रविवार, 3 जुलाई 2016

यादों की तितलियां

मीडिया की नौकरी में अमूमन इतवार नहीं होता. यह दिन भी सामान्य दिनों की तरह ही होता है. फिर भी जाने क्यों, इतवार आते ही खुद पर एतबार बढ़ जाता है. इसलिए मेरे लिए इतवार का दिन एतबार का दिन होता है. आशी (बेटी) को स्कूल नहीं जाना होता, सो मेरे इस पूरे एक दिन पर जैसे वह अपना हक मानती है. न खेलकूद, न पढ़ाई. हर वक्त मेरे आसपास तितली की तरह उड़ती-मंडराती रहती है. आज सुबह से हो रही अनवरत बारिश के बीच अलसायी सुबह कब बीत गयी थी और दोपहर सिर पर कब आ गया पता ही नहीं चला. प्याज के पकौड़े और चाय की चुस्कियों के बीच अचानक माहौल नॉस्टैल्जिक हो गया. एक फोटो एलबम को पलटते हुए आशी बार-बार कभी हम दोनों तो कभी उस एलबम के फोटो को देख रही थी.
उसने अपनी मम्मी से कहा-
तुम पहले कितनी सुंदर थी न.
सब चुप थे...
थोड़ी देर बाद...
पापा, तुम पहले अजीब लगते थे...!
अब अच्छे लगते हो.
मैंने कहा- मतलब?
देखो, कहते हुए उसने एलबम मुझे दे दिया. दरअसल, वो जो एलबम देख रही थी, उसमें मेरे कॉलेज के समय की तसवीरें थीं. कुछ शादी के तुरंत बाद की भी. एलबम पलटते हुए मैं भी पुरानी यादों में खो गया. बाहर बारिश हो रही थी. कभी धीमी, कभी तेज. रंग-बिरंगी तितलियों का एक समुह खिड़की के रास्ते कमरे में दाखिल हो चुका था. आशी तितलियों को पकड़ने की चेष्टा में मग्न हो गयी.

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

पानी उदास है

नानी के बिना कहानी उदास है
रोजगार के बिना जवानी उदास है
टूट गये सपने, उम्मीदें उदास है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है

गंगा में चाहे डूबकी लगाओ
महाकुंभ में जाकर जितना नहाओ
रो रही धरती, सुबकता आकाश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है

छिज गया भरोसा हमारा-तुम्हारा
परहित की बातें नहीं हैं गंवारा
पॉलिटिक्स हुई डर्टी, न कोई आश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है

सुखे जलाशय, सुख रही नदियां
पैसों की भूखी है ये देश-दुनिया
क्रिकेट में हो रहा पानी का नाश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है.

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

सुनो लड़कियों!

दीपा करमाकर (ओलंपिक में क्वालीफ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिला जिमनास्ट) को समर्पित एक कविता.

शोर नहीं
धीमे बोलो
ऊंची आवाज
शोभा नहीं देता तुम्हें
इतना तेज चलने की आदत
ठीक नहीं तुम्हारे लिए

ये क्या
अभी तक रोटी सेंकना भी
सीखा नहीं तुमने
अरे बाप!
आलू के इतने बड़े टूकड़े
कोई पुरुष पसंद नहीं करता

जाओ
गिलास में पानी भरके
बाप-भाईयों को पिलाना सीखो
शरबत, चाय, कॉफी बनाना
अच्छा हुनर है, लुभाने के लिए
यह तो आना ही चाहिए

जींस-टी शर्ट पहनकर
रिश्तेदारों के सामने
आना भी मत कभी
जाओ
सलवार-शूट
साड़ियां पहनना सीखो

जब कोई बोले
'जी' बोलो-हौले से
नजरें झुकी हो
जब कोई हो सामने
मुंह खोलकर हंसना
अच्छा नहीं माना जाता

जाओ, जाकर
करो शिव आराधना
तभी मिलेगा
तुम्हें अच्छा वर
अच्छा दांपत्य चाहिये तो
पूजो भगवान विष्णु को

और ये हर समय
हाथ में मोबाइल
क्या ठीक लगता है तुम्हे?
फेसबुक, वाट्सअप
क्या करना इन सबका
औरत ही रहो तो अच्छा

पढ़ो, नौकरी करो
शादी करो
बच्चे पैदा करो
खूब मेहनत करो
सबको खुश रखो
इतना ही करना है तुम्हें

सुनो लड़कियों!
बचपन से बुढ़ापे तक
यही तो सिखाया जाता है तुम्हें
क्या वाकई
इन सब बातों से
सहमत हो तुम...?


