तुम एनएच 33 की तरह व्यस्त रहती हो और मैं तुम्हारे इंतजार में जुबिली पार्क हो गया हूं. जब मैं तुम्हारे इंतजार में थक जाता हूं तो उन 86 बस्तियों सा महसूस करने लगता हूं जिन्हें आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है. फिर भी नसों में उम्मीदों का उबाल इतना तगड़ा है कि सांसे टूटती नहीं हैं. हां, कभी-कभी यह भी लगता है कि हमारी जिंदगी में मानगो पुल सा जाम लगने के कारण ठहराव आ गया है और कभी-कभी गरमी की तपती दोपहरी में टेल्को एरिया की सड़कों जैसी वीरानगी छा जाती है. फिर भी मैं सालाना आयोजन ‘फ्लावर शो’ की ताजगी और रंगीनियों जैसी ही खुशी देने वाले तुम्हारे इंतजार में हर दिन संस्थापक दिवस मनाता रहता हूं. सच तो यह है कि जब तुम बिष्टुपुर में होती हो तब मैं मानगो सा महसूस करता हूं. यह ‘खास’ और ‘आम’ होने का अहसास नहीं बल्कि समयानुकूल सच्चाइयों का सामना करना भर है. तुम्हारे साथ जब छप्पनभोग में स्वादिष्ट मिठाइयां खा रहा होता हूं तो तुम मुङो रसगुल्ला जैसी लगती हो, पर तन्हाइयों के वक्त मैं गोलगप्पा के उस फुचके जैसा हो जाता हूं जिसकी वैल्यू मसाला पानी के बिना नहीं होती. तुम्हारा स्वभाव मुङो कभी-कभी जलेबी जैसा भी लगता है. जिसे गरम खाओ तो मुंह जलता है और ठंडा खाने पर बेस्वाद लगता है. सीरियसली, जुबली पार्क मुझमें इस कदर बस गया है कि मैं तुम्हारे साथ साकची जाते वक्त स्टेडियम की तरफ से न जाकर जुबिली पार्क की तरफ से ही जाता हूं. उसकी खुली हवाओं को अपने नथुनों में भरते हुए. हरे-भरे पेड़ों और फूलों की ताजगी को मन ही मन समेटते हुए. जब तुम मेरे साथ होती हो मेरा मन साकची के मंगल बाजार की तरह गुलजार रहता है. जिसमें महंगी और ब्रांडेड चीजें नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में काम आनेवाले जरूरी सामान बहुत किफायती दामों में मिल जाते हैं. क्या हमारा प्यार सचमुच जमशेदपुर जैसा है? इतने त्योहार, इतने सेलिब्रेशन, इतने आयोजन होते हैं कि पता ही नहीं चलता कि कौन असली है और कौन बनावटी. मिश्रित संस्कृति ने शहर की पहचान छीन ली है. न कोई अपनी भाषा, न कोई अपना स्वभाव. लोग यहां होकर भी यहां के नहीं होते. यहां सबका मालिक एक है, पर सब खुद भी मालिक हैं अपनी मरजी के. दिखने में आयरन, पर अंदर बज रहा सायरन! अब छोड़ो भी. क्या रखा है इन शिकवा-शिकायतों में. मेरे मन में तुम्हारे प्रति वैसी ही अगाध श्रद्धा है जितनी शहरवासियों के मन में जमशेदजी टाटा के लिए. हां, एक बात मैं जरू र कहूंगा कि तुम अपने पहनावे से बागबेड़ा जैसी लगती हो. सीएच एरिया से बिष्टुपुर वाले रोड जैसा नया लुक आजमा कर देखो. बेहद खूबसूरत लगने लगोगी. मुङो उम्मीद है कि तुम इस प्रपोजल को मेरीन ड्राइव के मॉल और मल्टीप्लेक्स जैसा लटकाने के बजाय टाटा वर्कर्स युनियन के चुनाव जैसा शीघ्र ही मूर्त रू प में परिणत कर दोगी.
सोमवार, 23 मार्च 2015
बुधवार, 11 मार्च 2015
ट्रैफिक सिगनल वाली मलाला
नयी दिल्ली के किसी रेड सिगनल पर जैसे ही गाड़ियों का काफिला रुका कई बच्चे दौड़ते हुए कारों के बंद शीशे खटखटाने लगे. किसी के हाथ में लाल गुलाब का गुलदस्ता तो किसी के पास खिलौने. कई के पास किताबें भी थी. वे बारी-बारी से बिना प्रतीक्षा किये सभी के पास जा रहे थे. एक 12-14 साल की लड़की हाथ में कई किताबें लिए मेरे पास भी आयी और एक किताब ‘आइ एम मलाला’ को मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोली-‘शांति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त पाकिस्तान की इस बहादुर लड़की की किताब ले लो साहब.’ मेरी निगाह उस किताब के बजाय उस मासूम-सी लड़की पर टिक गयी थी. लाल फीते की दो चोटियां उसके कंधे पर लटक रही थी. गेहुंआ रंग, गोल चेहरा, इकहरा बदन, मोतियों जैसे दांत. साधारण से कपड़े में भी वह बहुत खुबसूरत दिख रही थी. मुङो लगा जैसे उसमें मलाला की रूह उतर आयी हो. उतनी ही निश्चल, उतनी ही मोहक लग रही थी वह. इतने में उसने अमर्त्य सेन की किताब ‘ऐन अनसरटेन ग्लोरी : इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन’ दिखाते हुए कहा ‘तो ये ले लो साहब. अच्छी है.’ मैं अपलक उसे देख ही रहा था. उसने यह भांप लिया कि मैं उसकी किताबें नहीं खरीदूंगा. यह सच था. मेरे पास उस वक्त उतने पैसे नहीं थे कि मैं किताब ले पाता. लगा वह जाने वाली है. मैंने पूछा- तुम स्कूल नहीं जाती, तुम्हारे मां-बाप क्या करते हैं, तुम्हारा नाम क्या है? चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान बिखेरते हुए कहा ‘आइ एम मलाला.’ और भीड़ में कहीं गुम हो गयी. सिगनल ग्रीन हो चुका था, गाड़ियां आगे की ओर सरकने लगी थीं. मलाला की नन्ही-सी कलम बड़े-बड़े हथियारों के सामने जिस ताकत से खड़ी रही और आकर्षक जीत हासिल की उसने हर लड़की को विपरीत हालातों में मुस्कुराने का हसीन जज्बा दिया है. बधाई मलाला! यह मसाल जलती रहनी चाहिए. पर, दुख होता है यह देख कर दिल्ली जैसे महानगर में ट्रैफिक सिगनल पर मासूम लड़के/लड़कियां इस तरह पेट पालने के लिए विवश हैं. बच्चों के आर्थिक उत्पीड़न की समाप्ति तथा सभी बच्चों के शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने की जो लड़ाई मलाला ने पाकिस्तान के एक प्रांत से शुरू की थी, अब वह ग्लोबल हो चुकी है. दुनिया के लगभग हर मुल्क में मलाला के प्रशंसक हैं. तो क्या जो लड़की मुङो ट्रैफिक सिगनल पर किताबें बेचती मिली थी वह यह सब नहीं जानती? उसके हाथ में तो ‘आइ एम मलाला’ नामक किताब भी थी. तो फिर कैसे पूरा होगा मलाला का वह सपना जो उसने दुनिया भर की लड़कियों की बेहतरी के लिए देखा है. क्यूंकि मलाला अब एक लड़की का नाम भर नहीं, वह एक प्रतीक बन गयी है. भारत में ऐसे बच्चों की संख्या भी बहुत है जिनके मां-बाप अपनी तरक्की के लिए उन्हें पढ़ने नहीं देते. रोजी-रोटी उनकी पहली प्राथमिकता है. क्या यहां भी कोई मलाला आकर रोशनी फैलायेगी?
गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015
रोटी की जगह अब मोबाइल चबाएंगे!
रफू मियां जोर-जोर से खबर बांच रहे थे ताकि अगल-बगल बैठे उनके यार-दोस्त ठीक से सुन-समझ सकें. ‘रिटायर्ड’ लोगों की यह ‘मित्र मंडली’ प्रतिदिन झुमरू चाय वाले के यहां पौ फटते ही इकट्ठी हो जाती है. रफू मियां इस टीम के मेठ (लीडर) हैं. क्योंकि उनको दूसरे का बोलना ‘अच्छा’ नहीं लगता इसलिए अखबार पढ़ कर सुनाने का काम लीडर होने का फायदा उठाते हुए वे खुद ही करते हैं. राजनीतिक खबरों में उनकी दिलचस्पी अधिक है. उच्चरण करते हुए शब्दों को लगभग चबाकर बोलते हैं. पहले पेज से शुरू होकर अब वे देश-विदेश पेज तक पहुंच चुके हैं. उनकी आंखें अचानक से चमक उठी. पहले बांची जा चुकी खबरों पर चर्चा को बीच में ही रोकते हुए वह जोर-जोर से बोलने लगे- ‘‘नौ महीने पुरानी सरकार के प्रधानमंत्री ने फिर एक नयी घोषणा कर दी है. मोदी ने मोबाइल फोन पर दुनिया ले आने का आह्वान करते हुए कहा है कि ई-गवर्नेस पर नजर डालते समय हमें पहले मोबाइल के बारे में सोचना चाहिए और इस प्रकार एम-गवर्नेस अर्थात ‘मोबाइल गवर्नेस’ को महत्व देना चाहिए.’’ मोबाइल की चर्चा सुनकर वहां बैठे रफू मियां की मित्र मंडली में ऐसी खलबली मच गयी मानो उन्हें किसी ने पत्थर दे मारा हो. झंझट दास कहने लगे ‘‘इस कलमुंहे मोबाइल ने तो जिंदगी हराम कर रखी है. चिट्ठी-पत्री और शुभकामना संदेश को इतिहास की ओर धकेल दिया है. वहीं प्रेमी-प्रेमिकाओं की तो चांदी हो गयी, जब चाहे तब इश्क लड़ाओ. कुछ लोग रहते कहीं हैं, बताते कहीं और हैं. ये उल्लू बनाविंग का मुख्य साधन हो गया है.’’ इतने में सबसे किनारे बैठे पोपट लाल ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा ‘‘सुना है आजकल मैसेज फॉरवर्ड करने से भगवान को प्रसन्न करने का प्रयोजन भी मोबाइल से होता है. लिखा रहता है - 11 या 21 लोगों को भेजो फिर देखो चमत्कार. चमत्कार तो होता है पर मैसेज फॉरवर्ड करने वाले के बैलेंस कम होने का.’’ मिसिर जी बोले ‘‘मोबाइल की माया तो इतनी निराली है कि लोगबाग मिस-कॉल देकर अपनी जवाबदेही से मुक्त हो जाते हैं. फोन लगाओ किसी को तो लगता है किसी और को. कभी नेटवर्क फेल तो कभी बेमतलब बैलेंस गायब. किसी भी कंपनी का सिम लो, हालत सबकी एक जैसी ही है. जब मोबाइल पर बात ही ठीक से नहीं हो पाती तो और क्या होगा भला?’’ सभी बोल रहे थे पर सबसे अधिक मुखर शख्स मौन था. रफू मियां की चुप्पी सबको खलने लगी. किसी को भी इसका कारण समझ में नहीं आ रहा था. पोपट लाल ने अपने अंदाज में छेड़ा ‘‘क्या हुआ मियां तुम्हारी जुबान क्यों खामोश है, किसी ने सिम लॉक कर दिया क्या?’’ रफू मियां धीरे से बस इतना बोले ‘‘पता नहीं नेता देश को कहां ले जायेंगे, रोटी की जगह गरीब अब मोबाइल चबायेंगे. नौ महीने में न तो विकास हुआ, न प्रगति. मोदी गवर्नमेंट कुछ नहीं कर पा रही अब मोबाइल गवर्नेस की बाट देखिये!’’
