सच कहिये तो इ राजनीति भी ससुरी बड़ी टूच्ची चीज है. सहा भी नहीं जाता, रहा भी नहीं जाता. लोकतंत्रवासी जानबूझ के मक्खी निगलने के आदी हो चुके हैं. निकम्मे नेताओं को खुद ही वोट देते हैं और फिर पांच बरिस तक गाली देते रहते हैं. अरे, नेता लोगन पर गोसाने से क्या फायदा? उ काहे काम करेगा, संसद हो या बाहर. ओके मरजी, नहीं करेगा काम. किसके डर से करेगा काम. न लोग (जनता) का डर है लोक (संसद) का. सत्ता पक्ष बरजोरी कर रहा और विपक्ष जोकरई. संसद में भूकंप न आ जाये इस डर से राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अकेले में मिलते हैं. पर उ कहे या बताये क्या? मालूम नहीं चल पाता. इ तो गजबे हो गया भईया! दुनिया में एह से बढ़कर अचरज और का होवेगा कि संगीन आरोप लगावे के डूगडूगी पीटे वाला आदमी आरोपी के कान में बुदबुदा के हंसत-खेलत घर आ गवा. असल भूकंप त एही है! अब आप अगर अइसा सोचते हैं कि काम नहीं तो पइसा नहीं (संसद के शीतकालीन सत्र में एक भी दिन काम नहीं हुआ तो सांसदों को उतने दिन का वेतन नहीं मिलना चाहिये) तो सोचते रहिये. किसने मना किया है. टाइम तो आखिर आप ही के पास है. उन लोगन जइसन आप बिजी थोड़ी न हैं!
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शनिवार, 17 दिसंबर 2016
मंगलवार, 26 अप्रैल 2016
पानी उदास है
नानी के बिना कहानी उदास है
रोजगार के बिना जवानी उदास है
टूट गये सपने, उम्मीदें उदास है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है
गंगा में चाहे डूबकी लगाओ
महाकुंभ में जाकर जितना नहाओ
रो रही धरती, सुबकता आकाश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है
छिज गया भरोसा हमारा-तुम्हारा
परहित की बातें नहीं हैं गंवारा
पॉलिटिक्स हुई डर्टी, न कोई आश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है
सुखे जलाशय, सुख रही नदियां
पैसों की भूखी है ये देश-दुनिया
क्रिकेट में हो रहा पानी का नाश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है.
रोजगार के बिना जवानी उदास है
टूट गये सपने, उम्मीदें उदास है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है
गंगा में चाहे डूबकी लगाओ
महाकुंभ में जाकर जितना नहाओ
रो रही धरती, सुबकता आकाश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है
छिज गया भरोसा हमारा-तुम्हारा
परहित की बातें नहीं हैं गंवारा
पॉलिटिक्स हुई डर्टी, न कोई आश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है
सुखे जलाशय, सुख रही नदियां
पैसों की भूखी है ये देश-दुनिया
क्रिकेट में हो रहा पानी का नाश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है.
