रविवार, 2 जून 2013

सुनो ससुर जी अब जिद छोड़ो

बीसीसीआइ अध्यक्ष श्रीनिवासन पर इस्तीफा देने का चौतरफा दबाव इन दिनों इस कदर है मानो मानसून का पश्चिमी विक्षोभ बंगाल की खाड़ी पर दबाव बना रहा हो. श्रीनिवासन को सोते-जागते, खाते-पीते बस इस्तीफे का भूत ही सता रहा है. जानकारों का मानना है कि वे अवश्य ही उस मुहूर्त को कोस रहे होंगे, जब उन्होंने ‘सुयोग्य’ मयप्पन को अपना दामाद बनाया. कुछ ऐसी ही सोच मयप्पन की भी है. मयप्पन आज जिस हालात (जेल) में हैं, उसमें वे अपने ससुर श्रीनिवासन के बारे में भला अच्छा कैसे सोच सकते हैं. सूत्र बताते हैं कि ‘सुयोग्य’ दामाद ने अपने ससुर की ‘काबिलीयत’ पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि होशियारी आती नहीं तो किया क्यों? और पकड़े ही गये तो अब जिद कैसी, इस्तीफा क्यों नहीं देते?
मयप्पन का यह भी मानना है कि उन पर इतना शिकंजा इसीलिए कसा, क्योंकि वे श्रीनिवासन के दामाद हैं. अगर वे ‘आम आदमी’ होते तो बड़े ही आराम से सारा माल हजम कर जाते और डकार भी नहीं लेते. मयप्पन का दावा सुन कर आपको उनके हाजमे का अंदाजा तो लग ही गया होगा. पर इस प्रकरण को लेकर उल्टी-दस्त करने वाले भी बहुतेरे हैं. कोई क्रिकेट को कोस रहा है तो कोई सट्टेबाजों को, कोई बीसीसीआइ को कोस रहा है तो कोई क्रिकेटरों को. ये सब लोग वही हैं जिन्हें कुछ भी हजम नहीं होता. बात चाहे इनके प्रिय टीम के हारने की हो या इनके पसंदीदा क्रिकेटर के बिना रन बनाये आउट हो जाने की. इनके लिए किसी भी परिस्थिति को हजम करना मुश्किल होता है. आज क्रिकेट के फैन भले ही दुखी हों और ससुर दामाद भले ही एक-दूसरे को कोस रहे हों, पर मीडिया को आजकल खूब मसाला मिल रहा है. कुछ दिनों पूर्व ही एक बड़े पत्रकार ने अपने लेख में इस प्रकरण पर अपनी टिप्पणी कुछ यूं दी -
‘‘टी-20 में भागीदार सभी को मालूम था कि इसके जन्म के समय से ही इससे दरुगध आ रही है. कुछ सट्टेबाज शायद इसी बदबू के कारण इसकी ओर आकर्षित हुए. एक शीर्ष अधिकारी जो अब इस लीग से बाहर है, अपने लोगों के सामने कहता था कि जब भी उसकी पसंदीदा टीम हारती है, वह सट्टेबाजों के जरिये जीत जाता है. पार्टी में होनेवाली ऐसी बातें दौलत के पुजारियों की ओह-आह से बाहर निकलीं. आइपीएल में सभी भ्रष्ट नहीं हैं. अधिकतर मालिक और मैनेजर मजे और मनोरंजन के नये तरीके के जरिये कानूनी तरीके से पैसा कमाने की चाह में इससे जुड़े. अधिकतर क्रि केटरों को अपना बैंक बैंलेंस देखने पर अपने भाग्य पर यकीन नहीं होता होगा. उन्होंने कभी सपने में भी ‘लॉटरी’ से मिलनेवाली ऐसी अमीरी के बारे में नहीं सोचा होगा. लेकिन इसकी कीमत थी चुप्पी. लेकिन क्या किया जाये, कुछ लोग बात न पचा पाने के लिए अभिशप्त होते हैं.’’

गुरुवार, 23 मई 2013

वो कत्ल करे हैं या करामात करे है...