बुधवार, 28 जनवरी 2015
गोरेपन की देवी को एक सांवली लड़की का खत
निखरे-निखरे रूप, दमकती त्वचा और लंबे काले-घने जुल्फों वाली ‘गोरेपन की देवी’ आपको एक सांवली लड़की की तरफ से बार-बार प्रणाम है. आप ये कहती/चाहती हैं कि आपका क्रीम लगा कर समस्त जहान की लड़कियां गोरी-सुंदर दिखने लगेंगी/लगें. आपके इस दावे में कितना दम है, मैं यह तो नहीं जानती और न ही जानने में कोई रुचि है पर टीवी और अखबार में आपकी सुंदर सी तसवीर देख कर मेरे जैसी सांवली लड़कियों के माता-पिता पर क्या गुजरती है यह आपने कभी सोचा है? इस देश में आज भी अधिकांश माता-पिता लड़की के जन्म लेते ही उसकी शादी और दहेज की चिंता में असमय बूढ़े हो जाते हैं. अगर लड़की सांवली या काली हुई तब तो वे उसे खुद के लिए कोई दैवीय प्रकोप ही मान लेते हैं. क्योंकि अखबारों या वेबसाइटों पर शादी के लिए दिये गये विज्ञापन इस बात के उदाहरण हैं, जिनमें ‘फेयरनेस’ और ‘ब्यूटीफुल’ के बाद ही दूसरी विशेषताओं का स्थान आता है. क्या सांवली लड़कियां सुंदर नहीं होती? हे गोरेपन की देवी! मैं आपको बार-बार नमन करती हूं. वैसे तो आप ‘अंतर-यामी’ हैं फिर भी मैं अपने मन की कुलबुलाहटों को आप तक पहुंचाना चाहती हूं. आखिर ऐसा क्यूं है कि किसी लड़की का सांवला या गोरा होना उसके वजूद से जुड़ जाता है. क्यों कोई उस लड़की के अंतर्मन की सुंदरता को नहीं देख पाता. क्यों कोई जाने-माने शायर कैफी आजमी की तरह नहीं कहता ‘सांवला होना ठीक है और काला होना सचमुच में सुंदर है.’ क्यों अभिभावक अपनी बच्चियों को ‘बार्बी डॉल’ की जगह सांवली या काली गुड़िया तोहफे में नहीं देते. हे गोरेपन की देवी! आप मेरी यह अज्ञानता दूर करें कि क्या गोरी लड़कियां ज्यादा प्रतिभावान होती हैं. या वे अपने माता-पिता, जीवनसाथी और ससुराल वालों को ज्यादा सम्मान देती हैं. आप ग्लैमर जगत की मोहतरमा हैं आपको तो मालूम ही होगा कि शबाना आजमी, काजोल, रानी मुखर्जी और नंदिता दास का रंग गोरा नहीं था. क्या वे अपने समय की कमजोर शख्सीयत हैं? तो फिर क्यों हमें विज्ञापनों के माध्यमों से यह बताने की कोशिश की जाती है कि फलां क्र ीम लगा कर या किसी खास साबुन से नहा कर गोरा और सुंदर बना जा सकता है और ‘जो सुंदर है, वही सफल है.’ क्यों लड़कियों के मन में पहले कुंठा पैदा की जाती है और फिर इसी कुंठा को भुनाते हुए गोरेपन को उनके सामने ‘पावर’ या हथियार की तरह पेश किया जाता है. तमाम सौंदर्य प्रतियोगिताएं भी इसीलिए आयोजित की जाती हैं कि लड़कियों को यह अहसास कराया जाए कि खूबसूरत दिखना बेहद जरूरी है. हे गोरेपन की देवी! कोई ऐसी क्रीम क्यों नहीं बनायी जाती जिससे लोगों का मन-मस्तिष्क साफ हो सके और उनकी दूषित मानसिकता में बदलाव हो. ताकि इस समाज में सांवली/गोरी सभी लड़कियां शुकून से जी सकें. - एक दुखियारी सांवली लड़की.
बुधवार, 14 जनवरी 2015
पापा, हम लोग कवन जात हैं?
जब हम पैदा हुआ रहा, हमको अपना जात-धरम कुछो मालूम नहीं रहा. मास्टर जी जब हाजिरी बनावत रहें, उ समय सभन लक्ष्कन के किसिम-किसिम का नाम पुकारें.. सिंह, ठाकुर, पांडेय, मांझी, महतो, प्रसाद, हुसैन, अहमद.. हम तो कनफुजिया ही गये. बाप रे बाप.. इ सब का है? सुबह-सुबह कवनो चाय पीने समय हमरे घर आता तो दादी उके अलग बरतन में चाय भिजवातीं. हमरा दिमाग चकरा जाता कि अलग-अलग बरतन काहे? दादी बहुत प्यार करत रहीं हमका. उनही से एक दिन मालूम पड़ा कि हमन के जात पंडित है.. दूसरे जात का छूआ हमनी के खाइल बरजित रहे. हम अभियो नाहीं समझ पावत रहीं कि आखिर दूसर जात का होत है और इके पहचानत कइसे हैं. हम जब कुछ बड़ा हुवै तो हमैं हिस्टरी में बड़ा इंटेरेस्ट आवै लगा. हिस्टरी में हम पढ़ा कि मुसलमान लोग अपने लिए अलग पाकिस्तान बनवाया. हम सोचा कि हमरा दोस्त अनवर फिर हियां कैसे रह गया. एक दिन हम अनवर से पूछ बैठा, ‘‘जब मुसलमान लोग अपने लिए पाकिस्तान बनाया तब तुम पाकिस्तान काहे नहीं गया.’’ अनवरवा हमरा मुंह ताकता रहा, बोला कुछो नहीं. हम उके लेके ओकरे घर गये. उइके अब्बा से इहे बतिया फिर पूछे तो मुस्कराने लगे.. हमरा हाथ पकड़ के बोले- ‘‘पाकिस्तान कइसे जाते बेटवा, हमै तो यहीं की धरती प्यारी है. पाकिस्तान तौ जिन्ना बनाए हैं बेटवा, उन्हें गवर्नर जनरल बनै का रहा. हमें तो यहीं किसानी करना मंजूर रहा बेटवा.’’ नौकरी करने मेरठ पहुंचे तो हुआं भी गड़बड़झाला देखै का पड़ा. हुआं एगो तिवारी जी मिले. उ हमको ढेरे दिन तक भूमिहार समझत रहें. एही चक्कर में ढेरे बार उ हमरे कान में फुसफसा के पंडित लोगन के बुराई करत रहें. एगो दोसर दोस्त ने हमसे कहा कि आप इन्हैं बताते काहे नाहीं कि आप कौन हैं. हम कहा- ‘‘जे जऊन कहता है कहन दो, हम काहे अपना एनर्जी सबका समझावै मां भेस्ट करैं.’’ एइके बाद हम इत्मीनान से रह रहे थे. जमशेदपुर आये भी कई साल होई गवा. सोचे अब सब ठीक.. तभी एक दिन चौथी क्लास में पढ़ रही हमरी बेटी ने हमसे पूछ लिया कि हम लोग कवन जात हैं? सवाल सुन के हम उके टुकुर-टुकुर देखन लगे.. हमारी सिरीमतीजी ने उससे पूछा- ‘‘काहे, तुम इ सवाल काहे कर रही आज?’’ उ बोली- ‘‘मेरी एक दोस्त ने पूछा है.’’ फिर सिरीमतीजी हमरा मुंह देखन लगीं. हमरे दिमाग में उथल-पुलथ मच गया.. मोहन भागवत जी कहत हैं कि जवन भी हिंदुस्तान में पैदा हुआ है ऊ सब हिंदू है, अऊर ओवैसी जी कहत हैं कि हर केऊ मुसलिम पैदा होता है. एक जगह हम पढ़ा हूं कि वेद में लिखा है कि हर केऊ शूद्र पैदा होता है अऊर संस्कार से आदमी अलग-अलग वर्ण वाला होय जाता है.. एगो निहोरा है : हम सब अपने लक्ष्कन के का सिखाईं..हमही का तय करे दो नो भागवतो/ओवैसियो!
