वर्षो बीत गये दीपावली और छठ में घर गये. जब भी यह अवसर आता है, घर की बहुत याद आती है. याद आती है इस त्योहार के उत्साह की, उमंग की, सामूहिकता की और बचपन की भी. जीवन की आपाधापी में आप चाहे जितना भी आगे चले जायें, मन में एक कोना ऐसा अवश्य होता है जहां जिंदगी के कुछ खुशनुमा पलों की यादें रची-बसी होती हैं. ये यादें ऐसी धरोहर होती हैं, जो आपके जमीर को मरने नहीं देतीं. ये यादें ही जमीर को जिंदा रखती हैं और आपको ऊर्जावान व संजीदा बनाये रखती हैं. अभी शहर से लेकर गांव तक दीपावली-धनतेरस को लेकर बाजार गरम है. कोई साजो-सामान खरीद रहा तो कोई गिफ्ट, कोई पूजा-पाठ की तैयारियों में मग्न है तो कोई व्यापार में तल्लीन. प्रशासन चाहे कितना भी आगाह कर ले, लाखों-करोड़ों रुपये के पटाखे हवा में उड़ाये जाएंगे. यह जानते हुए भी कि यह न सिर्फ पैसे की बरबादी है बल्कि प्रदूषण की वजह भी. कोई मानता नहीं है. मेरी बेटी तेज आवाज वाले पटाखों से तो डरती है पर फुलझड़ी और रंग-बिरंगी रोशनी वाले आइटम उसे बेहद पसंद हैं. मुङो याद है, मैंने भी बचपन में खूब पटाखे चलाये हैं. छोटे चाचाजी (काका) कोलकाता से मेरे लिए ‘स्पेशल’ पटाखे लाते थे. साथ में ढेरों टॉफियां भी, जिन्हें मैं मित्रों को भी खिलाता था. हम सफल होने की जल्दबाजी में जो सबसे महत्वपूर्ण चीज खो रहे हैं वह है रिश्ते-नाते. आप सफलता की चाहे जितनी सीढ़ियां चढ़ लें, कुछ रिश्ते आपको सदा ही लुभाते हैं. मेरे बचपन की स्मृतियों में भी कुछ ऐसे ही रिश्ते बसे हैं. मैं अपने पिताजी के बजाय चाचा लोगों के बहुत करीब रहा. पेशे से शिक्षक रहे बड़े चाचाजी से मिला अपार स्नेह आज भी मेरी जिंदगी की धरोहर है. मैं सोचता हूं क्या हम अपने बच्चों को संयुक्त परिवार के स्नेह की वह खुशबू दे पा रहे हैं! एकल परिवार की व्यवस्था में यह सब शायद एक सपने की तरह है. भाई और बहनों से भरा-पूरा परिवार, दादी का लाड़-प्यार सब कुछ आज एक सपना ही तो है. छठ के अवसर पर मां के हाथ का बना ठेकुआ का स्वाद आज के किसी भी महंगी मिठाई में मिलना नामुमकिन है. मां के साथ शाम और सुबह के अघ्र्य के वक्त छठ घाट जाने में जो खुशी मिलती थी वह किसी पर्यटन स्थल पर जाकर हासिल नहीं हो सकती. रिश्तों के स्मरण की बात चल रही है तो एक हालिया घटना का जिक्र छेड़ना जरूरी हो जाता है. चार दिन पहले की बात है, रायपुर में रह रहे मेरे बचपन के एक मित्र सुबोध (राणा) ने फोन किया. बोला पहचान रहे हो या नहीं? मैं थोड़ी देर के लिए हतप्रभ रह गया. मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या प्रतिक्रिया दूं. अचानक से ढेर सारी स्मृतियां उमड़ने-घुमड़ने लगी. लंबी बातचीत के बाद मैंने उसे फोन करने के लिए धन्यवाद दिया. वाकई, रिश्तों का रिनुअल करना कितना अच्छा है, जरूरी है! आइये, इस दीपावली एक खूबसूरत पहल करें.
