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गुरुवार, 5 नवंबर 2015

गाय, गीता और गप वाले देश में

माननीय प्रधानमंत्री जी. आप देश की जनता से हर महीने मन की बात करते हैं. आज मैं भी अपने मन की कुछ बातें आपसे कहना चाहता हूं. यह जुमला तो आपने सुना ही होगा कि इस देश में तीन चीजें खूब बिकती हैं - सिनेमा, सेक्स और सियासत. पर अब यह जुमला पुराना हो गया. अब इस देश में जो तीन चीजें खूब चर्चित हैं वह है - गाय, गीता और गप. जरा गौर फरमायें तो ये तीनों चीजें भारतीय संस्कृति में सनातन काल से रची-बसी हैं. कोई भी इससे अनभिज्ञ नहीं. पर इन दिनों ये तीनों चीजें नये कारणाें से चर्चा में हैं. अचानक से इस देश में कई लोगों के लिए गाय महत्वपूर्ण हो गयी है. इतनी कि सियासत भी पाकिकस्तान से लौटी भारतीय बेटी गीता के मुकाबले गाय को ज्यादा तवज्जो दे रही. यही कारण है कि इसे लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के गपों का सिलसिला जारी है. जब कभी भी सोशल मीडिया पर गप का दौर तेज होता है सरकार के माथे पर पसीना आने लगता है.उसे तरह-तरह की चिंता सताने लगती है और फिर सोशल मीडिया पर पाबंदी और निगरानी जैसी कवायद शुरू हो जाती है.
  आपको तो मालूम ही है कि हमारे देश में कई राज्य ऐसे हैं, जहां गाय को बिना अनुमति के नहीं मार सकते. लेकिन भैंसों को मार सकते हैं, उनका मांस खा सकते हैं और उनके चमड़ों से बैग बना सकते हैं. यहां तक कि एक गाय को मारने पर भारतीय दंड संहिता के मुताबिक शराब पीकर गाड़ी चलाने, छेड़छाड़, किसी को गंभीर चोट पहुंचाने या इनकम टैक्स चोरी जैसे अपराधों से कहीं ज्यादा सजा मिलेगी- वहीं बिना पलक झपकाए एक भैंस को मार सकते हैं. क्या गाय महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यओं से ज्यादा महत्वपूर्ण है. मार्च 2015 में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने लोकसभा में बताया था कि महिलाओं पर बलात्कार और हमलों के मामलों में इजाफा हुआ है. महिलाओं और बच्चों के प्रति यौनहिंसा, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति जातीय हिंसा की बढ़ती घटनाएं क्या कम महत्वपूर्ण है.  क्या इंसान पशुओं से भी ज्यादा बदतर है?
   एक बात और, गीता को जब पाकिस्तान में लावारिस हालत में पाया गया तो सबसे पहले उसे लाहौर के अनाथालय में भेज दिया गया. मूक-बधिर इस बच्ची को वहां नाम दिया गया फातिमा. कुछ दिन बाद इस बच्ची को वहां से ईधी फाउंडेशन के सदस्य और बिलकीस के पुत्र फैजल अपने साथ कराची ले आए. पहली बार जब उन्होंने उस बच्ची को अपनी मां बिलकीस से मिलवाया तो उसनेे हाथ जोड़े और बिलकीस के पैर छुए. बिलकीस तुरंत बोल पड़ीं कि यह बच्ची तो हिंदू है. और उन्होंने तुरंत उसका नाम फातिमा से बदलकर गीता रख दिया. यह वाकया यह बताने के लिए काफी है कि पड़ोसी मुल्क या दुनिया के दूसरे देश भारतीय संस्कृति के बारे में कितनी बारीक जानकारी रखते हैं, इसके बारे में कितना जानते हैं. तो क्यों न अब हम उन्हें अपने बारे में कुछ और भी बतायें. और हां, गप की चिंता न करें तो ही अच्छा. कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...!

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

सोशल मीडिया के तीर घाव करें गंभीर

उस दिन श्रीमती जी ने चाय का कप सामने रखते हुए पूछा- ‘‘आज इतनी जल्दी कैसे जग गये? कहीं जाना है क्या?’’ मैंने कहा- ‘‘जरा टीवी ऑन करो. महाराष्ट्र-हरियाणा का चुनाव परिणाम देखना है.’’ वह बोलीं- ‘‘पावर कट है.’’ इतना सुनते ही मुङो चाय कड़वी लगने लगी. हालांकि आधा कप पी चुका था. मैंने चाय छोड़ दी और सोने चला गया. काफी देर हो गयी, पर नींद नहीं आयी. श्रीमती जी ने मोबाइल पकड़ाते हुए कहा- ‘‘इतना अपसेट होने की जरू रत नहीं है. फेसबुक-व्हाट्सऐप आदि पर सारे अपडेट पड़े हैं.’’
मोबाइल ऑन करते ही व्हाट्सऐप पर पहला मैसेज दिखा- ‘‘हरियाणा-महाराष्ट्र के नतीजे आते ही राहुल गांधी विशाखापत्तनम में तूफान को महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं, जीजा जी पूछ रहे हैं जमीन के रेट कितने गिरे और बहन कहीं खादी की साड़ी खरीदने के लिए मां के साथ निकल चुकी हैं.’’ और फिर दूसरा मैसेज- ‘‘राहुल गांधी महात्मा गांधी के सपने को पूरा कर रहे हैं. गांधी ने कहा था कि आजादी के बाद अब कांग्रेस को नहीं होना चाहिए इसकी भूमिका खत्म.’’ फिर तीसरा- ‘‘देश के स्वच्छता अभियान में सबसे ज्यादा योगदान राहुल बाबा का ही है, क्यों है कि नहीं..?’’ अब तक यह बात साफ हो चुकी थी कि निश्चित ही कांग्रेस का बेड़ा गर्क हो चुका है. पर यह जानना बाकी था कि असल रुझान क्या है. किसको कितनी सीटें मिली या मिल रही है.  मैंने तुरंत फेसबुक का रुख किया. वहां भी एक से एक कमेंट-
‘‘बीजेपी की जीत के बाद सेंसेक्स आज 400 अंक उछल गया. अब इसकी धर्मनिरपेक्षता पर भी सवाल उठाये जा सकते हैं.’’
‘‘राज ठाकरे का उस वक्त हाथ उठ गया जब कोई रिपोर्टर उनसे ये पूछ बैठा कि सर आपके विधायकों की बैठक कब है? ’’
‘‘उजड़ा हुआ गुलशन और रोता हुआ माली... यानी कांग्रेस का अब क्या होगा?’’
‘‘सस्ते पटाखे चाहिए तो कृपया कांग्रेस कार्यालय में संपर्क करें. (मई माह की बिलकुल बंद पैकिंग मिलेगी.)’’
‘‘नौ साल पहले जब नारायण राणो ने शिवसेना छोड़ कर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीते तो बाल ठाकरे बहुत दुखी हुए थे. शिवसेना के नेता अरविंद भोंसले ने कसम खायी थी कि जब तक नारायण राणो अपनी सीट से हार नहीं जाते, वे चप्पल नहीं पहनेंगे. और नौ साल तक वे खाली पैर ही घूमते रहे. चुनाव परिणाम के बाद उन्हें 400 चप्पलें उपहार में मिली हैं.’’
एक संदेश तो बिल्कुल दार्शनिक अंदाज में था- ‘‘वह इतना कमजोर न होता, तो आप इतने मजबूत न होते.’’
अब मैं खुद को तरोताजा महसूस कर रहा था. बरबस ही मुंह से निकला- थैंक्स सोशल मीडिया!