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सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

ये सोना अगर मिल भी जाये तो क्या है?

दुर्गापूजा का उफान फैलिन तूफान से भी फींका नहीं पड़ा. रेनकोट पहने और छाता लगाये श्रद्धालुओं का रेला जगह-जगह मेलों में देखा जा सकता था. धर्म-अध्यात्म के जानकार बताते हैं कि ऐसे त्योहारों, आयोजनों के दौरान लोगों का उत्साह दोगुना हो जाता है. ‘कुंडलिनी’ जाग्रत हो जाती है. मैंने भी इसे ‘महसूस’ किया. महिलाओं-बच्चे, बीमार- स्वस्थ, बड़े-बूढ़े सभी उत्साह से लबरेज दिखे. यहां तक कि चोर-उचक्के भी. दुर्गापूजा के दौरान लौहनगरी में चोरी-लूट की घटनाएं भी बढ गयी थीं. किसी का पर्स चोरी, तो किसी का जेवर. किसी की स्कूटी चुरा ली, तो किसी की कार गायब कर दी.
मेला देखने के जोश में होश खो बैठी श्रीमती जी का मंगलसूत्र किसी उचक्के ने उड़ा लिया. उन्हें दुखी देख कर मैंने समझाने की कोशिश की- ‘इसमें इतना अफसोस करने की क्या बात? त्योहार का दिन है, इंज्वाय करो.’ वह बोलीं- ‘क्या खाक इंज्वाय करूं, माता के दरबार में आयी थी और ऐसा हो गया.’ मैंने कहा- ‘कोई जरूरतमंद रहा होगा, माता ने उसकी सुन ली. अब चलो, दूसरा ले लेना.’ श्रीमती जी मां चंडी की तरह मुझ पर बरस पड़ीं- ‘दूसरा कहां से ले लेंगे. इस महंगाई में दो वक्त की सब्जी तो खरीद नहीं पाते, जेवर कहां से खरीद लेंगे?’
मैंने अपना ज्ञान (या शायद अज्ञान) बघारने की कोशिश की. सोचा कि शायद इससे बात बन जाये. बोला- ‘देखो, उन्नाव (उत्तर प्रदेश) में 1000 टन सोना मिलने वाला है. आज के बाजार मूल्य के मुताबिक, इस सोने की कीमत तीन लाख करोड़ रुपये होगी. हमारे रिजर्व बैंक के पास 550 टन सोने का रिजर्व है और वह इस मामले में दुनिया में 11वें नंबर पर है.  खजाने से मिलने वाले सोने को जोड़ देने पर आरबीआइ दुनिया में 8वें नंबर पर आ जायेगा. इससे हमारे रु पये की आंतरिक कीमत भी बढ़ जायेगी. कुल मिला कर कहें, तो हमारा देश अमीर हो जायेगा. सोने की कीमत घट जायेगी. इस प्रकार इसे आम आदमी भी आसानी से खरीद पायेगा.’ पर वह कहां मानने वाली थीं. बोलीं- ‘जिस देश में आालू-प्याज आम आदमी की पहुंच से दूर हो, वहां सोना किस प्रकार सहजता से उपलब्ध होगा? कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाले इस देश में आज चिड़िया जितना भी सोना नहीं रहा.’ मैं चुप हो गया. मुङो इसी में अपनी भलाई लगी.
अब भला उन्हें कौन समझाये कि हमारा देश साधु-संतों का देश है. संत जो कह दें, वह पत्थर की लकीर होती है. आखिर शोभन सरकार ने जो सपना देखा है, वह गलत तो नहीं होगा. हम ताउम्र देखे-अनदेखे सपनों को पूरा करने के लिए ही तो भागते रहते हैं. वैसे राजनीति के जानकार यह भी कह रहे हैं कि इस सोने की खुदाई के पीछे नेताजी (मुलायम सिंह यादव) का दिमाग है. आगामी लोस चुनाव में ‘मोदी प्रकोप’ से बचने के लिए नेताजी का यह ‘खोदी दावं’ है.

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

मंगलसूत्र पहनते हैं पार्टी के कार्यकर्ता

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि हिंदू विवाह में मंगलसूत्र का क्‍या महत्‍व है। इसकी पवित्रता और इसका क्‍या रस्‍म-रिवाज है। पर क्‍या आपने कभी सोचा है कि मंगलसूत्र का कोई राजनीतिक उपयोग भी हो सकता है। नहीं न। तो लीजिये पढिये यह रोचक जानकारी-

यह चुनावी सीजन है। जाहिर सी बात है कि अभी चुनावी खबरों का बोलबाला है। नई व रोचक जानकारियां भी मिल रही हैं। ऐसी ही एक रोचक जानकारी चेन्‍नई से आई है- द्रमूक नामक राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता संगठन के प्रति अपनी वफादारी को साबित करने के लिए पार्टी के नाम का मंगलसूत्र पहनते हैं।

द्रमूक पार्टी के कार्यकर्ता अपने विवाह के अवसर पर बनने वाले मंगलसूत्र में पार्टी का चुनाव चिन्‍ह उगता सूर्य खुदवा कर अपनी पत्नियों को देते हैं जिसे वे खुशी-खुशी धारण करती हैं। यह पार्टी के प्रति वफादारी की मिसाल है। तमिलनाडू के एक गांव पट़टी में पिछले तीन पीढियों से यह परंपरा आज भी जारी है।
क्‍यों है न कमाल की जानकारी।


जरा सो‍चिये-
अगर राजद के कार्यकर्ताओं को ऐसी वफादारी दिखानी पडे तो उनकी पत्नियों को लालटेन पहनना पडेगा और कांग्रेस कार्यकर्ता अपना हाथ काटकर पत्‍नी के गले में लटका देंगे। इससे आपको अंगुलीमाल डाकू की कहानी तो याद आ ही गयी होगी। रालोद वालों की दुर्दशा तो सोचिये बेचारों को अपनी श्रीमति को जी इस बात के लिए सहमत करना कितना मुश्किल होगा कि प्‍लीज हैंडपंप अपने गले में लटका लो आखिर यह मेरी पार्टी का चुनाव चिन्‍ह है। इससे भी बुरा हश्र तो बसपा वालों का हो जाएगा वे हाथी को गले में लटकाएंगे या हाथी के गले में ही लटक जाएंगे। और न जाने किन-किन पार्टियों के क्‍या-क्‍या चुनाव चिन्‍ह होते हैं उनका क्‍या होगा।
है न फनी थिंकिंग ----