बुधवार, 30 जनवरी 2013

इस मर्ज की गालिब कोई दवा तो बताओ!


हर बार सोचता हूं कि इस बार क्या नया लिखूं. अधिकारी से लेकर नेता तक सब जनता की सेवा में लगे हैं, आखिर मुङो भी कुछ करना चाहिए. मैं भी इस अभागे देश का अभागा नागरिक हूं. अपने देश का कुछ तो भला करूं. उम्र बीत जाती है कई लोग यह  सोच ही नहीं पाते कि उन्हें देश के लिए, समाज के लिए या खुद के लिए करना क्या है? मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मैंने इस निष्कर्ष को शीघ्र ही पा लिया. एक दिन चिंतन-मनन में डूबा देख कर श्रीमती जी ने बाउंसर मारा ‘कोई गंभीर बात है?’ मैंने कहा ‘बस यूं ही सोच रहा था कि कुछ अलग लिखूं, कुछ नया लिखूं.’ श्रीमती जी का जवाब हाजिर था ‘लिखना है तो लिखो, सोच क्यों रहे हो? लोगों से भी कम मतलब लोगों की बात लिख कर कूदते रहते हो,  लिखना है तो ऐसा लिखो जो सबके मतलब का हो.’
  मुङो ‘मतलब’ तो समझ में आ गया पर हमने बहुत सोचा कि ऐसा क्या लिखूं कि जो सबके मतलब का हो! यह सोचते-सोचते मैंने इतना सोचा कि अब मुङो लगने लगा है कि मुङो ‘सोचने’ की बीमारी हो गयी है.  कभी-कभी तो मैं यह सोचने लगता हूं कि मैं सोच क्यों रहा हूं? सच बताऊं तो कभी-कभी यह भी सोचता हूं कि सोचना कम कर दूं क्योंकि बंद तो नहीं कर सकता. सोचने-सोचने के क्रम में ही कई ऐसी पुस्तकें भी पढ़ डाली, जिनमें मेरी कभी रुचि नहीं रही. इस दौरान कहीं पढ़ने को मिला कि दुनिया में हर मर्ज की दवा बताते हुए उससे बचने के उपाय हाजिर हैं. कुछ में तो दर्द बाद में आता है, दवा पहले तैयार रहती है बल्कि सच कहा जाये तो दवा होती है इसीलिए दर्द ईजाद किया जाता है.
      पिछले दिनों शहर में एक पुस्तक मेला भी लगा था. कई पुस्तकें स्टॉलों पर चमक रही थीं - दोस्त कैसे बनायें, लोगों को प्रभावित कैसे करें, अच्छा व सफल मैनेजर कैसे बनें, करोड़पति बनने के सौ सफल उपाय, अच्छा व प्रभावकारी वक्ता कैसे बनें, सुखद-सफल दांपत्य जीवन के नुस्खे, महान कैसे बनें? वगैरह-वगैरह. यह सब देख कर मैं सच बताऊं तो हतोत्साहित हो गया. इतनी सारी जानकारियों पर तो पहले ही लिखा जा चुका है. इसके अलावा भी तमाम अटरम-सटरम विषयों पर भी किताबें मौजूद हैं लेकिन हमने आजतक ऐसी कोई किताब नहीं देखी जिसमें कोई ऐसी तरकीब बतायी गयी हो कि आप  अच्छा इंसान कैसे बनें? दुनिया में औने-पौने-बौने व्यक्तित्व के लोगों का धमाल है. अच्छे लोग दिखते ही नहीं! ऐसा तो नहीं कि अच्छे लोग भगवान के यहां से बन के आने ही बंद हो गये? मुङो तो लग रहा कि यह मुद्दा सभी के मतलब का है, बाकी आप जैसा उचित समङों. वैसे मैं इस निष्कर्ष पर अभी नहीं पहुंच पाया हूं कि क्या वाकई मैंने सोचने का ‘मजर्’ पाल लिया है? अगर ऐसा है तो, इस मर्ज की गालिब कोई दवा तो बताओ!

