सुबह उठते ही, चाय पीते वक्त दूध और चीनी की महंगाई याद आती है. दोपहर और रात को, भोजन करते वक्त सब्जी-आटा-चावल-दाल की महंगाई सताती है. तो क्या हुआ.. यह क्षणिक आवेग है जनाब! थोड़ा ठंड रखिए. गुस्सा पी जाइए. क्या हुआ जो टमाटर आपको लाल आंखें दिखा रहा है, प्याज का दाम सुन कर ही आंसू आ रहे हैं? वह दिन दूर नहीं जब प्याज भी सेंसेक्स और रुपये की मंडली में शामिल हो जायेगा. फिलहाल तो आप ‘भारत निर्माण’ का विज्ञापन देखिए और देश में तरक्की का चढ़ता ग्राफ महसूस कीजिए. हो सके तो उस ढाबे या होटल की तलाश कर लीजिए, जहां 12 या 5 रु पये का खाना मिल सके. वैसे परिवार को ढूंढ़ कर उसकी जीवनशैली अपनाइए जो 27 या 33 रु पये में गुजारा कर रहा है. केंद्रीय मंत्रियों और सत्तासीन पार्टी के नेताओं का यह दावा बस यूं ही नहीं है. आखिर वे जो कह रहे हैं उसका पुख्ता आधार होगा. उन पर ‘भरोसा’ कीजिए. ठीक उसी तरह जिस तरह पिछले दस साल से अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री पर भरोसा कर रहे हैं. इस उम्मीद के साथ कि आज नहीं, तो कल देश की अर्थव्यवस्था जरूर ठीक हो जायेगी. पर हो इसका उल्टा रहा है. रुपया दिनोदिन रसातल में जा रहा है. दलाल पथ से लेकर राजपथ तक भयंकर गिरावट का दौर जारी है. दलाल पथ पर सेंसेक्स गिर रहा है, तो राजपथ पर नेता लोग. किसी को अपनी गिरावट पर ‘अफसोस’ नहीं है. पर इस गिरावट को आप हल्के में मत लीजिए. इसमें तमाम अंदरूनी रहस्य छिपे हैं. सेंसेक्स इसलिए गिर रहा है, ताकि निवेशकों के दिल मजबूत हों. रु पया इसलिए गिर रहा है, ताकि लोग फिजूलखर्ची कम करें और अपना माल बचा कर निर्यात किया जाये. नेता इसलिए गिर रहे हैं, ताकि राजनीति के प्रतिमान कुछ बदल सकें. अगर आप समझ सकें तो असल बात यह है कि नेताओं के लिए देश की जनता और राजनीति दोनों ही मनोरंजन का सामान बन गयी हैं. इस मनोरंजन का लुत्फ वे अक्सर अपने बयानों में लेते रहते हैं. गरीब, गरीबी और भूख तीनों में उन्हें मनोरंजन नजर आता है. स्त्री उन्हें ‘टंच माल’ दिखायी पड़ती है. उनकी जुबान और बयान का कोई भरोसा नहीं; कब, किसे, क्या कह-बना दें. दरअसल, यह अंतर भूखे पेट होने और पेट भरे होने के बीच का है. यह भरे पेट का ‘टंचत्व’ है. अगर खुद का पेट भरा हो, तो सब तरफ सुख-शांति और अमन-चैन ही नजर आता है. अमीरी-गरीबी में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. फर्क है तो सिर्फ गिरने में. कुछ लोग ऊंचाई पर पहुंचने के लिए गिर रहे हैं, तो कुछ लोग ऊंचाई पर पहुंचने के कारण गिर रहे हैं. दरअसल, गिरना टैक्स और ब्याज से मुक्त है. पर उसका क्या जो हर गिरावट की मार खा कर बीच बाजार में खड़ा है. बाजार में खुद को औने-पौने दामों में बिकवा रहा है, ताकि किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट भर सके.
बुधवार, 4 सितंबर 2013
शनिवार, 10 अगस्त 2013
नवाज को एक शरीफ हिंदुस्तानी का खत
मियां नवाज शरीफ जी! आपको और आपके मुल्क पाकिस्तान की अवाम को ईद मुबारक. आज ईद के ही दिन हमारे देश की आइबी ने अलर्ट किया है कि आपके मुल्क के जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद दिल्ली के लालकिले पर फिर से हमले की योजना बना चुके हैं. वह पाकिस्तानियों को भारत के खिलाफ उकसा रहे हैं. उन्होंने ट्विटर पर ईद की शुभकामना देते हुए भारत के खिलाफ सख्त संदेश जारी किया है. अब क्या बतायें कि यह संदेश पाकर हमारे देश में ईद कैसे मन रही है. ईद के उसी चांद को हिंदुस्तान ने भी देखा, जिसे पाकिस्तानियों ने देखा. पर इस बार हमारी ईद जरा फीकी है. हमारा मुल्क अभी गम और गुस्से के दौर से गुजर रहा है. सरहद की निगहबानी करने के दौरान अपने पांच जवानों को खो देने के गम में हम अभी डूबे हैं. उन जवानों के घर-गांव में पिछले चार दिनों से चूल्हा नहीं जला. अन्न का एक निवाला तक बच्चों ने नहीं खाया.
आप तो ‘शरीफ’ हैं, यह तो पता ही होगा कि हिंदुस्तान के कई परिवारों की मौसी, बुआ, बहनें और भाई पाकिस्तान में रहते आ रहे हैं. सोचिए, उनकी ईद कैसी गुजरी होगी. अरे हां! आपको शुक्रिया कि आप हमारे इस गम में शरीक हुए और अफसोस जताते हुए ‘रिश्ते को मजबूत और भरोसेमंद बनाने की पहल’ करने पर जोर दिया. पर रिश्ते की कीमत भला तुम क्या जानो शरीफ बाबू! तुम्हारा मुल्क तो सिर्फ धोखेबाजी और फरेब की राजनीति करता है. दरअसल, पाकिस्तान की सियासी आबोहवा ही कुछ ऐसी है जहां अमन को लेकर ईमानदार लोगों के लिए गुंजाइश जरा कम है. पर हमारा गम जरा जुदा है. हम पाकिस्तान से बार-बार छले गये एक ऐसे मुल्क के वाशिंदे हैं, जहां के हुक्मरान गंदी और स्वार्थ की राजनीति में मशगूल हैं. उन्हें यह तक पता नहीं कि एलओसी पर हमला आतंकियों ने किया या पड़ोसी मुल्क के सैनिकों ने. हमारे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों को बोलने तक नहीं आता. जिनकी मानसिकता यह है कि ‘सैनिक तो होते ही हैं शहीद होने के लिए’, उनसे भला किस प्रकार की उम्मीद की जा सकती है.