अपने गांव गया था. एक बस यात्रा में बड़ा ही रोचक अनुभव हुआ. अगर आप गौर करें तो बस यात्रियों की आपस में बातचीत, खलासी-ड्राईवर के संवाद और यात्रा के दौरान तरह-तरह की आवाज से एक खास तरह का कोलाज बन उठता है. महसूस कीजिये..
  एक सवारी-एक सवारी, रोक के..रोक के. चल.. ए.. भाई, ए साइकिल.. उपर..अरे तनिक बैगवा उहां रखिये..हां अरे बच्चा है तो उसे गोद में लेकर बैठिए. टिकस लिया है तो बच्चे का लिया है पूरे का नहीं. सीट पर आप बैठ जाईये. मां जी..हां.कहां जाना है. ऐ रिक्शा.. अरे तोहरी हरामी के आंख.. चांपे चले आवत हउव..
  न दामन पे कोई छींटा/ न खंजर पे कोई दाग/ वो कत्ल करे हैं..या करामात करे हैं..बड़ा शायरी मारत बाड़..कॉलेजवा में इहे पढाई होता है का.. रउरा ना बुझाई ए बाबा..
    ललुवा के रैली फेल हो गइल..ए भाई तनिक गाड़ी साइड होखे द तब थूकिह. हवा इधरे का है. ऐ बाबा तनी होने खसकिये. ए साल सरजू बावन बोना है, सोनालिका भी ठीक है.उपज ठीके है. एक निबंध.. विज्ञान ने हमारे जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन किया है..अब बताओ..आमूल तो आमूल ये चूल क्या है. रोक के..रोक के..उतरना है. ए भाई सामान आगे करो.. आप वहां बईठिये.. अरे तो आधे पर ही बईठो भाई जल्दीऐ पहुंच जाओगे. काहे जल्दीयाये हो. सामान पर जोर मत डालिए..फूटेगा नहीं.. अरे चिंता मत करो..
  पप्पू यादव बाइज्जत बरी..अपने देश में कानून सबके लिए अलग-अलग है.. अरे कानून के किताब में करिया-करिया शब्द का भारी-भारी अर्थ समझना सबके वश में नहीं नू है भाई..सही कह रहे हैं, इ काम खाली वकीले लोग कर सकता है..वह भी पईसा लेकर.. बीड़ी छूआ जाएगा. हाथ उधरे रखिये. कुरता बड़ा कटाह पहिनले बाड़ ससुरारी जात हऊव का..अरे तोहरी बहिन के. इहां काहे भीड़ है भाई..बारात निकलल है का. सीवान के बाबू बजरंगी के यहां परसो बड़ा स्वागत सत्कार हुआ. फायरिंग से पूरा सामियाना फाड़ दिया सब.. साइड होखिये.. बैल हइस का रे..मारेब कि मरिये जइब.
 कमरिया करे लपालप..लॉलीपप लागेलू.. अरे तनी गनवा धीरे बजाइये.. महाराजगंज के उपचुनाव में के जीतेगा एह बार.. जीते केहू लेकिन नीतीश आउर लालू के प्रतिष्ठा दांव पर लागल बा..
  हां भाई. आइये..उतरिए जल्दी..उतर रहे हैं नू. लग रहा है कि हवाई जहाज चला रहे हैं.. ढेर कानून मत बतिआइये..जाइये घरे.. ऐ लल्लन भईया आपका मोबाइल गिर गया..रिक्शा पकड़ के स्टेशन काहे नहीं चले जाते हैं, पैदल त लू मार देगा.. ट्रेनवा में अभी लेट है का..

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

मुंह में गांधी और बगल में गोडसे!


