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गुरुवार, 5 नवंबर 2015

गाय, गीता और गप वाले देश में

माननीय प्रधानमंत्री जी. आप देश की जनता से हर महीने मन की बात करते हैं. आज मैं भी अपने मन की कुछ बातें आपसे कहना चाहता हूं. यह जुमला तो आपने सुना ही होगा कि इस देश में तीन चीजें खूब बिकती हैं - सिनेमा, सेक्स और सियासत. पर अब यह जुमला पुराना हो गया. अब इस देश में जो तीन चीजें खूब चर्चित हैं वह है - गाय, गीता और गप. जरा गौर फरमायें तो ये तीनों चीजें भारतीय संस्कृति में सनातन काल से रची-बसी हैं. कोई भी इससे अनभिज्ञ नहीं. पर इन दिनों ये तीनों चीजें नये कारणाें से चर्चा में हैं. अचानक से इस देश में कई लोगों के लिए गाय महत्वपूर्ण हो गयी है. इतनी कि सियासत भी पाकिकस्तान से लौटी भारतीय बेटी गीता के मुकाबले गाय को ज्यादा तवज्जो दे रही. यही कारण है कि इसे लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के गपों का सिलसिला जारी है. जब कभी भी सोशल मीडिया पर गप का दौर तेज होता है सरकार के माथे पर पसीना आने लगता है.उसे तरह-तरह की चिंता सताने लगती है और फिर सोशल मीडिया पर पाबंदी और निगरानी जैसी कवायद शुरू हो जाती है.
  आपको तो मालूम ही है कि हमारे देश में कई राज्य ऐसे हैं, जहां गाय को बिना अनुमति के नहीं मार सकते. लेकिन भैंसों को मार सकते हैं, उनका मांस खा सकते हैं और उनके चमड़ों से बैग बना सकते हैं. यहां तक कि एक गाय को मारने पर भारतीय दंड संहिता के मुताबिक शराब पीकर गाड़ी चलाने, छेड़छाड़, किसी को गंभीर चोट पहुंचाने या इनकम टैक्स चोरी जैसे अपराधों से कहीं ज्यादा सजा मिलेगी- वहीं बिना पलक झपकाए एक भैंस को मार सकते हैं. क्या गाय महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यओं से ज्यादा महत्वपूर्ण है. मार्च 2015 में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने लोकसभा में बताया था कि महिलाओं पर बलात्कार और हमलों के मामलों में इजाफा हुआ है. महिलाओं और बच्चों के प्रति यौनहिंसा, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति जातीय हिंसा की बढ़ती घटनाएं क्या कम महत्वपूर्ण है.  क्या इंसान पशुओं से भी ज्यादा बदतर है?
   एक बात और, गीता को जब पाकिस्तान में लावारिस हालत में पाया गया तो सबसे पहले उसे लाहौर के अनाथालय में भेज दिया गया. मूक-बधिर इस बच्ची को वहां नाम दिया गया फातिमा. कुछ दिन बाद इस बच्ची को वहां से ईधी फाउंडेशन के सदस्य और बिलकीस के पुत्र फैजल अपने साथ कराची ले आए. पहली बार जब उन्होंने उस बच्ची को अपनी मां बिलकीस से मिलवाया तो उसनेे हाथ जोड़े और बिलकीस के पैर छुए. बिलकीस तुरंत बोल पड़ीं कि यह बच्ची तो हिंदू है. और उन्होंने तुरंत उसका नाम फातिमा से बदलकर गीता रख दिया. यह वाकया यह बताने के लिए काफी है कि पड़ोसी मुल्क या दुनिया के दूसरे देश भारतीय संस्कृति के बारे में कितनी बारीक जानकारी रखते हैं, इसके बारे में कितना जानते हैं. तो क्यों न अब हम उन्हें अपने बारे में कुछ और भी बतायें. और हां, गप की चिंता न करें तो ही अच्छा. कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...!

गुरुवार, 12 जून 2014

आइआइटी बेहतर या चाय बेचना?

