झारखंड लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
झारखंड लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 27 मई 2017

हल्दीपोखर का सच

सच का मुलम्मा चढ़ा देने से झूठ नहीं छिपता
थोड़ा फेरबदल करके 
आप उसके नंगापन को ढंक सकते हैं 
अमली जामा नहीं पहना सकते
क्योंकि झूठ नंगा होता है

जो हुआ नागाडीह और हल्दीपोखर में
मारे गये जो लोग
बच्चा चोर तो नहीं ही थे
किसने मारा
क्यों मारा
हो रही जांच
होती रहेगी 
फिलहाल तो
कई घरों की आंच ठंडी है

बूढ़ी मां की आंखों की आखिरी उम्मीद
श्मशानी राख में तब्दील हो गयी
बहन के सपने धुएं हो गये
बच्चों की निर्दोष आंखों ने 
देखें हैं जब से हैवानियत के मंजर
मासूमियत पत्थरा गयी है  
नवब्याहता की सूनी मांग
सच और झूठ के साबित हो जाने से भी
अब सिंदूरी नहीं होगी
अंखुआने से पहले ही 
ठूंठ हो चुका दांपत्य 
अब हरियाली का गीत नहीं गा पायेगा

हाथ जोड़कर जिंदगी की भीख मांगते युवक को देख
क्यों नहीं जगी मानवता
क्यों नहीं सुगबुगायी इंसानियत
बच्चा चोरी की अफवाह में 
हत्या सिर्फ युवकों की नहीं
मानवता की भी हुई है
फिर भी शर्मसार नहीं इंसान
हे भगवान!
हे भगवान!!

- अखिलेश्वर पांडेय

(झारखंड के नागाडीह और हल्दीपोखर में पिछले दिनों बच्चा चोर की अफवाह में छह युवकों की हत्या कर दी गयी) 

सोमवार, 9 जून 2014

अगर मैं कवि नहीं होता तो ट्रेन चला रहा होता : अरुण कमल


अरुण कमल की गणना आधुनिक कवियों की पहली पंक्ति में की जाती है. उनकी कविताओं में नए बिंब, बोलचाल की भाषा, खड़ी बोली के अनेक लय-छंदों का समावेश है. इनकी कविता में वर्तमान शोषण मूलक व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश, नफरत और उसे उलट कर एक नई मानवीय व्यवस्था का निर्माण करने की आकुलता सर्वत्र दिखाई देती है. इन्हें कविताओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कारों से नवाजा चुका है. एक साहित्यिक आयोजन में शिरकत करने जमशेदपुर (झारखंड) आये हिंदी के इस ख्यातिलब्ध कवि से बात की अखिलेश्वर पांडेय ने. पेश हैं इस इंटरव्यू के मुख्य अंश.


अरुण कमल (जन्म :1954 रोहतास, बिहार)  
प्रमुख कृतियां हैं : अपनी केवल धार, सबूत नए इलाके में, पुतली में संसार तथा कविता और समय. 
पुरस्कार-सम्मान : भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार (1980), सोवियत भूमि पुरस्कार (1989), श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार (1990), रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (1996), शमशेर सम्मान (1997) एवं कविता संग्रह ‘नए इलाके में’ के लिए (1998) साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित.

खुद के अभी तक के रचनाकर्म से संतुष्ट हैं? 
नहीं, कतई संतुष्ट नहीं हूं, क्योंकि संतोष हो जाएगा तो लिखना बंद हो जायेगा. मुङो हमेशा लगता है कि कविता बिल्कुल वैसी होनी चाहिए जैसे कबीर और तुलसीदास की कविता हैं, जिनकी पंक्तियां गांव-गांव, शहर-शहर में लोगों की जुबान पर हैं. जो लोगों के सुख-दुख की सहचर हो. अभी तक मैंने ऐसा नहीं लिखा है.