मैडम जी, जय हिंद! आज देश का माहौल क्या हो गया है. अपने को पार्टी का आदमी कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है. पहले तो पाटी मेंबर जानते ही लोग प्यार करते थे, महात्मा-सी जयजयकार करते थे. आज मालूम पड़ते ही अपराधी जैसा  व्यवहार होता है, जूतों से, गालियों से सत्कार होता है. ये कैसे हुआ कि लोकतंत्र में ‘बाबा’ और ‘अन्ना’ लोग देशहित के लिए आगे आ रहे हैं, लेकिन आपके मुंशी-मैनेजर कहते हैं कि बाबा फ्र ॉड है, अन्ना बेईमान है. पर मैडम जी अगर ये लोग ऐसे हैं, और आपके ‘मौनमोहन’ संत हैं, महात्मा हैं, तो देश में इतना भ्रष्टाचार कैसे हो गया? यह तो वही बात हुई कि ‘मुंह में गांधी और बगल में गोडसे!’
ये जो आपके ‘मौनमोहन’ हैं न, उनको कॉलेज में किसी ने पढ़ा दिया कि मंदी उर्फ रिसेशन बुरी चीज है इसलिए इसे आने देना ही नहीं चाहिए. यह बात गांठ बांध कर ‘मौनमोहन’ ने रख ली है और यही मुसीबत की जड़ है. मुख्य बात यह कि पिछली बार जब मंदी आयी तो आपके ‘मौनमोहन’ ने उससे बचने के लिये नोट छाप कर बाजार मे ढकेल दिये. उससे महंगाई बढ़ गयी. और इस बार ‘मौनमोहन’ बैंक की ब्याज दरों के साथ-साथ पेट्रोल और अन्य चीजों के भाव भी बढ़ा रहे हैं, ताकि अतिरिक्त पैसा मार्केट से बाहर हो जाये. पर इससे फायदा हो नहीं
रहा. उल्टे आम आदमी का तेल निकल जा रहा है.
अगला लोकसभा चुनाव सिर पर है. यह साल भी बीतते देर न लगेगी. पिछली बार तो अपने राजकुंवर कुछ कर नहीं पाये. यूपी चुनाव में भी उनका हश्र आप देख ही चुकी हैं. अगला चुनाव किसके भरोसे है, यह अभी तक आम कार्यकर्ता जान नहीं पाया है. आपने पार्टी में दो प्रकार के लोगों को प्रमुखता दे रखी है, कमाने के लिए अर्थशास्त्री और बचाने के लिए वकील. अब हम भला आपको क्या सलाह दें? वैसे अपने ‘मौनमोहन जी’ को कहिये कि पेट्रोल- डीजल का भाव कम करवा दें, तो कुछ तो राहत मिलेगी. आशा है, आपका स्वास्थ अच्छा होगा और आप कुशल से होंगी. कोई गलती हो गयी हो, तो माफ करें और लौटती डाक से अपनी चरणधूलि भेजने की कृपा करें.
आपका अपना
      आपकी ही पार्टी का एक अनाम सेवक
 (यह गुमनाम पत्र अभी दो दिन पहले ही मुङो प्राप्त हुआ है. मेरी समझ में यह बात नहीं आ रही कि आखिर यह पत्र मेरे पते पर क्यों आया? यह ऐसा अजीबोगरीब पत्र है, जिस पर न तो पानेवाले का पता दर्ज है और न ही भेजनेवाले का. फिर भी डाकिया न जाने यह पत्र मेरे घर क्यों डाल गया? खैर मैं कब तक इस उधेड़बुन में रहूं. अंतत: मेरे एक मित्र ने यह सुझाव दिया कि क्यों न इस पत्र को सार्वजनिक किया जाये. समझनेवाले समझ जायेंगे, जो न समङों वो अनाड़ी हैं!)

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

यह गिरने-गिराने का दौर है, जरा बच के!