बुधवार, 6 मई 2015
कह दो नाखुदाओं से तुम कोई खुदा नहीं
किसानों की मौत पर घड़ियाली आंसू बहाने व गंदे हथकंडे अपनाने वाले राजनीतिक दलों! तुम्हें क्या कभी इस बात पर भी रोना आया कि तुम्हारे अंदर की संवेदनाएं दिन-ब-दिन मर रही हैं. गांव का किसान अपने पड़ोसी से खेत की मेढ़ काटने का मुकदमा लड़ते-लड़ते जवानी खोकर बुढ़ापे की दहलीज में कब प्रवेश कर जाता है उसे खुद ही मालूम नहीं पड़ता. खाद-बीज और सिंचाई के मकड़जाल में किसान की जिंदगी इस कदर उलझी होती है कि उसकी बेटी सयानी होकर ब्याह करने लायक हो गयी, इस बात का भान उसे आस-पड़ोस वालों के ताने सुन कर ही होता है. वह करे तो क्या करे? जवान बेटी के अरमानों की डोली उठने का ख्वाब पाले उसके कानों में बिस्मिला खान की शहनाई नहीं बल्कि घरवाली की कर्कश आवाज गूंजती रहती है ‘तोहरे चेंट में पइसा ना हवे त हमार गहना-गुरिया बेचके एकर बियाह करी द.’ घर में बैठी बेटी के मुस्कान उसके चेहरे में ही कहीं खो गयी है. दिल का दर्द दबाते-दबाते होंठ काले पड़ गये हैं. उसके हाथ की लकीरों में क्या है, उसे भले ही न पता हो पर उसे इस बात का गुमान अवश्य है कि ये नेता उसकी तकदीर नहीं बदल सकते. ज्यादातर किसान लोकसभा-राज्यसभा चैनल नहीं देखते. उन्हें इस बात का इल्म नहीं है कि संसद में बैठे माननीय कभी ‘बेटा बूटी’ तो कभी ‘सांवली औरत’ जैसी ऊटपटांग बातों में देश का वक्त जाया कर देते हैं. वह तो यह भी नहीं जानते कि इस देश के प्रधानमंत्री की पत्नी को अपने अधिकारों की लड़ाई आरटीआइ के माध्यम से लड़नी पड़ रही है. खुद कहानी गढ़ने, खुद किरदार बनाने और खुद इल्जाम तय कर खुद ही जज बन जाने का ये गजब दौर है. गुमशुम अटल, न लाल-न कृष्ण, मझधार में मांझी, न नीति-न ईश, डगमगाते विश्वास का दौर..! किसके पास जाएं, किससे करें फरियाद. कौन होगा मददगार, कौन तारणहार..! ऐसे में इस देश के किसानों के मन में यह सवाल जरू र उठता है - न राज है न नाथ है. कोई पप्पू है, कोई फेंकू है. जनता अनाथ है तो नेता कहां है? कौओं की टोली में हंस को ढूंढ़ने का क्या फायदा?
सच्चई तो यह है कि इस देश के किसान भोले-भाले जरू र हैं पर वे खुद के नाथ हैं. उन्हें भरोसा है अपने हाथ पर. कर्म को सवरेपरि मानने वाला किसान किस्मत और किसी खेवनहार के सहारे की उलझनों से अब बाहर आना चाहता है. ऐसे में अगर कोई किसान शायरी लिखने लग जाये तो उसका पहला शेर यही होगा - कश्तियां ना सही हौसले तो साथ हैं/ कह दो नाखुदाओं से तुम कोई खुदा नहीं. अब राजनीतिक आकाओं को यह बात समझनी ही होगी कि वो दिन चले गये जब छलावे की राजनीति और डपोरशंखी घोषणाओं से किसानों को बहलाया जा सकता था. किसी को कुछ करना ही है तो वह करोड़ों किसानों का दिल जीते..उसका सच्च दोस्त बन कर.
सच्चई तो यह है कि इस देश के किसान भोले-भाले जरू र हैं पर वे खुद के नाथ हैं. उन्हें भरोसा है अपने हाथ पर. कर्म को सवरेपरि मानने वाला किसान किस्मत और किसी खेवनहार के सहारे की उलझनों से अब बाहर आना चाहता है. ऐसे में अगर कोई किसान शायरी लिखने लग जाये तो उसका पहला शेर यही होगा - कश्तियां ना सही हौसले तो साथ हैं/ कह दो नाखुदाओं से तुम कोई खुदा नहीं. अब राजनीतिक आकाओं को यह बात समझनी ही होगी कि वो दिन चले गये जब छलावे की राजनीति और डपोरशंखी घोषणाओं से किसानों को बहलाया जा सकता था. किसी को कुछ करना ही है तो वह करोड़ों किसानों का दिल जीते..उसका सच्च दोस्त बन कर.
सोमवार, 14 जुलाई 2014
वो धारदार कलम कहां से लाऊं?