बीते आम चुनाव ने सामाजिक बदलाव में बड़ी भूमिका निभायी है. कांग्रेस की करारी हार और भाजपा की चौतरफा जीत ने लोगों के सोचने का तौर-तरीका बदल दिया है. कुछ बदले या न बदले नयी पीढ़ी की सोच जरूर बदल गयी है. हालिया परिदृश्य में लोगबाग कन्फ्यूज्ड हैं कि वे अपने बच्चों को आइआइटी में दाखिला दिला कर अरविंद केजरीवाल बनायें या चाय की दुकान में काम करा कर नरेंद्र मोदी. और तो और, अब बच्चे अपनी मां-बहन की बात भी सुनने को तैयार नहीं, कहते हैं- ‘मुङो राहुल गांधी नहीं बनना.’ सुनने में आया है कि अर्थशास्त्र पढ़नेवालों की तदाद भी घटने लगी है. जब एक पिता ने अपने बेटे से कहा कि ‘तुम अर्थशास्त्र क्यों नहीं पढ़ते?’ तो छात्र ने टका सा जवाब दिया- ‘यह सब्जेक्ट अब किसी काम का नहीं रहा. एक वक्त था जब देश के नामी-गिरामी अर्थशास्त्रियों को केंद्रीय कैबिनेट में वित्त मंत्री बनाया जाता था. अब तो इसकी जरूरत ही नहीं रही.’ बीच में जब पिता ने टोका, ‘क्यों, डॉ मनमोहन सिंह इतने बड़े अर्थशास्त्री थे तो प्रधानमंत्री  बने कि नहीं?’ बेटा बीच में ही बोल पड़ा, ‘पापा! क्या आप नहीं जानते कि मनमोहन सिंह कम बोलने की अपनी योग्यता के कारण प्रधानमंत्री बनाये गये?’ हां, वकालत के पेशे को अब प्रतिष्ठा की नजर से अवश्य देखा जाने लगा है. बात भी सही है- जिस पेशे ने देश को रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, कानून मंत्री, दूरसंचार मंत्री, विदेश मंत्री, मानव संसाधन मंत्री वगैरह दिये हों, उसे तो इतनी प्रतिष्ठा मिलनी ही चाहिए. इस बात को वर्तमान सरकार से लेकर पिछली सरकार तक में देखा जा सकता है. वकालत पेशे का एक अहम पहलू यह भी है कि किसी भी सरकार में यह आपको मंत्री तो बनाता ही है, खुदा न खास्ता कहीं अगले चुनाव में आपकी पार्टी की सरकार नहीं बनी या आप हार गये या मान लो आपको मंत्री नहीं बनाया गया, तो बेफिक्र होकर फिर से अदालतों में प्रैक्टिस शुरू कर दो. अभिभावकों का यह भी मानना है कि एक बात का खतरा भविष्य में अवश्य मंडरा सकता है. खतरा यह कि नयी पीढ़ी कहीं यह न सोचने लगे कि ज्यादा लिख-पढ़ कर क्या फायदा, जब हमारी केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री ही सिर्फ इंटर पास हैं. डर यह भी है कि लड़कियां कहीं पढ़ने से ज्यादा टीवी सीरियल, एक्टिंग या मॉडलिंग में रुचि न प्रदर्शित करने लगें. नयी पीढ़ी के एक बड़े वर्ग को यह भी लगने लगा है कि आज जमाना योग्यता का नहीं, किसी का विश्वासपात्र होने का है. अगर आप किसी के विश्वासपात्र हैं तो किसी और योग्यता की आवश्यकता शायद न हो. यानी, मुरली मनोहर जोशी होने से अच्छा है स्मृति इरानी होना! यह एक खतरनाक वक्त है, यह संक्रमणकाल भी है. यह दौर है खुद को खो देने और किसी को जीत लेने का. जो इस दौर को समझ जायेगा, इसे आत्मसात कर लेगा. सिकंदर वही कहलायेगा. आप क्या सोचते हैं..?

गुरुवार, 22 मई 2014

अरुण यह मोदीमय देश हमारा..!