सोमवार, 28 मार्च 2016

ओ मेरी गौरेया

फूदक-फूदक कर
आंगन में
करती ता-ता थैय्या
ओ मेरी गौरैया...
बचपन के दिन हों
या अब के
है तू वैसी की वैसी
तुझे दिखा दादी कहती थी
मुझको बाबू-भैय्या
ओ मेरी गौरेया...
मोबाइल से फोटो खींचे
बिस्किट तुझे खिलाती
मेरी बेटी
नित दिन तुझको
कहती सोन चिरैय्या
ओ मेरी गौरेया...
तेरा आना
तेरा गाना
मुझको बहुत सुहाये
तेरे बिन झुठा लागे
शोहरत व रुपैय्या
ओ मेरी गौरेया...
आती रहे तू
गाती रहे तू
हम सबको
चाहे सताती रहे तू
तू है मेरी मैय्या
ओ मेरी गौरेया...
खबरदार सबको
कोई न बोले
ढीठ चिरैय्या
ओ मेरी गौरेया...
- अखिलेश्वर पांडेय

सोमवार, 18 जनवरी 2016

जो कहना है मुझे

मुझे इल्म है इस बात का
तुम नहीं जानती कुछ भी
न यह कि 
तुम हो बेहंतहा
खूबसूरत
नाजूक फूलों सी
इठलाती/ इतराती
प्यार की खुशबु फैलाती
अनायास मेरी जिंदगी में
न यह कि
तुम्हारा होना ही
मेरा होना है
तुम्हारी हंसी ही
मेरी मुस्कान
इतना वक्त बीत जाने पर भी
कहां कह पाया मैं
सोचता रहा/ दिलासा देता रहा
खुद को मन ही मन
पर अब नहीं
अब नहीं चुप रहना मुझे
कह देना चाहता हूं
सब कुछ
तुमसे/सिर्फ तुम्हीं से
क्योंकि कहना जरूरी है
न कहना ठीक नहीं
बोल देना जरूरी है
यह जानते हुए भी
बचेगा नहीं कुछ इसके बाद अब
न कहने को/ न सुनने को
हो शायद ऐसा भी
तुम सुन ही न पाओ
जो कहना है मुझे
खो दूं तुम्हें मैं
तो भी कोई बात नहीं
तुम्हारे न होने में भी
होगा तुम्हारा होना
मैं कुछ कहना चाहता हूं
मैं तुम्हें खोना चाहता हूं...

मुझे इल्म है इस बात का
तुम नहीं जानती कुछ भी
न यह कि 
तुम हो बेहंतहा
खूबसूरत
नाजूक फूलों सी
इठलाती/ इतराती
प्यार की खुशबु फैलाती
अनायास मेरी जिंदगी में
न यह कि
तुम्हारा होना ही
मेरा होना है
तुम्हारी हंसी ही
मेरी मुस्कान
इतना वक्त बीत जाने पर भी
कहां कह पाया मैं
सोचता रहा/ दिलासा देता रहा
खुद को मन ही मन
पर अब नहीं
अब नहीं चुप रहना मुझे
कह देना चाहता हूं
सब कुछ
तुमसे/सिर्फ तुम्हीं से
क्योंकि कहना जरूरी है
न कहना ठीक नहीं
बोल देना जरूरी है
यह जानते हुए भी
बचेगा नहीं कुछ इसके बाद अब
न कहने को/ न सुनने को
हो शायद ऐसा भी
तुम सुन ही न पाओ
जो कहना है मुझे
खो दूं तुम्हें मैं
तो भी कोई बात नहीं
तुम्हारे न होने में भी
होगा तुम्हारा होना
मैं कुछ कहना चाहता हूं
मैं तुम्हें खोना चाहता हूं...

