शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

जब तुम बोल रही थी

सुना मैंने तुम्हें
पर वैसे नहीं 
जैसे तुम कहना चाहती थी
कोशिश की मैंने बहुत
पर कम नहीं कर पाया अहम
आंखे झुका कर
नजरें गड़ा कर
सुनता रहा तुम्हें

तुम बोलती रही
मैं विचरता रहा
बिस्तर की उन सलवटों में
जो छोड़ आयी थी तुम
उस अंधेरे कमरे में
सहलाते हुए अपनी पीठ
मैं महसूस करता रहा
तुम्हारे नर्म हाथों की छूअन
बिखरे बालों को सहलाते हुए
सुना मैंने तुम्हे

तुम बोलती रही
मैं सोचता रहा
तुम्हारी हर हर्फ का
 कोई अलहदा मतलब
तुम्हारी सोच से परे
मैं था वहीं
तुम्हारे पास
जब तुम बोल रही थी
मैं सुन नहीं पाया वह
जो तुम कहना चाहती थी.

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

सच तो यही है!

मेरे दरवाजे की सांकल
मेरे पैरों की बिवाई
मेरे घिसे हुए चप्पल
मेरे अधूरे पड़े खत
मेरे कांपते हुए होठ
मेरी फटी हुई लिहाफ
सब मुझसे नफरत करते हैं
सच कहूं तो-
सिवाय तुम्हारे
कोई नहीं करता मुझसे प्रेम

मैं एक ठहरा हुआ समय हूं
अधूरे पड़े किसी मीनार की तरह
जिसे किसी शहंशाह ने
यूं ही छोड़ दिया
अपनी बेगम की याद में

तुम्हें बुरा तो नहीं लगा
मेरे बारे में जानकर
अगर हां तो-
माफ कर देना मुझे
क्योंकि सच तो यही है! 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

यह कैसा समय है!

अटालिकाओं की छाया ने
हमें बौना बना दिया है
मल्टीप्लेक्स ने छिन ली हमारी मासूमियत
हैरी पॉटर को उड़ान भरते देख
रोमांचित होते हैं हम
बच्चों को खेलने से रोकते हैं
मशीनों की शोर में
दब गयी है भाषा
बंजर हो गयी है
हमारी भावभूमि
अब उगते नहीं उसपर
सुविचार.

सोमवार, 9 जनवरी 2017

भाषा का नट

अखबारनवीस परेशान है-
अनर्गल के समुद्र में
गिर रही है वितर्क की नदियां
तलछट पर इधर-उधर
बिखरे पड़े हैं शब्द
प्रत्यय की टहनी पर बैठा है उल्लू
समास की शाख पर लटका है चमगादड़
कर्म की अवहेलना कर
बैठा है कुक्कुर
क्रिया वहीं खड़ी है चुचपाप
संज्ञा-सर्वनाम नंगे बदन
लेटे हैं रेत पर

हैरान है अखबारनवीस -
यह भाषा का कौन सा देश है
तभी अचानक
लोकप्रियता की रहस्यमयी धुन बजाते
अवतरित होता है
भाषा का नट
डुगडुगी बजाके
शुरू करता है तमाशा
सब दौड़े चले आते हैं
बनाके गोल घेरा
देख रहे अपलक
खेल रहा है भाषा का नट
उछाल रहा अक्षरों को
उपर-नीचे, दायें-बायें
तालियों से गूंज रहा चतुर्दिक
खुश है भाषा का नट.

