Tuesday, July 21, 2009

उम्र मुठी में ऐसे आती है

पहले पहल जापानी सभ्‍यता पर पश्चिम का प्रभाव सिर चढकर बोला था लेकिन हिरोशिमा और नागासाकी के हादसे के बाद जापान ने अपनी परंपराएं खुद गढी हैं। उन्‍हीं में शामिल है स्‍वस्‍थ दिनचर्या। जापान में या तो फास्‍ट ट्रेनें चलती हैं या लोग पैदल चलते हैं।

जापानी लोग अपने दिन की शुरुआत बडे ही सलीके से करते हैं। एक्टिव लाइफस्‍टाइल यहां के लोगों के सोने में भी है और जागने में भी। दिन का शुभारंभ दैनिक कार्यों से निवृत होने के बाद पैदल चलने से होता है। कामकाजी लोग रेलवे स्‍टेशन तक और बुजुर्ग बागों की ओर पैदल निकल पडते हैं। जापान में फर्क नहीं पडता कि कंपनी का सीइओ ट्रेन से जा रहा है और चपरासी कार से आफ‍िस पहुंच रहा है। धुन के पक्‍के यहां के लोग पैदल चलने में जरा भी शर्म महसूस नहीं करते।

जापान के लोगों के काम करने का ढंग इतना व्‍यवस्थित और त्रुटिरहित है कि आज दुनिया के कई देशों और मशहूर कंपनियों ने जापानी माडल को अपनाया है। एक समान यूनीफार्म पहनना, हर लक्ष्‍य को जोश के साथ समय से पहले पूरा करने की कोशिश जापानी विशेषताएं हैं। कम खाने, कम बोलने और कम सोने में उसका भरोसा है।

जीने के लिए खाना - जापान के लोग खाने के लिए कम और जीने के लिए ज्‍यादा खाते हैं। वे खाने में स्‍वाद के बजाय सेहत ज्‍यादा ढूंढते हैं। खाने में कच्‍चापन जापान की विशेषता है। वे तले-गले और मसालेदार खाने से परहेज करते हैं। ज्‍यादा जीना है तो कम खाओ जापानी लोगों के व्‍यवहार का सबल पक्ष है। उनकी सक्रियता और स्‍फूर्ति का भी यही राज है कि वे उतना ही खाते हैं जितना शरीर की जरुरत है। जीभ की जरुरत के हिसाब से खाना जापान में ठीक नहीं माना जाता।

पशुओं के मांस से परहेज - मांसाहार और महंगे और गरिष्‍ठ रेड मीट के बजाय ताजा और मछली खाना जापानियों की सेहतमंदी का खास राज है। वे मछली को ज्‍यादा पकाने या मसालों में लपेटने के बजाय उसे कच्‍चा व कम पकाकर खाते हैं।

औषधीय उलांग चाय - जापानियों के
खान-पान और सेहतमंदी का सबसे खास राज है उलांग चाय। यह हरी चाय है जो चीन और जापान में सेहत के लिए बेहद अच्‍छी मानी जाती है। इसे ठंडे और गर्म पेय के रूप में पिया जाता है। यह पाचन तंत्र के लिए भी अच्‍छी होती है।


ये कुछ ऐसी बाते हैं जिससे हम भी प्रेरणा ले सकते हैं और अपनी जिंदगी को खुशहाल और स्‍वस्‍थ बना सकते हैं।

Wednesday, June 17, 2009

यौवन की चाह

क्‍‍या एंजेलिना जोली ने बोटोक्‍स के इंजेक्‍शन लिए हैं, सनी देओल ने नए बाल उगवाए हैं, जेनिफर लोपेज का फ‍िगर कास्‍टेमिक सर्जरी से जवान हुआ है, देवआनंद कौन सी डाई लगा रहे हैं, अमिताभ बच्‍चन इस उम्र में भी इतनी उछल-कूद कैसे कर पाते हैं उनके सामने उनका बेटा अभिषेक थका दिखता है। अभिनेत्री रेखा की आंखों के आस-पास की झुर्रियां कहां गई....