खैर, यह तो हमारा ऐसा दर्द है जिसे सुन कर आप हमारी हंसी ही उड़ायेंगे. हमारे यहां बच्चों को शुरुआती कक्षा में ही एक कविता पढायी जाती है- ‘मां मुझको बंदूक दिला दो मैं भी लड़ने जाऊंगा.’ यहां लड़ने से अभिप्राय देश की रक्षा करने से है. कुछ ऐसी ही पंक्तियां आपके भी मुल्क में भी बच्चों को सिखायी जाती हैं, पर उसका अभिप्राय शायद कुछ और होता होगा. चलते-चलते एक चर्चित शेर अर्ज करना चाहूंगा, पर जरा बदले अंदाज में -
न दिल्ली में याद रखना, न लाहौर में याद रखना/ हो सके तो हमें बस दुआओं में याद रखना.
आपका, एक शरीफ हिंदुस्तानी
आप तो ‘शरीफ’ हैं, यह तो पता ही होगा कि हिंदुस्तान के कई परिवारों की मौसी, बुआ, बहनें और भाई पाकिस्तान में रहते आ रहे हैं. सोचिए, उनकी ईद कैसी गुजरी होगी. अरे हां! आपको शुक्रिया कि आप हमारे इस गम में शरीक हुए और अफसोस जताते हुए ‘रिश्ते को मजबूत और भरोसेमंद बनाने की पहल’ करने पर जोर दिया. पर रिश्ते की कीमत भला तुम क्या जानो शरीफ बाबू! तुम्हारा मुल्क तो सिर्फ धोखेबाजी और फरेब की राजनीति करता है. दरअसल, पाकिस्तान की सियासी आबोहवा ही कुछ ऐसी है जहां अमन को लेकर ईमानदार लोगों के लिए गुंजाइश जरा कम है. पर हमारा गम जरा जुदा है. हम पाकिस्तान से बार-बार छले गये एक ऐसे मुल्क के वाशिंदे हैं, जहां के हुक्मरान गंदी और स्वार्थ की राजनीति में मशगूल हैं. उन्हें यह तक पता नहीं कि एलओसी पर हमला आतंकियों ने किया या पड़ोसी मुल्क के सैनिकों ने. हमारे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों को बोलने तक नहीं आता. जिनकी मानसिकता यह है कि ‘सैनिक तो होते ही हैं शहीद होने के लिए’, उनसे भला किस प्रकार की उम्मीद की जा सकती है.
खैर, यह तो हमारा ऐसा दर्द है जिसे सुन कर आप हमारी हंसी ही उड़ायेंगे. हमारे यहां बच्चों को शुरुआती कक्षा में ही एक कविता पढायी जाती है- ‘मां मुझको बंदूक दिला दो मैं भी लड़ने जाऊंगा.’ यहां लड़ने से अभिप्राय देश की रक्षा करने से है. कुछ ऐसी ही पंक्तियां आपके भी मुल्क में भी बच्चों को सिखायी जाती हैं, पर उसका अभिप्राय शायद कुछ और होता होगा. चलते-चलते एक चर्चित शेर अर्ज करना चाहूंगा, पर जरा बदले अंदाज में -
न दिल्ली में याद रखना, न लाहौर में याद रखना/ हो सके तो हमें बस दुआओं में याद रखना.
आपका, एक शरीफ हिंदुस्तानी
बुधवार, 10 जुलाई 2013
कर न सके हम सौदा पनीर का
कर न सके हम प्याज का सौदा, कीमत ही कुछ ऐसी थी/ लाल टमाटर छोड़ आये हम, किस्मत ही कुछ ऐसी थी.. आजकल हर ‘मैंगो मैन’ (आम आदमी) की व्यथा कुछ ऐसी ही है. कुछ दिन पहले तक दाल-चावल की महंगाई का रोना रोनेवाले लोग सब्जियों की कीमतों में भारी इजाफे के बाद अब उसी दाल की दुहाई दे रहे हैं, ‘‘शुक्र है कि दाल है, वरना शनिवार से गुरुवार तक उपवास ही करना पड़ता.’’
आज हर कोई भले ही महंगाई से परेशान हो, पर एक शख्स ऐसा है जिस पर कोई असर नहीं हो रहा. आप जानना चाहेंगे उसके बारे में? वह है ‘ईमानदार आदमी.’ उसे कल भी वस्तुएं महंगी लगती थीं, आज भी लगती हैं. वह कहता है, ‘‘जमीर बेच कर पनीर नहीं खरीद सकता. भले ही भूखा रहना पड़े. जब जमीर ही मर जायेगा तो शरीर जिंदा रह कर क्या करेगा? आखिर बापू का प्रिय भजन वैष्णवजन तो तेणो कहिए जो पीर परायी जाणो रे.. कब काम आयेगा.’’ बापू तो रहे नहीं, लाचारी में अन्ना हजारे को अपना आदर्श माननेवाला यह ईमानदार आदमी कभी अनशन, तो कभी उपवास, तो कभी धरना-प्रदर्शन के बहाने भोजन से मुक्ति पाने का बहाना ढूंढ़ता है. कल की ही बात है, एक टीवी चैनलवाले ने उसके मुंह में माइक ठूंसते हुए पूछा, ‘‘आपको भूख हड़ताल से इतना लगाव क्यूं है भला?’’ बोला, ‘‘आज भी जिस देश की एक चौथाई आबादी को भूखे पेट सोना पड़ता हो, उस देश में भूख हड़ताल से बेहतर विरोध का कोई साधन नहीं हो सकता. इस देश की सरकार सो रही है. हमारे ही वोटों से जीत कर ‘जन प्रतिनिधि’ का तमगा पहने ज्यादातर सांसद और विधायक संसद और विधानसभा की कैंटीनों में भयंकर सब्सिडीवाला खाना खाते हैं. इसलिए उन्हें लगता है कि जब इतना सस्ता खाना मिल रहा है, तो भला आम जनता महंगाई का हल्ला क्यों मचा रही है?’’