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

गाय, गीता और गप वाले देश में

माननीय प्रधानमंत्री जी. आप देश की जनता से हर महीने मन की बात करते हैं. आज मैं भी अपने मन की कुछ बातें आपसे कहना चाहता हूं. यह जुमला तो आपने सुना ही होगा कि इस देश में तीन चीजें खूब बिकती हैं - सिनेमा, सेक्स और सियासत. पर अब यह जुमला पुराना हो गया. अब इस देश में जो तीन चीजें खूब चर्चित हैं वह है - गाय, गीता और गप. जरा गौर फरमायें तो ये तीनों चीजें भारतीय संस्कृति में सनातन काल से रची-बसी हैं. कोई भी इससे अनभिज्ञ नहीं. पर इन दिनों ये तीनों चीजें नये कारणाें से चर्चा में हैं. अचानक से इस देश में कई लोगों के लिए गाय महत्वपूर्ण हो गयी है. इतनी कि सियासत भी पाकिकस्तान से लौटी भारतीय बेटी गीता के मुकाबले गाय को ज्यादा तवज्जो दे रही. यही कारण है कि इसे लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के गपों का सिलसिला जारी है. जब कभी भी सोशल मीडिया पर गप का दौर तेज होता है सरकार के माथे पर पसीना आने लगता है.उसे तरह-तरह की चिंता सताने लगती है और फिर सोशल मीडिया पर पाबंदी और निगरानी जैसी कवायद शुरू हो जाती है.
  आपको तो मालूम ही है कि हमारे देश में कई राज्य ऐसे हैं, जहां गाय को बिना अनुमति के नहीं मार सकते. लेकिन भैंसों को मार सकते हैं, उनका मांस खा सकते हैं और उनके चमड़ों से बैग बना सकते हैं. यहां तक कि एक गाय को मारने पर भारतीय दंड संहिता के मुताबिक शराब पीकर गाड़ी चलाने, छेड़छाड़, किसी को गंभीर चोट पहुंचाने या इनकम टैक्स चोरी जैसे अपराधों से कहीं ज्यादा सजा मिलेगी- वहीं बिना पलक झपकाए एक भैंस को मार सकते हैं. क्या गाय महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यओं से ज्यादा महत्वपूर्ण है. मार्च 2015 में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने लोकसभा में बताया था कि महिलाओं पर बलात्कार और हमलों के मामलों में इजाफा हुआ है. महिलाओं और बच्चों के प्रति यौनहिंसा, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति जातीय हिंसा की बढ़ती घटनाएं क्या कम महत्वपूर्ण है.  क्या इंसान पशुओं से भी ज्यादा बदतर है?
   एक बात और, गीता को जब पाकिस्तान में लावारिस हालत में पाया गया तो सबसे पहले उसे लाहौर के अनाथालय में भेज दिया गया. मूक-बधिर इस बच्ची को वहां नाम दिया गया फातिमा. कुछ दिन बाद इस बच्ची को वहां से ईधी फाउंडेशन के सदस्य और बिलकीस के पुत्र फैजल अपने साथ कराची ले आए. पहली बार जब उन्होंने उस बच्ची को अपनी मां बिलकीस से मिलवाया तो उसनेे हाथ जोड़े और बिलकीस के पैर छुए. बिलकीस तुरंत बोल पड़ीं कि यह बच्ची तो हिंदू है. और उन्होंने तुरंत उसका नाम फातिमा से बदलकर गीता रख दिया. यह वाकया यह बताने के लिए काफी है कि पड़ोसी मुल्क या दुनिया के दूसरे देश भारतीय संस्कृति के बारे में कितनी बारीक जानकारी रखते हैं, इसके बारे में कितना जानते हैं. तो क्यों न अब हम उन्हें अपने बारे में कुछ और भी बतायें. और हां, गप की चिंता न करें तो ही अच्छा. कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...!

