सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

पति बनने से पहले करोड़पति बनना जरूरी

मेरे एक अविवाहित मित्र हैं. उन्हें देख कर मुङो खुद पर बड़ी कोफ्त होती है. उनसे जब भी शादी की बात करो, तो बोलते हैं,‘‘अभी तैयारी कर रहा हूं.’’ एक दिन मैंने उनसे पूछ ही लिया. मित्र आखिर इतने वर्षो से आप तैयारी ही कर रहे हो, आखिर यह ‘तैयारी’ है क्या? बोले,‘‘महंगाई का जमाना है. गृहस्थी जमाने के लिए पैसे इकट्ठे कर रहा हूं. पति बनने से पहले करोड़पति तो बन जाऊं.’’ मैं सोच में पड़ गया कि कितना मूर्ख हूं, बिना करोड़पति बने ही पति बन गया. नतीजा सामने है. आटा-दाल के भाव की रोज-रोज की चिंता में सिर के बाल उड़ गये.

अभी इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि टीवी पर बिग बी का बहुचर्चित शो कौन बनेगा करोड़पति शुरू हो गया. पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर इस कार्यक्रम के धुआंधार प्रचार का मेरी श्रीमती जी पर भयानक असर हुआ है. एक दिन देखा कि जनरल नॉलेज की ढेर सारी पुस्तकें खरीद कर ले आयी हैं. सुबह-शाम जब देखो उसी में डूबी रहती हैं. अक्सर घर के कोने में पड़ा रहनेवाला उपेक्षित अखबार भी उनको भाने लगा. मुङो घोर अचरज हुआ. यह चमत्कार हुआ कैसे? लेकिन यह बदलाव अच्छा भी लगा. सोचा, छोड़ो कम से कम पढ़ने में रुचि तो हुई, वरना पहले तो हमेशा सास-बहू वाले टीवी सीरियल में आंखें गड़ाये रहती थीं.

उस दिन मेरा साप्ताहिक अवकाश था. सुबह के नौ बज रहे होंगे. मेरी बेटी ने मुङो जगाते हुए पूछा, ‘‘हू इज प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया?’’ मैंने करवट बदलते हुए कहा, ‘‘मम्मी के पास जाओ.’’ पर वह डटी रही, बोली-‘‘नहीं पापा, आप ही बताओ.’’ मैंने कहा,‘‘डॉ मनमोहन सिंह.’’ बोली, ‘‘यू आर राइट़ अच्छा अब नेक्स्ट क्वेश्चन..’’ मैंने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ‘‘बेटा अभी जाओ, सोने दो.’’ खैर वह चली गयी, पर मेरी नींद गायब हो गयी. थोड़ी देर बाद मैं उठा और आदतन अखबार ढूंढ़ते हुए बालकनी में पहुंचा. इतने में दूसरे कमरे से श्रीमती जी अखबार लहराते हुए निकलीं और लाल-पीला होते हुए सवाल दागा,‘‘सलमान खान की हालिया रिलीज सुपर-डुपर हिट फिल्म टाइगर के डाइरेक्टर का नाम बताओ?’

मुङो झुंझलाहट हुई कि आज सुबह-सुबह मां-बेटी को आखिर हुआ क्या है. सवाल पर सवाल किये जा रही हैं. इतने में श्रीमती जी बरस पड़ीं,‘‘अखबार में नौकरी करने से जिंदगी नहीं चलने वाली. अपने पड़ोसी सिन्हा जी को देखो, कौन बनेगा करोड़पति से 27 लाख जीत कर लौटे हैं. आज से रोज सुबह चाय के साथ अखबार के बदले ये जनरल नॉलेज की किताबें पढ़ना शुरू कर दो. इस सीजन में बिग बी के सामने हॉट सीट पर तुम्हें बैठना ही होगा.’’ उस दिन से कोशिश जारी है, ‘करोड़पति’ बनने की. आप सभी की दुआ चाहिए.