जब से देश का निजाम बदला है, राजनीति पर व्यंग्य लिखनेवालों के ‘बुरे दिन’ आ गये हैं. दिमाग पर थोड़ा जोर डालिए और फ्लैशबैक में जाइए.. यह बात ज्यादा पुरानी नहीं, महज छह महीने पहले की है. सोशल मीडिया हो या टेलीविजन, समाचार पत्र हो पत्रिका. जहां देखिए वहीं हर दूसरा शख्स राजनीति पर तंज कसता दिखता था. कई लोगों को तो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देखते ही व्यंग्य सूझने लगता था. कई ऐसे भी थे जिन्होंने सोनिया और राहुल पर व्यंग्य लिख-लिख कर अपने को लेखन की दुनिया में दुर्दात व्यंग्यकार साबित कर दिया. यह अलग बात है कि लालकृष्ण आडवाणी भी व्यंग्यकारों के लिए कम प्रिय नहीं रहे. लेकिन जैसे ही पीएमओ में प्रधानमंत्री का नेम प्लेट बदला वैसे ही पता नहीं व्यंग्यकारों के कलम की स्याही सूख गयी या उनके हाथों में कंपकंपी होने लगी.. यह ठीक-ठीक कहना मुश्किल है. यह पता लगने में जरा वक्त लगेगा. यह मैं नहीं कह रहा, बल्कि यह बात हाल ही में हुए एक ‘सव्रे’ में सामने आयी है. जब से इस सव्रे की रिपोर्ट आयी है, मेरे अंदर का ‘व्यंग्यकार’ तिलमिला गया है. सव्रे में यह भी कहा गया है कि व्यंग्यकारों की कलम की धार कुंद हो गयी है. उनके लेखन का पैनापन खत्म हो गया है. इसी तिलमिलाहट में मैं यह सोचते-सोचते कि आगे करना क्या है, रास्ते से गुजर रहा था कि शहर के एक जाने-माने साहित्यकार मिल गये. मैंने शिष्टाचारवश उनका अभिवादन किया तो वे पूछ बैठे ‘क्यों जनाब! कुछ परेशान दिख रहे हैं.’ मैं उलझन में था ‘हां’ कहूं या ‘ना’. खैर मेरी उलझन दूर करते हुए साहित्यकार महोदय ने कहा, ‘बताओ भई क्या बात है?’ मैंने कहा ‘क्या सच में अब कोई राजनीति पर व्यंग्य नहीं लिख रहा?’ वे बोले ‘हां, हो सकता है. पर अगर ऐसा है भी तो क्या फर्क पड़ता है? राजनीति पर व्यंग्य लिख देने से किस समस्या का समाधान हो जायेगा? क्या व्यंग्य लिख कर देश में आसन्न सूखे के संकट को टाला जा सकता है या बेतहाशा बढ़ रही महंगाई पर काबू पाया जा सकता है?’ साहित्यकार महोदय की बातें सुन कर मुङो गुस्सा आ रहा था. मैंने झुंझला कर कहा, ‘मुङो कहीं जाना है, चलता हूं.’ इतना कह कर मैं वहां से चल पड़ा. पीछे से आवाज सुनायी पड़ी, ‘कहां जा रहे हो..?’ वहां से चला तो थोड़ी ही दूर पर स्टेशनरी की दुकानें दिखीं. मैं बरबस ही वहां पहुंच गया. दुकानदार ने पूछा, ‘क्या दूं साहब?’ मैंने कहा ‘क्या आपके पास कोई ऐसी कलम है जिसकी धार पैनी हो?’ झट से उसने कहा, ‘आपको कलम चाहिए या चाकू? हमारे यहां तरह-तरह की कलमें हैं, देसी-विदेशी, महंगी-सस्ती. मगर पैनी धार वाली कलम मांगनेवाले आप पहले ग्राहक हो.’ मैं दुकान से परे हट गया. पर मुङो उम्मीद है कि किसी न किसी दिन मेरे भी ‘अच्छे दिन’ आयेंगे और मैं राजनीति पर तीखा व्यंग्य जरूर लिखूंगा..बस मुङो सही कलम मिल जाये.
बुधवार, 16 अप्रैल 2014
एक वोटर को और क्या चाहिए?