शनिवार, 16 मई 2015

भरी दुपहरी में चिंता पर छोटा सा चिंतन

भरी दुपहरी में मौसम को गरियाते हुए श्रीमतीजी को बाइक पर बिठा कर चला जा रहा था. अचानक ऐसा लगा कि कोई ‘रुको! रुको!’ की आवाज दे रहा है. मैं इधर-उधर देख ही रहा था कि पीछे से श्रीमतीजी ने झकझोरा- ‘सो रहे का जी. तब से रुकने को कह रही हूं सुन ही नहीं रहे.’ मैंने बाइक सड़क किनारे रोक दी. वे उतर कर मुङो आने को कहते हुए खुद सब्जी की दुकान पर चली गयीं. मैं भी बेमन से पीछे-पीछे चल पड़ा. सब्जियां लेने के बाद जब हम चलने लगे, तो दुकानदार ने कहा- ‘भइया! आज धूप बहुत है, डॉक्टर प्याज ले लीजिए न.’ मैंने चौंक कर कहा, ‘डॉक्टर प्याज!’  सब्जी दुकानदार ने श्रीमतीजी की तरफ देखते हुए कहा, ‘क्या भइया आप डॉक्टर प्याज नहीं जानते? अरे इका पाकिट में रखने से लू-गरमी नहीं लगती है इसीलिए इसे डॉक्टर प्याज कहते हैं.’ हमने कहा भाई प्याज बेचने का आइडिया तुम्हारा अच्छा है. एकदम मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ जैसा. वह बोला, ‘हम सच में कहत हैं भइया. इ सफेद वाला प्याज जो आप देख रहे हैं न इसे पाकिट में रख कर कितना भी धूप में निकलिए कुछो नहीं होगा. जो जानत हैं इसके बारे में वो जरूर खरीदत हैं.’ मैंने कहा, ‘इतना ज्ञान देने के लिए शुक्रिया. पर हमें नहीं चाहिए. क्योंकि हमें पता है कि लू कैसे नहीं लगती.’ वह बोला, ‘कोई बात नहीं, आप मत लीजिए, वैसे हम तो आप ही के लिए कह रहे थे.’ चिलचिलाती धूप ने कम, उस सब्जीवाले ने मेरा पारा ज्यादा चढ़ा दिया था. मैंने श्रीमतीजी से कहा, ‘अगर मैं एक मिनट भी और यहां रुका, तो मुङो लू जरू र लग जायेगी. चलो यहां से.’ रास्ते भर मैं उस सब्जी वाले की बातों पर हंसता रहा.
उस सब्जीवाले की लू से बचके तो मैं घर आ गया, पर जिस तरह उसने मेरे प्रति भरी दुपहरी में लू को लेकर चिंता जतायी थी, उस चिंता ने मुङो चिंतित कर दिया. चिंता करना एक राष्ट्रीय समस्या बन गयी है. इस समस्या ने हर किसी को जकड़ रखा है. दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल इस चिंता में हैं कि मीडिया को कैसे काबू में किया जाये. कोई प्रधानमंत्री की विदेश यात्र की अधिकता से चिंतित है, तो कोई भाजपा को जिता कर चिंता के मारे अंदर ही अंदर घुट रहा है. कोई कांग्रेस की पतली हालत से दुखी है तथा उसके भविष्य की चिंता में चिंतित है. तो कई लोग जनता परिवार के एकीकरण को लेकर चिंतित हैं. चिंता एक स्वाभाविक गुण है. लेकिन, क्या हर समस्या का हल केवल चिंता ही है? कई लोग तो महज इस बात के लिए चिंतित हो जाते हैं कि आज उनके मोबाइल पर एक मिस्ड कॉल तक नहीं आया. कई लोग अत्यधिक फोन आने से चिंता के मारे डायबिटीज के मरीज बन जा रहे हैं. और तो और कई युवा मित्र अपने मोबाइल की बैटरी जल्द खत्म हो जाने की परेशानी से चिंतित हो उठते हैं. चिंताओं की कमी नहीं, बिना ढूंढ़े ही हजार मिलती हैं. बचके रहिएगा!