रविवार, 9 सितंबर 2012

माई पापा इज माई एटीएम

माई पापा इज माई एटीएम.. बिष्टुपुर के कमानी सेंटर में एक हमउम्र युवक का हाथ पकड़ कर घूम रही युवती के टी-शर्ट पर यही लिखा था. सात वर्षीय मेरी बेटी ने उस स्लोगन को पढने के बाद मुस्कराते हुए मेरा ध्यान उसकी ओर आकृष्ट कराया तो मेरे चेहरे से मुस्कराहट गायब हो गई. पापा जो बचपन में हमारा ख्याल रखते हैं. पापा जो युवावस्था में हमें सही मार्ग दिखाते हैं और दुनिया से बचाते हैं. वही पापा एक दिन हमारे लिए ‘वस्तु’ हो जाते हैं. वस्तु, जी हां क्योंकि किसी वस्तु का ही हम उपयोग करते हैं. जिनसे हमें प्यार होता है, उनके लिए तो हमारे दिल में सम्मान और समर्पण की भावना होती है, लेकिन आधुनिकता की होड़ में शामिल युवा पीढी में मां-बाप को सिर्फ ‘वस्तु’ बनाने की होड़ है. मानसिकता सिर्फ पाने की, बदले में कुछ देने की नहीं. माई पापा इज माई एटीएम.. महज टी-शर्ट पर लिखा एक स्लोगन भर नहीं है. यह यंग जेनरेशन की सोच को प्रतिबिंबित करता एक वाक्य भी है जिसके गंभीर निहितार्थ हैं.

एक भयावह तथ्य से आपको वाकिफ कराता चलूं. केवल जमशेदपुर ही नहीं झारखंड व बिहार के दूसरे शहरों तथा कोलकाता के साथ-साथ दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई, पुणो, चेन्नई, कटक, भुवनेश्वर सब जगह युवाओं में आत्महत्या की प्रवृति में बेतहासा वृद्धि हो रही है. जमशेदपुर में तो महीने के तीसो दिन यानि, औसतन हर रोज आत्महत्या की कोई न कोई घटना जरू र होती है. कभी पॉकेटमनी के लिए, कभी खेलने से मना करने पर, कभी स्कूटी न खरीदने पर, कभी नये मोबाइल के लिए.. और न जाने कितने बेवजह कारण. हद तो यह कि मां-बाप की जरा-सी भी बात बरदाश्त नहीं होती. संवादहीनता का दायरा व्यापक होता जा रहा है. दोस्तों से फोन पर घंटों बातें करने में कोई गुरेज नहीं रखने वाले बच्चों को अपने अभिभावकों से बात करने में जाने कैसी हिचक होती है. हां, इनकी जिंदगी में सबसे अहम कोई चीज है तो वह है मनी (पैसा). पावर और पैसे के पीछे भाग रही यह पीढी रिश्ते-नाते सबको पीछे छोड़ती जा रही है. सोचा, आखिर यह दिशाभ्रम क्यों है? तभी टीवी पर आ रहे एक विज्ञापन का जिंगल मेरे कानों में गुंजने लगा- ‘हर एक फेंड्र जरू री होता है.’ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन आज खुशहाल जीवन के नुस्खे बांट रहे हैं, जिसकी कीमत एक निश्चित रकम से तय होती है. इन विज्ञापनों की कोशिश ‘पैसा बोलता है’ जैसे मुहावरे को जायज ठहराने के साथ उसे स्थापित करने की भी होती है. पैसे के बोलने का मतलब स्नेह, ममता, प्रेम जैसे शब्दों का बाजारीकरण है. क्या सचमूच हमारी जिंदगी में माता-पिता, दादा-दादी, भैया-दीदी, चाचा-चाची के लिए कोई स्थान नहीं रहा. यह क्षरण हमें कहां ले जाएगा?  क्या 'पिज्जा'  हमें ‘पकवान’ से दूर करता जा रहा है?

रविवार, 12 अगस्त 2012

अब, प्रकाशित करें अपनी प्रेम कहानी

क्या आप कोई कहानी लिखने की सोच रहे हैं, और वह भी प्रेम कहानी? बिल्कुल लिखिये क्योंकि इसे आप आसानी से प्रकाशित करा सकते हैं. अपनी प्रेम कहानी प्रकाशित कराने के लिए आपकी उम्र 18 साल या इससे अधिक होनी चाहिए. आपकी प्रेम कहानी गतिशील, प्रेरक, दिल को छू लेने वाली होनी चाहिए और वह भी कम से कम 3,000 शब्दों में.
पेंगुइन इंडिया एक स्पर्धा लव स्टोरीज दैट टच्ड माई हार्टआयोजित कर रहा है. पुरस्कार के लिए प्रविष्टियों का चयन कैन लव हैप्पन ट्वाइजके बेस्टसेलिंग लेखक रविन्दर सिह और पेंगुइन के संपादक करेंगे. पुरस्कृत कहानियां संकलन के तौर पर दिसंबर तक प्रकाशित की जाएंगी. पेंगुइन बुक्स इंडिया की वरिष्ठ संपादक वैशाली माथुर ने प्रेस ट्रस्ट से कहा ‘‘हम इस स्पर्धा के माध्यम से नए लेखकों की खोज की संभावना से रोमांचित हैं. यह स्पर्धा नए लेखकों के लिए अपनी रचनाएं प्रकाशित कराने का अच्छा मौका है.’’ (भाषा)