ये सारे सवाल एक ही दिशा से आते हैं और वह है यौवन की चाह। देवताओं का रुप युगों-युगों तक एक सा रहता है, पर जब वे धरती पर अवतार लेते हैं तो बाल लीला, यौवन और महाप्रयाण उनका भी सत्‍य बन जानते हैं। मनुष्‍य आत्‍मा जीतने वालों के सम्‍मुख नत हो जाता है लेकिन दैहिक जीत के उपक्रम करता रहता है। हाल के वर्षों में सौंदर्यशाली और जवान बने रहने की चाह ने अरबों की नई इंडस्‍ट्री खडी कर दी है। वैज्ञानिक आयु के प्रभावों को निष्‍फल करने के लिए रोज नये प्रयोग कर रहे हैं।

उम्र का बढना जीवन की अंतिम सच्‍चाई है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार आत्‍मसंतुष्टि, सुंदर दिखने की चाह, समय के साथ कदम मिलाने की इच्‍छा जैसे कारण व्‍यक्ति को अपनी उम्र से कम नजर आने के लिए बाध्‍य करत हैं। पुरी दुनिया में उम्र को जीतने के प्रयास चल रहे हैं। कैलिफोर्निया की एक कंपनी ने ब्‍लास्‍ट कैंसर कोशिकाओं से निबटने का एक तरीका खोज निकाला है। उनके इस तरीके से एंटी एजिंग इंडस्‍ट्री को अरबों डालर का फायदा होगा। वैज्ञानिकों की एक टीम ने स्किन एजिंग जीन खोज निकाला है जिसमें झुर्रियों, बढती उम्र की त्‍वचा पर कुप्रभाव और त्‍वचा पर होने वाले दूसरे नुकसानों में राहत मिल सकती है।


शिकागो यूनिवर्सिटी में शोध कर रहे वैज्ञानिक प्रोफेसर जे के अनुसार कुछ लोग सेहत के नियमों पर चलकर भी तीस की उम्र में मर जाते हैं और कुछ नशा करके भी सौ साल निकाल लेते हैं। उम्र की यह गुत्‍थी अनेक प्रश्‍नों को जन्‍म देती है। क्‍या वाकई ऐसी कोई प्रक्रिया है जो बढते हुए बुढापे को रोककर इंसान को सदाबहार बनाए रख सके। या एंटी एजिंग मात्र खोखला भ्रम है, जिसे इंसान आत्‍मसंतुष्टि के लिए अपनाता है। आखिरकार बुढापा है क्‍या, यह एक सामान्‍य प्रक्रिया है या फ‍िर एक बीमारी जिसका इलाज संभव है।


बुढापा दरअसल एक क्रमिक और स्‍वाभाविक परिवर्तन की प्रक्रिया है जिसका परिणाम बचपन, युवावस्‍था, वयस्‍कता के रुप में आता है। उम्र बढने की यह प्रक्रिया मनुष्‍य के शरीर में उम्र के साथ होने वाले परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करती है। इसके नकारात्‍मक और सकारात्‍मक दोनों पहलू हैं। जहां एक ओर एजिंग से शारीरिक क्षमता में कमी आती है वहीं दूसरी ओर इसका अर्थ विकास (बुदि़धमानी व अनुभव) है। जारी....

Monday, June 15, 2009

खुशखबरी। चांद के साथ मैं भी लौट आया हूं

खुशखबरी।खुशखबरी।खुशखबरी। चांद मोहम्‍मद अपनी फ‍िजां के पास लौट आए हैं यह कहते हुए कि उन्‍होंने जो कुछ भी अत्‍याचार किया वह किसी के दबाव में किया और वह आज भी अपनी फ‍िजां से बेपनाह मोहब्‍बत करते हैं। मेरे ब्‍लागर साथियों मुझे जैसे ही यह खबर मिली मुझे लगा कि अब मुझे भी लौट आना चाहिए आप सभी के पास। अपनी ब्‍लाग्‍स की दुनिया में। पिछले दो सप्‍ताह आप सभी से दूर रहकर मैं बता नहीं सकता कि किस बेचैनी को मैंने जिया है। ब्‍लाग्‍स की दुनिया में क्‍या कुछ चल रहा है इस सबसे बेखबर था। काश मैं भी चांद मोहम्‍मद की तरह यह कह पाता कि मैंने जो कुछ भी किया किसी और के दबाव में किया। मैं बेकसूर हूं। हां यह जरुर कहूंगा और डंके की चोट पर कहूंगा कि इस दूरी ने ब्‍लागिंग के प्रति मेरी चाहत को और मजबूत बना दिया है।

अब बात खुशखबरी वाली...