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शनिवार, 2 नवंबर 2013
सोमवार, 30 अप्रैल 2012
नयी टेक्नोलॉजी और नये जेनरेशन से डर कैसा?
आजकल सोशल साइटस-फेसबुक, चैटिंग और इंटरनेट को लेकर कई तरह की चिंताएं जताई जा रही हैं. क्या यह सच नहीं कि नयेपन को हमेशा ही संदेह भरी दृष्टि से देखा जाता है. इतिहास में झांक कर देखिये तो पता चलेगा कि रेलगाड़ी, महिलाओं की शिक्षा, फिल्मों और रेडियो सुनने तक पर कितना हंगामा हुआ. फिल्मी गाने सुनने वालों को बड़े-बुजुर्ग हिकारत भरी नजर से देखते थे. रेडियो और फिल्मों के प्रति आकर्षण जिनमें पैदा हो गई वे ‘नालायक पुत्र’ घोषित कर दिये जाते थे. पर जैसे ही टेलीविजन क्रांति आई मां-बाप पूरे परिवार के साथ बैठकर दूरदर्शन पर चित्रहार देखने लगे. बहुसंख्य परिवारों ने महाभारत और रामायण सीरियल में दिखाये गये अंतरंग दृश्यों को भी बड़े-बुजुर्गो और बच्चों के साथ श्रद्धाभाव से खूब देखा और वर्षो तक देखते रहे. कुछ उसी तरीके का डर इन दिनों न जाने कितने मां-बाप के मन में घर बना चुका है. यानि, उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि इंटरनेट हमारे बच्चों को बिगाड़ रहा है. वह यह समझते हैं कि हमारे बच्चे इंटरनेट पर ईल सामग्री देख रहे हैं, नशीली सामग्री लेने के तरीके सीख रहे हैं. पर इंटरनेट के प्रादुर्भाव से पहले बच्चों को ईल पत्रिकाएं देखने से कितने मां-बाप रोक पाते थे? किशोरावस्था में सिगरेट पीने का रोमांच किसके अंदर नहीं पैदा हुआ? दरअसल, किशोरावस्था और युवावस्था के दौरान ऐसा दौर हर किसी की जिंदगी में आता है. हम सभी अपने अनुभवों से जानते हैं कि उम्र के साथ इस सबका आकर्षण भी स्वत: ही खत्म हो जाता है. यह सच है कि टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के दौरान विवेक की जरू रत होती है पर यह तो व्यक्ति के स्व विवेक से ही उपजता है. मैंने बचपन में अपने परिवार में चीटियों को चीनी देने, पक्षियों को दाना देने और गर्मियों में राहगीरों के लिए शीतल जल की व्यवस्था करने की परंपरा देखी है. मेरा ऐसा मानना है कि इसके पीछे उपकार करने या मृत्यु के बाद स्वर्ग जाने की लालसा नहीं, बल्कि अन्यान्य प्रजातियों पर मनुष्य की निर्भरता को स्वीकार करने का बोध ही रहा होगा. आज जब अपनी छह वर्षीया बेटी को गौरेयों के पीछे भागते और उनको दाना खिलाते देखता हूं तो अपना बचपन याद आता है. ॅ हम सभी को मालूम है कि मां-बाप ही बच्चे के पहले गुरु होते हैं. इसीलिए मां-बाप जन्म से बच्चों को संस्कारों की घुट्टी पिलाते हैं. अपने गलत कामों को बच्चों से छुपकर अंजाम देते हैं और न जाने क्या-क्या इंतजाम करते हैं. हमें उसे बचपन से ही सच को सच और झूठ को झूठ बताने की आदत डाल लेनी चाहिए ताकि जिंदगी में सबकुछ साफ-सुथरा रहे. यह तो सर्वविदित है कि आपको जिस काम के लिए रोका जाए उसे करने की इच्छा बलवती होती जाती है. तो नयी जेनरेशन और नयी टेक्नोलॉजी को फलने-फूलने दीजिए. उससे डरिये नहीं समङिाये.
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