बुधवार, 4 जनवरी 2017

नये साल का एक सुखद अहसास

नये साल पर मुझे कई बधाई संदेश मिले, मैंने भी कई लोगों को 'हैप्पी न्यू इयर' का मैसेज भेजा. स्मार्टफोन आने के बाद किसी भी खास अवसर पर शुभकामनाएं देना अब बड़ा ही सहज काम हो गया है. चिट्ठी पत्री, ग्रीटिंग्स कार्ड और तो और फोन कॉल करने से भी छुटकारा. एक ही मैसेज सबको फॉरवर्ड करो और काम खत्म. स्मार्टफोन युग से पहले इतने लोगों को शायद ही कभी शुभकामनाएं भेजे जाने का चलन रहा हो! टेक्नोलॉजी ने हमें औपचारिक तो बनाया पर हमसे हमारी असली वाली फिलिंग्स छिन ली. कोई चित्र, विडियो क्लीप, कोई साधारण सा मैसेज, कोई ऑडियो क्लीप जो अमूनन कहीं से आया होता है उसे ही हम फॉरवर्ड करके अपनी औपचारिकता पूरी कर लेते हैं पर कुछ सालों पहले तक ऐसा नहीं था. हम बाकायदा फोन कॉल करके शुभकामना देते थे, भले ही वह कुछ चुनिंदा लोग हों पर अब किसी को कॉल करके 'हैप्पी न्यू इयर' बोलना अजीब लगता है, उसे कैसे लगेगा? यह सोचने के बजाय हम खुद ही इसे एक निकृष्ट कार्य मान कर इससे मुक्ति पा लेते हैं.
सामान्यत: मैं भी इसी का आदी हो गया हूं. सुबह का इंतजार कौन करे, 31 दिसंबर की रात 12 बजे से ही सभी को मैसेज करना शुरू कर दिया (सूची लंबी जो थी). इस बीच कुछ नये लोगों के भी मैसेज आते रहे, उनको भी यथायोग्य जवाबी बधाई संदेश की प्रक्रिया चलती रही. शाम होते-होते मैं निश्चिंत हो चुका था कि चलो यह रस्म भी पूरी हो गई. तभी अचानक हरिवंश सर का फोन कॉल आया. हालांकि निजी तौर पर मेरे लिए यह खुश होने की बात थी पर मैं चौक गया. क्योंकि यह अनप्रीडेक्टिबल था. मेरे हेलो कहते ही दूसरी तरफ से 'हैप्पी न्यू इयर अखिलेश' सुनायी पड़ा. मैंने भी उन्हें नये वर्ष की बधाई दी फिर सामान्य शिष्टाचार के तहत दूसरी बातें भी हुईं, पर यह पहली दफा था जब मैं उनसे बातचीत करते हुए खुद को असहज महसूस कर रहा था. मैं ग्लानि महसूस कर रहा था. मुझे लग रहा था कि किसी ने मेरी चोरी पकड़ ली हो. मैं कोई अपराध करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया हूं!
इस बातचीत के कई घंटे हो चुके हैं पर अभी तक उनकी बातें मेरे कानों में गूंज रही है. 'खुश रहो! अच्छा लगा, तुमसे बात करके.' तब से यही सोच रहा हूं - काश! यह फोन उन्हें मैंने ही कर लिया होता. पर क्या मैं उतना ही सहज हो पाता, जितना वे थे?
पीढ़ियों का अंतर कई बार हमें कई महत्वपूर्ण कामों से पीछे धकेल देता है. हम यंत्रवत खड़े रह जाते हैं और वक्त आगे निकल चुका होता है. क्या यह सच नहीं कि मैसेजिंग में वह फिलिंग्स नहीं जो लाइव बातचीत में है. पर यह फिलिंग्स पीढियों में उत्तरोत्तर कम होता जा रहा है. आज के बच्चे मम्मी-डैडी से भी फोन कॉल के बजाय वाट्सएप, एसएमएस पर ही सहज होते हैं. घर से दूर रहने वाले बच्चे सुबह एक मैसेज मम्मी-डैडी को करके दिनभर की छुट्टी पा जाते हैं, पर बड़े-बुजुर्गों का मन तो बिना आवाज सुने भरता नहीं है.
सलाम है उनकी इन आदतों को. शायद हम नयी पीढ़ी को उनकी इन आदतों ने ही बचाया हुआ है. तभी तो हम अपने अभिभावकों को फोन करें न करें उनके फोन आने पर खुशी जरूर महसूस करते हैं. कभी-कभी अफसोस और ग्लानि भी कि कॉल हमने क्यों नहीं किया? इतनी भी फिलिंग्स बची रहे तो, बची रहेंगी पीढ़ियां, बचे रहेंगे रिश्ते, प्रेम, समाज और हम.

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

सहा भी नहीं जाता, रहा भी नहीं जाता

सच कहिये तो इ राजनीति भी ससुरी बड़ी टूच्ची चीज है. सहा भी नहीं जाता, रहा भी नहीं जाता. लोकतंत्रवासी जानबूझ के मक्खी निगलने के आदी हो चुके हैं. निकम्मे नेताओं को खुद ही वोट देते हैं और फिर पांच बरिस तक गाली देते रहते हैं. अरे, नेता लोगन पर गोसाने से क्या फायदा? उ काहे काम करेगा, संसद हो या बाहर. ओके मरजी, नहीं करेगा काम. किसके डर से करेगा काम. न लोग (जनता) का डर है लोक (संसद) का. सत्ता पक्ष बरजोरी कर रहा और विपक्ष जोकरई. संसद में भूकंप न आ जाये इस डर से राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अकेले में मिलते हैं. पर उ कहे या बताये क्या? मालूम नहीं चल पाता. इ तो गजबे हो गया भईया! दुनिया में एह से बढ़कर अचरज और का होवेगा कि संगीन आरोप लगावे के डूगडूगी पीटे वाला आदमी आरोपी के कान में बुदबुदा के हंसत-खेलत घर आ गवा. असल भूकंप त एही है! अब आप अगर अइसा सोचते हैं कि काम नहीं तो पइसा नहीं (संसद के शीतकालीन सत्र में एक भी दिन काम नहीं हुआ तो सांसदों को उतने दिन का वेतन नहीं मिलना चाहिये) तो सोचते रहिये. किसने मना किया है. टाइम तो आखिर आप ही के पास है. उन लोगन जइसन आप बिजी थोड़ी न हैं! 