दोस्‍तों यह मेरी 52वीं पोस्‍ट है। यानि, चार महीने में चिट़ठों का पचासा। शायद अप टू द मार्क नहीं है पर निराशाजनक भी नहीं है। नौकरी, परिवार, दोस्‍तों और खुद पर समय खर्च करने के बाद भी इतना समय चुराकर ब्‍लागिंग कर लेने को मैं अपने लिए बडी उपलब्धि मानता हूं। सीनियर्स व नये ब्‍लार्ग्‍स साथियों से काफी कुछ सीखने को मिल रहा है। कई अच्‍छे और आवश्‍यक मुद़ों पर चर्चा होती रही है। निश्चित ही ब्‍लागिंग का भविष्‍य अंधकारमय नहीं है। बल्कि यह तो संभावनाओं से भरा माध्‍यम है। उम्‍मीद है, आगे भी मेरी यह यात्रा अनवरत चलती रहेगी और आप सभी का स्‍नेह, प्‍यार और मार्गदर्शन मिलता रहेगा।

Friday, May 29, 2009

आइला रे... बेटियों के प्रति इतनी नफरत

दोस्‍तों, कहने को तो हम कई मामले में अफलातून हो गए हैं। विज्ञान से खलिहान तक तरक्‍की के नये-नये आयाम कायम कर लिये हैं। पर आज भी हमारे समाज के किसी कोने से कई ऐसी घटनाएं उजागर होती रहती हैं जो हमारे सभ्‍य होने और तरक्‍की के दावे को पलभर में झूठला देती हैं।

उडीसा के कटक में भुवनेश्‍वर नामक एक युवक ने अपनी 11 महीने की बेटी को इसलिए मार डाला क्‍योंकि वह बेटा चाहता था। जबसे उसे बेटी पैदा हुई वह अपनी पत्‍नी जूली को भी नापसंद करने लगा। अक्‍सर वह उससे लडाई-झगडा भी करता। इसीलिए जूली अपनी बेटी को लेकर अपने मायके चली गई। भुवनेश्‍वर का गुस्‍सा तब भी शांत नहीं हुआ और वह वहां भी जा पहुंचा। मायके वाले और जूली दोनों ही नहीं चाहते थे कि भुवनेश्‍वर उन्‍हें ले जाए। यह बात भुवनेश्‍वर बर्दाश्‍त नहीं कर पाया और रात के अंधेरे में सो रही जूली के गोद से अपनी दूधमुंही बच्‍ची को उठा ले गया। सुबह जूली की जब आंख खुली तो बच्‍ची उसके बिस्‍तर पर नहीं थी। पूरे घर में छानबिन की गई। पता चला कि भुवनेश्‍वर भी गायब है। थोडी देर में घर के पिछवाडे में बच्‍ची की सिर कटी लाश मिली।


ऐसे न जाने कितने भुवनेश्‍वर हमारे समाज में आज भी हैं। जो बेटियों को जिंदा नहीं देखना चाहते भले ही वह उनके ही घर में क्‍यों न पैदा हुई हो। ऐसे लोग न सिर्फ बेटियों के दुश्‍मन हैं बल्कि पूरी इंसानियत के नाम पर कलंक हैं। दुखी मन तो यह कहता है कि बंगाल में हाल में ही आए आइला नामक चक्रवाती तुफान केवल इन दरिंदों को ही क्‍यों नहीं डूबो व बहा ले जाता। आखिर बेटियों के प्रति इतनी नफरत क्‍यों...