बुधवार, 9 जनवरी 2013

पुराने की कशिश और नयेपन की तलाश


तीन दशक पहले की बात होगी, हम चार भाई-बहन किताबें एक के बाद एक उपयोग कर लेते थे. इस कड़ी में पड़ोसी घरों के बच्चे भी शामिल थे. बड़े भैया की किताबें मैं, फिर मेरे से छोटी वाली बहन और उसके बाद सबसे छोटी वाली बहन. कड़ी आगे भी थी. पड़ोस के बच्चे तक भी उन किताबों का बहुधा उपयोग करते थे. किताबें बेहद संभाल कर उपयोग की जाती थीं क्योंकि आनेवाले सालों में छोटे भाई-बहनों के लिए भी काम में लाना था. इससे जहां किताबों के प्रति स्नेह-लगाव पैदा हो जाता था, वहीं उनकी साज-संभाल के प्रति सजगता खुद-ब-खुद आती गयी. इतना ही नहीं, पुरानी कॉपियों के बचे पन्नों से नयी क्लास के लिए नयी नोटबुक भी जिल्द के साथ बना ली जाती थी. कपड़ों के मामले में भी कुछ इसी तरह की मितव्ययिता बरती जाती थी. कपड़े, किताबों के अलावा पुराने टूटे सामान का भी कहीं न कहीं सदुपयोग हो ही जाता था. कद्दू (कुम्हड़े) के छिलके की स्वादिष्ट सब्जी और सूखी चटनी बनाने वाले अब कितने हाथ बचे हैं? बासी रोटी को मसल कर स्वादिष्ट नाश्ते में बदलना आजकल कम ही रसोई घरों में हो पाता है. बासी भात के पकोड़े और बासी रोटी के पकोड़े सुबह के नाश्ते का जरूरी हिस्सा थे. गांव की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर तांगे या बैलगाड़ी की सवारी करने में जो बात थी वह आज किसी महंगी/लग्जरी कार में भी नहीं.
   आप सोच रहे होंगे कि मैं यह सब पुरानी बातें क्यों याद कर रहा हूं. दरअसल, बीते दिनों को याद करना मानव की फितरत है. हम जानते हैं कि हमारी नियति आगे की ओर जाना ही है, समय की गंगा को उलटा बहा कर पीछे जाना संभव नहीं होता. मगर बीते हुए कल में कोई न कोई ऐसी कशिश होती है जो हमें समय-बेसमय उसकी ओर खींचती है. विदेशों या देश के ही बड़े शहरों से छुट्टियां मनाने छोटे शहरों व गांवों में जाने वाले लोग तांगे की सवारी करना पसंद करते हैं, तो इसलिए नहीं कि उन्हें मोटर से चिढ़ हो गयी है और वे उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं. छुट्टियों से लौट कर उन्हें उन्हीं कार, बस, हवाई जहाज दरकार होंगे. कथित पिछड़े  मुल्कों या इलाकों के लोग जहां चमचमाते कांच और कंक्र ीट के जंगलों में घूमने के ख्वाब देखते हैं, वहीं इन जंगलों में से निकल कर सुविधाओं से वंचित स्थानों पर कुछ दिन बिताने की चाह रखने वालों की संख्या भी बढ रही है. बड़े-बड़े रईसों में ऐसे किसी स्थान पर छुट्टियां बिताने का चलन चल पड़ा है, जहां न टेलीफोन हो, न टीवी और न ही इंटरनेट.  दरअसल, यह यह कुछ अलग पाने की चाहत है. मनुष्य को जो हासिल है, उसे सुकून पाने के लिए हमेशा उससे इतर कुछ चाहिए. जब वह पीछे होता है, तो आगे जाना चाहता है और जब आगे पहुंच जाता है, तो वापस पीछे लौटना चाहता है..

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

अगर यह भी नहीं मालूम तो धन्यवाद आपका!