जो जितनी तेजी से उठता है, वो एक दिन उतनी ही तेजी से धड़ाम भी होता है. यह नियम है. फिर प्यारे क्यों दुखी हो सोने-चांदी की इस गिरावट पर? अब तलक सोने-चांदी की छलांग के मजे लिए, अब थोड़े दिन उसकी गिरावट का दर्द भी ङोलो. ताकि पता तो चल सके गिरने का दर्द कैसा होता है. सोने-चांदी के मूल्य में गिरावट से लोग इतने दुखी हैं, पर समाज की नैतिकता में जाने कब से कितनी गिरावट आ चुकी है, वह किसी को नहीं दिखती. जहां देखो वहीं, कहीं किरानी तो कहीं फूड इंस्पेक्टर तो कहीं किसी बाबू के घर से लगातार चल-अचल संपत्ति बरामद हो रही है. नोट गिनने की मशीन न हो तो छापे मारनेवाली टीम का जाने क्या हाल होगा? मैं सच बताऊं तो बाबू प्रजाति में ऐसे फिलासॉफिकल डायमेंशन मुङो पहले कभी नजर नहीं आए थे. आज मुङो अपने बाबू नहीं होने का जो अफसोस हो रहा है, वो पीड़ा कालीदास की शकुंतला की पीड़ा से भी बड़ी है. अपने अल्प अनुभव और सीमित ज्ञान से मैं बाबुओं के विषय में जितना जानता था, वो तमाम भ्रांतियों की दीवारें ताश के पत्ताें के महल के समान भरभरा कर गिर रही हैं.
बाबुओं के घर से निकलती यह करोड़ों रु पयों की बरात, फाइलों के बोझ तले दुबके हुए बैठे अन्य बाबुओं को भी संशय के घेरे में ला रही है. जिन कार्यालयीन बाबुओं ने दिनभर में दो-तीन पान चबा लेने को रईसी समझा हो, जिन्होंने सब्जी मंडी में लौकी-नेनुआ के भाव-ताव में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया हो, ऐसे पवित्र बाबुओं के बारे में समाज की राय का एकाएक बदल जाना चिंतनीय विषय है. यह अजीब दौर है. चारों तरफ गिरने-गिराने का दौर जारी है. पर गिरने की भी हद होती है. अरे! इनसानों को छोड़िए, सोने-चांदी को देखिए. इत्ता गिरे, इत्ता गिरे कि गिर-गिर कर अपना नाम और दाम दोनों ही डुबो दिया. सोना-चांदी खुद तो डूबे ही, साथ में न जाने कितने निवेशकों, व्यापारियों, कारीगरों को ले डूबे. देख रहा हूं सब डूब-डाब कर मातम मना रहे हैं.
हो सकता है, सर्राफा बाजार की गिरावट से धोखा खा चुके लोग भविष्य में सोने-चांदी से मुंह फेर लें या इसके प्रति उनमें अरुचि पैदा हो जाये, पर एक बात तो तय है कि जगह-जगह  बाबू बनानेवाले कोचिंग क्लासेस के बड़े-बड़े होर्डिग लग जायेंगे. बच्चे भी शायद अब बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस बनना न चाहें. बड़े ओहदों पर जाने की तैयारियों में भी कोई व्यर्थ ही अपना अर्थ और श्रम क्यों जाया करेगा? जब पहले पायदान पर ही लक्ष्मी जी भर-भर के कृपा दृष्टि लुटाने को आतुर बैठी हों, तब ऊपरी पायदान को लक्ष्य बनाने का क्या फायदा? या यूं कहें कि जब खिड़की से ही चांद के दर्शन हो रहे हों, तो छलनी लेकर छत पर टहलने का क्या मतलब?

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

समंदर में सू-सू करने से सुनामी नहीं आती!