शनिवार, 11 अगस्त 2012

यशप्रार्थियों के लिए अनुकरणीय हैं राधे मां

धन के साथ नाम भी हो, ऐसी ख्वाहिश अमूमन हर शख्स पालता है. ‘नाम’ और ‘नामा’ एकसाथ बहुसंख्य लोगों की किस्मत में नहीं होते. कुछ ताउम्र धन कमाने में ही संलग्न रहते हैं, नाम कमाने की उनमें इच्छा ही नहीं होती. कुछ भद्रजन केवल नाम ही कमाना चाहते हैं. खुद नाम न पैदा कर सके तो पैदा किए हुए से उम्मीद पालते हैं- मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राजदुलारा. शोहरत जब बुलंदियों को छूती है, तो आदमी को लगता है कि उसका जीवन सार्थक हुआ. गली की प्रधानी से लेकर देश की प्रधानी के पीछे यही दीवानगी है. कवि-लेखक नाम चमकाने के चक्कर में मसि-कागद के सिलबट्टे पर अक्ल घिसते हैं. हालांकि टन भर अक्ल खर्च करने के बाद यह नाचीज प्राणी छटांक भर इज्जत ही अर्जित कर पाता है. वह भी जरूरी नहीं कि जीते जी मिले. कइयों का नंबर मरणोपरांत आता है. आजीवन कहीं न छप पाने के क्षोभ में कई कवि/लेखक बाद के दिनों में प्रकाशक बन गये. इन्होंने नाम और नामा का महत्व समझा और छपने की खुजली से त्रस्त कई नामचीनों को दाम लेकर नाम दिया.

हाल के वर्षो में कुछ चेहरों ने जिस तरह से नाम ‘कमाया’ है, वह अनुकरणीय हो या न हो, ‘स्मरणीय’ अवश्य है. इनमें मॉडल पूनम पांडेय, पोर्न स्टार सनी लियोनी, निर्मल बाबा और अध्यात्म जगत की नयी सनसनी राधे मां का नाम उल्लेखनीय है. वास्तविकता तो यह है कि एक खास तबका इन नये अवतारों का सर्वाधिक मुखर प्रशंसक और समर्थक है. वैसे भी इस उम्रवालों को ‘मन-मन भावे मुड़िया हिलावे’ वाली डिप्लोमेसी आती ही नहीं.

दरअसल, राधे मां ने ख्याति का वो शार्टकट अपनाया है, जहां कामयाबी के गंतव्य तक पहुंचना असंदिग्ध और न्यूनतम जोखिम से भरा होता है. वह इस रास्ते की न तो निर्माता हैं, न कोलंबस सरीखी अन्वेषक ही. यह शार्टकट तो सदियों से वहीं का वहीं है बस इसे अब एक नाम मिल गया है. इतिहास गवाह है कि हर युग में समाज दुस्साहसियों की तीव्र आलोचना और विरोध के साथ सराहना और अनुसरण भी करता आया है. समय चाहे जितना बदल चुका हो, राधे मां को चाहने और दुत्कारने वाले दोनों हैं. राधे मां के ‘आइ लव यू फ्रॉम द बॉटम ऑफ माइ हार्ट’ जैसे जुमलों पर अमेरिका से लेकर अमृतसर तक और मुंबई से लेकर मुरी तक के ‘भक्त’ जान छिड़क रहे हैं.

राधे मां महामंडलेश्वर रहें या ना रहें, इससे उनके चहेतों को कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं है. यकीनन उनके चाहने वालों का बहुमत उनके साथ है. पूनम पांडेय और राधे मां सरीखे नाम कमानेवाले यशस्वियों को आप सराहें या कोसें, पर भुला नहीं पायेंगे. वह अनेक संघर्षरत यशप्रार्थियों के लिए प्रेरणादायक हैं और अनुकरणीय भी!