रामदरश काका पिछले पांच दशकों से वोट करते आ रहे हैं, लेकिन आज तक एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि वोट देने के तुरंत बाद वे पछताये ना हों. उन्हें लगता है कि वे पछताने के लिए ही मतदान करते हैं. ऐसा नहीं है कि वे हमेशा ही ईमानदार आदमी को चुनना चाहते हैं. जानते हैं कि ईमानदार आदमी अब पैदा होना बंद हो गये हैं. यहां-वहां कहीं दो-चार अदद मिलते भी हैं, तो ऐसे बिदकते हैं मानो राजनीति नहीं, सिर पर मैला उठाने की प्रथा हो! रामदरश काका मानते हैं कि वे खुद भी ईमानदार नहीं हैं. मौका मिलने पर अनेक बार उन्होंने दो-चार दिनों के लिए ईमानदारी-नैतिकता जैसी चीजों को लाल कपड़े में बांध कर खूंटी पर टांग दिया है. मौके और मजबूरियां किसके जीवन में नहीं आते. समझदार आदमी वही है जो सावधानी से इन्हें बरत ले. राजनीति में ईमानदार आदमी ढूंढ़ना खुद अपनी जगहंसाई करवाना है. फिर किसी और की ईमानदारी से हमें क्या, होगा तो अपने घर का. काम करनेवाला हो, तो बेईमान भी चलेगा. ठेकेदार से कमीशन खा ले, पर सड़क बनवा दे. चंदा वसूलता हो तो वसूले, पर भोजन-भंडारे बराबर करवाता रहे. अतिक्र मण हटानेवाले आयें तो प्रशासन से लड़ ले. शादी-ब्याह, मरे-जिये में आ कर खड़ा हो जाए. और, क्या चाहिए इसके सिवाय आम आदमी को!!
इतना काफी है. गरीब आम आदमी वैसे भी किस्मत का मारा होता है. कभी भूल से थाली में काने बैंगन की सब्जी दिख गयी, तो दिल्ली से आवाजें आने लगती हैं कि गरीब ने सब्जी खायी इसलिए महंगाई बढ़ गयी. अगर गरीब दो सब्जी खायेंगे, तो अपना रुतबा बनाये रखने के लिए अमीर आदमी को कम से कम बारह सब्जियां खानी पड़ेंगी. गरीब बिहार-यूपी से पहुंच जाए तो राजधानी में गंदगी पैदा हो जाती है. वैसे तो इन दिनों सभी पार्टियों के प्रत्याशी रोज ही रामदरश काका के यहां वोट मांगने आते हैं. पर, उस दिन गली के अंधेरे में एक प्रत्याशी से सामना हो गया. बोला- ‘काका ध्यान रखना, इस बार आपके वोट से ही सरकार बनेगी.’ इतना कह कर हौले से उनके हाथ में पांच सौ का एक कड़क नोट पकड़ा कर बोला- ‘बच्चों के लिए मिठाई ले लेना.’ वो कुछ सोच पाते इसके पहले पता नहीं चला कि वह नोट कब किसने ले लिया. ले लिया तो ले लिया. अब क्या हो सकता था. रोकते-रोकते मुंह से ‘थैंक्यू’ भी निकल गया. प्रत्याशी ने एक अंगूठा ऊंचा करके पूछा ‘चलती है क्या?’ काका कुछ समङों, मना करने या स्वीकारने के लिए तैयार हों, इससे पहले एक आदमी एक बोतल, जिसमें शहद के रंग जैसा कुछ था, पकड़ा गया. जब काका की आंखों के सामने का अंधेरा हटा तो देखा, बोतल पर लिखा था ‘रेड डाग’, और एक कुत्ता मुंह फाड़े बना हुआ था जिसकी आंखें लाल थीं. रामदरश काका बार-बार उसे देखते रहे, जबतक खुद उनकी आंखें लाल नहीं हो गयीं.