अभी कल की ही बात है मार्केट में रुसवा साहब मिल गये. मैंने खैर मकदब के बाद पूछा इधर कैसे आना हुआ चाचू? मुंह में पान की गिलौरी चबाते रुसवा साहब ने मुङो उपर से नीचे तक देखा. मानो आरबीआइ गवर्नर सुब्बाराव की तरह वे भी बढती महंगाई के लिये मुङो दोषी मान रहे हों. वे धीरे से बोले ‘बस यूं ही.’ मैंने पूछा- रांची में सब कैसा है, चाय पीना पसंद करेंगे? वे कुछ बोले तो नहीं पर मेरे साथ चाय की दुकान की तरफ हो लिये. चाय की पहली चुस्की के साथ ही मैंने पूछा-
चाचू, महंगाई के लिये आप किसे दोषी मानते हैं?
पब्लिक को. महंगाई सरकार ने नहीं बढ़ाई. महंगाई को बढ़ाया ज्यादा खाने-पीने वाले लोगों ने! अंट-संट कमाने वाले लोगों ने! हद है, खुद के पेट पर कंट्रोल है नहीं और सरकार से कहते हैं कि महंगाई को कंट्रोल करे. सरकार भला महंगाई को कैसे कंट्रोल कर सकती है. हालांकि सरकार की हरदम यह कोशिश रहती है कि वो जनता को महंगाई से मुक्त रखे मगर क्या करे, उसकी हर कोशिश पर विरोधी विरोध शुरू कर देते हैं. उसे जन-विरोधी करार देते हैं. उसे बाजारवाद और पूंजीवाद का हितैषी कहते हैं.
लेकिन चाचू ये पब्लिक इतना खाती क्यों है?
भतीजे, खाते रहना पब्लिक की जरूरत या मजबूरी नहीं, उसकी नियति होती है. पब्लिक अच्छा खाना खाये. यह सरकार की सेहत के लिए भी अच्छा नहीं माना जाता. इसलिए सरकार इतना चिंतित हो जाती है.
लेकिन चाचू पब्लिक के अच्छा खाने से सरकार को क्या नुकसान होता है?
दरअसल, पब्लिक के अच्छा खाने से सरकार का काम-धाम और उसकी जवाबदेही बढ़ जाती है. बाजार में दूध, मीट, दाल, फल और सब्जियों की कीमतों में भी इजाफा हो जाता है. शेयर बाजार के सूचकांक हिलोरे मारने लगते हैं.
लेकिन चाचू  सरकार महंगाई न सही भ्रष्टाचार तो रोक सकती थी?
भ्रष्टाचार को रोकने में सरकार फेल हुई लेकिन कथित ईमानदार लोग भी भ्रष्टाचार को कहां रोक पाए? जोर तो बहुत लगा लिया ईमानदारों ने कभी रामलीला मैदान, कभी जंतर-मंतर पर हो-हल्ला काटके मगर रहे ढाक के तीन पात. हो-हंगामे का असर इत्ता हुआ कि ईमानदारों ने अपना राजनीतिक दल खड़ा कर लिया.
  इतने में चाय खत्म हो गयी और रुसवा चाचू पान की दुकान की तरफ बढ लिये. मैंने पूछा चाचू-चाचू आप तो पूरी तरह संप्रग सरकार के पक्ष में खड़े दिखते हैं. कहीं 2014 का चुनाव लड़ने का इरादा तो नहीं? वे फिर मुङो उपर से नीचे तक देखते हुए बोले- बाल सफेद हो जाने से नादानी नहीं जाती और समंदर में सू-सू करने से सुनामी नहीं आती.

गुरुवार, 21 मार्च 2013

हमने एक शेर सुनाया तो बुरा मान गये!


अजीब हालात हैं. बेनी प्रसाद वर्मा ने जरा सा ‘कुछ’ कह दिया, तो उनके पुराने ‘दोस्त’ मुलायम सिंह यादव बुरा मान गये. राज्यसभा में कांग्रेस नेता प्रदीप बलमुचु ने जया बच्चन की जरा-सी तसवीर क्या ले ली, वे बुरा मान गयीं. करुणानिधि की एक छोटी इच्छा केंद्र सरकार ने पूरी नहीं की, तो वे इस कदर बुरा मान गये कि सरकार से अपना समर्थन ही वापस ले लिया. बिहारी बाबू (शत्रुघ्न सिन्हा) ने रानी मुखर्जी को ‘रानी चोपड़ा’ क्या कह दिया, वे भी बुरा मान गयीं और ऐसे रिएक्ट किया- मानो कह रही हों ‘खामोश!’
  भई! यह तो होली का मौसम है, बुरा क्या मानना. देखो, पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा सबकी जुबान यही कह रही है ‘बुरा न मानो होली है.’
पता नहीं ‘बुरा न मानने’ से लोग परहेज क्यों करते हैं. वैसे मैं बता दूं कि ‘बुरा न मानना’ कोई रोग नहीं है, लेकिन शायद इनको लगता है कि जहां सभी लोग बात-बिना बात बुरा मान रहे हों, वहां  बात  पर भी बुरा न मानना रोग ही है. अगर आपने गौर किया हो, तो ऐसा लगता है कि अपने देश में किसी किसी की शक्ल तो बुरा मानने के लिए ही बनायी गयी लगती है. मायावती, ममता बनर्जी, करुणानिधि, अब्दुल्ला बुखारी, आडवाणी, राखी सावंत, डैनी..आदि-आदि. इन लोगों के चेहरे पर कभी ख़ुशी के भाव नहीं देखे. ऐसा लगता है कि ऐसे लोग पैदा होते ही अपने मां-बाप से भी बुरा मान गये होंगे.
  वैसे होली का मौसम होता गजब का है. जिसे देखो वही बौराया हुआ लगता है. आम, लीची, जामुन, गेहूं, अरहर, सरसों से लेकर इनसान तक. और, कवियों की पूछिये ही मत. जहां देखो वहीं हास्य कवि सम्मेलन हो रहा है. एक मंच से किसी होलियाये कवि ने तुकबंदी पेश की-
तमाम रात सुनते रहे गज़लें उनकी
हमने एक शेर सुनाया तो बुरा मान गये.
जब भी चाहते हो कुरेद देते हो जख्मों को
हाथ हमने दबाया तो बुरा मान गये.
 दूसरे ने तेवर दिखाते हुए माइक थामा-
हर हाल में हमने तुम्हारा साथ दिया,
थोड़ा सच बोला तो बुरा मान गये.
ताउम्र खोजता रहा,रोशनी तेरे लिए,
दीये में तेल न बचा तो बुरा मान गये.
बरसाती मेढक जैसे कवियों की नयी खेप होली के मौसम में उग आती है. पता नहीं पूरे साल ये कहां रहते और क्या करते हैं. कवि भी गजब-गजब के.
खैर, हम यहां बात कर रहे हैं बुरा न मानने की. वैसे, अगर आप बुरा न मानें तो मेरी एक सलाह है कि हम लोगों को सिर्फहोली में ही बुरा मानने से क्यों रोकते हैं? इस मंत्र का प्रयोग पूरे साल करने में क्या हर्ज है? मसलन- बुरा न मानो  संडे  है,  मंडे  है,  वेलेंटाइन डे  है आदि आदि. इसी बहाने बुरा मानने की बुराई तो खत्म होगी. खैर चलते-चलते, बुरा न मानो होली है..