नरेंद्र मोदी गुजरात का चुनावी समर जीते तो वोटरों के साथ-साथ अपने प्रतिद्वंदियों को भी धन्यवाद कहा. उधर, हिमाचल प्रदेश में ‘हिमालयी परिवर्तन’ के तहत जीतने पर वीरभद्र ने जनता को धन्यवाद कहा तो प्रेम कुमार धूमल ने भी आखिरकार हार स्वीकार किया और जनता को धन्यवाद कहा.  धन्यवाद भले ही एक साधारण शब्द हो पर इसमें व्यापक ऊर्जा समाहित है. जो भी इसका उपयोग करता है उसे यह बात बताने की जरू रत शायद नहीं है. पर हमारी पाश्चात्य से अति पाश्चात्य होती जा रही जीवन शैली में, हमारे व्यवहार में, हमारी दिनचर्या में ‘धन्यवाद’ का तेजी से हृास होता जा रहा है. शायद महंगाई के इस दौर में हमारी कंजूस होने की प्रवृति का सबसे ज्यादा साइड इफेक्ट ‘धन्यवाद’ ने ही ङोला है. इस घोर महंगाई के दौर में ‘धन्यवाद’ ही एक ऐसी ‘वस्तु’ बची है जिसके दाम में उतार-चढ़ाव नहीं होता. जिसका सेंसेक्स गिरता-चढ़ता नहीं है और न ही कोई इसकी कालाबाजारी कर सकता है. और तो और इस पर न तो सरकारी नियंत्रण है और न ही निजी कंपनियों का वर्चस्व. सबसे बड़ा फायदा तो यह कि इसका कितना भी उपयोग-दुरुपयोग दुनिया भर में किया जाए इसके खत्म होने का कोई खतरा नहीं है. हम भारतीय इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि ‘धन्यवाद’ रूपी ईंधन की उपलब्धता की खातिर हमें किसी अरब देश का मुंह ताकने की जरू रत भी नहीं. यह तो भारतीय संस्कृति में प्रचूर मात्र में उपलब्ध है.
आप कहीं यह तो नहीं सोच रहे कि मैं ‘धन्यवाद’ पर किया अपना शोधपत्र आपके सामने पेश कर रहा. ऐसा नहीं है. मेरा इरादा आप विज्ञ पाठकों को बोर करना कतई नहीं है. मैं तो ‘बस यूं ही’ कुछ कहना चाह रहा था. अगर आप ‘धन्यवाद’ को लेकर सीरियस नहीं हैं तो कोई बात नहीं. अब ‘धन्यवाद’ कोई सास-बहू का सीरियल तो है नहीं कि इसे याद रखना जरू री है. न ही यह मैरिज एनिवर्सरी  या जन्मदिन है जिसे याद न रखने से आपकी फजीहत हो जाएगी. यह किसी बाबा का बताया गया वह चमत्कारिक नुस्खा भी नहीं है जिससे आपकी सारी परेशानियां छू-मंतर हो जाएंगी. वैसे भी जब हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में आलू-प्याज, नमक-तेल, साबून-शैंपू, डीजल-पेट्रोल, सोना-चांदी, बच्चों की परवरिश, दवा और दुआ ने हलचल मचा रखी हो तो ‘धन्यवाद’ कहां याद रह पाता है. और हां मैं तो आपको इस पर चिंतन-मनन करने के लिए भी नहीं कहूंगा. इसके लिए तो समय चाहिए होता है. वह आज कहां किसी के पास है. आप तो सुबह से रात तक ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ के भंवरजाल में ऐसे उलङो हुए हैं कि आपको इस बात की भनक ही नहीं कि ‘सरकार की इतनी कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद हमारे देश में कितने बच्चे अब भी स्कूल की देहरी से दूर हैं.’ आपको तो यह भी नहीं मालूम कि हमारे देश में कितने लोग दिनभर भोजन का इंतजार करने के बाद रोज रात को भूखे पेट ही सो जाते हैं?  धन्यवाद आपका!