आप कवि नहीं होते तो क्या होते?
रघुवीर सहाय की एक कविता है-मैं तोता होता तो क्या होता. वैसे ही अगर मैं कवि नहीं होता तो तोता होता. हो सकता है कि मैं कोई बड़ा स्मगलर होता. कोई मंत्री या प्रधानमंत्री भी हो सकता था. जब हम कोई एक निर्णय लेते हैं तो फिर उसी पर अडिग रहना पड़ता है/रहना चाहिए. एक साथ बहुत काम नहीं कर सकते. जैसे मैं कविता लिखता हूं तो यह तो नहीं हो सकता कि मैं किसी दूसरे देश की खुफियागीरी करूं, हत्यारों के साथ पार्टियों में जाऊं. भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का शागिर्द बन जाऊं. जब आप सड़क पर चल पड़ते हैं तो आपका ध्यान सिर्फ पेड़-पौधों पर होता है, वही आपके सहचर होते हैं. वैसे तो मैं पेशे से शिक्षक हूं, पर मेरी दिली ख्वाहिश रही है कि काश मैं रेलगाड़ी चला पाता. तो मुङो यह लगता है कि अगर मैं कवि नहीं होता तो मैं रेलगाड़ी का ड्राइवर होता. दरअसल, मुङो बचपन से ही ट्रेन को देखकर बड़ा कौतूहल होता था. मैं सोचता था कि आखिर कोई इतनी बड़ी ट्रेन को कैसे चला पाता है?

क्या कवि कोई विशिष्ट प्राणी है?
कवि का काम है कविता लिखना. कविता लिखने के लिए उसे तमाम तरह के यत्न  करने पड़ते हैं. उसे अपने तरह की जिंदगी जीनी पड़ती है. अगर वह हमेशा सजा-संवरा, माला-दुशाला में रहेगा तो उसका अजीब तरह का स्वांग होगा. कवि के लिए सबसे अच्छा तो यही होता है कि उसे कोई न जाने कि वह कवि है, लोग उसकी कविताओं को जानें, यही कवि की विशिष्टता है. मेरी एक पंक्ति है- सितारा बनने से अच्छा है, गंदी गली का लैंपपोस्ट बनो.

इसी साल आपने जिंदगी का 60वां पड़ाव पार किया है? कुछ स्पेशल लग रहा है?
हां, इसका एक रोचक वाकया है. जिस दिन मैंने 60 साल पूरे किये, उसी दिन मैं रेलवे स्टेशन गया और वरिष्ठ नागरिक वाला एक रियायती टिकट खरीदा. हालांकि मुङो कहीं जाना नहीं था, फिर भी मैंने रियायती टिकट खरीदा और फिर दूसरे दिन जाकर वापस कर आया. थोड़े दिन रियायती टिकट लेकर बनारस गया और अब जमशेदपुर आया हूं. मुङो अच्छा लगा कि चलो उम्र बढ़ने का यह फायदा तो हुआ. मैं इस बात का हिमायती नहीं हूं कि उम्र बढ़ने से कोई विशिष्ट या बड़ा हो जाता है. इंसान बड़ा होता है अपने कर्म से, अपने गुण से. जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु इतनी कम उम्र में गुजर गये, लेकिन लोग उनकी रचनाओं को याद करते हैं. अंग्रेजी में शेली, किट्स और फ्रांस में रैम्बो. रैम्बो की तो सारी बेहतर कविताएं 20-21 की उम्र तक आ चुकी थीं. मेरा मानना है कि उम्र का न तो विशिष्टता से संबंध है और न ही गुणवत्ता से.

अब आगे क्या प्लानिंग है, कोई इच्छा?
मेरी बहुत इच्छा है कि मैं कैलाश-मानसरोवर देखूं, माउंट एवरेस्ट जाऊं, लेकिन मुङो पता है कि मैं अब यह नहीं कर सकता. लेकिन मेरी यह इच्छा अवश्य है कि मैं दुनिया का वह श्रेष्ठ साहित्य अवश्य पढूं जो अब तक नहीं पढ़ पाया या ठीक से नहीं पढ़ पाया. जैसे-महाभारत, रामचरित मानस, कालीदास, भवभूति आदि को ध्यान से पढ़ने की प्रबल इच्छा है. शेक्सपीयर भी मेरे प्रिय रचनाकार हैं, उन्हें भी और पढ़ना चाहता हूं. हां, एक बात और है - मैं ऐसी जगह रहना चाहता हूं जहां सामने नदी और पीछे पहाड़ हो, आसपास पेड़ हों. लेकिन यह ऐसी इच्छा है जो पूरी होनी मुश्किल है. मैं घाटशिला भी इसीलिए जाना चाहता हूं-जहां विभूति भूषण बंदोपध्याय रहते थे.