बुधवार, 6 मार्च 2013

यह तो मीना कुमारी कॉम्प्लेक्स है जनाब!


निर्माता-निर्देशक विशाल भारद्वाज की चर्चित फिल्म ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ में नायक  नायिका को कहता है ‘तुङो मीना कुमारी कॉम्प्लेक्स है.’ नायिका सवाल करती है ‘कैसे?’ नायक बताता है ‘तुम दुखी रहकर खुश रहती हो.’ यह बात भले ही एक मुहावरे की तरह फिल्म में इस्तेमाल हुई हो पर अगर हम गौर करें तो हमारे आसपास कई लोग ऐसे नजर आते हैं जिन्हें सच में मीना कुमारी कॉम्प्लेक्स है. अच्छे खासे लोग, जिन्हें न रोजी-रोटी की चिंता है न घर-परिवार की. न पाने की खुशी है न खोने का गम. जिंदगी की हर सुख-सुविधाएं  हासिल हैं, फिर भी वे मुकेश के दर्द भरे नगमे सुनना पसंद करते हैं. भारतीय प्रशासनिक सेवा से सेवानिवृत्त एक अधिकारी के यहां एक दिन जाना हुआ. पहुंचा तो म्यूजिक की हल्की आवाज कमरे के बाहर तक आ रही थी ‘जब दिल ही टूट गया तो जीकर क्या करें’ मैं ठिठक गया. गार्ड ने बताया कि घबराइये नहीं. यह रूटीन का हिस्सा है. मैंने पूछा ‘सर आप यह गीत?’ बोले ‘बस यूं ही. अच्छा लगता है.’
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हाल ही में संपन्न राजधानी दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी ‘मीना कुमारी कॉम्प्लेक्स’ का बोलबाला  रहा. वजह थे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी. पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से लेकर वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज तक हर कोई नरेंद्र मोदी का मुरीद नजर आया. मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को जब भाषण देने का मौका मिला तो उन्होंने अपनी उपलब्धियों को मोदी की उपलब्धियों के बराबर दिखाने की कोशिश की. हद तो तब हो गयी जब पार्टी के भूतपूर्व पीएम-इन-वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी के दिल का दर्द उनके भाषण में छलक आया ‘मुङो नरेंद्र मोदी से जलन होती है. वे इतने प्रखर वक्ता हैं कि उनके बोलने के बाद किसी को बोलने के लिए कुछ बचता ही नहीं है.’ ऐसी ही बात उन्होंने सुषमा स्वराज के लिए भी कही ‘जब मैं अटल बिहारी वाजपेयी के साथ जनसंघ में काम करता था, तो उनकी प्रखर भाषण शैली के कारण जनसभाओं में बोलने से कतराता था. आज सुषमा स्वराज भी अपने ओजस्वी विचारों से मेरे अंदर कॉम्प्लेक्स पैदा करती हैं.’
मनोविज्ञान में खुद को पीड़ा देकर आनंद पाने को ‘मैसोचिस्म’ कहते हैं. आपने शायद गौर किया हो, बीजेपी के हर बड़े आयोजनों में आडवाणी जी अक्सर आंखों में आंसू लिये देखे जाते हैं. कोई उनकी प्रशंसा कर दे तो आंसू, किसी ने पुरानी यादें ताजा कर दी तो आंसू. आप कहेंगे यह तो खुशी के आंसू हैं. जी हां जनाब!  सही फरमा रहे हैं आप. यह खुशी के ही आंसू हैं. पर यह आंसू ही उनके अंदर का ‘मीना कुमारी कांम्प्लेक्स’ उजागर करता है.