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

रोटी मजबूरी हो या दूरी पर सबके लिए जरूरी


प्रख्यात साहित्यकार प्रयाग शुक्ल की एक कविता है-
व्यंजन पकाने की विधियां कई हैं
व्यंजन भी कई हैं
ढेरों व्यंजनों के
पर व्यंजन विधियों को चकमा देकर
कब और कैसे स्वाद को
मधुर तिक्त करते हैं
यही चमत्कार है.
पर इससे भी बड़ा चमत्कार है ‘खाना-खिलाना’. चाहें तो आप इसे ‘डिनर डिप्लोमेसी’ भी कह लें. दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी यूपी में भोजन करने को ‘रोटी खाना’ कहते हैं. रोटी के लिए इनसान क्या-क्या नहीं करता? खेती से लेकर राजनीति तक सब इस रोटी की ही लाचारी है. अरे भई! कोई  रोटी बनाता है, कोई रोटी उगाता है. कई महानुभाव तो ऐसे भी होते हैं जो दूसरे की उगायी फसल काटने की फिराक में रहते हैं. कोई रोटी खिलाता है, कोई खाता है. किसी के लिए रोटी मजबूरी है तो किसी के लिए दूरी है. जो भी हो रोटी होती सभी के लिए जरू री है.
कुछ लोग रोटी छीन कर खाते हैं, तो कुछ लोग कमा कर. कुछ लोग दिखा कर, तो कुछ लोग छिपा कर. हमारे बड़े-बुजुर्ग आज भी इस बात को बहुत जोर देकर कहते हैं कि ‘रोटी और बेटी का रिश्ता हर किसी से नहीं किया जाता.’ रोटी के लिए कई लोग बेघर हो जाते हैं, तो कई लोग रोटी का व्यवसाय कर कई-कई घरों के मालिक बन जाते हैं. रोटी की महिमा जितनी भी बखानी जाये कम ही होगी. कोई रोटी खाने के लिए राजनीति करता है तो कोई रोटी खाकर राजनीति करता है. कई नेता तो गरीबों/दलितों/मजदूरों के घर जाकर रोटी खाने का दिखावा करते हैं. दरअसल, इनकी नजर रोटी पर कम उनके वोट बैंक पर ज्यादा होती है. यह बात कोई समझ नहीं पाता. क्या वह गरीब यह नहीं सोचता होगा कि नेताजी मेरे यहां आकर रोटी तोड़ रहे हो कभी मुङो भी अपने घर बुलाओ? तुमने खून-पसीने की कमाई का स्वाद तो चख लिया, जरा मैं भी देखूं मुफ्तखोरी का स्वाद कैसा होता है?
संभ्रांत लोग रोटी खाने-खिलाने को ‘डिनर डिप्लोमेसी’ कहते हैं. उन्हें ‘रोटी’ से गरीबी की दरुगध आती है. साझा पार्टियों के समर्थन पर टिकी सरकारें जब-तब अपने अल्पमत में होने का खतरा महसूस करती हैं और राजधानी में डिनर डिप्लोमेसी का दौर तेज हो जाता है. शादी-ब्याह तो बिना डिनर के होते ही नहीं. ये अलग बात है कि इस डिनर का लाभ उठाने के लिए कई बिन बुलाये ‘चतुर सुजान’ बन-ठन कर आयोजन स्थलों के पास मंडराते रहते हैं. कई पत्नियां लजीज डिनर बना कर पति महोदय का मूड ठीक करने का हुनर अब भी ढूंढ़ रही हैं. बड़े होटलों/रेस्तरां में पसंदीदा डिश खिला कर प्रेमिका को प्रेयसी बनाने का प्रयत्न करना आज भी प्रेमियों की पहली पसंद है. ‘लड़की-देखाई’ की रस्म हो, तो सास-ससुर यह पूछना नहीं भूलते कि ‘बेटी खाना बनाना तो जानती ही होगी?’

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

वो सुबह-सुबह अखबार नहीं पढ़ते!


सुबह-सुबह जैसे ही अखबार खोलिए, कोई न कोई घपले-घोटाले की खबर जरू र मिलेगी. ऐसे में हर घोटालेबाज यही सोचता है, पता नहीं मेरा नंबर कब आ जाये. इसलिए वह अखबार जरा डरते-डरते ही खोलता है और अपना नाम उसमें न पाकर इत्मीनान की चाय पीता है.
पिछले दिनों बच्चों के एक कार्यक्रम में एक नेताजी को चीफ गेस्ट बनाया गया था. जिज्ञासा से लबरेज एक बच्चे ने प्रश्नोत्तर सत्र में नेताजी से पूछ लिया, ‘‘आप तो इतने सुरक्षा बल के बीच रहते हैं. क्या आपको भी किसी चीज से डर लगता है?’’ नेताजी सोच में पड़ गये. जिसका डर था वही हुआ. भरी सभा में कैसे बतायें. पर बचने का कोई उपाय न पाकर बोले, ‘‘मुङो अखबार से बहुत डर लगता है.’’ बच्चे खिलाखिला कर हंस पड़े. उन्हें शायद ‘क्यों’ पूछने की जरू रत नहीं थी.
मेरे मोहल्ले में रहनेवाले एक छुटभैये नेता ने बताया कि नेता हमेशा इस बात को लेकर खास अलर्ट रहते हैं. वह अखबार पढ़ रहे किसी व्यक्ति से बात नहीं करते, क्योंकि उन्हें इस बात का सदैव डर सताता रहता है कि पता नहीं कब कौन उनसे उल्टा-सीधा सवाल कर बैठे, जिसका जवाब देना उनके लिए मुश्किल भरा हो. एक ‘नामवर’ नेता की पत्नी ने बताया कि उनके ‘साहेब’ उनसे भी ज्यादा अखबार से डरते हैं. खास कर तब अगर कोई यह पूछे कि आज आपने अखबार पढ़ा क्या?’’ सुबह-सुबह अखबार छूने से डरते हैं. जब तक नहा-धोकर पूजा-पाठ नहीं कर लें, वह अखबार नहीं पढ़ते. यहां तक कि ‘राशिफल’ भी नहीं.
ऐसा नहीं कि केवल नेता ही इस सिंड्रोम से पीड़ित हैं, बल्कि कई अफसर भी इस बीमारी की गिरफ्त में हैं. एक आला अधिकारी के बंगले में चाकरी करनेवाले एक अर्दली ने राजफाश किया,‘‘मैडम हर वक्त साहब को ताना मारती रहती हैं- वैसे तो तुम बड़े बहादुर बने फिरते हो, पर सुबह-सुबह अखबार देख कर तुम्हारी घिग्गी क्यों बंध जाती है? अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को तो बेवजह गरियाते रहते हो पर अखबार देखकर क्यों भीगी बिल्ली बन जाते हो? मैडम चाहे कितना भी कुछ कहें पर साहब कुछ नहीं बोलते.’’
ये तो कुछ उदाहरण मात्र हैं. आपको ऐसे बहुतायत से प्राणी मिल जायेंगे जो वैसे तो मीडिया से दोस्ती रखना चाहते हैं, दूसरों का कच्च चिट्ठा खोलते रहते हैं, पर अपनी काली करतूतों के बारे में छपने से डरते हैं. इन्हें पसंद है दूसरों के बारे में गॉसिप पढ़ना, पर अपने बारे में सच्चई पढ़ने से भी डरते हैं. ये चाहते हैं चौराहे पर लगे एक आईना पर उसमें अपना चेहरा देखने से बचते हैं. ऐसे लोगों से विनम्र विनती है-
‘‘भइया! डरना ही है तो अपने आप से डरो, अखबार से क्यों डरते हो
लड़ना ही है तो तूफान से लड़ो, बयार से क्यों लड़ते हो.’’