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

खाली ‘तरकश’ से मेडल नहीं मिला करते

ओलिंपिक के लिए जाने से पहले से भारतीय तीरंदाजों को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे. पर वे उन्हें हकीकत में बदलने में पूरी तरह नाकाम रहे. इससे ज्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है कि जिन स्टार खिलाड़ियों से गोल्ड की उम्मीद की जा रही थी, वे क्वालिफाई करने में भी नाकाम रहे. हमारे खिलाड़ियों के लिए जब खेल से ज्यादा अपने हित महत्वपूर्ण होने लगें, जिम्मेदारी व अनुशासन का कोई दायरा उन्हें बांध न सके, तो फिर भला जीत की उम्मीद कैसे की जा सकती है? जीत मिल गई, तो अपनी ताकत की वजह से कम, सामने वाले की कमजोरी से अधिक.

अतिआत्मविश्वास ने डूबोया

भारतीय तीरंदाजी टीम ने लंदन ओलिंपिक में करोड़ों खेल प्रेमियों को जिस तरह से निराशा किया है वह निंदनीय है. क्वालिफाइंग राउंड से ही खासकर महिला तीरंदाजों में न तो एकाग्रता नजर आई और न ही वह कूबत जिसकी उम्मीद भारतवासी कर रहे थे. हमारे सभी
धुरंधरतीरंदाज अपने प्रतिद्वंदियों के सामने ढेर होते नजर आए. सबसे ज्यादा निराश किया महिला तीरंदाजों ने. उसमें भी लोग दीपिका से कुछ ज्यादा ही दुखी हैं, क्योंकि वह तो दुनिया की नंबर एक तीरंदाज हैं. यह खिताब ओलिंपिक में जाने से कुछ दिन पूर्व ही उन्हें हासिल हुआ था. अफसोस कि दीपिका ने उसकी गरिमा को बरकरार नहीं रखा. आत्मविश्वास तो ठीक है, लेकिन अतिआत्मविश्वास ने दीपिका को डूबो दिया. ओलिंपिक के लिए रवाना होने से पूर्व दीपिका ने कहा था ओलिंपिक कोई भूत नहीं है, जिससे डर लगेगा.अब शायद उन्हें यह अहसास भली भांति हो गया होगा कि ओलिंपिक क्या बला है. जीत का दंभ भरने और जीतने में फर्क भी उन्हें मालूम हो गया होगा. उन्हें यह भी मालूम हो गया होगा कि ओलिंपिक का मेडल पाने के लिए लक्ष्य भेदना पड़ता है सही निशाना लगाना पड़ता है. इसके लिए तीरंदाज के तरकश में कैसा तीरहोना चाहिए. भारतीय तीरंदाजों का तरकशतो खाली था, उन्हें भला मेडल कैसे मिलता? यह सवाल वे जब खुद से करेंगे तो इसका जवाब उन्हें खुद-ब-खुद मिल जाएगा कि क्या उनके तरकश में संकल्प का तीर था, मनोबल का तीर था, एकाग्रता का तीर था, जोश का तीर था. जवाब है नहीं.

ले डूबा अहंकार

काश, भारतीय खिलाड़ी थोड़ा और ज्यादा प्रेशर ङोलने का माद्दा रखते, तो आज ओलिंपिक मेडल लिस्ट में भारत के नाम के आगे लिखे मेडल की संख्या कुछ ज्यादा होती. काश, हमारे तीरंदाज अपनी अभ्यास को और धार देते और एकाग्रता को बनाये रखते तो आज कुछ और बात होती.

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

बिना पिये ही रूठ गये पिया, मनाऊं कैसे?

नंबर दो के भी अपने मजे हैं गुरु. कई लोग बिजनेस में ईमानदारी की रेजगारी से कंगाल होते-होते होश में आये और तुरंत नंबर दो का धंधा अपनाया तो आज करोड़ों में खेल रहे हैं. नंबर एक आदमी हमेशा सही-गलत के फेर में फंसा रहता है और तरक्की की सीढ़ियां चढने से पहले ही लुढ़क जाता है. आज के जमाने में ‘नंबर दो’ की क्या हैसियत यह किसी से छिपी नहीं है. थाने से लेकर दिल्ली में सत्ता के गलियारों तक की उन्हीं की चलती है.