बुधवार, 6 मई 2015

कह दो नाखुदाओं से तुम कोई खुदा नहीं

किसानों की मौत पर घड़ियाली आंसू बहाने व गंदे हथकंडे अपनाने वाले राजनीतिक दलों! तुम्हें क्या कभी इस बात पर भी रोना आया कि तुम्हारे अंदर की संवेदनाएं दिन-ब-दिन मर रही हैं. गांव का किसान अपने पड़ोसी से खेत की मेढ़ काटने का मुकदमा लड़ते-लड़ते जवानी खोकर बुढ़ापे की दहलीज में कब प्रवेश कर जाता है उसे खुद ही मालूम नहीं पड़ता. खाद-बीज और सिंचाई के मकड़जाल में किसान की जिंदगी इस कदर उलझी होती है कि उसकी बेटी सयानी होकर ब्याह करने लायक हो गयी, इस बात का भान उसे आस-पड़ोस वालों के ताने सुन कर ही होता है. वह करे तो क्या करे? जवान बेटी के अरमानों की डोली उठने का ख्वाब पाले उसके कानों में बिस्मिला खान की शहनाई नहीं बल्कि घरवाली की कर्कश आवाज गूंजती रहती है ‘तोहरे चेंट में पइसा ना हवे त हमार गहना-गुरिया बेचके एकर बियाह करी द.’ घर में बैठी बेटी के मुस्कान उसके चेहरे में ही कहीं खो गयी है. दिल का दर्द दबाते-दबाते होंठ काले पड़ गये हैं. उसके हाथ की लकीरों में क्या है, उसे भले ही न पता हो पर उसे इस बात का गुमान अवश्य है कि ये नेता उसकी तकदीर नहीं बदल सकते. ज्यादातर किसान लोकसभा-राज्यसभा चैनल नहीं देखते. उन्हें इस बात का इल्म नहीं है कि संसद में बैठे माननीय कभी ‘बेटा बूटी’ तो कभी ‘सांवली औरत’ जैसी ऊटपटांग बातों में देश का वक्त जाया कर देते हैं. वह तो यह भी नहीं जानते कि इस देश के प्रधानमंत्री की पत्नी को अपने अधिकारों की लड़ाई आरटीआइ के माध्यम से लड़नी पड़ रही है. खुद कहानी गढ़ने, खुद किरदार बनाने और खुद इल्जाम तय कर खुद ही जज बन जाने का ये गजब दौर है. गुमशुम अटल, न लाल-न कृष्ण, मझधार में मांझी, न नीति-न ईश, डगमगाते विश्वास का दौर..! किसके पास जाएं, किससे करें फरियाद. कौन होगा मददगार, कौन तारणहार..! ऐसे में इस देश के किसानों के मन में यह सवाल जरू र उठता है - न राज है न नाथ है. कोई पप्पू है, कोई फेंकू है. जनता अनाथ है तो नेता कहां है? कौओं की टोली में हंस को ढूंढ़ने का क्या फायदा?
   सच्चई तो यह है कि इस देश के किसान भोले-भाले जरू र हैं पर वे खुद के नाथ हैं. उन्हें भरोसा है अपने हाथ पर. कर्म को सवरेपरि मानने वाला किसान किस्मत और किसी खेवनहार के सहारे की उलझनों से अब बाहर आना चाहता है. ऐसे में अगर कोई किसान शायरी लिखने लग जाये तो उसका पहला शेर यही होगा - कश्तियां ना सही हौसले तो साथ हैं/ कह दो नाखुदाओं से तुम कोई खुदा नहीं. अब राजनीतिक आकाओं को यह बात समझनी ही होगी कि वो दिन चले गये जब छलावे की राजनीति और डपोरशंखी घोषणाओं से किसानों को बहलाया जा सकता था. किसी को कुछ करना ही है तो वह करोड़ों किसानों का दिल जीते..उसका सच्च दोस्त बन कर.