इतना काफी है. गरीब आम आदमी वैसे भी किस्मत का मारा होता है. कभी भूल से थाली में काने बैंगन की सब्जी दिख गयी, तो दिल्ली से आवाजें आने लगती हैं कि गरीब ने सब्जी खायी इसलिए महंगाई बढ़ गयी. अगर गरीब दो सब्जी खायेंगे, तो अपना रुतबा बनाये रखने के लिए अमीर आदमी को कम से कम बारह सब्जियां खानी पड़ेंगी. गरीब बिहार-यूपी से पहुंच जाए तो राजधानी में गंदगी पैदा हो जाती है. वैसे तो इन दिनों सभी पार्टियों के प्रत्याशी रोज ही रामदरश काका के यहां वोट मांगने आते हैं. पर, उस दिन गली के अंधेरे में एक प्रत्याशी से सामना हो गया. बोला- ‘काका ध्यान रखना, इस बार आपके वोट से ही सरकार बनेगी.’ इतना कह कर हौले से उनके हाथ में पांच सौ का एक कड़क नोट पकड़ा कर बोला- ‘बच्चों के लिए मिठाई ले लेना.’ वो कुछ सोच पाते इसके पहले पता नहीं चला कि वह नोट कब किसने ले लिया. ले लिया तो ले लिया. अब क्या हो सकता था. रोकते-रोकते मुंह से ‘थैंक्यू’ भी निकल गया. प्रत्याशी ने एक अंगूठा ऊंचा करके पूछा ‘चलती है क्या?’ काका कुछ समङों, मना करने या स्वीकारने के लिए तैयार हों, इससे पहले एक आदमी एक बोतल, जिसमें शहद के रंग जैसा कुछ था, पकड़ा गया. जब काका की आंखों के सामने का अंधेरा हटा तो देखा, बोतल पर लिखा था ‘रेड डाग’, और एक कुत्ता मुंह फाड़े बना हुआ था जिसकी आंखें लाल थीं. रामदरश काका बार-बार उसे देखते रहे, जबतक खुद उनकी आंखें लाल नहीं हो गयीं.
शनिवार, 10 अगस्त 2013
नवाज को एक शरीफ हिंदुस्तानी का खत
मियां नवाज शरीफ जी! आपको और आपके मुल्क पाकिस्तान की अवाम को ईद मुबारक. आज ईद के ही दिन हमारे देश की आइबी ने अलर्ट किया है कि आपके मुल्क के जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद दिल्ली के लालकिले पर फिर से हमले की योजना बना चुके हैं. वह पाकिस्तानियों को भारत के खिलाफ उकसा रहे हैं. उन्होंने ट्विटर पर ईद की शुभकामना देते हुए भारत के खिलाफ सख्त संदेश जारी किया है. अब क्या बतायें कि यह संदेश पाकर हमारे देश में ईद कैसे मन रही है. ईद के उसी चांद को हिंदुस्तान ने भी देखा, जिसे पाकिस्तानियों ने देखा. पर इस बार हमारी ईद जरा फीकी है. हमारा मुल्क अभी गम और गुस्से के दौर से गुजर रहा है. सरहद की निगहबानी करने के दौरान अपने पांच जवानों को खो देने के गम में हम अभी डूबे हैं. उन जवानों के घर-गांव में पिछले चार दिनों से चूल्हा नहीं जला. अन्न का एक निवाला तक बच्चों ने नहीं खाया.