बुधवार, 30 जनवरी 2013

इस मर्ज की गालिब कोई दवा तो बताओ!


हर बार सोचता हूं कि इस बार क्या नया लिखूं. अधिकारी से लेकर नेता तक सब जनता की सेवा में लगे हैं, आखिर मुङो भी कुछ करना चाहिए. मैं भी इस अभागे देश का अभागा नागरिक हूं. अपने देश का कुछ तो भला करूं. उम्र बीत जाती है कई लोग यह  सोच ही नहीं पाते कि उन्हें देश के लिए, समाज के लिए या खुद के लिए करना क्या है? मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मैंने इस निष्कर्ष को शीघ्र ही पा लिया. एक दिन चिंतन-मनन में डूबा देख कर श्रीमती जी ने बाउंसर मारा ‘कोई गंभीर बात है?’ मैंने कहा ‘बस यूं ही सोच रहा था कि कुछ अलग लिखूं, कुछ नया लिखूं.’ श्रीमती जी का जवाब हाजिर था ‘लिखना है तो लिखो, सोच क्यों रहे हो? लोगों से भी कम मतलब लोगों की बात लिख कर कूदते रहते हो,  लिखना है तो ऐसा लिखो जो सबके मतलब का हो.’
  मुङो ‘मतलब’ तो समझ में आ गया पर हमने बहुत सोचा कि ऐसा क्या लिखूं कि जो सबके मतलब का हो! यह सोचते-सोचते मैंने इतना सोचा कि अब मुङो लगने लगा है कि मुङो ‘सोचने’ की बीमारी हो गयी है.  कभी-कभी तो मैं यह सोचने लगता हूं कि मैं सोच क्यों रहा हूं? सच बताऊं तो कभी-कभी यह भी सोचता हूं कि सोचना कम कर दूं क्योंकि बंद तो नहीं कर सकता. सोचने-सोचने के क्रम में ही कई ऐसी पुस्तकें भी पढ़ डाली, जिनमें मेरी कभी रुचि नहीं रही. इस दौरान कहीं पढ़ने को मिला कि दुनिया में हर मर्ज की दवा बताते हुए उससे बचने के उपाय हाजिर हैं. कुछ में तो दर्द बाद में आता है, दवा पहले तैयार रहती है बल्कि सच कहा जाये तो दवा होती है इसीलिए दर्द ईजाद किया जाता है.
      पिछले दिनों शहर में एक पुस्तक मेला भी लगा था. कई पुस्तकें स्टॉलों पर चमक रही थीं - दोस्त कैसे बनायें, लोगों को प्रभावित कैसे करें, अच्छा व सफल मैनेजर कैसे बनें, करोड़पति बनने के सौ सफल उपाय, अच्छा व प्रभावकारी वक्ता कैसे बनें, सुखद-सफल दांपत्य जीवन के नुस्खे, महान कैसे बनें? वगैरह-वगैरह. यह सब देख कर मैं सच बताऊं तो हतोत्साहित हो गया. इतनी सारी जानकारियों पर तो पहले ही लिखा जा चुका है. इसके अलावा भी तमाम अटरम-सटरम विषयों पर भी किताबें मौजूद हैं लेकिन हमने आजतक ऐसी कोई किताब नहीं देखी जिसमें कोई ऐसी तरकीब बतायी गयी हो कि आप  अच्छा इंसान कैसे बनें? दुनिया में औने-पौने-बौने व्यक्तित्व के लोगों का धमाल है. अच्छे लोग दिखते ही नहीं! ऐसा तो नहीं कि अच्छे लोग भगवान के यहां से बन के आने ही बंद हो गये? मुङो तो लग रहा कि यह मुद्दा सभी के मतलब का है, बाकी आप जैसा उचित समङों. वैसे मैं इस निष्कर्ष पर अभी नहीं पहुंच पाया हूं कि क्या वाकई मैंने सोचने का ‘मजर्’ पाल लिया है? अगर ऐसा है तो, इस मर्ज की गालिब कोई दवा तो बताओ!

