बुधवार, 16 अप्रैल 2014

एक वोटर को और क्या चाहिए?

रामदरश काका पिछले पांच दशकों से वोट करते आ रहे हैं, लेकिन आज तक एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि वोट देने के तुरंत बाद वे पछताये ना हों. उन्हें लगता है कि वे पछताने के लिए ही मतदान करते हैं. ऐसा नहीं है कि वे हमेशा ही ईमानदार आदमी को चुनना चाहते हैं. जानते हैं कि ईमानदार आदमी अब पैदा होना बंद हो गये हैं. यहां-वहां कहीं दो-चार अदद मिलते भी हैं, तो ऐसे बिदकते हैं मानो राजनीति नहीं, सिर पर मैला उठाने की प्रथा हो! रामदरश काका मानते हैं कि वे खुद भी ईमानदार नहीं हैं. मौका मिलने पर अनेक बार उन्होंने दो-चार दिनों के लिए ईमानदारी-नैतिकता जैसी चीजों को लाल कपड़े में बांध कर खूंटी पर टांग दिया है. मौके और मजबूरियां किसके जीवन में नहीं आते. समझदार आदमी वही है जो सावधानी से इन्हें बरत ले. राजनीति में ईमानदार आदमी ढूंढ़ना खुद अपनी जगहंसाई करवाना है. फिर किसी और की ईमानदारी से हमें क्या, होगा तो अपने घर का. काम करनेवाला हो, तो बेईमान भी चलेगा. ठेकेदार से कमीशन खा ले, पर सड़क बनवा दे. चंदा वसूलता हो तो वसूले, पर भोजन-भंडारे बराबर करवाता रहे. अतिक्र मण हटानेवाले आयें तो प्रशासन से लड़ ले. शादी-ब्याह, मरे-जिये में आ कर खड़ा हो जाए. और, क्या चाहिए इसके सिवाय आम आदमी को!!
 इतना काफी है. गरीब आम आदमी वैसे भी किस्मत का मारा होता है. कभी भूल से थाली में काने बैंगन की सब्जी दिख गयी, तो दिल्ली से आवाजें आने लगती हैं कि गरीब ने सब्जी खायी इसलिए महंगाई बढ़ गयी. अगर गरीब दो सब्जी खायेंगे, तो अपना रुतबा बनाये रखने के लिए अमीर आदमी को कम से कम बारह सब्जियां खानी पड़ेंगी. गरीब बिहार-यूपी से पहुंच जाए तो राजधानी में गंदगी पैदा हो जाती है. वैसे तो इन दिनों सभी पार्टियों के प्रत्याशी रोज ही रामदरश काका के यहां वोट मांगने आते हैं. पर, उस दिन गली के अंधेरे में एक प्रत्याशी से सामना हो गया. बोला- ‘काका ध्यान रखना, इस बार आपके वोट से ही सरकार बनेगी.’ इतना कह कर हौले से उनके हाथ में पांच सौ का एक कड़क नोट पकड़ा कर बोला- ‘बच्चों के लिए मिठाई ले लेना.’ वो कुछ सोच पाते इसके पहले पता नहीं चला कि वह नोट कब किसने ले लिया. ले लिया तो ले लिया. अब क्या हो सकता था. रोकते-रोकते मुंह से ‘थैंक्यू’ भी निकल गया. प्रत्याशी ने एक अंगूठा ऊंचा करके पूछा ‘चलती है क्या?’ काका कुछ समङों, मना करने या स्वीकारने के लिए तैयार हों, इससे पहले एक आदमी एक बोतल, जिसमें शहद के रंग जैसा कुछ था, पकड़ा गया. जब काका की आंखों के सामने का अंधेरा हटा तो देखा, बोतल पर लिखा था ‘रेड डाग’, और एक कुत्ता मुंह फाड़े बना हुआ था जिसकी आंखें लाल थीं. रामदरश काका बार-बार उसे देखते रहे, जबतक खुद उनकी आंखें लाल नहीं हो गयीं.

