फेसबुक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फेसबुक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

सोशल मीडिया के तीर घाव करें गंभीर

उस दिन श्रीमती जी ने चाय का कप सामने रखते हुए पूछा- ‘‘आज इतनी जल्दी कैसे जग गये? कहीं जाना है क्या?’’ मैंने कहा- ‘‘जरा टीवी ऑन करो. महाराष्ट्र-हरियाणा का चुनाव परिणाम देखना है.’’ वह बोलीं- ‘‘पावर कट है.’’ इतना सुनते ही मुङो चाय कड़वी लगने लगी. हालांकि आधा कप पी चुका था. मैंने चाय छोड़ दी और सोने चला गया. काफी देर हो गयी, पर नींद नहीं आयी. श्रीमती जी ने मोबाइल पकड़ाते हुए कहा- ‘‘इतना अपसेट होने की जरू रत नहीं है. फेसबुक-व्हाट्सऐप आदि पर सारे अपडेट पड़े हैं.’’
मोबाइल ऑन करते ही व्हाट्सऐप पर पहला मैसेज दिखा- ‘‘हरियाणा-महाराष्ट्र के नतीजे आते ही राहुल गांधी विशाखापत्तनम में तूफान को महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं, जीजा जी पूछ रहे हैं जमीन के रेट कितने गिरे और बहन कहीं खादी की साड़ी खरीदने के लिए मां के साथ निकल चुकी हैं.’’ और फिर दूसरा मैसेज- ‘‘राहुल गांधी महात्मा गांधी के सपने को पूरा कर रहे हैं. गांधी ने कहा था कि आजादी के बाद अब कांग्रेस को नहीं होना चाहिए इसकी भूमिका खत्म.’’ फिर तीसरा- ‘‘देश के स्वच्छता अभियान में सबसे ज्यादा योगदान राहुल बाबा का ही है, क्यों है कि नहीं..?’’ अब तक यह बात साफ हो चुकी थी कि निश्चित ही कांग्रेस का बेड़ा गर्क हो चुका है. पर यह जानना बाकी था कि असल रुझान क्या है. किसको कितनी सीटें मिली या मिल रही है.  मैंने तुरंत फेसबुक का रुख किया. वहां भी एक से एक कमेंट-
‘‘बीजेपी की जीत के बाद सेंसेक्स आज 400 अंक उछल गया. अब इसकी धर्मनिरपेक्षता पर भी सवाल उठाये जा सकते हैं.’’
‘‘राज ठाकरे का उस वक्त हाथ उठ गया जब कोई रिपोर्टर उनसे ये पूछ बैठा कि सर आपके विधायकों की बैठक कब है? ’’
‘‘उजड़ा हुआ गुलशन और रोता हुआ माली... यानी कांग्रेस का अब क्या होगा?’’
‘‘सस्ते पटाखे चाहिए तो कृपया कांग्रेस कार्यालय में संपर्क करें. (मई माह की बिलकुल बंद पैकिंग मिलेगी.)’’
‘‘नौ साल पहले जब नारायण राणो ने शिवसेना छोड़ कर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीते तो बाल ठाकरे बहुत दुखी हुए थे. शिवसेना के नेता अरविंद भोंसले ने कसम खायी थी कि जब तक नारायण राणो अपनी सीट से हार नहीं जाते, वे चप्पल नहीं पहनेंगे. और नौ साल तक वे खाली पैर ही घूमते रहे. चुनाव परिणाम के बाद उन्हें 400 चप्पलें उपहार में मिली हैं.’’
एक संदेश तो बिल्कुल दार्शनिक अंदाज में था- ‘‘वह इतना कमजोर न होता, तो आप इतने मजबूत न होते.’’
अब मैं खुद को तरोताजा महसूस कर रहा था. बरबस ही मुंह से निकला- थैंक्स सोशल मीडिया!

रविवार, 13 मई 2012

साइबर जगत में ‘सत्यमेव जयते’ की धूम

मशहूर अभिनेता आमिर खान के पहले टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ को दर्शकों का जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है और एक सप्ताह के अंदर ही यह टीवी शो सोशल नेटवर्किग वेबसाइटों पर छा गया है. दुनिया की सबसे लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक पर ‘सत्यमेव जयते’ के पेज को 747,572 लोगों ने अब तक ‘लाइक’ किया है और 356,838 लोग इस शो की चर्चा कर रहे हैं. प्रत्येक रविवार को सुबह 11 बजे प्रसारित हो रहे इस टीवी शो की लोकप्रियता का आलम यह है कि बच्चे, बूढे, जवान सभी इस शो को न केवल देख रहे हैं बल्कि आमिर खान द्वारा उठाये गये मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं. ‘चुप्पी तोडो’ के नारे के साथ बाल यौन शोषण पर आज दिखाये गये शो को अब तक 3504 लोगों ने फेसबुक पर ‘लाइक’ किया है और 353 लोगों ने इस शो पर अपनी टिप्पणियां दी हैं. आमिर ने आज ‘सत्यमेव जयते’ के दूसरे एपिसोड में बालयौन शोषण का मुद्दा उठाते हुए कहा कि बालयौन शोषण एक डरावनी वास्तविकता है और शोध बताते हैं कि करीब 53 प्रतिशत बच्चे या दो में से एक बच्चा बाल यौन शोषण का शिकार रहा है.