खैर नंबर दो की महिमा अपनी जगह, मैं तो इस बात से हैरान हूं कि एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार भला क्यों ‘नंबर दो’ का ओहदा चाहते हैं? वह तो केंद्र सरकार में ‘नंबरी आदमी’ हैं. दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक उनकी खासी पूछ है. दरअसल, नेताओं को रूठ जाने की बीमारी होती है. कभी बहाने से, तो कभी बिना बहाने के रूठ जाते हैं. किसी को पार्टी में पदाधिकारी बना दिया जाये तो मुंह फुला लेते हैं. जैसे परिवार में शादी के कथित शुभ अवसर पर फूफा और जीजा ऐन घुड़चढ़ी के अवसर पर रूठ जाते हैं. जीजा रूठे तो थोड़ा जंचता भी है, पर फूफा? घरवाले तो घरवाले, दूल्हा भी जीजू को मनाने में लग जाता है. बारातें अक्सर रूठों को मनाने के चक्कर में रेलगाड़ियों की तरह घंटा दो-घंटे लेट हो जाती हैं. कुछ नेता तो रूठने के मामले में पत्नियों को भी पीछे छोड़ देते हैं. न उनकी मांगें कभी खत्म होती हैं और न उनके रूठने का सिलसिला. वैसे, कई बार तो पिया लोग बिन पिये ही रूठ जाते हैं. तब नारी के लिए प्रॉब्लम हो जाती है कि रूठे-रूठे पिया, मनाऊं कैसे? बाकी मुल्कों का तो पता नहीं, अपने मुल्क में प्रेयसी-पत्नी को मनाने के लिए गहने-लत्तों की दुकानें बेहद सहायक सिद्ध हुई हैं. कुछ महीने पहले स्वर्णकार हड़ताल पर चले गए थे. परिणास्वरूप तलाक के मामलों में खासा इजाफा हो गया था.

पुरानी बात क्यों, रूठने की ताजा घटना बताता हूं. अपने एशिया संस्करण में भारतीय प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की तस्वीर मुखपृष्ठ पर देते हुए टाइम पत्रिका ने शीर्षक दिया ‘द अंडरअचीवर’. सरकार के निंदक, योग से राजनीति में कूदे बाबा रामदेव ने इसका हिंदी अनुवाद फिसड्डी के रूप में किया है और अब मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा इस विशेषण को ही प्रसारित-प्रकाशित किया जा रहा है. फिसड्डी एक नकारात्मक भाव वाला शब्द है, जिसका अभिप्राय पिछड़ जाने से है. कक्षा में कुछ छात्र होशियार होते हैं, कुछ फिसड्डी. खेल में कोई विजेता होता है, कोई फिसड्डी. अंडरअचीवर का अगर थोड़ा सुसंस्कृत भाषा में अनुवाद किया जाता, तो इसे ‘उपलब्धिहीन’ कहा जा सकता है, अर्थात् जिसकी उपलिब्धयां कम हों. पर क्या कहें, अर्थ लगानेवाला तो अपने ‘दिमाग’ का इस्तेमाल करता है. जब से यह प्रकरण हुआ है, तब से कुछ लोगों का मुंह भी फूला हुआ है. मुङो तो लगता है यह ‘नमी’ का असर है.

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

पापा जल्दी मत आना

रांची से टाटा आ रही एसी बस में यात्र कर रहा एक लड़का और एक लड़की एक-दूसरे के इतने करीब हैं कि उनकी सांस एक-दूसरे से टकरा रही है. आजू-बाजू के लोगों की नज़रें उन पर गड़ी हैं. पर वे बिल्कुल जमाने से बेपरवाह. चांडिल आ चुका है, तभी लड़की का मोबाइल बज उठता है. ‘पापा हैं’, युवती युवक से कहती है. ‘जी पापा, बस अभी-अभी खुली है. आप बस स्टैंड आराम से मुङो लेने आना.’ लोग आश्चर्य से उसे देखते हैं. उसने अपने पापा से झूठ बोला है. वह जमशेदपुर के इतने करीब पहुंच चुकी है और खुद को रांची में बता रही है. युवक, ‘तुमने पापा को अच्छा उल्लू बनाया.’ लड़की मुस्कुराती है.

यह महज एक वाकया नहीं बल्कि भविष्य का वह डरावना सच है जिसे स्वीकार करते हुए हमें हिचकिचाहट हो सकती है. क्योंकि हर पिता सिर्फ और सिर्फ यही सुनने का आदी है ‘पापा जल्दी आना.’ और नयी पीढी की यह सोच - पापा जल्दी मत आना..यहां तुमसे भी जरूरी कोई है. जिसके साथ मैं अधिक से अधिक समय गुजारना चाहती/चाहता हूं. तुम बाद में भी आओगे तो फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन उसके साथ एक-एक पल कीमती है. पापा तुम सचमुच जल्दी मत आना..

