हैं. समय से पहले फल पक जाए तो स्वाद और सेहत दोनों ही पैमाने पर खरा नहीं उतरता. योग की कक्षाओं के लिए बहस भले न छिड़े, लेकिन यौन शिक्षा पर खुद को बुद्धिजीवी समझने वाला हर व्यक्ति इसकी पैरवी करता नजर आता है. इस पक्षधरता से वह अपने-आप को अभिजात्य और अधिक समझदार होने का दंभ भर सकता है.
आप कागज पर कानून बनाते रहिए और समाज की बखिया उघेड़ते रहिए. नतीजा वही होगा जो सामने है. ऊंचाई पर चढना और वहां अड़ना बहुत मुश्किल है. आसान है वहां से गिरना. यह समाज जिस रास्ते चल पड़ा है, उससे आगे का रास्ता भले चमकीला दिख रहा हो, लेकिन यह अंधेरे से पहले की चमक है. बहुत-से बुद्धिविलासियों को यह बात निगलने में मुश्किल होगी, लेकिन यह सच है. अब नानी-दादी की कहानियों का संबल नहीं है. चाचा-मामा तो अतिथियों की सूची में आ गए हैं. कौन संभालेगा इस टूटते-दरकते और बिखरते परिवार को, जो एक खोखले होते समाज की सबसे छोटी इकाई है! जब बचपन ‘पालना घर’ में और बुढापा ‘वृद्धाश्रम’ में बीतने लगे तो सोचने का समय है. बाजार हमें इसलिए तोड़ रहा है क्योंकि उसके लिए हम केवल उपभोक्ता हैं.
यह महज एक वाकया नहीं बल्कि भविष्य का वह डरावना सच है जिसे स्वीकार करते हुए हमें हिचकिचाहट हो सकती है. क्योंकि हर पिता सिर्फ और सिर्फ यही सुनने का आदी है ‘पापा जल्दी आना.’ और नयी पीढी की यह सोच - पापा जल्दी मत आना..यहां तुमसे भी जरूरी कोई है. जिसके साथ मैं अधिक से अधिक समय गुजारना चाहती/चाहता हूं. तुम बाद में भी आओगे तो फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन उसके साथ एक-एक पल कीमती है. पापा तुम सचमुच जल्दी मत आना..
आप मानिये या न मानिये समाज बहुत आगे निकल चुका है. आज पांच बरस के बच्चे को भी गले लगाते हुए डर लगता है. एक शिक्षक ने बताया ‘क्लासरूम में बच्चियां कहती हैं कि आप हमें बेटा क्यों कहते हैं सर.’ रिश्ते असहज हो रहे हैं. समय से पहले फल पक जाए तो स्वाद और सेहत दोनों ही पैमाने पर खरा नहीं उतरता. योग की कक्षाओं के लिए बहस भले न छिड़े, लेकिन यौन शिक्षा पर खुद को बुद्धिजीवी समझने वाला हर व्यक्ति इसकी पैरवी करता नजर आता है. इस पक्षधरता से वह अपने-आप को अभिजात्य और अधिक समझदार होने का दंभ भर सकता है.
आप कागज पर कानून बनाते रहिए और समाज की बखिया उघेड़ते रहिए. नतीजा वही होगा जो सामने है. ऊंचाई पर चढना और वहां अड़ना बहुत मुश्किल है. आसान है वहां से गिरना. यह समाज जिस रास्ते चल पड़ा है, उससे आगे का रास्ता भले चमकीला दिख रहा हो, लेकिन यह अंधेरे से पहले की चमक है. बहुत-से बुद्धिविलासियों को यह बात निगलने में मुश्किल होगी, लेकिन यह सच है. अब नानी-दादी की कहानियों का संबल नहीं है. चाचा-मामा तो अतिथियों की सूची में आ गए हैं. कौन संभालेगा इस टूटते-दरकते और बिखरते परिवार को, जो एक खोखले होते समाज की सबसे छोटी इकाई है! जब बचपन ‘पालना घर’ में और बुढापा ‘वृद्धाश्रम’ में बीतने लगे तो सोचने का समय है. बाजार हमें इसलिए तोड़ रहा है क्योंकि उसके लिए हम केवल उपभोक्ता हैं.
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