सोमवार, 26 नवंबर 2012

आम आदमी (मैंगो मैन) की खास बातें

भले ही ‘खास’ लोगों की नजर में आम आदमी यानी ‘मैंगो मैन’ की कोई औकात नहीं होती हो, पर मुङो लगता है कि ‘मैंगो मैन’ होना कोई आसान बात नहीं है. अब देखिए न! अपनी गाढ़ी कमाई और काफी जुगाड़-जतन से जो उसने कभी रसोई गैस का कनेक्शन लिया था, उसका पंजीकरण बचाने के लिए अनिवार्य किये गये केवाईसी फॉर्म भरने के बाद वह खुद को ऐसा गौरवान्वित महसूस करता है मानो उसने केबीसी (कौन बनेगा करोड़पति) का एंट्री फॉर्म भर दिया हो. फ्री में मिलने वाला केवाईसी फॉर्म भी वह बगल की फोटोकॉपी सेंटर से पांच रुपये में खुशी-खुशी खरीदता है. जब उसे पता चलता है कि इस फॉर्म पर तो फोटो भी चिपकाना है, तो उसकी बांछे खिल उठती हैं. हां भई! आखिरी फोटो उसने शादी में खिंचवाई थी, जो अब घर के किसी कोने में पड़े-पड़े रंग से बदरंग हो चुकी है. अब फोटो स्टूडियो वाले की अपनी मरजी. वह भी सिर्फ एक फोटो तो खींचेगा नहीं. बोला- देखो जी! तीस रुपये में तीन फोटो दूंगा.‘मैंगो मैन’ खुश हो गया. इसी बहाने दो फोटो एक्सट्रा हो जायेंगे.

छठ-दीपावली मनाने लोगबाग अपने-अपने घर आये हुए हैं. कोलकाता-मुंबई हो या दिल्ली. बिहार आने-जाने वाली सभी ट्रेनें ठसाठस भरी हुई हैं. वैसे यह कालजयी परंपरा है. क्योंकि ‘मैंगो मैन’ ट्रेन में रिजव्रेशन (आरक्षण) नहीं करवाता. भई! ट्रेन हुई सार्वजनिक संपत्ति. मतलब जितनी तेरी उतनी ही मेरी तो भला इसमें आरक्षण क्या करवाना? वैसे भी ट्रेनों में जब तक भीड़ न हो सफर का मजा अधूरा रह जाता है. और जिसने बर्थ आरक्षित करा ही रखी है, उसको ही कौन से मजे आ रहे हैं. वह बेचारा किनारे हो कर दुबक कर बैठा है. बिना टिकट वाला उसी की बर्थ पर सो रहा है. आखिर छठ मइया का ठेकुआ खाना इतना आसान थोड़े ही न है!

‘मैंगो मैन’ की अपनी कुछ खासियत होती है. उसे सपने भी भीड़भाड़ के ही आते हैं. जैसे राशन के लिए लाइन लगा कर खड़ा है. बीमार बच्चे के इलाज के लिए अस्पताल में अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा है. रेलवे स्टेशन पर शौचालय का उपयोग करने के लिए सात लोगों के पीछे शांत हो कर पंक्तिबद्ध है..आदि-आदि. जब कोई ‘मैंगो मैन’ एक साथ इतनी जद्दोजहद कर रहा हो, तो वह भला खुद को स्विट्जरलैंड की वादियों में कटरीना कैफ के साथ गाना गाते हुए कैसे देख सकता है?