आप तो ‘शरीफ’ हैं, यह तो पता ही होगा कि हिंदुस्तान के कई परिवारों की मौसी, बुआ, बहनें और भाई पाकिस्तान में रहते आ रहे हैं. सोचिए, उनकी ईद कैसी गुजरी होगी. अरे हां! आपको शुक्रिया कि आप हमारे इस गम में शरीक हुए और अफसोस जताते हुए ‘रिश्ते को मजबूत और भरोसेमंद बनाने की पहल’ करने पर जोर दिया. पर रिश्ते की कीमत भला तुम क्या जानो शरीफ बाबू! तुम्हारा मुल्क तो सिर्फ धोखेबाजी और फरेब की राजनीति करता है. दरअसल, पाकिस्तान की सियासी आबोहवा ही कुछ ऐसी है जहां अमन को लेकर ईमानदार लोगों के लिए गुंजाइश जरा कम है. पर हमारा गम जरा जुदा है. हम पाकिस्तान से बार-बार छले गये एक ऐसे मुल्क के वाशिंदे हैं, जहां के हुक्मरान गंदी और स्वार्थ की राजनीति में मशगूल हैं. उन्हें यह तक पता नहीं कि एलओसी पर हमला आतंकियों ने किया या पड़ोसी मुल्क के सैनिकों ने. हमारे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों को बोलने तक नहीं आता. जिनकी मानसिकता यह है कि ‘सैनिक तो होते ही हैं शहीद होने के लिए’, उनसे भला किस प्रकार की उम्मीद की जा सकती है.
खैर, यह तो हमारा ऐसा दर्द है जिसे सुन कर आप हमारी हंसी ही उड़ायेंगे. हमारे यहां बच्चों को शुरुआती कक्षा में ही एक कविता पढायी जाती है- ‘मां मुझको बंदूक दिला दो मैं भी लड़ने जाऊंगा.’ यहां लड़ने से अभिप्राय देश की रक्षा करने से है. कुछ ऐसी ही पंक्तियां आपके भी मुल्क में भी बच्चों को सिखायी जाती हैं, पर उसका अभिप्राय शायद कुछ और होता होगा. चलते-चलते एक चर्चित शेर अर्ज करना चाहूंगा, पर जरा बदले अंदाज में -
न दिल्ली में याद रखना, न लाहौर में याद रखना/ हो सके तो हमें बस दुआओं में याद रखना.
आपका, एक शरीफ हिंदुस्तानी
आप तो ‘शरीफ’ हैं, यह तो पता ही होगा कि हिंदुस्तान के कई परिवारों की मौसी, बुआ, बहनें और भाई पाकिस्तान में रहते आ रहे हैं. सोचिए, उनकी ईद कैसी गुजरी होगी. अरे हां! आपको शुक्रिया कि आप हमारे इस गम में शरीक हुए और अफसोस जताते हुए ‘रिश्ते को मजबूत और भरोसेमंद बनाने की पहल’ करने पर जोर दिया. पर रिश्ते की कीमत भला तुम क्या जानो शरीफ बाबू! तुम्हारा मुल्क तो सिर्फ धोखेबाजी और फरेब की राजनीति करता है. दरअसल, पाकिस्तान की सियासी आबोहवा ही कुछ ऐसी है जहां अमन को लेकर ईमानदार लोगों के लिए गुंजाइश जरा कम है. पर हमारा गम जरा जुदा है. हम पाकिस्तान से बार-बार छले गये एक ऐसे मुल्क के वाशिंदे हैं, जहां के हुक्मरान गंदी और स्वार्थ की राजनीति में मशगूल हैं. उन्हें यह तक पता नहीं कि एलओसी पर हमला आतंकियों ने किया या पड़ोसी मुल्क के सैनिकों ने. हमारे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों को बोलने तक नहीं आता. जिनकी मानसिकता यह है कि ‘सैनिक तो होते ही हैं शहीद होने के लिए’, उनसे भला किस प्रकार की उम्मीद की जा सकती है.
खैर, यह तो हमारा ऐसा दर्द है जिसे सुन कर आप हमारी हंसी ही उड़ायेंगे. हमारे यहां बच्चों को शुरुआती कक्षा में ही एक कविता पढायी जाती है- ‘मां मुझको बंदूक दिला दो मैं भी लड़ने जाऊंगा.’ यहां लड़ने से अभिप्राय देश की रक्षा करने से है. कुछ ऐसी ही पंक्तियां आपके भी मुल्क में भी बच्चों को सिखायी जाती हैं, पर उसका अभिप्राय शायद कुछ और होता होगा. चलते-चलते एक चर्चित शेर अर्ज करना चाहूंगा, पर जरा बदले अंदाज में -
न दिल्ली में याद रखना, न लाहौर में याद रखना/ हो सके तो हमें बस दुआओं में याद रखना.