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

12 दिनों में कितना कुछ बदल गया!

नेपाल और आधे भारत में जानलेवा भूकंप. बिहार-झारखंड में आंधी-बारिश से जानमाल की भारी तबाही. 56 दिनों की लंबी छुट्टी के बाद राहुल गांधी की ‘घर वापसी’. जनता परिवार का एक होना और सीपीएम का नेतृत्व सीताराम येचुरी के हाथ में जाना. ये कुछ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की घटनाएं हैं जिनका मैं टीवी-अखबार के जरिये गवाह न बन सका. भतीजी की शादी में शिरकत करके गांव से 12 दिनों बाद लौटने पर इन सभी खबरों से वाकिफ हुआ. घर में जब बेटी की शादी हो तो देश-दुनिया की फिक्र कहां रह जाती है? इंटरनेट, फेसबुक, ब्लॉग, ट्विटर, अखबार, टेलीविजन सबसे दूर..12 दिन. बीते 12 दिनों के अखबार पलटते हुए लग रहा है कि इतने दिनों में वाकई कितना कुछ बदल गया है. हवाई यात्र के लिए चर्चित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के मेट्रो ट्रेन में सफर करने लगे हैं. यह अलग बात है कि पहली बार दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल ने जब मेट्रो का सफर किया था तो भाजपा समेत अन्य राजनीतिक दलों ने इसकी खूब आलोचना की थी. कहा था कि यह प्रचार पाने का हथकंडा है. यह अच्छी बात है कि अब उन सभी आलोचकों के ज्ञान चक्षु खुल गये हैं और वह यह समझ गये हैं कि किसी बड़ी शख्सियत का मेट्रो में सफर करना प्रचार पाने का उपक्रम नहीं है. तभी तो सभी चुप हैं. ऐसी ही एक अन्य विस्मयकारी राजनीतिक घटनाक्रम के तहत सोशल मीडिया के ‘पप्पू’ (राहुल गांधी) अब संसद में कुर्ते की आस्तीनें चढ़ाये बिना भाषण देने लगे हैं. यह जानने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा कि 56 दिनों के अज्ञात प्रवास से लौटे राहुल गांधी क्या लोकसभा चुनावों के दौरान बिखरे-बिखरे लगने वाले राहुल से अलग हैं? नयी दिल्ली में ‘आप’ की किसान रैली के दौरान राजस्थान के किसान द्वारा आहत्महत्या कर लेने के बाद राजनीतिक दलों का जो चेहरा सामने आया है वह बेहद निराशाजनक है. भाजपा-कांग्रेस की तो मौकापरस्त राजनीति की पुरानी आदत है, पर आम आदमी पार्टी भी..! राजनीति में कदम पड़ते ही एक कवि (कुमार विश्वास) और पत्रकार (आशुतोष) का भी दंभी और गैर जिम्मेदार हो जाना अनहोनी है. इन दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद, शाहरुख खान अभिनीत फिल्म ‘कल हो ना हो’ से प्रेरित बॉलीवुड शैली के एक संगीत वीडियो में भारत में जर्मनी के राजदूत माइकल स्टेनर की पत्नी ऐलिसे के साथ डांस करते नजर आ रहे हैं. इन सभी घटनाक्रम को देख-जान कर वाकई लगता है कि भूकंप आया है. सब कुछ हिलता हुआ लग रहा है. उथल-पुथल मची हुई है. बाहर भी, भीतर भी. भूकंप सिर्फ धरती के नीचे नहीं आता है, धरती के ऊपर वालों के भीतर भी आता है. उसके लौट जाने के बहुत बाद तक हम हिलते रहते हैं. बेटी को उसके ससुराल विदा करते हुए एक भूकंप मेरे भीतर भी आया है.. अभी तक हिल रहा हूं.

सोमवार, 23 मार्च 2015

इंतजार में जुबिली पार्क हो गया हूं!