शनिवार, 27 दिसंबर 2014
उत्सवधर्मिता को जीता है जमशेदपुर
यह शहर शानदार है. यहां के लोग अपनी विरासत और संस्कृति का सम्मान करते हैं और दूसरे के साथ इसे साझा करते हुए उसे भी अपने साथ शामिल कर लेते हैं. त्योहारों के केंद्र में कुछ लोगों के लिए भले ही धार्मिक मान्यताओं का महत्व होता हो पर एक बड़ा तबका ऐसा भी है, जो उत्सवधर्मिता को जीता है. दुर्गा पूजा से लेकर, ईद तक. दीवाली से लेकर गुरुपर्व तक. टुसू में भी यह शहर उतना ही शरीक होता है जितना रामनवमी और मुहर्रम के जुलूस में. लगता है यहां की नागरिकता उत्सवधर्मिता से बनी है.
अभी जमशेदपुर क्रिसमस के जश्न में डूबा है. गली-मोहल्ले की छोटी-छोटी दुकानें भी क्रिसमस के गिफ्ट (चॉकलेट, सांताक्लाज, क्रिसमस ट्री आदि) से सजी हुई हैं. तरह-तरह की टोपियां बिक रही हैं. किराने की दुकान और जनरल स्टोर तक विभिन्न वेराइटी के केक से भरे पड़े हैं. कुछ गिने-चुने लोगों के लिए क्रि समस का मतलब भले ही सिर्फ सरकारी छुट्टी भर रह गया हो पर जमशेदपुर के व्यवहार में क्रि समस सिर्फ ईसाई धर्म के अनुयायियों का त्योहार नहीं है. छठ, होली और पोंगल की तरह क्रि समस भी सबका है. राजनीति में हर बात भले ही राज सत्ता से तय होती हो लेकिन जमशेदपुर के लोगों ने ‘गुड गवर्नेंस’ के साथ-साथ ‘गुड क्रि समस’ भी मनाया. विशेषकर बच्चों के उत्साह से क्रि समस भी अन्य त्योहारों की तरह हो गया है. गोलमुरी स्थित चर्च में प्रभु यीशु को चरनी में देखने वालों की कतार में ललाट पर चंदन लगाये पंडित जी भी हैं और गाढ़ा नारंगी रंग की पगड़ी बांधे अपने बच्चे का हाथ पकड़े सरदार जी भी. हर किसी की आंखों में वही चमक, वही कौतुहल. कोई भेदभाव नहीं, वही पवित्रता. यही दृश्य सभी गिरिजाघरों की है.
उत्सव कोई भी हो, खाना-पीना जमशेदपुरवासियों की पहली पसंद होती है. बंगाली ब्रिगेड के लिए तो गोलगप्पा के बिना हर उत्सव अधूरा है. इडली-डोसा, चाट, पकौड़ी और नान वेज के शौकीनों की भी कमी नहीं है. जुबिली पार्क के गेट नंबर दो से निकलते ही स्ट्रीट फूड के कतारों की फेहरिश्त में उपरोक्त व्यंजनों के अलावा प्रॉन फिंगर, मोमो, चाउमिन, हॉट डॉग और लिट्टी-चोखा खाने के लिए यूथ ब्रिगेड की होड़ लगी है. इस भीड़ में न तो कोई हिंदू समझ में आ रहा है, न ही मुसलिम और ईसाई. सब खूबसूरत और संतुष्ट लग रहे हैं. हर कोई खुश है. इस खुशी के केंद्र में क्रिसमस है. ऐसा क्रिसमस जो प्रेम और सौहार्द लेकर आया है. बनावटी नहीं सच्च. थोड़े ही दिन में नया साल भी आने वाला है. जुबिली पार्क में पिकनिक, मिलना-जुलना चलता रहेगा.. इस साल से अगले साल तक. सच्चे मन से सालों-साल तक. प्रार्थना है कि हमारा जमशेदपुर सदैव ऐसा ही बना रहे. कोई ‘परिवर्तन’ न हो. हर उत्सव में, हर त्योहार में, हर व्यवहार में. हर साल में-हर हाल में.