भले ही प्राकृतिक विपदा से तबाह उत्तराखंड को सरकार राहत न दिला सकी हो, पर बढती महंगाई और सब्जियों और दूध के दाम में हो रही बेतहाशा वृद्धि के मद्देनजर ‘कैलेंडर और पोस्टर योजना’ शुरू करने की योजना बना रही है. लोग सब्जियों की शक्ल न भूल जायें इसलिए इनके पोस्टर छपवा कर घर-घर पहुंचाये जायेंगे. दूध भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रहा है. बड़ों के लिए तो नहीं, पर बच्चों को इसकी खास जरूरत होती है. ऐसे में सरकार पोलियो ड्राप्स की तरह ‘दूध ड्राप्स’ पिलाने के लिए ‘मिशन दूध’ शुरू करने की तैयारी में है. महीने में एक दिन तय किया जायेगा, जब लोग अपने बच्चों को नजदीकी केंद्रों पर ले जा कर दूध ड्राप्स पिलवायेंगे. इसका स्लोगन भी ‘दो बूंद जिंदगी की’ रखा जायेगा. ये बात अलग है कि इससे बच्चों को जिंदगी मिले न मिले, सरकार को जरूर मिलेगी.
आज हर कोई भले ही महंगाई से परेशान हो, पर एक शख्स ऐसा है जिस पर कोई असर नहीं हो रहा. आप जानना चाहेंगे उसके बारे में? वह है ‘ईमानदार आदमी.’ उसे कल भी वस्तुएं महंगी लगती थीं, आज भी लगती हैं. वह कहता है, ‘‘जमीर बेच कर पनीर नहीं खरीद सकता. भले ही भूखा रहना पड़े. जब जमीर ही मर जायेगा तो शरीर जिंदा रह कर क्या करेगा? आखिर बापू का प्रिय भजन वैष्णवजन तो तेणो कहिए जो पीर परायी जाणो रे.. कब काम आयेगा.’’ बापू तो रहे नहीं, लाचारी में अन्ना हजारे को अपना आदर्श माननेवाला यह ईमानदार आदमी कभी अनशन, तो कभी उपवास, तो कभी धरना-प्रदर्शन के बहाने भोजन से मुक्ति पाने का बहाना ढूंढ़ता है. कल की ही बात है, एक टीवी चैनलवाले ने उसके मुंह में माइक ठूंसते हुए पूछा, ‘‘आपको भूख हड़ताल से इतना लगाव क्यूं है भला?’’ बोला, ‘‘आज भी जिस देश की एक चौथाई आबादी को भूखे पेट सोना पड़ता हो, उस देश में भूख हड़ताल से बेहतर विरोध का कोई साधन नहीं हो सकता. इस देश की सरकार सो रही है. हमारे ही वोटों से जीत कर ‘जन प्रतिनिधि’ का तमगा पहने ज्यादातर सांसद और विधायक संसद और विधानसभा की कैंटीनों में भयंकर सब्सिडीवाला खाना खाते हैं. इसलिए उन्हें लगता है कि जब इतना सस्ता खाना मिल रहा है, तो भला आम जनता महंगाई का हल्ला क्यों मचा रही है?’’
भले ही प्राकृतिक विपदा से तबाह उत्तराखंड को सरकार राहत न दिला सकी हो, पर बढती महंगाई और सब्जियों और दूध के दाम में हो रही बेतहाशा वृद्धि के मद्देनजर ‘कैलेंडर और पोस्टर योजना’ शुरू करने की योजना बना रही है. लोग सब्जियों की शक्ल न भूल जायें इसलिए इनके पोस्टर छपवा कर घर-घर पहुंचाये जायेंगे. दूध भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रहा है. बड़ों के लिए तो नहीं, पर बच्चों को इसकी खास जरूरत होती है. ऐसे में सरकार पोलियो ड्राप्स की तरह ‘दूध ड्राप्स’ पिलाने के लिए ‘मिशन दूध’ शुरू करने की तैयारी में है. महीने में एक दिन तय किया जायेगा, जब लोग अपने बच्चों को नजदीकी केंद्रों पर ले जा कर दूध ड्राप्स पिलवायेंगे. इसका स्लोगन भी ‘दो बूंद जिंदगी की’ रखा जायेगा. ये बात अलग है कि इससे बच्चों को जिंदगी मिले न मिले, सरकार को जरूर मिलेगी.
सोमवार, 24 जून 2013
कोई बिकने में मशगूल है, तो कोई बेचने में
अलस्सुबह कल्लू चायवाले की दुकान पर जुम्मन मियां गला फाड़-फाड़ के चिल्ला रहे हैं, ‘‘जैसे मजबूर किसान की जमीन बिकती है, जैसे मजबूर औरत की अस्मत बिकती है, जैसे आजकल बच्चे बिकते हैं, जैसे कोयला और लौह अयस्क जैसी देश की दौलत बिकती है, जैसे किसी का जमीर बिकता है, जैसे कोई नेता बिकता है या फिर नेताओं का समर्थन बिकता है, जैसे हाकिम बिकते हैं, उनकी कलम बिकती है, जैसे नौकरियां बिकती हैं, जैसे सरकारी कंपनियां बिकती हैं, वैसे ही अगर खिलाड़ी भी बिक गये तो ताज्जुब कैसा? अगर बाकी सबकुछ बिकना जायज है, तो खिलाड़ियों का बिकना गलत कैसे हुआ?’’