आप मानिये या न मानिये समाज बहुत आगे निकल चुका है. आज पांच बरस के बच्चे को भी गले लगाते हुए डर लगता है. एक शिक्षक ने बताया ‘क्लासरूम में बच्चियां कहती हैं कि आप हमें बेटा क्यों कहते हैं सर.’ रिश्ते असहज हो रहे हैं. समय से पहले फल पक जाए तो स्वाद और सेहत दोनों ही पैमाने पर खरा नहीं उतरता. योग की कक्षाओं के लिए बहस भले न छिड़े, लेकिन यौन शिक्षा पर खुद को बुद्धिजीवी समझने वाला हर व्यक्ति इसकी पैरवी करता नजर आता है. इस पक्षधरता से वह अपने-आप को अभिजात्य और अधिक समझदार होने का दंभ भर सकता है.

आप कागज पर कानून बनाते रहिए और समाज की बखिया उघेड़ते रहिए. नतीजा वही होगा जो सामने है. ऊंचाई पर चढना और वहां अड़ना बहुत मुश्किल है. आसान है वहां से गिरना. यह समाज जिस रास्ते चल पड़ा है, उससे आगे का रास्ता भले चमकीला दिख रहा हो, लेकिन यह अंधेरे से पहले की चमक है. बहुत-से बुद्धिविलासियों को यह बात निगलने में मुश्किल होगी, लेकिन यह सच है. अब नानी-दादी की कहानियों का संबल नहीं है. चाचा-मामा तो अतिथियों की सूची में आ गए हैं. कौन संभालेगा इस टूटते-दरकते और बिखरते परिवार को, जो एक खोखले होते समाज की सबसे छोटी इकाई है! जब बचपन ‘पालना घर’ में और बुढापा ‘वृद्धाश्रम’ में बीतने लगे तो सोचने का समय है. बाजार हमें इसलिए तोड़ रहा है क्योंकि उसके लिए हम केवल उपभोक्ता हैं.

बुधवार, 11 जुलाई 2012

नाखून बढ़ गये हैं, तो काटते क्यों नहीं?

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का सुप्रसिद्ध निबंध है- नाखून क्यों बढ़ते हैं. नाखून मनुष्य की आदिम हिंसक मनोवृत्ति का परिचायक है, जो बार-बार बढते हैं और आधुनिक मनुष्य उन्हें हर बार काट कर हिंसा से मुक्त होने और सभ्य बनने का प्रयत्न करता है. जीवन में ऐसी अनेक सामाजिक बुराइयों से आये दिन हमारा साबका पड़ता है. सभ्य समाज इनको नियंत्रित करने की कोशिश करता है. साधु-संत बुराइयों से दूर रहने के उपदेश देते हैं. सरकारें भी इन्हें रोकने के लिए कानून बनाती हैं. इसे एक तरह से नाखून काटना माना जा सकता है. बुराई को जड़ से खत्म करना तो संभव नहीं, लेकिन जो इनमें लिप्त होते हैं, वे समाज में प्रवाद माने जाते हैं.

इस लिहाज से यह दौर भयावह है. हम अपने चारों तरफ बड़े-बड़े नाखूनों को देख और महसूस कर सकते हैं. इस दौर में पल्लू के नीचे.., मुन्नी बदनाम हुई.. और शीला की जवानी.. जैसे गीत सिनेमा के परदे से उतर गलियों में गूंज रहे हैं. यहां नैतिकता की ठेकेदारी या संस्कृति की झंडाबरदारी का सवाल नहीं है. सवाल सामाजिक है. इस तरह के गीत, संवाद या दृश्य किस समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभा रहे हैं? क्या इन गीतों, संवादों और दृश्यों का समाज पर कोई असर नहीं पड़ता? अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किस समाज को गढ़ने की कोशिश की जा रही है? कौन-से आदर्श स्थापित किये जा रहे हैं?

चूंकि ‘पुरवइया’ से ज्यादा हमें ‘पछुआ’ पवन भाती है, इसलिए जो भी झोंका वहां से आता है, हमारे मन को खूब सुहाता है. शायद यह उन 200 बरसों का असर हो? हम कहां सोच पाते हैं कि झोंका अगर बवंडर बन गया? तो हमारी सारी जड़ें उखाड़ देगा. एक विज्ञापन के मुताबिक कोई विशेष शेविंग क्रीम चुंबन के लिए ही लगायी जाती है. अगर गौर किया हो तो एक विज्ञापन हम सबको चॉकलेट खाने की एक अनोखी कला सिखाता है. बात समझने में देर नहीं लगती कि हम क्या कहना और करना चाहते हैं. एक बिस्कुट का विज्ञापन पति को शंका में डाल देता है और वह भागता हुआ घर आता है.