अभी जमशेदपुर क्रिसमस के जश्न में डूबा है. गली-मोहल्ले की छोटी-छोटी दुकानें भी क्रिसमस के गिफ्ट (चॉकलेट, सांताक्लाज, क्रिसमस ट्री आदि) से सजी हुई हैं. तरह-तरह की टोपियां बिक रही हैं. किराने की दुकान और जनरल स्टोर तक विभिन्न वेराइटी के केक से भरे पड़े हैं. कुछ गिने-चुने लोगों के लिए क्रि समस का मतलब भले ही सिर्फ सरकारी छुट्टी भर रह गया हो पर जमशेदपुर के व्यवहार में क्रि समस सिर्फ ईसाई धर्म के अनुयायियों का त्योहार नहीं है. छठ, होली और पोंगल की तरह क्रि समस भी सबका है. राजनीति में हर बात भले ही राज सत्ता से तय होती हो लेकिन जमशेदपुर के लोगों ने ‘गुड गवर्नेंस’ के साथ-साथ ‘गुड क्रि समस’ भी मनाया. विशेषकर बच्चों के उत्साह से क्रि समस भी अन्य त्योहारों की तरह हो गया है. गोलमुरी स्थित चर्च में प्रभु यीशु को चरनी में देखने वालों की कतार में ललाट पर चंदन लगाये पंडित जी भी हैं और गाढ़ा नारंगी रंग की पगड़ी बांधे अपने बच्चे का हाथ पकड़े सरदार जी भी. हर किसी की आंखों में वही चमक, वही कौतुहल. कोई भेदभाव नहीं, वही पवित्रता. यही दृश्य सभी गिरिजाघरों की है.
उत्सव कोई भी हो, खाना-पीना जमशेदपुरवासियों की पहली पसंद होती है. बंगाली ब्रिगेड के लिए तो गोलगप्पा के बिना हर उत्सव अधूरा है. इडली-डोसा, चाट, पकौड़ी और नान वेज के शौकीनों की भी कमी नहीं है. जुबिली पार्क के गेट नंबर दो से निकलते ही स्ट्रीट फूड के कतारों की फेहरिश्त में उपरोक्त व्यंजनों के अलावा प्रॉन फिंगर, मोमो, चाउमिन, हॉट डॉग और लिट्टी-चोखा खाने के लिए यूथ ब्रिगेड की होड़ लगी है. इस भीड़ में न तो कोई हिंदू समझ में आ रहा है, न ही मुसलिम और ईसाई. सब खूबसूरत और संतुष्ट लग रहे हैं. हर कोई खुश है. इस खुशी के केंद्र में क्रिसमस है. ऐसा क्रिसमस जो प्रेम और सौहार्द लेकर आया है. बनावटी नहीं सच्च. थोड़े ही दिन में नया साल भी आने वाला है. जुबिली पार्क में पिकनिक, मिलना-जुलना चलता रहेगा.. इस साल से अगले साल तक. सच्चे मन से सालों-साल तक. प्रार्थना है कि हमारा जमशेदपुर सदैव ऐसा ही बना रहे. कोई ‘परिवर्तन’ न हो. हर उत्सव में, हर त्योहार में, हर व्यवहार में. हर साल में-हर हाल में.
गुरुवार, 18 दिसंबर 2014
कोलकाता की रात और टैक्सी ड्राइवर
रात के 11 बज रहे थे. कोलकाता के नेताजी सुभाषचंद्र बोस हवाई अड्डे से मुङो हावड़ा रेलवे स्टेशन आना था. आदतन सस्ती सुविधा ढूंढ़ रहा था. पुलिसवाले ने बताया- रात नौ बजे के बाद यहां बसों की एंट्री बंद हो जाती है. आपको टैक्सी लेनी पड़ेगी. एक टैक्सी वाले को बुलाया तो तीन आ गये. कोई 800 रुपये मांग रहा था, तो कोई 700. तीसरे ने कहा- दादा! 600 से कम में कोई नहीं जायेगा. तभी एक शख्स मेरे पास आया और धीरे से बोला- बाबू! प्रीपेड टैक्सी क्यों नहीं ले लेते? उसने काउंटर की तरफ इशारा किया और मैं चल पड़ा. 310 रुपये की परची ली और टैक्सियों की कतार के पास आकर खड़ा हो गया. एक टैक्सी आकर मेरे पास रुकी. मैं चुपचाप बैठ गया. कुछ मिनट बाद मैंने टैक्सी ड्राइवर को गौर से देखा. यह वही शख्स था जिसने मुङो प्रीपेड टैक्सी लेने की बिन मांगी सलाह दी थी. आज के जमाने में भी ऐसे मददगार हैं! मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर इस टैक्सी ड्राइवर से क्या बोलूं. क्या ‘थैंक्स’ कहना ठीक रहेगा. आखिरकार निस्तब्धता को तोड़ने में उसी ने मदद की- ‘‘जानते हैं साहब! बंगाल अब बाहर के लोगों के लिए ठीक नहीं रहा. दीदी ने बंगाल के लोगों के साथ विश्वासघात किया है. कई दशकों के सीपीएम शासन से ऊबी हुई बंगाल की जनता ने दीदी की सरकार बनवायी. इस उम्मीद में कि कुछ नया होगा, अच्छा होगा. यहां रहनेवाले बाहर के लोग भी ऐसा ही सोचते थे. पर सभी की उम्मीदें धराशायी हो गयीं. मंत्री-विधायक सब के सब चोर निकले. अब तो अब मोदी से ही उम्मीद है. 2016 में दीदी का जेल जाना तय है. जैसी करनी-वैसी भरनी.’’ टैक्सी ड्राइवर बोले ही जा रहा था. अनवरत.. आखिर वह किसी और मुद्दे पर भी बात कर सकता था. या चुपचाप म्यूजिक ऑन कर देता या मेरे बारे में भी पूछ सकता था या.. बहरहाल, जो भी था.. मुङो उसकी बातें अच्छी लग रही थीं. इसलिए नहीं कि मेरी राजनीति में गहन अभिरुचि है. इसलिए, क्योंकि मेरी उसमें रुचि बढ़ती जा रही थी. मैं उसके बारे में जानना चाहता था. क्यूंकि उसने मेरी मदद की थी. मैं मोबाइल में उसकी बातें रिकॉर्ड करता जा रहा था. अपनी बात बीच में ही रोकते हुए उसने पूछा- आप मेरी बातों से बोर तो नहीं हो रहे? मेरे जवाब देने से पहले ही उसने टैक्सी रोक दी. मैं चौंका- क्या हुआ? गाड़ी क्यों रोक दी? बोला - स्टेशन आ गया, उतरना नहीं है? मैं उसके बारे में सोचते हुए थोड़ी देर के लिए भूल गया था कि मैं हवाई अड्डे से रेलवे स्टेशन के लिए चला था. पूछने पर बताया कि उसका नाम राजेश यादव है, वह गिरिडीह (झारखंड) का रहनेवाला है. गांव पर पत्नी दो बच्चों के साथ रहती है. बच्चे पढ़ाई करते हैं. मैं टैक्सी से बाहर आ चुका था. बरबस ही मुंह से निकल पड़ा- थैंक्यू राजेश. मुस्कराते हुए उसने गाड़ी आगे बढ़ा ली.