बुधवार, 9 जनवरी 2013

पुराने की कशिश और नयेपन की तलाश


तीन दशक पहले की बात होगी, हम चार भाई-बहन किताबें एक के बाद एक उपयोग कर लेते थे. इस कड़ी में पड़ोसी घरों के बच्चे भी शामिल थे. बड़े भैया की किताबें मैं, फिर मेरे से छोटी वाली बहन और उसके बाद सबसे छोटी वाली बहन. कड़ी आगे भी थी. पड़ोस के बच्चे तक भी उन किताबों का बहुधा उपयोग करते थे. किताबें बेहद संभाल कर उपयोग की जाती थीं क्योंकि आनेवाले सालों में छोटे भाई-बहनों के लिए भी काम में लाना था. इससे जहां किताबों के प्रति स्नेह-लगाव पैदा हो जाता था, वहीं उनकी साज-संभाल के प्रति सजगता खुद-ब-खुद आती गयी. इतना ही नहीं, पुरानी कॉपियों के बचे पन्नों से नयी क्लास के लिए नयी नोटबुक भी जिल्द के साथ बना ली जाती थी. कपड़ों के मामले में भी कुछ इसी तरह की मितव्ययिता बरती जाती थी. कपड़े, किताबों के अलावा पुराने टूटे सामान का भी कहीं न कहीं सदुपयोग हो ही जाता था. कद्दू (कुम्हड़े) के छिलके की स्वादिष्ट सब्जी और सूखी चटनी बनाने वाले अब कितने हाथ बचे हैं? बासी रोटी को मसल कर स्वादिष्ट नाश्ते में बदलना आजकल कम ही रसोई घरों में हो पाता है. बासी भात के पकोड़े और बासी रोटी के पकोड़े सुबह के नाश्ते का जरूरी हिस्सा थे. गांव की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर तांगे या बैलगाड़ी की सवारी करने में जो बात थी वह आज किसी महंगी/लग्जरी कार में भी नहीं.
   आप सोच रहे होंगे कि मैं यह सब पुरानी बातें क्यों याद कर रहा हूं. दरअसल, बीते दिनों को याद करना मानव की फितरत है. हम जानते हैं कि हमारी नियति आगे की ओर जाना ही है, समय की गंगा को उलटा बहा कर पीछे जाना संभव नहीं होता. मगर बीते हुए कल में कोई न कोई ऐसी कशिश होती है जो हमें समय-बेसमय उसकी ओर खींचती है. विदेशों या देश के ही बड़े शहरों से छुट्टियां मनाने छोटे शहरों व गांवों में जाने वाले लोग तांगे की सवारी करना पसंद करते हैं, तो इसलिए नहीं कि उन्हें मोटर से चिढ़ हो गयी है और वे उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं. छुट्टियों से लौट कर उन्हें उन्हीं कार, बस, हवाई जहाज दरकार होंगे. कथित पिछड़े  मुल्कों या इलाकों के लोग जहां चमचमाते कांच और कंक्र ीट के जंगलों में घूमने के ख्वाब देखते हैं, वहीं इन जंगलों में से निकल कर सुविधाओं से वंचित स्थानों पर कुछ दिन बिताने की चाह रखने वालों की संख्या भी बढ रही है. बड़े-बड़े रईसों में ऐसे किसी स्थान पर छुट्टियां बिताने का चलन चल पड़ा है, जहां न टेलीफोन हो, न टीवी और न ही इंटरनेट.  दरअसल, यह यह कुछ अलग पाने की चाहत है. मनुष्य को जो हासिल है, उसे सुकून पाने के लिए हमेशा उससे इतर कुछ चाहिए. जब वह पीछे होता है, तो आगे जाना चाहता है और जब आगे पहुंच जाता है, तो वापस पीछे लौटना चाहता है..