दुकान पर बैठे अन्य ग्राहक चुपचाप चाय सुड़क रहे हैं. जुम्मन मियां की बात का जवाब देने की हिम्मत किसी में नहीं हो रही. मैं समझ गया कि आज फिर सुबह-सुबह ये जनाब अखबार पढ़ कर ‘चाजर्’ हो गये हैं. यह यहां का आम दृश्य है. कलक्ट्रेट ऑफिस में बड़ा बाबू पद से सेवानिवृत्त होने के दस साल बाद भी जुम्मन मियां बेबाकी और जिंदादिली के मामले में सबसे अलग हैं. कुछ लोग उन्हें ‘मुंहफट’ की संज्ञा भी दे देते हैं. मुङो देखा तो फिर शुरू हो गये. अखबार लहरा कर बोले, ‘‘हल्ला मचा है कि देखो खिलाड़ी बिक गये! पर खिलाड़ियों को तो बिकना ही था. पहले अर्थव्यवस्था देश की होती थी, अब बाजार की होती है. पहले सब कुछ सरकार तय करती थी, अब बाजार तय कर रहा है. खुद सरकार ने बाजार को इतना सम्मान दे दिया है, ऐसी खुली छूट दे दी है कि बाजार उद्दंड हो गया है. वह छुट्टा सांड़ की तरह घूम रहा है. फिर खिलाड़ी ही बेचारे उससे कब तक बचते? उनका बिकना तो उसी दिन तय हो गया जिस दिन आइपीएल की योजना बनी थी. हालांकि जब वे विज्ञापनों में कोल्ड ड्रिंक बेच रहे थे, तेल-साबुन बेच रहे थे या चड्ढी-बनियान बेच रहे थे, असल में तो वे तब भी बिक ही रहे थे. हमें लगता था कि वे ये चीजें बेच रहे हैं. पर वास्तव में वे अपने को ही बेच रहे थे, अपने हुनर से हासिल सम्मान बेच रहे थे, दर्शकों और खेल प्रेमियों से मिला प्यार बेच रहे थे, खेल से प्राप्त अपना ऊंचा स्थान बेच रहे थे. अर्थात वे खुद ही बिक रहे थे. अरे, इस देश में क्या-क्या नहीं बिक रहा. कोई ‘विश्वास’ बेच रहा है तो कोई ‘विश्वासमत’ बेच रहा है. कोई ‘समर्थन’ बेच रहा तो कोई वोट बेच रहा. कहीं कुरसी बिक रही, तो कहीं पद बिक रहा. कोई बेचने में मशगूल है तो कोई खरीदने में मग्न..’’
मैंने उन्हें बीच में टोका, ‘‘काका चाय खत्म हो गयी हो तो चलो पान खिलाता हूं.’’ बोले, ‘‘हां, चलिये जनाब! यहां सब फटीचर हैं. पर चूना जरा कम लगवाइयेगा. मुंह में छाले हो गये हैं. परसों एक सज्जन ने कारबाइड से पका आम खिला दिया था.’’
दुकान पर बैठे अन्य ग्राहक चुपचाप चाय सुड़क रहे हैं. जुम्मन मियां की बात का जवाब देने की हिम्मत किसी में नहीं हो रही. मैं समझ गया कि आज फिर सुबह-सुबह ये जनाब अखबार पढ़ कर ‘चाजर्’ हो गये हैं. यह यहां का आम दृश्य है. कलक्ट्रेट ऑफिस में बड़ा बाबू पद से सेवानिवृत्त होने के दस साल बाद भी जुम्मन मियां बेबाकी और जिंदादिली के मामले में सबसे अलग हैं. कुछ लोग उन्हें ‘मुंहफट’ की संज्ञा भी दे देते हैं. मुङो देखा तो फिर शुरू हो गये. अखबार लहरा कर बोले, ‘‘हल्ला मचा है कि देखो खिलाड़ी बिक गये! पर खिलाड़ियों को तो बिकना ही था. पहले अर्थव्यवस्था देश की होती थी, अब बाजार की होती है. पहले सब कुछ सरकार तय करती थी, अब बाजार तय कर रहा है. खुद सरकार ने बाजार को इतना सम्मान दे दिया है, ऐसी खुली छूट दे दी है कि बाजार उद्दंड हो गया है. वह छुट्टा सांड़ की तरह घूम रहा है. फिर खिलाड़ी ही बेचारे उससे कब तक बचते? उनका बिकना तो उसी दिन तय हो गया जिस दिन आइपीएल की योजना बनी थी. हालांकि जब वे विज्ञापनों में कोल्ड ड्रिंक बेच रहे थे, तेल-साबुन बेच रहे थे या चड्ढी-बनियान बेच रहे थे, असल में तो वे तब भी बिक ही रहे थे. हमें लगता था कि वे ये चीजें बेच रहे हैं. पर वास्तव में वे अपने को ही बेच रहे थे, अपने हुनर से हासिल सम्मान बेच रहे थे, दर्शकों और खेल प्रेमियों से मिला प्यार बेच रहे थे, खेल से प्राप्त अपना ऊंचा स्थान बेच रहे थे. अर्थात वे खुद ही बिक रहे थे. अरे, इस देश में क्या-क्या नहीं बिक रहा. कोई ‘विश्वास’ बेच रहा है तो कोई ‘विश्वासमत’ बेच रहा है. कोई ‘समर्थन’ बेच रहा तो कोई वोट बेच रहा. कहीं कुरसी बिक रही, तो कहीं पद बिक रहा. कोई बेचने में मशगूल है तो कोई खरीदने में मग्न..’’
मैंने उन्हें बीच में टोका, ‘‘काका चाय खत्म हो गयी हो तो चलो पान खिलाता हूं.’’ बोले, ‘‘हां, चलिये जनाब! यहां सब फटीचर हैं. पर चूना जरा कम लगवाइयेगा. मुंह में छाले हो गये हैं. परसों एक सज्जन ने कारबाइड से पका आम खिला दिया था.’’
रविवार, 2 जून 2013
सुनो ससुर जी अब जिद छोड़ो
बीसीसीआइ अध्यक्ष श्रीनिवासन पर इस्तीफा देने का चौतरफा दबाव इन दिनों इस कदर है मानो मानसून का पश्चिमी विक्षोभ बंगाल की खाड़ी पर दबाव बना रहा हो. श्रीनिवासन को सोते-जागते, खाते-पीते बस इस्तीफे का भूत ही सता रहा है. जानकारों का मानना है कि वे अवश्य ही उस मुहूर्त को कोस रहे होंगे, जब उन्होंने ‘सुयोग्य’ मयप्पन को अपना दामाद बनाया. कुछ ऐसी ही सोच मयप्पन की भी है. मयप्पन आज जिस हालात (जेल) में हैं, उसमें वे अपने ससुर श्रीनिवासन के बारे में भला अच्छा कैसे सोच सकते हैं. सूत्र बताते हैं कि ‘सुयोग्य’ दामाद ने अपने ससुर की ‘काबिलीयत’ पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि होशियारी आती नहीं तो किया क्यों? और पकड़े ही गये तो अब जिद कैसी, इस्तीफा क्यों नहीं देते?