सोमवार, 8 दिसंबर 2014
प्रधानमंत्री जी! सिर्फ सुनायें नहीं, सुनें भी
आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
मैं इस देश का एक अदना सा शख्स होने ही हैसियत से कुछ कहना चाहता हूं. पुराने प्रधानमंत्री ‘बोलते’ नहीं थे और आप ‘सुनते’ नहीं हैं. आप स्वच्छता अभियान के साथ-साथ नसीहत अभियान भी चला रहे हैं, पर क्या यह सब केवल मीडिया के लिए है? कुछ संदेश अपने सहयोगी मंत्रियों को भी दीजिए. आप सफाई कर रहे हैं और मंत्री जी गंदगी, वह भी जबान से. अब आप ही बताइए मीडिया मक्खी का काम करे या मधुमक्खी का? आप सवा सौ करोड़ भारतीयों की बातें करते हैं और आपकी सहयोगी साध्वी निरंजन ज्योति सबको राम की संतान बताती हैं. कभी विरोधियों को पाकिस्तान भेजने वाले गिरिराज बाबू की फिर जुबान फिसल गयी. विरोधियों को राक्षस बताने लगे. आप ही बताइए, जो जुबान साध्वी निरंजन और गिरिराज सिंह जैसे आपके मंत्री बोल रहे हैं, उसमें शहद है या जहर? इस चुनावी मौसम में लोकतंत्र जुबानी जहर से बीमार होता जा रहा है. अच्छे दिन आये कि नहीं, इस पर तो विशेषज्ञ विमर्श कर ही रहे हैं. मुझ जैसा अदना सा शख्स जब यह जानने की कोशिश करता है कि नयी सरकार में क्या और कितना कुछ बदला है तो कहीं भी उम्मीद की रोशनी नजर नहीं आती. संसद से सड़क तक कहीं भी कुछ बदला हुआ नजर नहीं आता..फिर कैसे कह दें कि ‘बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं.’ बात चाहे काला धन वापस लाने के मुद्दे की हो या संसद की कार्यवाही सुचारु ढंग से चलाने की, जो तर्क हमेशा मनमोहन सरकार दिया करती थी हू-ब-हू वही तर्क आपकी सरकार दे रही है. संसद में जैसे हंगामे पिछली सरकार के जमाने में हुआ करते थे वही अब इस सरकार के जमाने में हो रहे हैं. कुछ नहीं बदला. सिर्फ चेहरे और मोहरे बदल गए. जो पहले मोहरे थे वे अब चेहरे बन गए और चेहरे अब मोहरे बन कर उसी जुबान में बोल रहे हैं. इस सारे तमाशे में इस मुल्क के मुझ जैसे करोड़ों लोग उस घड़ी का इंतजार कर रहे हैं कि कब हमारे खाते में 15 लाख जमा होंगे और कब हम अपने मन की वो सारी हसरत पूरी करेंगे जो बचपन से दिल में दबाए बैठे हैं. लेकिन हम जानते हैं कि ‘काले’ चोर कभी पकड़ में नहीं आ सकते. क्योंकि ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ होते हैं. यह बात जितना चोरों को पता है उतना ही आपको-हमको और सबको. प्रधानमंत्री जी! आपसे गुजारिश सिर्फ इतनी सी है कि आप सुना भी करो. कभी-कभी तो लगता है आप अभी भी खुद को श्रेष्ठ वक्ता के रू प में ही स्थापित करने में लगे हो. आपको याद दिला दूं कि आप इस देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री हो. इसलिए आप सुनो भी. सुनो उस जनता की जिसने आपको प्रधानमंत्री बनाया, उस संसद की जिसके दरवाजे पर आपने पहले दिन माथा टेका था. सुनने से सब समझ में आ जायेगा. धन्यवाद.
- देश का एक अदना सा शख्स
मैं इस देश का एक अदना सा शख्स होने ही हैसियत से कुछ कहना चाहता हूं. पुराने प्रधानमंत्री ‘बोलते’ नहीं थे और आप ‘सुनते’ नहीं हैं. आप स्वच्छता अभियान के साथ-साथ नसीहत अभियान भी चला रहे हैं, पर क्या यह सब केवल मीडिया के लिए है? कुछ संदेश अपने सहयोगी मंत्रियों को भी दीजिए. आप सफाई कर रहे हैं और मंत्री जी गंदगी, वह भी जबान से. अब आप ही बताइए मीडिया मक्खी का काम करे या मधुमक्खी का? आप सवा सौ करोड़ भारतीयों की बातें करते हैं और आपकी सहयोगी साध्वी निरंजन ज्योति सबको राम की संतान बताती हैं. कभी विरोधियों को पाकिस्तान भेजने वाले गिरिराज बाबू की फिर जुबान फिसल गयी. विरोधियों को राक्षस बताने लगे. आप ही बताइए, जो जुबान साध्वी निरंजन और गिरिराज सिंह जैसे आपके मंत्री बोल रहे हैं, उसमें शहद है या जहर? इस चुनावी मौसम में लोकतंत्र जुबानी जहर से बीमार होता जा रहा है. अच्छे दिन आये कि नहीं, इस पर तो विशेषज्ञ विमर्श कर ही रहे हैं. मुझ जैसा अदना सा शख्स जब यह जानने की कोशिश करता है कि नयी सरकार में क्या और कितना कुछ बदला है तो कहीं भी उम्मीद की रोशनी नजर नहीं आती. संसद से सड़क तक कहीं भी कुछ बदला हुआ नजर नहीं आता..फिर कैसे कह दें कि ‘बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं.’ बात चाहे काला धन वापस लाने के मुद्दे की हो या संसद की कार्यवाही सुचारु ढंग से चलाने की, जो तर्क हमेशा मनमोहन सरकार दिया करती थी हू-ब-हू वही तर्क आपकी सरकार दे रही है. संसद में जैसे हंगामे पिछली सरकार के जमाने में हुआ करते थे वही अब इस सरकार के जमाने में हो रहे हैं. कुछ नहीं बदला. सिर्फ चेहरे और मोहरे बदल गए. जो पहले मोहरे थे वे अब चेहरे बन गए और चेहरे अब मोहरे बन कर उसी जुबान में बोल रहे हैं. इस सारे तमाशे में इस मुल्क के मुझ जैसे करोड़ों लोग उस घड़ी का इंतजार कर रहे हैं कि कब हमारे खाते में 15 लाख जमा होंगे और कब हम अपने मन की वो सारी हसरत पूरी करेंगे जो बचपन से दिल में दबाए बैठे हैं. लेकिन हम जानते हैं कि ‘काले’ चोर कभी पकड़ में नहीं आ सकते. क्योंकि ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ होते हैं. यह बात जितना चोरों को पता है उतना ही आपको-हमको और सबको. प्रधानमंत्री जी! आपसे गुजारिश सिर्फ इतनी सी है कि आप सुना भी करो. कभी-कभी तो लगता है आप अभी भी खुद को श्रेष्ठ वक्ता के रू प में ही स्थापित करने में लगे हो. आपको याद दिला दूं कि आप इस देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री हो. इसलिए आप सुनो भी. सुनो उस जनता की जिसने आपको प्रधानमंत्री बनाया, उस संसद की जिसके दरवाजे पर आपने पहले दिन माथा टेका था. सुनने से सब समझ में आ जायेगा. धन्यवाद.