Tuesday, May 26, 2009

दुनिया की सबसे छोटी पतंग और बैट


यूपी के सहारनपुर जिले के बीएससी के छात्र विपिन कुमार ने मात्र १.3 सेमी का क्रिकेट बैट और दो मिमी की दुनिया की सबसे छोटी पतंग बनाने का दावा किया है। विपिन अब अपने इस प्रयास को गिनीज बुक आफ वर्ल्‍ड रिकार्ड में दर्ज कराना चाहते हैं। गांव कुरलकी निवासी 26 वर्षीय विपिन मुजफ़फरनगर के चौधरी छोटू राम डिग्री कालेज का बीएससी एग्रीकल्‍चर के सेकेंड ईयर का छात्र है। विपिन के पिता देशराज सिंह बच्‍चों के डाक्‍टर हैं।

Monday, May 25, 2009

अगर आपकी प्रेमिका का सेलफोन बंदर छिन ले जाए

तनिक सोचिये......आप किसी पार्क में अपनी प्रेमिका के साथ व्‍यस्‍त हों और वैसे वक्‍त में कोई बंदर आपको परेशान करे तो आपको कैसा लगेगा। जी हां, ऐसी एक सत्‍य घटना पेश है-

दिल्‍ली या आगरा से मेरठ होकर हरिद्वार जाने के रास्‍ते में खतौली आता है। वहां चीतल पार्क काफी फेमस है। उधर से होकर आने-जाने वालों के लिए विश्राम करने का एक शुकूनदेह जगह। चीतल पार्क लविंग प्‍वाइंट के नाम से भी जाना जाता है। विगत शनिवार को वहां दुपहरी गुजारने आये प्रेमी युगल पार्क के एक कोने में बैठकर चिप्‍स का स्‍वाद लेते हुए प्रेम मग्‍न थे। दो बंदरों की नजर काफी देर से उनपर थी। इसी बीच एक बंदर तेजी से उनकी ओर लपका। यह देख युवती ने चिप्‍स का पैकेट उठा लिया। चिप्‍स हाथ न आने से गुस्‍साया बंदर युवती का पर्स उठाकर चलता बना। उस पर्स में युवती के मोबाइल फोन और रुपये थे। प्रेमी युवक ने बंदर को पत्‍थर मारना शुरू किया तो बंदर ने भी आवेश में आकर पर्स पास के नहर में फेंक दिया....क्‍यों हो गई न गुगली....

भलाई के बदले पिटाई

और अंत में, ऐसा ही एक और रोचक वाकया...
बागपत जिले के बडौत स्टेशन पर दिल्‍ली से शामली जा रही ट्रेन का इंतजार कर रही एक महिला ट्रेन आते ही उस पर बैठ गई। इस दौरान उसका पर्स स्‍टेशन पर ही छूट गया। तभी वहां मौजूद एक व्‍यक्ति ने महिला का पर्स उठाकर उसे देने का प्रयास किया तभी ट्रेन चल दी तो वह ट्रेन के साथ-साथ दौडने लगा। यह सीन देख स्‍टेशन पर मौजूद लोगों ने उसे जेबकतरा या पर्स चोर समझ बैठे और उसकी पिटाई कर पुलिस को सौंप दिया। थोडे ही दूर जाकर महिला भी चेन पुलिंग कर ट्रेन से उतर गयी, पूरा वाकया जानने के बाद वह पुलिस स्‍टेशन पहुंची और पुलिस से यह कहकर यह व्‍यक्ति निर्दोष है, उसे छुडाया। तो इस तरह से एक ऐसे व्‍यक्ति की पिटाई हो गयी जो भलाई करना चाहता था...

Friday, May 22, 2009

शायद आप इस युवती को पहचानते हों


गुरुवार की शाम को जीआरपी ने बरेली रेलवे स्‍टेशन के यार्ड में खडे त्रिवेणी एक्‍सप्रेस की बोगी से एक युवती को बरामद किया। पूछताछ के बाद जब युवती ने कुछ नहीं बताया तो इसे महिला थाने भेज दिया। वहां महिला कांस्‍टेबल ने पूछताछ की तो उसने अपना नाम कुसुम मिश्रा, पिता का नाम रमाकांत मिश्रा, मां का नाम निर्मला और भाईयों का नाम अजय और विनोद बताया। यह भी बताया कि उसके पिता फौजी हैं, लेकिन यह नहीं बताया कि वह कहां की रहनेवाली है या उसका घर कहां है।

जीआरपी के प्रभारी निरीक्षक वीपी त्रिपाठी ने बताया कि युवती मानसिक रुप से विक्षिप्‍त लगती है। पुलिस यह कयास लगा रही है कि युवती संभवत लखनउ की रहनेवाली है और घर से बिछुड गई है, उसे फ‍िलहाल नारी निकेतन भेज दिया गया है।