मयप्पन का यह भी मानना है कि उन पर इतना शिकंजा इसीलिए कसा, क्योंकि वे श्रीनिवासन के दामाद हैं. अगर वे ‘आम आदमी’ होते तो बड़े ही आराम से सारा माल हजम कर जाते और डकार भी नहीं लेते. मयप्पन का दावा सुन कर आपको उनके हाजमे का अंदाजा तो लग ही गया होगा. पर इस प्रकरण को लेकर उल्टी-दस्त करने वाले भी बहुतेरे हैं. कोई क्रिकेट को कोस रहा है तो कोई सट्टेबाजों को, कोई बीसीसीआइ को कोस रहा है तो कोई क्रिकेटरों को. ये सब लोग वही हैं जिन्हें कुछ भी हजम नहीं होता. बात चाहे इनके प्रिय टीम के हारने की हो या इनके पसंदीदा क्रिकेटर के बिना रन बनाये आउट हो जाने की. इनके लिए किसी भी परिस्थिति को हजम करना मुश्किल होता है. आज क्रिकेट के फैन भले ही दुखी हों और ससुर दामाद भले ही एक-दूसरे को कोस रहे हों, पर मीडिया को आजकल खूब मसाला मिल रहा है. कुछ दिनों पूर्व ही एक बड़े पत्रकार ने अपने लेख में इस प्रकरण पर अपनी टिप्पणी कुछ यूं दी -
‘‘टी-20 में भागीदार सभी को मालूम था कि इसके जन्म के समय से ही इससे दरुगध आ रही है. कुछ सट्टेबाज शायद इसी बदबू के कारण इसकी ओर आकर्षित हुए. एक शीर्ष अधिकारी जो अब इस लीग से बाहर है, अपने लोगों के सामने कहता था कि जब भी उसकी पसंदीदा टीम हारती है, वह सट्टेबाजों के जरिये जीत जाता है. पार्टी में होनेवाली ऐसी बातें दौलत के पुजारियों की ओह-आह से बाहर निकलीं. आइपीएल में सभी भ्रष्ट नहीं हैं. अधिकतर मालिक और मैनेजर मजे और मनोरंजन के नये तरीके के जरिये कानूनी तरीके से पैसा कमाने की चाह में इससे जुड़े. अधिकतर क्रि केटरों को अपना बैंक बैंलेंस देखने पर अपने भाग्य पर यकीन नहीं होता होगा. उन्होंने कभी सपने में भी ‘लॉटरी’ से मिलनेवाली ऐसी अमीरी के बारे में नहीं सोचा होगा. लेकिन इसकी कीमत थी चुप्पी. लेकिन क्या किया जाये, कुछ लोग बात न पचा पाने के लिए अभिशप्त होते हैं.’’
मयप्पन का यह भी मानना है कि उन पर इतना शिकंजा इसीलिए कसा, क्योंकि वे श्रीनिवासन के दामाद हैं. अगर वे ‘आम आदमी’ होते तो बड़े ही आराम से सारा माल हजम कर जाते और डकार भी नहीं लेते. मयप्पन का दावा सुन कर आपको उनके हाजमे का अंदाजा तो लग ही गया होगा. पर इस प्रकरण को लेकर उल्टी-दस्त करने वाले भी बहुतेरे हैं. कोई क्रिकेट को कोस रहा है तो कोई सट्टेबाजों को, कोई बीसीसीआइ को कोस रहा है तो कोई क्रिकेटरों को. ये सब लोग वही हैं जिन्हें कुछ भी हजम नहीं होता. बात चाहे इनके प्रिय टीम के हारने की हो या इनके पसंदीदा क्रिकेटर के बिना रन बनाये आउट हो जाने की. इनके लिए किसी भी परिस्थिति को हजम करना मुश्किल होता है. आज क्रिकेट के फैन भले ही दुखी हों और ससुर दामाद भले ही एक-दूसरे को कोस रहे हों, पर मीडिया को आजकल खूब मसाला मिल रहा है. कुछ दिनों पूर्व ही एक बड़े पत्रकार ने अपने लेख में इस प्रकरण पर अपनी टिप्पणी कुछ यूं दी -
‘‘टी-20 में भागीदार सभी को मालूम था कि इसके जन्म के समय से ही इससे दरुगध आ रही है. कुछ सट्टेबाज शायद इसी बदबू के कारण इसकी ओर आकर्षित हुए. एक शीर्ष अधिकारी जो अब इस लीग से बाहर है, अपने लोगों के सामने कहता था कि जब भी उसकी पसंदीदा टीम हारती है, वह सट्टेबाजों के जरिये जीत जाता है. पार्टी में होनेवाली ऐसी बातें दौलत के पुजारियों की ओह-आह से बाहर निकलीं. आइपीएल में सभी भ्रष्ट नहीं हैं. अधिकतर मालिक और मैनेजर मजे और मनोरंजन के नये तरीके के जरिये कानूनी तरीके से पैसा कमाने की चाह में इससे जुड़े. अधिकतर क्रि केटरों को अपना बैंक बैंलेंस देखने पर अपने भाग्य पर यकीन नहीं होता होगा. उन्होंने कभी सपने में भी ‘लॉटरी’ से मिलनेवाली ऐसी अमीरी के बारे में नहीं सोचा होगा. लेकिन इसकी कीमत थी चुप्पी. लेकिन क्या किया जाये, कुछ लोग बात न पचा पाने के लिए अभिशप्त होते हैं.’’
गुरुवार, 23 मई 2013
वो कत्ल करे हैं या करामात करे है...