आपका, एक शरीफ हिंदुस्तानी
बुधवार, 12 दिसंबर 2012
रोटी मजबूरी हो या दूरी पर सबके लिए जरूरी
प्रख्यात साहित्यकार प्रयाग शुक्ल की एक कविता है-
व्यंजन पकाने की विधियां कई हैं
व्यंजन भी कई हैं
ढेरों व्यंजनों के
पर व्यंजन विधियों को चकमा देकर
कब और कैसे स्वाद को
मधुर तिक्त करते हैं
यही चमत्कार है.
पर इससे भी बड़ा चमत्कार है ‘खाना-खिलाना’. चाहें तो आप इसे ‘डिनर डिप्लोमेसी’ भी कह लें. दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी यूपी में भोजन करने को ‘रोटी खाना’ कहते हैं. रोटी के लिए इनसान क्या-क्या नहीं करता? खेती से लेकर राजनीति तक सब इस रोटी की ही लाचारी है. अरे भई! कोई रोटी बनाता है, कोई रोटी उगाता है. कई महानुभाव तो ऐसे भी होते हैं जो दूसरे की उगायी फसल काटने की फिराक में रहते हैं. कोई रोटी खिलाता है, कोई खाता है. किसी के लिए रोटी मजबूरी है तो किसी के लिए दूरी है. जो भी हो रोटी होती सभी के लिए जरू री है.
कुछ लोग रोटी छीन कर खाते हैं, तो कुछ लोग कमा कर. कुछ लोग दिखा कर, तो कुछ लोग छिपा कर. हमारे बड़े-बुजुर्ग आज भी इस बात को बहुत जोर देकर कहते हैं कि ‘रोटी और बेटी का रिश्ता हर किसी से नहीं किया जाता.’ रोटी के लिए कई लोग बेघर हो जाते हैं, तो कई लोग रोटी का व्यवसाय कर कई-कई घरों के मालिक बन जाते हैं. रोटी की महिमा जितनी भी बखानी जाये कम ही होगी. कोई रोटी खाने के लिए राजनीति करता है तो कोई रोटी खाकर राजनीति करता है. कई नेता तो गरीबों/दलितों/मजदूरों के घर जाकर रोटी खाने का दिखावा करते हैं. दरअसल, इनकी नजर रोटी पर कम उनके वोट बैंक पर ज्यादा होती है. यह बात कोई समझ नहीं पाता. क्या वह गरीब यह नहीं सोचता होगा कि नेताजी मेरे यहां आकर रोटी तोड़ रहे हो कभी मुङो भी अपने घर बुलाओ? तुमने खून-पसीने की कमाई का स्वाद तो चख लिया, जरा मैं भी देखूं मुफ्तखोरी का स्वाद कैसा होता है?
संभ्रांत लोग रोटी खाने-खिलाने को ‘डिनर डिप्लोमेसी’ कहते हैं. उन्हें ‘रोटी’ से गरीबी की दरुगध आती है. साझा पार्टियों के समर्थन पर टिकी सरकारें जब-तब अपने अल्पमत में होने का खतरा महसूस करती हैं और राजधानी में डिनर डिप्लोमेसी का दौर तेज हो जाता है. शादी-ब्याह तो बिना डिनर के होते ही नहीं. ये अलग बात है कि इस डिनर का लाभ उठाने के लिए कई बिन बुलाये ‘चतुर सुजान’ बन-ठन कर आयोजन स्थलों के पास मंडराते रहते हैं. कई पत्नियां लजीज डिनर बना कर पति महोदय का मूड ठीक करने का हुनर अब भी ढूंढ़ रही हैं. बड़े होटलों/रेस्तरां में पसंदीदा डिश खिला कर प्रेमिका को प्रेयसी बनाने का प्रयत्न करना आज भी प्रेमियों की पहली पसंद है. ‘लड़की-देखाई’ की रस्म हो, तो सास-ससुर यह पूछना नहीं भूलते कि ‘बेटी खाना बनाना तो जानती ही होगी?’
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