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

रोया नहीं एक बार भी

जिंदगी का बोझ उठाया न गया तो
लाश ही कंधे पर उठा ली उसने
सब सोच रहे-
कठकरेजी होगा वह
रोया नहीं एक बार भी
बीवी के मरने पर रोना तो चाहिये था
कैसे रोता वह-
बीवी तो बाद में मरी
मर गयी थी इंसानियत पहले ही
उसके लिए
कैसे रोता वह-
बिटिया जो साथ थी उसके
सयानी सी
उम्र और मन दोनों से
कैसे रोता वह-
दिखावा थोड़े न करना था उसे
मुआवजा थोड़ी न मांगनी थी उसे
शिकायत थोड़ी न करनी थी उसे
कैसे रोता वह
क्यों रोता वह-
जब बीवी ही मर गयी
जब खो दिया उसने आधी जिंदगी
जब जीना ही है बिटिया के लिए
दीना मांझी नहीं, इंद्रजीत है वह
सीख लिया है उसने
कैसे लड़ी जाती है अपनी लड़ाई
दुनियावी बेहयाई को नजरअंदाज करके.

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

घर से भागी हुई लड़कियां

फिल्मकार आनंद एल राय की एक फिल्म आ रही है हैप्पी भाग जाएगी. दर्शकों की रोचकता बढ़ाने के लिए इन दिनों सोशल मीडिया पर रोज नये-नये पोस्टर व फिल्म का टीजर रिलीज किया जा रहा है. जैसा कि फिल्म के टाइटल से ही जाहिर है कि यह फिल्म नायिका के भागने के कथानक पर आधारित है. बॉलीवुड में पहले भी नायिकाओं के भाग जाने पर कई फिल्में बन चुकी हैं. पता नहीं हैप्पी भाग जाएगी में नया क्या है? इसके लिए तो हमें फिल्म के रिलीज होने तक की प्रतीक्षा करनी ही पड़ेगी. पर, यहां बात लड़कियों के भागने के मुद्दे पर.
हर दिन न जाने कितनी हैप्पी भागती है. वह भागती है हैप्पीनेस को पाने के लिए, हैप्पीनेस ढूंढने के लिए, हैप्पीनेस को जीने के लिए, हैप्पीनेस को जानने के लिए. कुछ को मिल जाता है, कई को नहीं मिलता. लड़कियों का भागना हमारे समाज में नयी घटना नहीं है. फिर भी जाने क्यों हर बार इस पर बात उतनी ही शिद्दत से होती है. लेखक, पत्रकार, फिल्मकार, समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी सब के सब हर बार इस मुद्दे पर बात ऐसे करते हैं जैसे कुछ नया या पहली बार हो रहा है. हर दिन के समाचार पत्रों में किसी न किसी लड़की के भाग जाने की खबर जरूर होती है. बल्कि उसके मुकाबले लड़कों के भाग जाने की खबर उतनी नहीं होती. शायद इसलिए क्योंकि घरवाले लड़कों के मुकाबले लड़कियों के भागने पर चिंतित ज्यादा होते हैं. इस वक्त मुझे जाने-माने कवि आलोक धन्वा की मशहूर कविता भागी हुई लड़कियां की कुछ पंक्तियां स्मरण हो रही है-
अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा
कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है.
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कितनी-कितनी लड़कियां
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे अपनी डायरी में
सचमुच की भागी लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है.
वैसे तो भागना एक क्रिया है पर कई बार परिस्थतियोंवश यह कर्म भी बन जाता है. जब कोई लड़की भागती है, लोग उसके कारणों पर कभी नहीं सोचते. सीधे लांछन लगाते हैं उसके चरित्र पर. बिना यह जाने कि जब कोई लड़का भागता है तो हम ऐसा ही क्यों नहीं सोचते. हम आधुनिकता का चाहे जितना भी लबादा ओढ़ लें वैचारिक दरिद्रता हमारा दामन नहीं छोड़ती. क्योंकि पुरुषवादी समाज की सोच ओढ़ते-पहनते हैं हम. यह हमें विरासत में ही मिलता है. सच तो यह है कि किसी भी लड़की के लिए घर से भागने का निर्णय आसान नहीं होता. बार-बार सोचना और काफी कुछ छोड़ना पड़ता है. बावजूद इसके अगर वह भागती है तो सामान्य तौर पर यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि किन कठिन परिस्थितियों में यह निर्णय उसने लिया होगा. तो फिर क्यों घर से भागी हुई लड़कियों के प्रति लोगों की सोच बदल जाती है?
क्या मां-बाप को भूल जाती हैं घर से भागी हुई लड़कियां. या भूल जाती हैं वह भाई की कलाई पर बांधी हुई राखी को. मां के आंचल में छिपकर सुबकना भी नहीं भूलती घर से भागी हुई लड़कियां. देवता-पितर के आगे सिर नवाना भी याद रहता है उन्हें. घर से भागी हुई लड़कियां नहीं भूलतीं रूमाल पर टांकना गुलाब का फूल जिसे सिखाया था मां ने. यकीन मानिये, बूरी नहीं होतीं घर से भागी हुई लड़कियां. बूरा तो हमारा समाज है, जो लड़कियों के भागने पर हौआ खड़ा कर देता है. इस सहज बात को भी इतना जटिल बना दिया जाता है कि घर से भागी हुई किसी लड़की के लिए उसके घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं. जबकि किसी भागे हुए लड़के के लौटने पर ऐसा नहीं होता.
लड़कियां भागती क्यों हैं, इसपर चिंता करना जरूरी तो है पर उससे भी जरूरी यह है कि हम एक ऐसे समाज व परिवार का निर्माण करें कि कभी किसी लड़की को भागना नहीं पड़े. और अगर भागना भी पड़े तो घर वापस लौटने के बारे में सोचना नहीं पड़े. अगर ऐसा हो पाया तो कभी कोई लड़की नहीं भागेगी. भागेगी क्यों, अपनों से भी भागता है कोई भला...?