अपने गांव गया था. एक बस यात्रा में बड़ा ही रोचक अनुभव हुआ. अगर आप गौर करें तो बस यात्रियों की आपस में बातचीत, खलासी-ड्राईवर के संवाद और यात्रा के दौरान तरह-तरह की आवाज से एक खास तरह का कोलाज बन उठता है. महसूस कीजिये..
एक सवारी-एक सवारी, रोक के..रोक के. चल.. ए.. भाई, ए साइकिल.. उपर..अरे तनिक बैगवा उहां रखिये..हां अरे बच्चा है तो उसे गोद में लेकर बैठिए. टिकस लिया है तो बच्चे का लिया है पूरे का नहीं. सीट पर आप बैठ जाईये. मां जी..हां.कहां जाना है. ऐ रिक्शा.. अरे तोहरी हरामी के आंख.. चांपे चले आवत हउव..
न दामन पे कोई छींटा/ न खंजर पे कोई दाग/ वो कत्ल करे हैं..या करामात करे हैं..बड़ा शायरी मारत बाड़..कॉलेजवा में इहे पढाई होता है का.. रउरा ना बुझाई ए बाबा..
ललुवा के रैली फेल हो गइल..ए भाई तनिक गाड़ी साइड होखे द तब थूकिह. हवा इधरे का है. ऐ बाबा तनी होने खसकिये. ए साल सरजू बावन बोना है, सोनालिका भी ठीक है.उपज ठीके है. एक निबंध.. विज्ञान ने हमारे जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन किया है..अब बताओ..आमूल तो आमूल ये चूल क्या है. रोक के..रोक के..उतरना है. ए भाई सामान आगे करो.. आप वहां बईठिये.. अरे तो आधे पर ही बईठो भाई जल्दीऐ पहुंच जाओगे. काहे जल्दीयाये हो. सामान पर जोर मत डालिए..फूटेगा नहीं.. अरे चिंता मत करो..
पप्पू यादव बाइज्जत बरी..अपने देश में कानून सबके लिए अलग-अलग है.. अरे कानून के किताब में करिया-करिया शब्द का भारी-भारी अर्थ समझना सबके वश में नहीं नू है भाई..सही कह रहे हैं, इ काम खाली वकीले लोग कर सकता है..वह भी पईसा लेकर.. बीड़ी छूआ जाएगा. हाथ उधरे रखिये. कुरता बड़ा कटाह पहिनले बाड़ ससुरारी जात हऊव का..अरे तोहरी बहिन के. इहां काहे भीड़ है भाई..बारात निकलल है का. सीवान के बाबू बजरंगी के यहां परसो बड़ा स्वागत सत्कार हुआ. फायरिंग से पूरा सामियाना फाड़ दिया सब.. साइड होखिये.. बैल हइस का रे..मारेब कि मरिये जइब.
कमरिया करे लपालप..लॉलीपप लागेलू.. अरे तनी गनवा धीरे बजाइये.. महाराजगंज के उपचुनाव में के जीतेगा एह बार.. जीते केहू लेकिन नीतीश आउर लालू के प्रतिष्ठा दांव पर लागल बा..
हां भाई. आइये..उतरिए जल्दी..उतर रहे हैं नू. लग रहा है कि हवाई जहाज चला रहे हैं.. ढेर कानून मत बतिआइये..जाइये घरे.. ऐ लल्लन भईया आपका मोबाइल गिर गया..रिक्शा पकड़ के स्टेशन काहे नहीं चले जाते हैं, पैदल त लू मार देगा.. ट्रेनवा में अभी लेट है का..
सोमवार, 29 अप्रैल 2013
मुंह में गांधी और बगल में गोडसे!
मैडम जी, जय हिंद! आज देश का माहौल क्या हो गया है. अपने को पार्टी का आदमी कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है. पहले तो पाटी मेंबर जानते ही लोग प्यार करते थे, महात्मा-सी जयजयकार करते थे. आज मालूम पड़ते ही अपराधी जैसा व्यवहार होता है, जूतों से, गालियों से सत्कार होता है. ये कैसे हुआ कि लोकतंत्र में ‘बाबा’ और ‘अन्ना’ लोग देशहित के लिए आगे आ रहे हैं, लेकिन आपके मुंशी-मैनेजर कहते हैं कि बाबा फ्र ॉड है, अन्ना बेईमान है. पर मैडम जी अगर ये लोग ऐसे हैं, और आपके ‘मौनमोहन’ संत हैं, महात्मा हैं, तो देश में इतना भ्रष्टाचार कैसे हो गया? यह तो वही बात हुई कि ‘मुंह में गांधी और बगल में गोडसे!’
ये जो आपके ‘मौनमोहन’ हैं न, उनको कॉलेज में किसी ने पढ़ा दिया कि मंदी उर्फ रिसेशन बुरी चीज है इसलिए इसे आने देना ही नहीं चाहिए. यह बात गांठ बांध कर ‘मौनमोहन’ ने रख ली है और यही मुसीबत की जड़ है. मुख्य बात यह कि पिछली बार जब मंदी आयी तो आपके ‘मौनमोहन’ ने उससे बचने के लिये नोट छाप कर बाजार मे ढकेल दिये. उससे महंगाई बढ़ गयी. और इस बार ‘मौनमोहन’ बैंक की ब्याज दरों के साथ-साथ पेट्रोल और अन्य चीजों के भाव भी बढ़ा रहे हैं, ताकि अतिरिक्त पैसा मार्केट से बाहर हो जाये. पर इससे फायदा हो नहीं
रहा. उल्टे आम आदमी का तेल निकल जा रहा है.
अगला लोकसभा चुनाव सिर पर है. यह साल भी बीतते देर न लगेगी. पिछली बार तो अपने राजकुंवर कुछ कर नहीं पाये. यूपी चुनाव में भी उनका हश्र आप देख ही चुकी हैं. अगला चुनाव किसके भरोसे है, यह अभी तक आम कार्यकर्ता जान नहीं पाया है. आपने पार्टी में दो प्रकार के लोगों को प्रमुखता दे रखी है, कमाने के लिए अर्थशास्त्री और बचाने के लिए वकील. अब हम भला आपको क्या सलाह दें? वैसे अपने ‘मौनमोहन जी’ को कहिये कि पेट्रोल- डीजल का भाव कम करवा दें, तो कुछ तो राहत मिलेगी. आशा है, आपका स्वास्थ अच्छा होगा और आप कुशल से होंगी. कोई गलती हो गयी हो, तो माफ करें और लौटती डाक से अपनी चरणधूलि भेजने की कृपा करें.