चुनाव का शोर थम गया है. प्रचंड बहुमत हासिल करके भाजपा नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनाने की तैयारी में है. वक्त जरा ठहरा हुआ सा लगता है. सभी पार्टियां और प्रत्याशी जीत-हार की समीक्षा में जुटे हैं. कई इस्तीफा दे चुके हैं, कई इस्तीफा देने वाले हैं और कई से इस्तीफा मांगा जा रहा है. वाराणसी में जन्मे हिंदी के पुरोधा कवि जयशंकर प्रसाद की वर्षो पूर्व लिखित यह पंक्तियां बरबस ही याद आ रही हैं- अरु ण यह मधुमय देश हमारा/ जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा. यह कविता याद आने की दो वजहें हैं- एक तो कवि वाराणसी का है, दूसरा कि हर जगह राष्ट्रीय गौरव और भारत माता की बात हो रही है.  पूरे चुनावी परिदृश्य पर अगर आप गौर करें तो इस बार के चुनाव का केंद्र बिंदु नयी दिल्ली नहीं, बल्कि वाराणसी रहा. जितनी चर्चा नयी दिल्ली की नहीं हुई, उससे अधिक वाराणसी की हुई.  इन सबके बीच खुद नरेंद्र मोदी भी वड़ोदरा के बजाय वाराणसी में हुई अपनी जीत को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं. तो क्या आज अगर महाकवि जयशंकर प्रसाद जीवित होते तो इन पंक्तियों को कुछ इस तरह लिखते- अरुण (जेटली) यह मोदीमय देश हमारा/ जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा.
पूरा देश मोदीमय हुआ पड़ा है. इंदौर के एक दंपती ने अपने जुड़वा बच्चों का नाम ‘नरेंद्र’ और ‘मोदी’ रख दिया, तो एक मोदी फैन ने अपनी दीवानगी की पराकाष्ठा दिखाते हुए अपनी किडनी समते कई अंग दान कर दिये. कई तो सिर और बाजुओं पर मोदी नाम का टैटू बनवाये घूम रहे हैं. यहां तक तो बात समझ में आती है पर अब जरा आगे की कहानी सुनिये. कई चाय दुकानों पर मोदी नाम से ‘स्पेशल चाय’ बिक रही है. जिसकी कीमत भी ‘स्पेशल’ है. मोदी नाम से चप्पल, टोपियां, टी शर्ट समेत अन्य कपड़े और न जाने कितने और प्रोडक्ट बाजार में आने की तैयारी में हैं. अब भला ऐसी दीवानगी में क्या बुराई है? इसमें तो फायदा ही फायदा है. नाम का नाम और दाम का दाम. अर्थशास्त्री ठीक ही कहते हैं ‘बाजार से ज्यादा धूर्त और मतलबपरस्त कोई नहीं है.’ आज मोदी नाम का शोर है तो सब इसको भुनाने में जुट गये हैं. चाहे वह बाजार हो या राजनेता. मुंबई की एक महिला फैशन डिजाइनर साई सुमन ने तो मोदी के शपथग्रहण समारोह के लिए जोधपुरी सूट तैयार किया है जिसमें बिना बांह वाले दो जैकेट हैं. इसमें हस्तशिल्प वाले बटन भी हैं और भाजपा का चुनाव चिह्न् भी बना हुआ है.
  नरेंद्र मोदी और वाराणसी की चर्चा हो तो आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल का स्मरण भी आवश्यक है. निश्चित ही जयशंकर प्रसाद अपनी इन पंक्तियों को अरविंद केजरीवाल को समर्पित करते- आह! वेदना मिली विदाई/मैंने भ्रमवश जीवन संचित/ मधुकरियों की भीख लुटाई.

मंगलवार, 13 मई 2014

मोदीसीन का जल्दी पेटेंट कराइए!