रविवार, 3 जुलाई 2016

यादों की तितलियां

मीडिया की नौकरी में अमूमन इतवार नहीं होता. यह दिन भी सामान्य दिनों की तरह ही होता है. फिर भी जाने क्यों, इतवार आते ही खुद पर एतबार बढ़ जाता है. इसलिए मेरे लिए इतवार का दिन एतबार का दिन होता है. आशी (बेटी) को स्कूल नहीं जाना होता, सो मेरे इस पूरे एक दिन पर जैसे वह अपना हक मानती है. न खेलकूद, न पढ़ाई. हर वक्त मेरे आसपास तितली की तरह उड़ती-मंडराती रहती है. आज सुबह से हो रही अनवरत बारिश के बीच अलसायी सुबह कब बीत गयी थी और दोपहर सिर पर कब आ गया पता ही नहीं चला. प्याज के पकौड़े और चाय की चुस्कियों के बीच अचानक माहौल नॉस्टैल्जिक हो गया. एक फोटो एलबम को पलटते हुए आशी बार-बार कभी हम दोनों तो कभी उस एलबम के फोटो को देख रही थी.
उसने अपनी मम्मी से कहा-
तुम पहले कितनी सुंदर थी न.
सब चुप थे...
थोड़ी देर बाद...
पापा, तुम पहले अजीब लगते थे...!
अब अच्छे लगते हो.
मैंने कहा- मतलब?
देखो, कहते हुए उसने एलबम मुझे दे दिया. दरअसल, वो जो एलबम देख रही थी, उसमें मेरे कॉलेज के समय की तसवीरें थीं. कुछ शादी के तुरंत बाद की भी. एलबम पलटते हुए मैं भी पुरानी यादों में खो गया. बाहर बारिश हो रही थी. कभी धीमी, कभी तेज. रंग-बिरंगी तितलियों का एक समुह खिड़की के रास्ते कमरे में दाखिल हो चुका था. आशी तितलियों को पकड़ने की चेष्टा में मग्न हो गयी.

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

पानी उदास है

नानी के बिना कहानी उदास है
रोजगार के बिना जवानी उदास है
टूट गये सपने, उम्मीदें उदास है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है

गंगा में चाहे डूबकी लगाओ
महाकुंभ में जाकर जितना नहाओ
रो रही धरती, सुबकता आकाश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है

छिज गया भरोसा हमारा-तुम्हारा
परहित की बातें नहीं हैं गंवारा
पॉलिटिक्स हुई डर्टी, न कोई आश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है

सुखे जलाशय, सुख रही नदियां
पैसों की भूखी है ये देश-दुनिया
क्रिकेट में हो रहा पानी का नाश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है.