गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

कोलकाता की रात और टैक्सी ड्राइवर

रात के 11 बज रहे थे. कोलकाता के नेताजी सुभाषचंद्र बोस हवाई अड्डे से मुङो हावड़ा रेलवे स्टेशन आना था. आदतन सस्ती सुविधा ढूंढ़ रहा था. पुलिसवाले ने बताया- रात नौ बजे के बाद यहां बसों की एंट्री बंद हो जाती है. आपको टैक्सी लेनी पड़ेगी. एक टैक्सी वाले को बुलाया तो तीन आ गये. कोई 800 रुपये मांग रहा था, तो कोई 700. तीसरे ने कहा- दादा! 600 से कम में कोई नहीं जायेगा. तभी एक शख्स मेरे पास आया और धीरे से बोला- बाबू! प्रीपेड टैक्सी क्यों नहीं ले लेते? उसने काउंटर की तरफ इशारा किया और मैं चल पड़ा. 310 रुपये की परची ली और टैक्सियों की कतार के पास आकर खड़ा हो गया. एक टैक्सी आकर मेरे पास रुकी. मैं चुपचाप बैठ गया. कुछ मिनट बाद मैंने टैक्सी ड्राइवर को गौर से देखा. यह वही शख्स था जिसने मुङो प्रीपेड टैक्सी लेने की बिन मांगी सलाह दी थी. आज के जमाने में भी ऐसे मददगार हैं! मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर इस टैक्सी ड्राइवर से क्या बोलूं. क्या ‘थैंक्स’ कहना ठीक रहेगा. आखिरकार निस्तब्धता को तोड़ने में उसी ने मदद की- ‘‘जानते हैं साहब! बंगाल अब बाहर के लोगों के लिए ठीक नहीं रहा. दीदी ने बंगाल के लोगों के साथ विश्वासघात किया है. कई दशकों के सीपीएम शासन से ऊबी हुई बंगाल की जनता ने दीदी की सरकार बनवायी. इस उम्मीद में कि कुछ नया होगा, अच्छा होगा. यहां रहनेवाले बाहर के लोग भी ऐसा ही सोचते थे. पर सभी की उम्मीदें धराशायी हो गयीं. मंत्री-विधायक सब के सब चोर निकले. अब तो अब मोदी से ही उम्मीद है. 2016 में दीदी का जेल जाना तय है. जैसी करनी-वैसी भरनी.’’ टैक्सी ड्राइवर बोले ही जा रहा था. अनवरत.. आखिर वह किसी और मुद्दे पर भी बात कर सकता था. या चुपचाप म्यूजिक ऑन कर देता या मेरे बारे में भी पूछ सकता था या.. बहरहाल, जो भी था.. मुङो उसकी बातें अच्छी लग रही थीं. इसलिए नहीं कि मेरी राजनीति में गहन अभिरुचि है. इसलिए, क्योंकि मेरी उसमें रुचि बढ़ती जा रही थी. मैं उसके बारे में जानना चाहता था. क्यूंकि उसने मेरी मदद की थी. मैं मोबाइल में उसकी बातें रिकॉर्ड करता जा रहा था. अपनी बात बीच में ही रोकते हुए उसने पूछा- आप मेरी बातों से बोर तो नहीं हो रहे? मेरे जवाब देने से पहले ही उसने टैक्सी रोक दी. मैं चौंका- क्या हुआ? गाड़ी क्यों रोक दी? बोला - स्टेशन आ गया, उतरना नहीं है? मैं उसके बारे में सोचते हुए थोड़ी देर के लिए भूल गया था कि मैं हवाई अड्डे से रेलवे स्टेशन के लिए चला था. पूछने पर बताया कि उसका नाम राजेश यादव है, वह गिरिडीह (झारखंड) का रहनेवाला है. गांव पर पत्नी दो बच्चों के साथ रहती है. बच्चे पढ़ाई करते हैं. मैं टैक्सी से बाहर आ चुका था. बरबस ही मुंह से निकल पड़ा- थैंक्यू राजेश. मुस्कराते हुए उसने गाड़ी आगे बढ़ा ली. 

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-12-2014) को "नये साल में मौसम सूफ़ी गाएगा" (चर्चा-1833)) पर भी होगी।
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    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. दीवारों पर लिखी इबारतें शायद
    हमारे राजनीतिक-गण पढते नहीं है?

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