उसे तो सब्जी से लेकर शादी तक में सब्सिडी हासिल करने की लड़ाई लड़नी पड़ती है. घर से हजार-दो हजार किलोमीटर दूर रहनेवाला ‘मैंगो मैन’ ठेकुआ खाने के लिए छठ मइया के घाट पर नंगे पांव पहुंचता है. क्या यह खास बात नहीं है? इसीलिए ‘मैंगो मैन’ खास है.

बुधवार, 7 नवंबर 2012

बाजार के ताल पर नाचतीं कठपुतलियां

पिछले दस वर्षो के अधिकतर हिट या सुपरहिट बॉलीवुड गीतों को याद कीजिए. इनमें से अधिकतर (लगभग 99 फीसदी) महिला केंद्रित हैं. ये गीत महिलाओं की पीड़ा, समस्याओं, मुद्दों को उठाने के लिए नहीं, बल्कि पुरुष मानसिकता को रिझाने या उकसाने के लिए बनाये जाते हैं. सिर्फ गीत ही क्यों? तमाम तरह के विज्ञापनों पर गौर फरमाइए, तो तसवीर और भी साफ हो जायेगी.

18 अगेन..! बाजार में पेश यह नया उत्पाद है, उन महिलाओं के लिए है जो पच्चीस-तीस-पैंतीस या शायद उससेज्यादा उम्र की हो चुकी हैं. इस उत्पाद के प्रचार के लिए दो रूपकों का इस्तेमाल हो रहा है. पूरे पन्ने के अखबारी विज्ञापन में एक पूरा खिला गुलाब और (इसके इस्तेमाल के बाद) नीचे गुलाब की ‘सख्त’ कली. यह क्रीम पूरे खिले गुलाब को ‘कली’ बनाती है. टीवी पर इसके विज्ञापन में एक महिला गाती है- ‘आइ एम 18 अगेन, फीलिंग..अगेन.’ यह एक उदाहरण मात्र है कि बाजार किस तरह हमारी जिंदगी को नियंत्रित कर रहा है. प्रोडक्ट किस तरफ हमारे निजी रिश्तों की दशा-दिशा तय करने की कोशिश में लगे हैं. शायद ही इस बात से कोई इनकार करे कि आप टेलीविजन देखते समय अपने बच्चों को आसपास नहीं रखना चाहते. क्योंकि जब आप अपना पसंदीदा कार्यक्रम देख रहे होते हैं तो इस बात का सदैव खतरा बना रहता है कि पता नहीं कब आपके टीवी स्क्रीन पर कंडोम का कोई अश्लील विज्ञापन नमूदार हो जाये. न जाने कब कोई पुरुष मॉडल किसी मल्टीनेशनल कंपनी का परफ्यूम या डियोड्रेंट लगा कर दर्जन भर युवतियों या महिलाओं को अपनी ओर ‘आकर्षित’ करने का ‘करतब’ दिखाने लगे. ऐसे में खतरा यह बना रहता है कि अगर आपके बच्चे ने ऐसे किसी भी विज्ञापन को अगर गौर से देख लिया और आपसे जिज्ञासा भरा कोई सवाल पूछ दिया तो आप क्या करेंगे? दरअसल, आज हमारी जिंदगी में रहन-सहन, संस्कृति, बोल-चाल, पर्व-त्योहार, सुख-दु:ख, हंसी-खुशी सबकुछ बाजार नियंत्रित हो गया है.

अब देखिए न दीपावली आ गयी है यह आपको बाजार बता रहा है. भारी डिस्काउंट से लदे बड़े-बड़े होर्डिग, कई-कई पेजों के अखबारी विज्ञापन, टेलीविजन पर आकर्षक विज्ञापनों की भरमार यह सबकुछ आपके लिए है. आपको यह बताने के लिए कि आप खर्च करने को तैयार हो जाइए. अभी-अभी दुर्गापूजा खत्म हुई है. मार्केट में खरीदारों की भीड़ देख कर यह भरोसा ही नहीं होता कि ये वही लोग हैं जो रसोई गैस या डीजल-पेट्रोल की कीमत बढने से गृहस्थी के डांवाडोल होने का रोना रोते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा अब खुद पर नियंत्रण रहा ही नहीं. हम किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की तरह हो गये हैं जिसे हर वह शख्स संचालित कर सकता है जिसके हाथ में रिमोट हो!

