शनिवार, 10 अगस्त 2013

नवाज को एक शरीफ हिंदुस्तानी का खत

मियां नवाज शरीफ जी! आपको और आपके मुल्क पाकिस्तान की अवाम को ईद मुबारक. आज ईद के ही दिन हमारे देश की आइबी ने अलर्ट किया है कि आपके मुल्क के जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद दिल्ली के लालकिले पर फिर से हमले की योजना बना चुके हैं. वह पाकिस्तानियों को भारत के खिलाफ उकसा रहे हैं. उन्होंने ट्विटर पर ईद की शुभकामना देते हुए भारत के खिलाफ सख्त संदेश जारी किया है.  अब क्या बतायें कि यह संदेश पाकर हमारे देश में ईद कैसे मन रही है. ईद के उसी चांद को हिंदुस्तान ने भी देखा, जिसे पाकिस्तानियों ने देखा. पर इस बार हमारी ईद जरा फीकी है. हमारा मुल्क अभी गम और गुस्से के दौर से गुजर रहा है. सरहद की निगहबानी करने के दौरान अपने पांच जवानों को खो देने के गम में हम अभी डूबे हैं. उन जवानों के घर-गांव में पिछले चार दिनों से चूल्हा नहीं जला. अन्न का एक निवाला तक बच्चों ने नहीं खाया.
आप तो ‘शरीफ’ हैं, यह तो पता ही होगा कि हिंदुस्तान के कई परिवारों की मौसी, बुआ, बहनें और भाई पाकिस्तान में रहते आ रहे हैं. सोचिए, उनकी ईद कैसी गुजरी होगी. अरे हां! आपको शुक्रिया कि आप हमारे इस गम में शरीक हुए और अफसोस जताते हुए ‘रिश्ते को मजबूत और भरोसेमंद बनाने की पहल’ करने पर जोर दिया. पर रिश्ते की कीमत भला तुम क्या जानो शरीफ बाबू! तुम्हारा मुल्क तो सिर्फ धोखेबाजी और फरेब की राजनीति करता है. दरअसल, पाकिस्तान की सियासी आबोहवा ही कुछ ऐसी है जहां अमन को लेकर ईमानदार लोगों के लिए गुंजाइश जरा कम है. पर हमारा गम जरा जुदा है. हम पाकिस्तान से बार-बार छले गये एक ऐसे मुल्क के वाशिंदे हैं, जहां के हुक्मरान गंदी और स्वार्थ की राजनीति में मशगूल हैं. उन्हें यह तक पता नहीं कि एलओसी पर हमला आतंकियों ने किया या पड़ोसी मुल्क के सैनिकों ने. हमारे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों को बोलने तक नहीं आता. जिनकी मानसिकता यह है कि ‘सैनिक तो होते ही हैं शहीद होने के लिए’, उनसे भला किस प्रकार की उम्मीद की जा सकती है.
खैर, यह तो हमारा ऐसा दर्द है जिसे सुन कर आप हमारी हंसी ही उड़ायेंगे. हमारे यहां बच्चों को शुरुआती कक्षा में ही एक कविता पढायी जाती है- ‘मां मुझको बंदूक दिला दो मैं भी लड़ने जाऊंगा.’ यहां लड़ने से अभिप्राय देश की रक्षा करने से है. कुछ ऐसी ही पंक्तियां आपके भी मुल्क में भी बच्चों को सिखायी जाती हैं, पर उसका अभिप्राय शायद कुछ और होता होगा. चलते-चलते एक चर्चित शेर अर्ज करना चाहूंगा, पर जरा बदले अंदाज में -
न दिल्ली में याद रखना, न लाहौर में याद रखना/ हो सके तो हमें बस दुआओं में याद रखना.
        आपका, एक शरीफ हिंदुस्तानी

2 टिप्‍पणियां:

  1. शरीफ साबह शरीफ होते तो उनको बात समझ में आती पर......

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल मंगलवार (13-08-2013) को "टोपी रे टोपी तेरा रंग कैसा ..." (चर्चा मंच-अंकः1236) पर भी होगा!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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