- देश का एक अदना सा शख्स
गुरुवार, 27 नवंबर 2014
जरा सोचो, कभी ऐसा हो तो क्या हो?
अरसे बाद एक ऐसी सनसनाती खबर (सनसनी नहीं) आयी है जो मोदी विरोधियों के धधकते सीने को ठंडक पहुंचा सकती है. खबर भी ऐसी जिसके न सिर्फ गहरे निहितार्थ हैं, बल्कि दूरगामी राजनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं. गुजरात के मेहसाणा में अपने भाई के साथ रह रहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पत्नी जशोदाबेन ने एक आरटीआइ दाखिल कर उन्हें मिलने वाली सुविधाओं और सिक्योरिटी कवर की जानकारी मांगी है. उन्होंने पूछा है, ‘‘मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पत्नी हूं. मैं यह जानकारी चाहती हूं कि प्रोटोकॉल के तहत मुङो दूसरी और क्या सुविधाएं और सुरक्षा कवर मिल सकता है?’’ अपने आवेदन में जशोदाबेन ने शिकायत करते हुए लिखा है, ‘‘मैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करती हूं, जबकि मेरे सिक्योरिटी ऑफिसर निजी वाहन से जाते हैं. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सुरक्षाकर्मियों ने हत्या कर दी थी. मुङो इस समय अपने सिक्योरिटी कवर को लेकर भय महसूस होता है. इसलिए मुङो मेरी सिक्योरिटी में लगे सुरक्षाकर्मियों की पूरी जानकारी मुहैया करायी जाये.’’
यह सभी जानते हैं कि नरेंद्र मोदी ने कभी भी अपने सार्वजनिक जीवन में जसोदाबेन को अपनी पत्नी का दर्जा नहीं दिया. वे कभी उनके बारे में कुछ भी नहीं बोलते. मोदी की यह चुप्पी उनके मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री बनने के बाद तक कायम है. हां, पिछले लोकसभा चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वियों ने अवश्य इसे मुद्दा बनाया, पर इससे उनका ‘उल्लू सीधा न हो सका.’ मोदी इस मुद्दे को लेकर कभी विचलित नहीं हुए. हां, गाहे-बगाहे जसोदाबेन खुद ही इस मुद्दे पर अवश्य बोलती रही हैं. पर इस बार मामला काफी गंभीर लग रहा है. इस मामले को ऐसे भी देखा जाना चाहिए कि जसोदाबेन आखिर अपनी सुरक्षा को लेकर अचानक क्यों चिंतित हो गयीं? इसके पीछे उनकी क्या सोच है? क्या जसोदाबेन ने ऐसा पहली बार सोचा है? हालांकि बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि सोच कभी भी आ सकती है. इस पर किसी का वश नहीं होता.
अब अगर बड़े-बुजुर्गो की कही इस बात को सच मानें (हालांकि सच नहीं मानने की न तो कोई वजह है और न ही मिजाज) तो एक और ‘सोच’ इस सोच की दिशा बदल सकती है. खुदा न खास्ता कहीं किसी राजनीतिक दल को (भाजपा तो ऐसा नहीं ही करेगी) जसोदबेन को राज्यसभा के टिकट पर संसद में भेजने जैसी ‘सोच’ कौंध गयी तो सोचिये कैसा नजारा होगा संसद का. फिलहाल तो यह लेखक का ख्याल भर है. पर दुआ और प्रार्थना कीजिए कि राजनीति में आने की सोच जसोदाबेन के मन में कभी न आये और न ही किसी राजनीतिक दल को. क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो जो होगा वह न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास की अद्भुत घटना होगी जिसका इतिहास लिखने वालों को संदर्भ ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेगा..!
यह सभी जानते हैं कि नरेंद्र मोदी ने कभी भी अपने सार्वजनिक जीवन में जसोदाबेन को अपनी पत्नी का दर्जा नहीं दिया. वे कभी उनके बारे में कुछ भी नहीं बोलते. मोदी की यह चुप्पी उनके मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री बनने के बाद तक कायम है. हां, पिछले लोकसभा चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वियों ने अवश्य इसे मुद्दा बनाया, पर इससे उनका ‘उल्लू सीधा न हो सका.’ मोदी इस मुद्दे को लेकर कभी विचलित नहीं हुए. हां, गाहे-बगाहे जसोदाबेन खुद ही इस मुद्दे पर अवश्य बोलती रही हैं. पर इस बार मामला काफी गंभीर लग रहा है. इस मामले को ऐसे भी देखा जाना चाहिए कि जसोदाबेन आखिर अपनी सुरक्षा को लेकर अचानक क्यों चिंतित हो गयीं? इसके पीछे उनकी क्या सोच है? क्या जसोदाबेन ने ऐसा पहली बार सोचा है? हालांकि बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि सोच कभी भी आ सकती है. इस पर किसी का वश नहीं होता.