रविवार, 4 नवंबर 2012

सक्सेस होना है तो इन छह किस्म के लोगों को बनाएं मित्र

यदि आप सक्सेस होना चाहते हैं तो अपनी मित्रमंडली में छह किस्म के लोगों को शामिल करें. विशेषज्ञों का दावा है कि आपकी मित्रमंडली में छह किस्म के लोग होने चाहिए.

1. जो आपसे ज्यादा ठंडे दिमाग का हो.

2. जो आपसे ज्यादा साहसी हो.

3. जो ऐसा शख्स हो जिसकी तरह आप बनना चाहते हों.

4. जो आपके बाकी किसी दोस्त के बारे में न जानता हो.

5. जो निहायत ही ईमानदार हो.

6. जिसे आप खुद से भी ज्यादा जानते हों.

हाल ही में मेलबर्न में किये गये एक रिसर्च के बाद द पॉजिटिविटी इंस्टीट्यूट के मनोवैज्ञानिक डॉ. सूजी ग्रीन ने बताया, विविधता होना बहुत जरुरी है और यह भी बहुत जरुरी है कि जब वक्त आए तो आपको अलग-अलग सोर्स  से मदद मिल सके. ग्रीन का कहना है, ‘‘ऐसी चीजों से हम अपनी जिंदगी जिंदादिली से जीते हैं और हमारा नजरिया भी काफी अलग होता है. अलग-अलग तरह के दोस्त हमारी जिंदगी खुशियों से भर देते हैं.’’

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

सवालों के इस मौसम में एक मासूम सवाल

आज कल देश में जिसे देखो सवाल पूछता नजर आ रहा है. बाबा रामदेव से शुरु हुई यह परंपरा अन्ना हजारे से होते हुए अरविंद केजरीवाल तक आ पहुंची. अब कुछ लोग अरविंद केजरीवाल से भी सवाल पूछ रहे हैं- बताओ, आंदोलनकारी हो या उदारवादी? इस पर केजरीवाल ने तपाक से कहा-मैं एनी कोहली (प्रश्नकर्ता) को नहीं जानता इसलिए मैं उनके सवालों के उत्तर देने को जवाबदेह नहीं हूं. मेरी बेटी अक्सर मुझसे सवाल पूछती है. शुक्र है भाई केजरीवाल के पास सवाल से बचने को एक विकल्प तो है पर मेरे पास तो वह भी नहीं है. मुङो मेरी बेटी के हर सवाल का जवाब देना पड़ता है वह भी ईमानदारी से और उसी समय. वरना वह नाराज हो जाती है, और मैं उसे नाराज या दुखी नहीं करना चाहता. सवाल कभी भोलेपन से भरे तो कभी शरारत से सराबोर.

खैर, रोजमर्रा की जदोजहद से दो-चार होते कुछ सवाल मेरे जेहन में भी उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं. कभी-कभी ये सवाल इतने घनीभूत हो उठते हैं कि जवाब पा लेने को मन आतूर हो उठता है. एक वाकया पेश है- दवा दुकान पर करीब 20 साल का एक युवक अपनी मां के साथ आया. दुकान में भीड़ थी. इतने में मोबाइल की घंटी बजी उसने जेब से जैसे ही अपना मोबाइल निकाला वह जमीन पर गिरा और बिखर गया. युवक बेचैन हो उठा, अपनी मां पर चिखने-चिल्लाने लगा. दुकान पर खड़े ग्राहक उसकी ओर देखने लगे. बीमार मां असहज हो उठी. उसे समझ में नहीं आ रहा था वह उसे कैसे शांत करे. थोड़ी देर बड़बड़ाने के बाद युवक वहां से बाहर आया और अपनी पल्सर बाइक से तेजी से कहीं निकल गया. उसकी मां निढाल हो कर दुकान में रखी एक टूटी प्लास्टिक चेयर पर बैठ गयी. मेरी जिज्ञासा बढ गयी थी. मैंने पास जाकर पूछा मैडम, वह आपको यूं छोड़कर कहां चला गया. जवाब मिला ‘वह मेरा इकलौता बेटा है. मैं एक सप्ताह से बीमार हूं. बहुत कहने पर वह मुङो डॉक्टर के पास लेकर आया था. यहां उसकी महंगी मोबाइल गिरने से टूट गयी. वह उसे बनवाने गया है.’ ‘और आप?’ ‘मेरा क्या, मैं ऑटो करके घर चली जाउंगी.’ मैं सोचने लगा- क्या जिंदगी में मोबाइल की अहमियत मां से ज्यादा है? वह युवक मोबाइल खराब होने से इतना बेचैन हो उठा पर मां की तबियत खराब होने से उस पर कोई अंतर क्यों नहीं पड़ा?