नये रचनाकारों के लिए कोई संदेश?
कभी भी सत्ता के पीछे न जाएं. रोजी-रोटी के लिए ज्यादा चिंतित न हों. हमारे पुरखे जो कहते थे वही बात मैं भी दोहराऊंगा कि जब भगवान ने मुंह चीर दिया है तो आहार भी मिल जायेगा. सत्ता और धन के प्रति हिकारत तो होनी ही चाहिए, उसके बिना कविता नहीं लिखी जा सकती. जिंदगी को अच्छे से जीने के लिए एक उन्मुक्तता जरूरी है. अन्याय का प्रतिकार करना चाहिए. जो कुछ भी दुनिया में सर्वोत्तम है उसे हासिल करने का प्रयत्न करना चाहिए. आप चाहे जिस भी क्षेत्र में हों, वहां अपना सर्वश्रेष्ठ दें.

वर्तमान राजनीति को आप कैसे देखते हैं?
अभी जो कुछ भी बदलाव हुआ है उसे मैं इस रूप में देखता हूं कि आम आदमी की जिंदगी में क्या बदलाव आया है. अगर उसकी जिंदगी में अच्छा बदलाव आया है तो समङिाये अच्छा हो रहा है. लेकिन अगर सिर्फ अरबपतियों की जिंदगी में अच्छा बदलाव आ रहा है तो समङिाये अच्छा नहीं है. जैसा व्यवहार आप मनुष्य के साथ करते हैं वैसा ही व्यवहार आप प्रकृति के साथ भी करते हैं. सिर्फ कुर्सी बदलना बदलाव नहीं है. बदलाव इंसानों में होना चाहिए. सबसे कमजोर आदमी की जिंदगी बेहतर हुई है तो समङिाये बदलाव हुआ है. सबको रोजी-रोटी मिले, किसी को रोजगार की चिंता न सताये. जब इंसान अपनी नौकरी जाने की चिंता छोड़, इत्मीनान से मछली मारे, अच्छा म्यूजिक सुने, सुकून की जिंदगी जीये, तब समङिाये कि अच्छे दिन आ गये.

आदिवासी साहित्य को बढ़ावा दे टाटा समूह
झारखंड की संताली और मुंडा कविता भी मुङो बहुत पसंद है. खासकर जगदीश त्रिगुणायत ने आदिवासी लोकगीतों का संग्रह तैयार किया ‘बांसुरी बज रही है’ नाम से. वह बहुत अच्छी है. उसने मुङो प्रभावित किया. मेरा मानना है कि आदिवासी भाषाओं की कविता को और ज्यादा प्रचारित-प्रकाशित किया जाना चाहिए. यह काम सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं को भी करना चाहिए. टाटा समूह को भी इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी चाहिए.

मिठाइयां खाने का शौक
मुङो खाने का बहुत शौक है. मैं जब भी केरल जाता हूं, ढेर सारे मसाले ले आता हूं. आलू दम का तो मैं दीवाना हूं. मुङो सभी तरह की मिठाइयां भी बहुत पसंद हैं. खासकर पुरानी मिठाइयां जैसे- गुड़ से बनी जलेबी, लाई, शक्करपाला, लक्ठो.

आमंत्रित करता शहर है जमशेदपुर
मैं दूसरी बार जमशेदपुर आया हूं. इस बार लंबे अरसे बाद आना हुआ है. खुला-साफ शहर है यह. पटना में मैं जिस इलाके में रहता हूं वहां आप शाम को भीड़ के मारे निकल नहीं सकते. यहां खाली व साफ सुथरी सड़कें मुङो आकर्षित करती हैं. सुबह जब मैं स्टेशन पर उतरा तो मुङो बहुत अच्छा लगा. झारखंड-बिहार में ऐसा शहर दूसरा नहीं है. यह एक कॉस्मोपॉलिटन सिटी है, शुरू से ही है. खास बात यह है कि इस शहर ने आरंभ से ही अपनी गुणवत्ता बरकरार रखी है. हर तरीके से यह एक आमंत्रित करता शहर है.