एक से जी नहीं भरता, ये दिल मांगे मोर जैसे जुमले जब बच्चों और युवाओं के कानों में पड़ते हैं, तो उन्हें इनका अर्थ कोई नहीं समझाता, वे खुद समझ कर अपने तरीके से इसका प्रयोग शुरू कर देते हैं. सड़क पर चलती हर लड़की-औरत उन्हें ‘मुन्नी’ और ‘चमेली’ ही नजर आने लगती है. उसके बाद जो होता है, वह चैनलों और अखबारों के लिए दिन भर की खबर बन जाता है.

...और अंत में, स्व सुभाष दशोत्तर की कविता की ये पंक्तियां : हमारी हथेलियां, हमारे कलाइयों के भीतर चली गयी हैं, बाहर असंख्य सुविधाएं हैं, मगर हमारे पास, अब वो उंगलियां नहीं हैं, जिनसे बटन दबता है, ऐसे ही हमारे पांव, हमारी टांगों के भीतर चले गये हैं, अब हम वहां नहीं पहुंच पायेंगे, जहां पांव ले जाना चाहते थे.

शनिवार, 7 जुलाई 2012

बोल बच्चन उर्फ बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें

जिसका कद जितना ही बड़ा उसकी बात भी उतनी ही बड़ी. यानि, बड़े लोगों की बड़ी बातें. या यूं कहिये कि ‘बोल बच्चन.’ यह बोल बच्चन जितना ही रोचक, उतना ही मजेदार. पेश है पिछले 24 घंटे के बोल बच्चन की झलकियां :

हरफनमौला क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग की सुनिये ‘विश्वकप अकेले धौनी के खेलने से हासिल नहीं हुआ, इसमें पूरी टीम का योगदान है.’ अब भला इस हरियाणवी छोरे से कोई यह पूछे कि यह भी कोई कहने व बताने की बात है. यह तो सब जाने हैं.

बांग्लादेश की चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन की खुशी थोड़ी प्राइवेट किस्म की है ट्विट किया ‘अभी-अभी एक उपन्यास खत्म किया है. ऐसा महसूस हो रहा है, जैसा जी-स्पॉट आर्गेज्म हासिल करने पर होता है.’

क्रिकेटर रोहित शर्मा ने कहा ‘मैं टीम इंडिया में वापसी के बारे में नहीं सोच रहा.’ लो कर लो बात आपको लेने की सोच कौन रहा है?

ममता बनर्जी का ताजा बयान ‘देश में कायर और कमजोर नेताओं की बाढ आ गयी है.’ इस बयान का मकसद और मतलब तो दीदी ही जानें पर है यह बात सोलह आना सच. वैसे दीदी बोलती खरी-खरी हैं. चाहे वह अपने पार्टी के नेताओं के खिलाफ हो या फिर केंद्र सरकार के. हालांकि एक मुद्दे पर उनके बोलने का इंतजार पूरे देश की जनता कर रही है. वह मुद्दा है राष्ट्रपति चुनाव. लोग यह जानने को बेताब हैं कि आखिर दीदी की ममता किस पर बरसेगी. एक तरफ प्रणब मुखर्जी खेमा दिनरात एक किये हुए है तो दूसरी तरफ पीए संगमा को दीदी पर पूरा भरोसा है. पर पब्लिक पसोपेस में है. उसे समझ में नहीं आ रहा दीदी क्या करने वाली हैं. उड़ते-उड़ते तो खबर यह भी आ रही है कि राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार मन माफिक तय करवाने में नाकाम रही ममता इस जुगाड़ में हैं कि मुलायम के साथ मिल कर उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अपनी पसंद का खड़ा करवा सकें.

उधर, प्रणब दा को कांग्रेस की तरफ से राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाये जाने को मजाक बताते हुए भाजपा ने कहा ‘प्रणब को राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार बना कर कांग्रेस ने उन्हें कोई इनाम नहीं दिया है बल्कि उनसे मुक्ति पा ली है. प्रणब वित्तीय प्रबंधन के मामले में पार्टी पर बोझ बन गये थे.’

लालू यादव ने भाजपा-जदयू गठबंधन पर चुटकी ली ‘घबराओ मत, मौका मिलेगा, डाइवोर्स होने ही वाला है.’ जदयू भी कहां चुप रहनेवाला था. आगामी चुनाव में राजद की तरफ से 50 प्रतिशत टिकट युवाओं को देने के लालू प्रसाद के बयान पर पलटवार किया ‘पुत्रमोह में युवाओं की बात कर रहे हैं लालू.’