क्या मनुष्य केवल देह है जो मात्र भौतिक सुखों से संतुष्ट हो जाये? हमारे भीतर की चेतना, संवेदनशीलता, प्रेम, करुणा, दया, सहानुभूति कहां विलुप्त हो गयी? क्या भोगवादी इस अवधारणा में इन अनुभवों के लिए कोई जगह नहीं है? क्या यह केवल दैहिक सुखों पर टिकी है? इन हालात पर तो कवि प्रदीप की पंक्तियां याद आ रही हैं-देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान!

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

अथ श्री जमाई कथा

बचपन से ही मुङो शादी का बहुत क्रेेज था. सोचता था जब मेरी शादी होगी मैं भी किसी का दामाद बनूंगा. खूब आवभगत होगी. मैं भी ‘दामादगीरी’ का खूब लुत्फ उठाऊंगा. पर, अफसोस कि शादी तो हुई पर ‘दामादगीरी’ का लुत्फ उठाने का वह ‘सुअवसर’ न मिल सका. इस बात का जिक्र मैं यहां इसलिए कर रहा हूं क्योंकि देश में इन दिनों एक जमाई राजा ने धमाल मचा रखा है. इस देश में तो हर जमाई, राजा होता है, तो राजा के जमाई का क्या कहना. कुछ ‘दामाद’ उनसे इसलिए खुन्नस खाये हुए हैं कि क्योंकि उनको वैसा मौका न मिला. खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर कुछ लोग उन्हें ‘राष्ट्रीय दामाद’ कह रहे हैं तो कुछ ‘सरकारी दामाद’. अजी, मैं पूछता हूं इसमें नया क्या है? सरकारी दामादों की परंपरा तो अंगरेजों के जमाने से चली आ रही है. वैसे भी बड़े-बुजुर्ग कह गये हैं—बेटियां परायी ‘धन’ होती हैं और दामाद सबसे ‘सम्माननीय’. भारतीय परंपरा में दामादों का बहुत महत्व रहा है, आज से नहीं प्राचीनकाल से ही.


जमाइयों की बात चली है तो मुङो याद आ रहा है गांव-जवार में कुछ घरजमाइयों को मैं भी जानता हूं. और कुछ हो न हो ये घर जमाई गांव-जवार के लोगों के मनोरंजन का साधन अवश्य होते हैं. इनसे हंसी-मजाक, ठिठोली करने और तंज कसने से कोई बाज नहीं आता. इनमें से कुछ तो जिंदादिल होते हैं जो यह सब ङोल जाते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो बात-बात पर बिफर जाते हैं. नतीजा झगड़ा-फसाद, बवाल और मनमुटाव. खैर ताना मारने वाले इस सबकी परवाह कहां करते हैं. दामादों को मेहमान भी कहा जाता है. अब जो दामाद घरजमाई ही बन गया वह कैसा मेहमान और कैसी उसकी मेहमानवाजी? वह खायेगा भी और खिलायेगा भी. वह सुनेगा भी और सुनायेगा भी. वह जो मरजी सो करेगा. आखिर घरजमाई जो ठहरा. वह काजू भी खायेगा और करैला भी. ‘फ्यूचर डिपेंड ऑन योर सिचुएशन’.

बहरहाल, हम जमी-जमाई अवधारणा से बाहर आते हैं और फ्रेश बात करते हैं. अगर आप शादीशुदा हैं तो सिवाय अफसोस करने के आपके पास कोई और विकल्प है नहीं. हां, खुशकिस्मत हैं वे जिनकी अभी तक शादी नहीं हुई. वह इसलिए क्योंकि उनमें अभी भरपूर संभावना बची है. सच कह रहा हूं. संभावना जमाई राजा बनने की, संभावना दामाद बनने की, संभावना घर जमाई बनने की. संभावना वह सब कुछ पा लेने की जिससे वह अभी तक वंचित हैं. मैं आग्रह और अपील करूंगा ऐसे तमाम संभावनाशील साथियों से कि अगर आपके लिए भी शादी जिंदगी में सिर्फ एक बार होनेवाली घटना है तो उसे सोच-समझ कर घटित होने दें. अपनी ‘दीन-दशा’ सुधारने के लिए रॉबर्ट वाड्रा की तरह किसी धन-संपदा से परिपूर्ण और राजनीतिक परिवार की सुयोग्य कन्या से सुनियोजित विवाह करें. तथास्तु!!!