भाजपाइयों के नाथ, श्री राजनाथ सिंह जी
इस नाचीज का अभिवादन स्वीकार करें. सुना है कि आपने पिछले दिनों उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ और बलिया में चुनावी जनसभाओं को संबोधित करते हुए अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को देश की हर समस्या का समाधान बताते हुए कहा, ‘‘जिस तरीके से लोग बुखार और दर्दनाशक दवा के रूप में क्रोसीन का इस्तेमाल करते हैं उसी तरह देश की समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को ‘मोदीसीन’ दवा का इस्तेमाल करना होगा. ‘मोदीसीन’ की एक खुराक ही सारी समस्या का इलाज कर देगी.’’ सर्वप्रथम तो आपको इस नयी खोज के लिए ढेरों बधाइयां. हां, अगर आप यह भी बता देते कि यह  खोज आपने खुद की या इसमें किसी और (विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने भी आपकी मदद की, तो अच्छा होता. फिर भी बधाई तो बनती है. अब बात मुद्दे की. अगर मेरा ‘अल्प-ज्ञान’ सही है तो आपका यह बयान जनसभा में उपस्थित लोगों को आश्वस्त करने के लिए नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी का महिमामंडन करने के लिए था. खैर, इसमें किसी को (सिवाय चुनाव आयोग के) ऐतराज क्यों होगा कि आप अपनी जनसभा में क्या बोलें और क्या न बोलें. फिर भी इस देश का आम नागरिक होने के नाते यह बंदा आपसे यह तो जानने का हक रखता ही है कि आपने या आपकी पार्टी भाजपा ने जिस ‘मोदीसीन’ की ईजाद की है वह किन-किन बीमारियों में असर करेगी. क्योंकि इन दिनों आपकी ही पार्टी के कई लोग ‘मोदियाबिंद’ से ग्रस्त हैं तो कइयों को ‘नमोनिया’ हो गया है. क्या इसका इस्तेमाल हताशा-निराशा से उबरने में भी हो सकता है? शायद 16 मई के बाद आपकी ही पार्टी के कई प्रत्याशियों को इसकी जरूरत पड़े. और हां, दरकिनार कर दिये गये भाजपा के कई सीनियर सिटीजन कैटेगरी के नेता इन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय का चक्कर काट रहे हैं. राजनाथ जी, आप तो अध्यापक रहे हैं और कई दशकों से राजनीति में हैं. आपसे उम्मीद की जाती है कि अपनी पार्टी के इन नेताओं के बारे में भी सोचिये. आपकी पार्टी के ‘अच्छे दिन’ आयेंगे कि नहीं, यह तो 16 मई को मालूम चल जायेगा, पर इन बुजुर्गो के बचे-खुचे दिन ‘बदतर’ न हों, इसकी चिंता कौन करेगा? और हां, अगर आपको ऐतराज न हो तो एक सुझाव है- इस ‘मोदीसीन’ का पेटेंट अवश्य करा लीजिए. वरना कहीं अमेरिका की नजर इस पर पड़ गयी, तो क्या होगा, आपको पता ही है.  अमेरिका जब हमारी हल्दी और नीम तक का पेटेंट करा सकता है, तो इस स्वदेशी ‘मोदीसीन’ को किसी सूरत में नहीं छोड़ेगा. इसलिए सब काम छोड़ कर पहले पेटेंट देनेवाले दफ्तर पहुंचिए.
उम्मीद है कि आप मेरी बातों को अन्यथा न लेंगे. धन्यवाद.
-एक (निचुड़ा हुआ) आम नागरिक

बुधवार, 15 जनवरी 2014

मन केकर-केकर राखीं, अकेले जियरा

भोजपुरी के एक पुराने लेकिन चर्चित गीत का यह मुखड़ा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर इन दिनों सटीक लगता है. खास आदमी के खिलाफ मुहिम चलाते-चलाते ‘आम आदमी’ अब पूरे देश में ‘खास’ हो चुका है. खास इस तरह की कई राज्य सरकारें अब केजरीवाल के फैसले और उनके काम करने के तौर-तरीकों की नकल करने लगी हैं. हालांकि अच्छाई को अपनाने को नकल नहीं कहा जाना चाहिए, लेकिन राजनीति में इसे नकल की ही संज्ञा दी जा रही है.
 पिछले दिनों केजरीवाल के जनता दरबार में जिस प्रकार बेतरह भीड़ जुटी उससे एक बात तो साफ हो गयी कि लोगों के पास कितनी समस्याएं हैं. और, लोग उन समस्याओं से किस तरह पके हुए हैं. केजरीवाल की सरकार दिल्ली के लोगों की उम्मीदों पर कितना खरा उतर पाती है. यह साबित होने में तो अभी वक्त लगेगा पर पूरा देश अभी आप (आम आदमी पार्टी) और अरविंद केजरीवाल को उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है. यही वजह है कि देश भर में आप का कुनबा बढता जा रहा है. कई नामी-गिरामी हस्तियां पार्टी में शामिल हो रही हैं. सदस्यों और समर्थकों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. यहां यह बता देना जरुरी है कि आप की बढती लोकप्रियता महज आकर्षण नहीं है. बल्कि यह वे लोग हैं जिनकी उम्मीदें धराशायी हो चुकी हैं.  जिन मूल्यों पर इस महादेश की आधारशिला रखी गई थी, वो टुकड़े-टुकड़े होकर राजपथ से लेकर जनपथ पर बिखरे पड़े हैं. और अफसोस ये है कि किसी को अफसोस नहीं.
 दरअसल, मनमोहन सिंह ने उदारीकरण का जो सिलिसला शुरू किया था, उससे अमीरों की अमीरी चाहे बढ़ी हो, गरीबी कम नहीं हुई. खतरा ये है कि 300 करोड़पतियों वाली संसद में गरीबों, दलितों, आदिवासियों के मुद्दों को दरकिनार किया जा रहा है. पर हमारे देश का दुर्भाग्य है कि जब किसी मौलिक विकल्प की सबसे ज्यादा जरूरत है तो हमारे पास नायक नहीं, महज विदूषक रह गए हैं. यह बात सब जानते हैं कि उन्मादी तेवर देश के मिजाज से मेल नहीं खाते. नरेंद्र मोदी के भाषण पर ताली चाहे जितनी बजती हो, लालकिले से ऐसी भाषा सुनने के लिए देश तैयार नहीं. वैसे भी, उन्माद की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वो स्थायी नहीं रहता. इसलिए उन्माद का झाग बैठते ही वोटों का सूखा पड़ जाता है. यही वजह है कि लोग केजरीवाल को उम्मीद भरी नजर से देख रहे हैं. अगर यह परिस्थति अरविंद केजरीवाल के पक्ष में है तो इसके खतरे भी कम नहीं हैं. टीम केजरीवाल आने वाले समय में किस प्रकार काम करती है. आम चुनाव में वे किस प्रकार के उम्मीदवार उतारते हैं. कांग्रेस के साथ संबंध कैसा रहता है. यह सब बातें ही तय कर पायेंगी कि देश और केजरीवाल का भविष्य कैसा होगा.