आपका अपना
आपकी ही पार्टी का एक अनाम सेवक
(यह गुमनाम पत्र अभी दो दिन पहले ही मुङो प्राप्त हुआ है. मेरी समझ में यह बात नहीं आ रही कि आखिर यह पत्र मेरे पते पर क्यों आया? यह ऐसा अजीबोगरीब पत्र है, जिस पर न तो पानेवाले का पता दर्ज है और न ही भेजनेवाले का. फिर भी डाकिया न जाने यह पत्र मेरे घर क्यों डाल गया? खैर मैं कब तक इस उधेड़बुन में रहूं. अंतत: मेरे एक मित्र ने यह सुझाव दिया कि क्यों न इस पत्र को सार्वजनिक किया जाये. समझनेवाले समझ जायेंगे, जो न समङों वो अनाड़ी हैं!)
शनिवार, 20 अप्रैल 2013
यह गिरने-गिराने का दौर है, जरा बच के!
जो जितनी तेजी से उठता है, वो एक दिन उतनी ही तेजी से धड़ाम भी होता है. यह नियम है. फिर प्यारे क्यों दुखी हो सोने-चांदी की इस गिरावट पर? अब तलक सोने-चांदी की छलांग के मजे लिए, अब थोड़े दिन उसकी गिरावट का दर्द भी ङोलो. ताकि पता तो चल सके गिरने का दर्द कैसा होता है. सोने-चांदी के मूल्य में गिरावट से लोग इतने दुखी हैं, पर समाज की नैतिकता में जाने कब से कितनी गिरावट आ चुकी है, वह किसी को नहीं दिखती. जहां देखो वहीं, कहीं किरानी तो कहीं फूड इंस्पेक्टर तो कहीं किसी बाबू के घर से लगातार चल-अचल संपत्ति बरामद हो रही है. नोट गिनने की मशीन न हो तो छापे मारनेवाली टीम का जाने क्या हाल होगा? मैं सच बताऊं तो बाबू प्रजाति में ऐसे फिलासॉफिकल डायमेंशन मुङो पहले कभी नजर नहीं आए थे. आज मुङो अपने बाबू नहीं होने का जो अफसोस हो रहा है, वो पीड़ा कालीदास की शकुंतला की पीड़ा से भी बड़ी है. अपने अल्प अनुभव और सीमित ज्ञान से मैं बाबुओं के विषय में जितना जानता था, वो तमाम भ्रांतियों की दीवारें ताश के पत्ताें के महल के समान भरभरा कर गिर रही हैं.
बाबुओं के घर से निकलती यह करोड़ों रु पयों की बरात, फाइलों के बोझ तले दुबके हुए बैठे अन्य बाबुओं को भी संशय के घेरे में ला रही है. जिन कार्यालयीन बाबुओं ने दिनभर में दो-तीन पान चबा लेने को रईसी समझा हो, जिन्होंने सब्जी मंडी में लौकी-नेनुआ के भाव-ताव में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया हो, ऐसे पवित्र बाबुओं के बारे में समाज की राय का एकाएक बदल जाना चिंतनीय विषय है. यह अजीब दौर है. चारों तरफ गिरने-गिराने का दौर जारी है. पर गिरने की भी हद होती है. अरे! इनसानों को छोड़िए, सोने-चांदी को देखिए. इत्ता गिरे, इत्ता गिरे कि गिर-गिर कर अपना नाम और दाम दोनों ही डुबो दिया. सोना-चांदी खुद तो डूबे ही, साथ में न जाने कितने निवेशकों, व्यापारियों, कारीगरों को ले डूबे. देख रहा हूं सब डूब-डाब कर मातम मना रहे हैं.
हो सकता है, सर्राफा बाजार की गिरावट से धोखा खा चुके लोग भविष्य में सोने-चांदी से मुंह फेर लें या इसके प्रति उनमें अरुचि पैदा हो जाये, पर एक बात तो तय है कि जगह-जगह बाबू बनानेवाले कोचिंग क्लासेस के बड़े-बड़े होर्डिग लग जायेंगे. बच्चे भी शायद अब बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस बनना न चाहें. बड़े ओहदों पर जाने की तैयारियों में भी कोई व्यर्थ ही अपना अर्थ और श्रम क्यों जाया करेगा? जब पहले पायदान पर ही लक्ष्मी जी भर-भर के कृपा दृष्टि लुटाने को आतुर बैठी हों, तब ऊपरी पायदान को लक्ष्य बनाने का क्या फायदा? या यूं कहें कि जब खिड़की से ही चांद के दर्शन हो रहे हों, तो छलनी लेकर छत पर टहलने का क्या मतलब?
बुधवार, 10 अप्रैल 2013
समंदर में सू-सू करने से सुनामी नहीं आती!
अभी कल की ही बात है मार्केट में रुसवा साहब मिल गये. मैंने खैर मकदब के बाद पूछा इधर कैसे आना हुआ चाचू? मुंह में पान की गिलौरी चबाते रुसवा साहब ने मुङो उपर से नीचे तक देखा. मानो आरबीआइ गवर्नर सुब्बाराव की तरह वे भी बढती महंगाई के लिये मुङो दोषी मान रहे हों. वे धीरे से बोले ‘बस यूं ही.’ मैंने पूछा- रांची में सब कैसा है, चाय पीना पसंद करेंगे? वे कुछ बोले तो नहीं पर मेरे साथ चाय की दुकान की तरफ हो लिये. चाय की पहली चुस्की के साथ ही मैंने पूछा-
चाचू, महंगाई के लिये आप किसे दोषी मानते हैं?