अब अगर बड़े-बुजुर्गो की कही इस बात को सच मानें (हालांकि सच नहीं मानने की न तो कोई वजह है और न ही मिजाज) तो एक और ‘सोच’ इस सोच की दिशा बदल सकती है. खुदा न खास्ता कहीं किसी राजनीतिक दल को (भाजपा तो ऐसा नहीं ही करेगी) जसोदबेन को राज्यसभा के टिकट पर संसद में भेजने जैसी ‘सोच’ कौंध गयी तो सोचिये कैसा नजारा होगा संसद का. फिलहाल तो यह लेखक का ख्याल भर है. पर दुआ और प्रार्थना कीजिए कि राजनीति में आने की सोच जसोदाबेन के मन में कभी न आये और न ही किसी राजनीतिक दल को. क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो जो होगा वह न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास की अद्भुत घटना होगी जिसका इतिहास लिखने वालों को संदर्भ ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेगा..!
शुक्रवार, 21 नवंबर 2014
जरूरत है एक अच्छे से गांव की
भाइयो और बहनो! मैं इन दिनों बड़ा परेशान हूं. मेरी परेशानी का सबब जानने चाहेंगे? जानना चाहेंगे कि नहीं? तो सुनिये.. मैं गांव गोद लेने के लिए परेशान हूं. यह मसला बच्चे को गोदी में लेने जैसा तो है नहीं. ऐसा रहता तो कोई बात ही नहीं थी. वोट मांगने के लिए मैं एक-एक दिन में 20-20 बच्चों को गोद में ले चुका हूं. मैं चाहता हूं कि आप सभी मेरी मदद करें. मुङो कोई ऐसा गांव सुझायें जो देखने में ठीकठाक हो, 24 घंटे बिजली रहती हो, स्कूल-कॉलेज हो, अस्पताल हो, सभी शिक्षित हों, पर कोई बेरोजगार न हो, कोई बूढ़ा न हो, बीमार न हो. गांव में बाढ़ न आती हो, सुखाड़ न पड़ता हो. जिसमें गोबर करने वाली गाएं-भैंसें, लेंड़ी फैलानेवाली भेड़-बकरियां न हों. कुत्ते-सुत्ते न हों. और वहां की सड़कें चकाचक हों, क्योंकि धूल से हमें एलर्जी हो जाती है.. और.. और.. और.. जिस गांव में भी यह सभी खूबियां मौजूद हों, मैं उसे गोद लेने को तैयार हूं. भाइयो-बहनो! बातों-बातों में टाइम बहुत हो चुका है, पर आपका प्यार-समर्पण और उत्साह देख कर मैं ‘मन की बातें’ आपसे करना चाहता हूं. जब से मुल्क में नयी सरकार आयी है, जिंदगी आसान होती जा रही है. जिधर देखो, उधर से ही एकाध अच्छी खबर आती दिख जाती है. हर काम बुलेट ट्रेन की गति से होने लगा है. मतदाता वोट डालने के लिए इंतजार करते रह जाते हैं और एग्जिट पोले वाले नतीजों का एलान कर देते हैं. प्याज 80-90 रुपये तक पहुंच कर, तीस-पैंतीस पर आकर टिक जाता है और सस्ता हो जाता है! और तो और, मुद्रास्फीति भी घट जाती है. अर्थव्यवस्था के गति पकड़ने का रहस्य न कोई पूछता है, न कोई बताता है. इसके बावजूद समूची दिनचर्या एकदम इवेंटफुल हो गई है. अब लोग अपनी तकदीर को भले कोस लें, कोई सरकार को नहीं कोस रहा. इसे कहते हैं अच्छे दिन. अच्छे दिन का उदाहरण इससे अच्छा और क्या होगा कि तूफान भी आता है, तो हुदहुद की तरह. जनता इसे ठीक से समझ पाये कि इससे पहले ही फुर्र हो जाता है. शिक्षक दिवस और गांधी जयंती जैसे दिखावटी दिन अब इतने बड़े उत्सव बन गये हैं कि पूछिए मत.
पहले साफ-सफाई बिना नहाये, पुराने कपड़े पहन कर करने की परंपरा थी, पर अब ‘स्वच्छता अभियान’ का असर देखिये कि लोग प्रेस कपड़े, पॉलिश जूते और विशेष प्रकार की खुशबू वाले परफ्यूम से महकते हुए झाड़ू देते टेलीविजन और अखबारों में साफ-साफ देखे जा रहे हैं. इसे कहते हैं अच्छे दिन. यह ‘स्वच्छता अभियान’ का ही असर है कि गांवों में लोग अब खुले में शौच नहीं करते, बल्कि खंडहर, पेड़-पौधों या झाड़-झंखाड़ की आड़ ढूंढ़ते रहते हैं. तो बहनो-भाइयो! आप अच्छे दिन का लुत्फ उठायें और मेरे लिए एक गांव ऐसा बतायें जिसे मैं गोद ले सकूं. मैं आपके सुझाव की प्रतीक्षा करूंगा. इतना धैर्य दिखाने के लिए आपका शुक्रिया. मेरे साथ बोलिए- भारत माता की जय!
पहले साफ-सफाई बिना नहाये, पुराने कपड़े पहन कर करने की परंपरा थी, पर अब ‘स्वच्छता अभियान’ का असर देखिये कि लोग प्रेस कपड़े, पॉलिश जूते और विशेष प्रकार की खुशबू वाले परफ्यूम से महकते हुए झाड़ू देते टेलीविजन और अखबारों में साफ-साफ देखे जा रहे हैं. इसे कहते हैं अच्छे दिन. यह ‘स्वच्छता अभियान’ का ही असर है कि गांवों में लोग अब खुले में शौच नहीं करते, बल्कि खंडहर, पेड़-पौधों या झाड़-झंखाड़ की आड़ ढूंढ़ते रहते हैं. तो बहनो-भाइयो! आप अच्छे दिन का लुत्फ उठायें और मेरे लिए एक गांव ऐसा बतायें जिसे मैं गोद ले सकूं. मैं आपके सुझाव की प्रतीक्षा करूंगा. इतना धैर्य दिखाने के लिए आपका शुक्रिया. मेरे साथ बोलिए- भारत माता की जय!
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