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

अब समझा मोदी की बात का मर्म

उस दिन मेरा साप्ताहिक अवकाश था. एक मित्र को स्टेशन छोड़ कर रात में घर लौट रहा था. घर से करीब दो सौ कदम दूर एक बंद गली से किसी प्रतिद्वंद्वी को परास्त कर या परास्त होकर तेजी से एक कुत्ता मेरी मोटरसाइकिल के अगले चक्के में घुस आया. गाड़ी फिसली और मैं धड़ाम. मुङो ठीक-ठीक इतना ही याद है. बाकी का घटनाक्रम इतनी तेजी से हुआ कि मुङो पता ही नहीं चला. मुङो आसपास के लोगों ने उठाया और मैं किसी तरह वहां से घर पहुंचा. रातभर दर्द से परेशान रहा. रातभर आपकी जगह दर्द की याद आती रही.. दूसरे दिन जब डॉक्टर से सामना हुआ, तो पता चला कि पैर में फ्रैर है. प्लास्टर करवा कर घर लौटा. मित्रों, रिश्तेदारों व जाननेवालों की तरफ से कुशलक्षेम जानने का सिलसिला शुरू हुआ. कुछ घर पहुंचे और कई ने फोन किया. अजीब लगता है, एक ही बात का रिपीट टेलीकास्ट करते रहो. किसी से विस्तृत, तो किसी से संक्षेप में. एक अलग तरह का अनुभव है यह. इस दौरान कई लोगों ने मुझसे यह भी जानना चाहा कि उस कुत्ते का क्या हुआ? वह जिंदा है या..? उसका पैर सलामत है या..? इन सवालों का सामना करते हुए शुरू में तो मुङो थोड़ा अजीब लगा, पर बाद में मैं इसे लेकर संजीदा हो गया. मैं इसे स्वाभाविक सवाल के रूप में देखने लगा.
तब मुङो याद आया नरेंद्र मोदी का वह बयान- ‘अगर हम गाड़ी चला रहे हैं या कोई और ड्राइव कर रहा है और हम पीछे बैठे हैं, फिर भी छोटा सा कुत्ते का बच्चा भी अगर गाड़ी के नीचे आ जाता है तो हमें पेन फील होता है.’ मैं सोच में पड़ गया कि मैं तो अपने दर्द से ही परेशान हूं. मुङो अपनी ही तकलीफें महसूस हो रही हैं. मैं इस बात से दुखी हूं कि मेरा आर्थिक नुकसान हुआ, स्वास्थ्य का नुकसान हुआ. मेरी छुट्टियां बरबाद हुईं. पर मुङो उस कुत्ते की एक बार भी चिंता नहीं हुई कि उसका क्या हुआ? क्या वाकई उसका भी पैर टूट गया होगा? कहीं उसकी जान पर तो नहीं बन आयी? उसकी देख-रेख कौन कर रहा होगा? वह कहां होगा, कैसे होगा? अब मुङो अपना दर्द कुछ कमतर लगने लगा. मैं सोच में पड़ गया. मुङो आत्मग्लानि महसूस होने लगी, पर मेरे सामने मुश्किल यह थी कि मैं खुद ही चल नहीं पा रहा था ऐसे में उस कुत्ते की शिनाख्त करना या उसके बारे में ठीक-ठीक पता लगा पाना मुश्किल था. बाद में मैंने खुद को दृढ़ करते हुए यह निश्चय किया कि मैं उस अज्ञात कुत्ते की सलामती के लिए प्रार्थना करूंगा. अफसोस तो मुङो भी है कि एक निदरेष कुत्ता मेरी गाड़ी के नीचे आ गया. मैं तो दोहरा गुनहगार हूं क्योंकि गाड़ी भी मेरी थी और ड्राइव भी मैं ही कर रहा था. इस पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए एक डर फिर भी मुङो परेशान कर रहा है कि कहीं फिर कोई मुझसे यह न पूछ ले कि ‘उस कुत्ते का क्या हुआ?’