पब्लिक को. महंगाई सरकार ने नहीं बढ़ाई. महंगाई को बढ़ाया ज्यादा खाने-पीने वाले लोगों ने! अंट-संट कमाने वाले लोगों ने! हद है, खुद के पेट पर कंट्रोल है नहीं और सरकार से कहते हैं कि महंगाई को कंट्रोल करे. सरकार भला महंगाई को कैसे कंट्रोल कर सकती है. हालांकि सरकार की हरदम यह कोशिश रहती है कि वो जनता को महंगाई से मुक्त रखे मगर क्या करे, उसकी हर कोशिश पर विरोधी विरोध शुरू कर देते हैं. उसे जन-विरोधी करार देते हैं. उसे बाजारवाद और पूंजीवाद का हितैषी कहते हैं.
लेकिन चाचू ये पब्लिक इतना खाती क्यों है?
भतीजे, खाते रहना पब्लिक की जरूरत या मजबूरी नहीं, उसकी नियति होती है. पब्लिक अच्छा खाना खाये. यह सरकार की सेहत के लिए भी अच्छा नहीं माना जाता. इसलिए सरकार इतना चिंतित हो जाती है.
लेकिन चाचू पब्लिक के अच्छा खाने से सरकार को क्या नुकसान होता है?
दरअसल, पब्लिक के अच्छा खाने से सरकार का काम-धाम और उसकी जवाबदेही बढ़ जाती है. बाजार में दूध, मीट, दाल, फल और सब्जियों की कीमतों में भी इजाफा हो जाता है. शेयर बाजार के सूचकांक हिलोरे मारने लगते हैं.
लेकिन चाचू सरकार महंगाई न सही भ्रष्टाचार तो रोक सकती थी?
भ्रष्टाचार को रोकने में सरकार फेल हुई लेकिन कथित ईमानदार लोग भी भ्रष्टाचार को कहां रोक पाए? जोर तो बहुत लगा लिया ईमानदारों ने कभी रामलीला मैदान, कभी जंतर-मंतर पर हो-हल्ला काटके मगर रहे ढाक के तीन पात. हो-हंगामे का असर इत्ता हुआ कि ईमानदारों ने अपना राजनीतिक दल खड़ा कर लिया.
इतने में चाय खत्म हो गयी और रुसवा चाचू पान की दुकान की तरफ बढ लिये. मैंने पूछा चाचू-चाचू आप तो पूरी तरह संप्रग सरकार के पक्ष में खड़े दिखते हैं. कहीं 2014 का चुनाव लड़ने का इरादा तो नहीं? वे फिर मुङो उपर से नीचे तक देखते हुए बोले- बाल सफेद हो जाने से नादानी नहीं जाती और समंदर में सू-सू करने से सुनामी नहीं आती.
गुरुवार, 21 मार्च 2013
हमने एक शेर सुनाया तो बुरा मान गये!
अजीब हालात हैं. बेनी प्रसाद वर्मा ने जरा सा ‘कुछ’ कह दिया, तो उनके पुराने ‘दोस्त’ मुलायम सिंह यादव बुरा मान गये. राज्यसभा में कांग्रेस नेता प्रदीप बलमुचु ने जया बच्चन की जरा-सी तसवीर क्या ले ली, वे बुरा मान गयीं. करुणानिधि की एक छोटी इच्छा केंद्र सरकार ने पूरी नहीं की, तो वे इस कदर बुरा मान गये कि सरकार से अपना समर्थन ही वापस ले लिया. बिहारी बाबू (शत्रुघ्न सिन्हा) ने रानी मुखर्जी को ‘रानी चोपड़ा’ क्या कह दिया, वे भी बुरा मान गयीं और ऐसे रिएक्ट किया- मानो कह रही हों ‘खामोश!’
भई! यह तो होली का मौसम है, बुरा क्या मानना. देखो, पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा सबकी जुबान यही कह रही है ‘बुरा न मानो होली है.’
पता नहीं ‘बुरा न मानने’ से लोग परहेज क्यों करते हैं. वैसे मैं बता दूं कि ‘बुरा न मानना’ कोई रोग नहीं है, लेकिन शायद इनको लगता है कि जहां सभी लोग बात-बिना बात बुरा मान रहे हों, वहां बात पर भी बुरा न मानना रोग ही है. अगर आपने गौर किया हो, तो ऐसा लगता है कि अपने देश में किसी किसी की शक्ल तो बुरा मानने के लिए ही बनायी गयी लगती है. मायावती, ममता बनर्जी, करुणानिधि, अब्दुल्ला बुखारी, आडवाणी, राखी सावंत, डैनी..आदि-आदि. इन लोगों के चेहरे पर कभी ख़ुशी के भाव नहीं देखे. ऐसा लगता है कि ऐसे लोग पैदा होते ही अपने मां-बाप से भी बुरा मान गये होंगे.
वैसे होली का मौसम होता गजब का है. जिसे देखो वही बौराया हुआ लगता है. आम, लीची, जामुन, गेहूं, अरहर, सरसों से लेकर इनसान तक. और, कवियों की पूछिये ही मत. जहां देखो वहीं हास्य कवि सम्मेलन हो रहा है. एक मंच से किसी होलियाये कवि ने तुकबंदी पेश की-
तमाम रात सुनते रहे गज़लें उनकी
हमने एक शेर सुनाया तो बुरा मान गये.
जब भी चाहते हो कुरेद देते हो जख्मों को
हाथ हमने दबाया तो बुरा मान गये.
दूसरे ने तेवर दिखाते हुए माइक थामा-
हर हाल में हमने तुम्हारा साथ दिया,
थोड़ा सच बोला तो बुरा मान गये.
ताउम्र खोजता रहा,रोशनी तेरे लिए,
दीये में तेल न बचा तो बुरा मान गये.
बरसाती मेढक जैसे कवियों की नयी खेप होली के मौसम में उग आती है. पता नहीं पूरे साल ये कहां रहते और क्या करते हैं. कवि भी गजब-गजब के.
खैर, हम यहां बात कर रहे हैं बुरा न मानने की. वैसे, अगर आप बुरा न मानें तो मेरी एक सलाह है कि हम लोगों को सिर्फहोली में ही बुरा मानने से क्यों रोकते हैं? इस मंत्र का प्रयोग पूरे साल करने में क्या हर्ज है? मसलन- बुरा न मानो संडे है, मंडे है, वेलेंटाइन डे है आदि आदि. इसी बहाने बुरा मानने की बुराई तो खत्म होगी. खैर चलते-चलते, बुरा न मानो होली है..
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