सोमवार, 30 अप्रैल 2012

नयी टेक्नोलॉजी और नये जेनरेशन से डर कैसा?

आजकल सोशल साइटस-फेसबुक, चैटिंग और इंटरनेट को लेकर कई तरह की चिंताएं जताई जा रही हैं. क्या यह सच नहीं कि नयेपन को हमेशा ही संदेह भरी दृष्टि से देखा जाता है. इतिहास में झांक कर देखिये तो पता चलेगा कि रेलगाड़ी, महिलाओं की शिक्षा, फिल्मों और रेडियो सुनने तक पर कितना हंगामा हुआ. फिल्मी गाने सुनने वालों को बड़े-बुजुर्ग हिकारत भरी नजर से देखते थे. रेडियो और फिल्मों के प्रति आकर्षण जिनमें पैदा हो गई वे ‘नालायक पुत्र’ घोषित कर दिये जाते थे. पर जैसे ही टेलीविजन क्रांति आई मां-बाप पूरे परिवार के साथ बैठकर दूरदर्शन पर चित्रहार देखने लगे. बहुसंख्य परिवारों ने महाभारत और रामायण सीरियल में दिखाये गये अंतरंग दृश्यों को भी बड़े-बुजुर्गो और बच्चों के साथ श्रद्धाभाव से खूब देखा और वर्षो तक देखते रहे. कुछ उसी तरीके का डर इन दिनों न जाने कितने मां-बाप के मन में घर बना चुका है. यानि, उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि इंटरनेट हमारे बच्चों को बिगाड़ रहा है. वह यह समझते हैं कि हमारे बच्चे इंटरनेट पर ईल सामग्री देख रहे हैं, नशीली सामग्री लेने के तरीके सीख रहे हैं. पर इंटरनेट के प्रादुर्भाव से पहले बच्चों को ईल पत्रिकाएं देखने से कितने मां-बाप रोक पाते थे? किशोरावस्था में सिगरेट पीने का रोमांच किसके अंदर नहीं पैदा हुआ? दरअसल, किशोरावस्था और युवावस्था के दौरान ऐसा दौर हर किसी की जिंदगी में आता है. हम सभी अपने अनुभवों से जानते हैं कि उम्र के साथ इस सबका आकर्षण भी स्वत: ही खत्म हो जाता है. यह सच है कि टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के दौरान विवेक की जरू रत होती है पर यह तो व्यक्ति के स्व विवेक से ही उपजता है. मैंने बचपन में अपने परिवार में चीटियों को चीनी देने, पक्षियों को दाना देने और गर्मियों में राहगीरों के लिए शीतल जल की व्यवस्था करने की परंपरा देखी है. मेरा ऐसा मानना है कि इसके पीछे उपकार करने या मृत्यु के बाद स्वर्ग जाने की लालसा नहीं, बल्कि अन्यान्य प्रजातियों पर मनुष्य की निर्भरता को स्वीकार करने का बोध ही रहा होगा. आज जब अपनी छह वर्षीया बेटी को गौरेयों के पीछे भागते और उनको दाना खिलाते देखता हूं तो अपना बचपन याद आता है. ॅ हम सभी को मालूम है कि मां-बाप ही बच्चे के पहले गुरु होते हैं. इसीलिए मां-बाप जन्म से बच्चों को संस्कारों की घुट्टी पिलाते हैं. अपने गलत कामों को बच्चों से छुपकर अंजाम देते हैं और न जाने क्या-क्या इंतजाम करते हैं. हमें उसे बचपन से ही सच को सच और झूठ को झूठ बताने की आदत डाल लेनी चाहिए ताकि जिंदगी में सबकुछ साफ-सुथरा रहे. यह तो सर्वविदित है कि आपको जिस काम के लिए रोका जाए उसे करने की इच्छा बलवती होती जाती है. तो नयी जेनरेशन और नयी टेक्नोलॉजी को फलने-फूलने दीजिए. उससे डरिये नहीं समङिाये.