शनिवार, 23 नवंबर 2013

विचारों की कब्र पर मूर्तियों की होड़

भारत में मूर्ति-निर्माण और मूर्ति-पूजा सदियों से चली आ रही है, लेकिन राजनीतिक फायदे के लिए मूर्तियों का इस्तेमाल इस वक्त जैसा हो रहा है, वैसा कभी नहीं हुआ. सरदार पटेल की राजनीतिक विरासत में सेंध लगा कर उस पर अपना हक जमाने की कोशिश के चलते नरेंद्र मोदी उनकी विशाल मूर्ति बनवा रहे हैं. तो कांग्रेस पटेल को अपनी पार्टी का नेता बता कर यह मुद्दा मोदी से छीनना चाहती है. इससे पहले भी कभी शिवाजी की बड़ी सी प्रतिमा लगा कर उनकी वीरता को सीमित अर्थो में बांधने की राजनीति की गयी, तो कभी बाबा भीमराव आंबेडकर को संविधान-निर्माता की जगह एक वर्ग का हितैषी बता कर प्रस्तुत किया गया. गांधीजी की मूर्तियां तो देश के कोने-कोने में हैं. चश्मे और लाठी के साथ उनकी मूर्तियों को उतनी ही आसानी से खड़ा कर दिया गया है, जितनी आसानी से बरगद के पेड़ के नीचे पत्थर को लाल सिंदूर लगा कर हनुमान की मूर्ति बना दी जाती है. गांधी जयंती और पुण्यतिथि पर उनकी साफ-सफाई हो जाती है, अन्यथा वर्ष भर वे उपेक्षित खड़ी रहती हैं. कभी मूर्ति का चश्मा टूटता है, कभी उसके नीचे बैठ कर मदिरापान या जुए का खेल होता है. संसद भवन में गांधीजी की जो मूर्ति लगी है, उसके सामने खड़े होकर सांसद अपना विरोध, प्रदर्शन आदि करते हैं. इस सब में गांधीजी की विचारधारा कहां दबा दी जाती है, उसकी खोज-खबर लेने वाला कोई नहीं. किसी भी महान व्यक्ति की मूर्ति लगा कर उसके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करना भावनात्मक अभिव्यक्ति का एक तरीका है,किंतु जब इसमें स्वार्थ जुड़ जाता है, तो यह तय है कि जिन विचारों और कर्मो से वह व्यक्ति महान कहलाया, उससे जनता को दूर करने की कोशिश हो रही है. भारत में मूर्तियों का इतिहास बहुत पुराना है. सिंधु घाटी सभ्यता के काल से मूतियों का वर्णन मिलता है. इनसान जिज्ञासाओं का जवाब ढूंढ़ता रहता है, और जहां वह अनुत्तरित हो जाता है, या यह महसूस करता है कि मुझसे ज्यादा कोई शक्तिशाली, श्रेष्ठ शक्ति इस ब्रrांड में विद्यमान है, तो उसे पूजना शुरू कर देता है. मूर्तियों का राजनैतिक प्रयोजन भारत में तब प्रारंभ हुआ, जब यूरोप में पुनर्जागरण हुआ. पर दुख की बात तो यह है कि निराकार को साकार करने की जगह अब साकार को ‘पाषाणकार’ किया जाने लगा है. कई मूर्तियां तो महज राजनैतिक स्वार्थो के चलते बनायी जा रही हैं. किसके नेता की ज्यादा बड़ी मूर्ति बनती है, ऐसी अविचारित होड़ देश में चल रही है. भारत में गांधी, नेहरू, भगत सिंह, शास्त्री, पटेल, आंबेडकर आदि महापुरुषों की जितनी मूर्तियां लगी हैं, अगर सचमुच उनका कोई असर होता, तो आज देश में जो वैचारिक शून्यता की स्थिति बनी है, वह कभी नहीं होती. हमें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने मूर्तियों को खड़ा कर उनके नीचे विचारों को दफन कर दिया है?