तुम एनएच 33 की तरह व्यस्त रहती हो और मैं तुम्हारे इंतजार में जुबिली पार्क हो गया हूं. जब मैं तुम्हारे इंतजार में थक जाता हूं तो उन 86 बस्तियों सा महसूस करने लगता हूं जिन्हें आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है. फिर भी नसों में उम्मीदों का उबाल इतना तगड़ा है कि सांसे टूटती नहीं हैं. हां, कभी-कभी यह भी लगता है कि हमारी जिंदगी में मानगो पुल सा जाम लगने के कारण ठहराव आ गया है और कभी-कभी गरमी की तपती दोपहरी में टेल्को एरिया की सड़कों जैसी वीरानगी छा जाती है. फिर भी मैं सालाना आयोजन ‘फ्लावर शो’ की ताजगी और रंगीनियों जैसी ही खुशी देने वाले तुम्हारे इंतजार में हर दिन संस्थापक दिवस मनाता रहता हूं. सच तो यह है कि जब तुम बिष्टुपुर में होती हो तब मैं मानगो सा महसूस करता हूं. यह ‘खास’ और ‘आम’ होने का अहसास नहीं बल्कि समयानुकूल सच्चाइयों का सामना करना भर है. तुम्हारे साथ जब छप्पनभोग में स्वादिष्ट मिठाइयां खा रहा होता हूं तो तुम मुङो रसगुल्ला जैसी लगती हो, पर तन्हाइयों के वक्त मैं गोलगप्पा के उस फुचके जैसा हो जाता हूं जिसकी वैल्यू मसाला पानी के बिना नहीं होती. तुम्हारा स्वभाव मुङो कभी-कभी जलेबी जैसा भी लगता है. जिसे गरम खाओ तो मुंह जलता है और ठंडा खाने पर बेस्वाद लगता है. सीरियसली, जुबली पार्क मुझमें इस कदर बस गया है कि मैं तुम्हारे साथ साकची जाते वक्त स्टेडियम की तरफ से न जाकर जुबिली पार्क की तरफ से ही जाता हूं. उसकी खुली हवाओं को अपने नथुनों में भरते हुए. हरे-भरे पेड़ों और फूलों की ताजगी को मन ही मन समेटते हुए. जब तुम मेरे साथ होती हो मेरा मन साकची के मंगल बाजार की तरह गुलजार रहता है. जिसमें महंगी और ब्रांडेड चीजें नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में काम आनेवाले जरूरी सामान बहुत किफायती दामों में मिल जाते हैं. क्या हमारा प्यार सचमुच जमशेदपुर जैसा है? इतने त्योहार, इतने सेलिब्रेशन, इतने आयोजन होते हैं कि पता ही नहीं चलता कि कौन असली है और कौन बनावटी. मिश्रित संस्कृति ने शहर की पहचान छीन ली है. न कोई अपनी भाषा, न कोई अपना स्वभाव. लोग यहां होकर भी यहां के नहीं होते. यहां सबका मालिक एक है, पर सब खुद भी मालिक हैं अपनी मरजी के. दिखने में आयरन, पर अंदर बज रहा सायरन! अब छोड़ो भी. क्या रखा है इन शिकवा-शिकायतों में. मेरे मन में तुम्हारे प्रति वैसी ही अगाध श्रद्धा है जितनी शहरवासियों के मन में जमशेदजी टाटा के लिए. हां, एक बात मैं जरू र कहूंगा कि तुम अपने पहनावे से बागबेड़ा जैसी लगती हो. सीएच एरिया से बिष्टुपुर वाले रोड जैसा नया लुक  आजमा कर देखो. बेहद खूबसूरत लगने लगोगी. मुङो उम्मीद है कि तुम इस प्रपोजल को मेरीन ड्राइव के मॉल और मल्टीप्लेक्स जैसा लटकाने के बजाय टाटा वर्कर्स युनियन के चुनाव जैसा शीघ्र ही मूर्त रू प में परिणत कर दोगी.