रविवार, 9 सितंबर 2012

माई पापा इज माई एटीएम

माई पापा इज माई एटीएम.. बिष्टुपुर के कमानी सेंटर में एक हमउम्र युवक का हाथ पकड़ कर घूम रही युवती के टी-शर्ट पर यही लिखा था. सात वर्षीय मेरी बेटी ने उस स्लोगन को पढने के बाद मुस्कराते हुए मेरा ध्यान उसकी ओर आकृष्ट कराया तो मेरे चेहरे से मुस्कराहट गायब हो गई. पापा जो बचपन में हमारा ख्याल रखते हैं. पापा जो युवावस्था में हमें सही मार्ग दिखाते हैं और दुनिया से बचाते हैं. वही पापा एक दिन हमारे लिए ‘वस्तु’ हो जाते हैं. वस्तु, जी हां क्योंकि किसी वस्तु का ही हम उपयोग करते हैं. जिनसे हमें प्यार होता है, उनके लिए तो हमारे दिल में सम्मान और समर्पण की भावना होती है, लेकिन आधुनिकता की होड़ में शामिल युवा पीढी में मां-बाप को सिर्फ ‘वस्तु’ बनाने की होड़ है. मानसिकता सिर्फ पाने की, बदले में कुछ देने की नहीं. माई पापा इज माई एटीएम.. महज टी-शर्ट पर लिखा एक स्लोगन भर नहीं है. यह यंग जेनरेशन की सोच को प्रतिबिंबित करता एक वाक्य भी है जिसके गंभीर निहितार्थ हैं.

एक भयावह तथ्य से आपको वाकिफ कराता चलूं. केवल जमशेदपुर ही नहीं झारखंड व बिहार के दूसरे शहरों तथा कोलकाता के साथ-साथ दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई, पुणो, चेन्नई, कटक, भुवनेश्वर सब जगह युवाओं में आत्महत्या की प्रवृति में बेतहासा वृद्धि हो रही है. जमशेदपुर में तो महीने के तीसो दिन यानि, औसतन हर रोज आत्महत्या की कोई न कोई घटना जरू र होती है. कभी पॉकेटमनी के लिए, कभी खेलने से मना करने पर, कभी स्कूटी न खरीदने पर, कभी नये मोबाइल के लिए.. और न जाने कितने बेवजह कारण. हद तो यह कि मां-बाप की जरा-सी भी बात बरदाश्त नहीं होती. संवादहीनता का दायरा व्यापक होता जा रहा है. दोस्तों से फोन पर घंटों बातें करने में कोई गुरेज नहीं रखने वाले बच्चों को अपने अभिभावकों से बात करने में जाने कैसी हिचक होती है. हां, इनकी जिंदगी में सबसे अहम कोई चीज है तो वह है मनी (पैसा). पावर और पैसे के पीछे भाग रही यह पीढी रिश्ते-नाते सबको पीछे छोड़ती जा रही है. सोचा, आखिर यह दिशाभ्रम क्यों है? तभी टीवी पर आ रहे एक विज्ञापन का जिंगल मेरे कानों में गुंजने लगा- ‘हर एक फेंड्र जरू री होता है.’ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन आज खुशहाल जीवन के नुस्खे बांट रहे हैं, जिसकी कीमत एक निश्चित रकम से तय होती है. इन विज्ञापनों की कोशिश ‘पैसा बोलता है’ जैसे मुहावरे को जायज ठहराने के साथ उसे स्थापित करने की भी होती है. पैसे के बोलने का मतलब स्नेह, ममता, प्रेम जैसे शब्दों का बाजारीकरण है. क्या सचमूच हमारी जिंदगी में माता-पिता, दादा-दादी, भैया-दीदी, चाचा-चाची के लिए कोई स्थान नहीं रहा. यह क्षरण हमें कहां ले जाएगा?  क्या 'पिज्जा'  हमें ‘पकवान’ से दूर करता जा रहा है?