और बिग बी यानि अमिताभ बच्चन की सुनिये ‘हम मिसाइल लांच करने में तो कामयाब हो जाते हैं पर एक बच्ची को बोरवेल से निकालने में नाकामयाब.’ सच्ची बात है मिस्टर बच्चन पर मशीन और इंसान में अंतर तो आपको मालूम ही होगा.

और अंत में मार्क ट्वेन के बोल बच्चन ‘अगर आप भूख से मरते एक कुते को उठा लाइये और उसका पालन-पोषण कीजिये तो वह आपको नहीं काटेगा. आदमी और कुत्ते में यही अंतर है. ’

गुरुवार, 28 जून 2012

महंगाई की तपिश और मॉनसून के नखरे

महंगाई की तपिश में मानसून नखरे दिखा रहा है. नल में पानी नहीं है. बीज और उर्वरकों में बेतहासा मूल्यवृद्धि के बाद उदासीन हो चुके किसानों के खाली खेतों में घोटाले की घास उग आयी है. बाजार में बिक रहा ‘आम’ लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा है. बेइमानी की पानी से जला हुआ आदमी लस्सी भी फुंक-फुंक कर पी रहा है. यह बड़ा ही भयावह दौर है.
100 दिन में महंगाई को ‘मटियामेट’ कर द...ेने का दावा करने वाली सरकार आज कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं है. एक आंकड़ा देखिये- तब डीएपी 520 रुपये प्रति बोरी था आज 1000 रुपये है, पेट्रोल 49 रुपये प्रति लीटर से 79 रुपये और दाल 58 से 100 रुपये प्रति किलो बिक रहा है. अनाज के दाम भी अगर इसी रफ्तार में बढते रहे तो अभी हम बीन कर खाते हैं, आगे गिनकर खाना पड़ेगा. समझ में नहीं आ रहा इसके लिए सरकार दोषी है या पब्लिक? हर आदमी ‘आम’ हो गया है और परेशानियों से ‘पक’ गया है.
अभी कल की ही बात है. सब्जी मार्केट से लौटने के बाद श्रीमती जी का चेहरा लाल हुआ पड़ा था. सहमते हुए मैंने पूछा ‘क्या हुआ ‘भाग्यवान’? चेहरे पर गरमी का असर है या गरमी ही है.’ बोलीं- आप तो चुप ही रहिये. महंगाई का किस्सा अखबार में छाप-छाप के सबका दिमाग खराब कर रखा है. सब्जियों के दाम में आग लगी है, रिक्शे वाला 10 के बजाय 20 रुपये मांग रहा है. कहता है- मैडम, आपको पता नहीं क्या पेट्रोल का दाम बढ गया है. अब भला पेट्रोल के दाम बढने से रिक्शे का भाड़ा बढाने का क्या औचित्य?’ मन तो हुआ कि रिक्शे वाले के बचाव में दो शब्द कहूं पर श्रीमती जी के ‘शब्दबाण’ की डर से मेरी बात मेरे हलक में ही सूख गयी. मैंने एक गिलास ठंडा पानी उनकी खिदमत में पेश किया और बोला- छोड़ो जाने दो. पानी गला से जैसे-जैसे नीचे उतरा उनका गुस्सा कुछ कम हुआ. बोलीं ‘एक तो इतनी गरमी और उपर से इतनी महंगाई. आखिर कोई कैसे गुजर-बसर करे. सचमूच जिंदगी टफ हो गई है.’ मुझसे रहा नहीं गया ‘देखो, इतना भी निराश होने की जरू रत नहीं. यह महंगाई तो बस इस मौसम में चल रही तपिश की तरह है जो मॉनसून के आते ही छू मंतर हो जाएगी.’ जवाब था ‘पर मॉनसून भी तो नखरे दिखा रहा. लगता है सरकारी नीतियों से रू ठ गया है. कभी केरल तो कभी बंगाल में झलक दिखा कर कहीं छुप जा रहा. हमारी सरकार तो कुछ करने से रही. विपक्ष भी बावला हो गया है. यह कैसी व्यवस्था है जो दिन-रात मेहनत करने वाले मजदूर को या अन्न उपजाने वाले किसान को प्रतिदिन के 200 रुपए नहीं देती है, पर केवल क्रिकेट खेलने की काबिलियत के लिए किसी को 40 लाख रु पए देने को तैयार है?’