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

मानो या न मानो मैं ‘माननीय’ हूं

जी हां, कोई माने या न माने, मैं हूं माननीय. वह भी कोई ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि जनता द्वारा ‘चुना’ हुआ. चुनाव जीतने के साथ ही मुङो कुछ भी करने का ‘विशेषाधिकार’ स्वत: हासिल हो जाता है. मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं, मैं चाहे जो करूं.. मेरी मर्जी. एक बार जब जनता ने मुङो वोट दे कर सदन में भेज दिया, तो फिर पांच साल तक चलेगी मेरी मर्जी.. मैं चाहे लोकसभा में मिरची पाउडर की बारिश करूं या राज्यसभा में धक्कामुक्की.. मैं चाहे विधानसभा में कपड़े उतार दूं या मार दूं किसी को थप्पड़. मैं चाहूं तो सदन के स्पीकर का आदेश भी न मानूं और मन करे तो अपनी ही पार्टी के नियमों की धज्जियां उड़ा दूं. सबके सामने ही पार्टी सुप्रीमो के खिलाफ नारेबाजी करूं और सदन की कार्यवाही भी न चलने दूं. ‘सबका मालिक एक’ होता होगा, पर मैं तो अपनी मर्जी का मालिक हूं. मेरा मन नहीं करता, तो मैं तब तक अपने चुनाव क्षेत्र में नहीं जाता जब तक कि अगला चुनाव न आ जाये. मैं तो अपने वोटर को भी ऐन वक्त पर पहचानने से इनकार कर देता हूं. अरे भई! नेता और वोटर का रिश्ता भी कोई स्थायी होता है भला. यह रिश्ता तो क्षणभंगुर है. और वैसे भी यह दुनिया नश्वर है, माया है, यहां कौन किसका है. वोटर-नेता का रिश्ता तो चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही शुरू होता है और चुनाव परिणाम आते ही खत्म हो जाता है. कम से कम मेरे तरफ से तो ऐसा ही समङिाए.
लोग मुझसे सवाल करते हैं कि माननीयों की मनमानी के कारण  संसदीय कार्य हो नहीं पा रहे हैं और संसद हंगामे का अखाड़ा बन गयी है. जनता की गाढ़ी कमाई की इस तरह बर्बादी हो रही है. लोग यह भी कहते हैं कि ‘संसद और विधानसभाओं का मूल काम आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से लोगों का सशक्तीकरण करना है. इसके अलावा संसद पर जिम्मा है कि वह कार्यपालिका पर नियंत्रण रखे और उसे सभी तरह से जवाबदेह बनाये. किंतु माननीय इस मंदिर को अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने के केंद्र के रूप में तब्दील करने में लग गये हैं. परिणामस्वरूप संसद का मूल कार्य गौण हो गया है.’
भइया मेरे! इत्ती बात तो मुङो भी पता है. मैं कोई बुद्धू थोड़े ही न हूं. मुङो तो यह भी मालूम है कि विश्व में भारत ही सबसे बड़ा लोक-तांत्रिक देश है जिसमें जनता के द्वारा चुने हुए 543 प्रतिनिधि ही केंद्रीय सरकार के शासन को चलते हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है माननीय बनने के लिए किसी भी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं है. केवल 35 वर्ष का वयस्क भारतीय नागरिक होना जरूरी है. किसी शिक्षा की भी जरूरत नहीं है. यहां तक कि अगर अनपढ़ भी हो, तो चलेगा? अब जब इतनी जानकारी मुङो है ही तो आप मान क्यों नहीं लेते कि मैं कुछ गलत नहीं कर रहा या जो करता हूं वही सही है. देखो भाई, मानना हो तो मान लो, वरना क्या कर लोगे???

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

शायद मैं भी बाबूजी की तरह हो रहा हूं

घर की बुनियादें, दीवारें, बामो-दर हैं बाबूजी
सबको बांधे रखने वाला खास हुनर हैं बाबूजी,
भीतर से खालिस जज्बाती और ऊपर से ठेठ-पिता
अलग, अनूठा, अनबूझा-सा इक तेवर हैं बाबूजी.
 नामचीन कवि भाई आलोक श्रीवास्तव की ये पंक्तियां मुङो अत्यंत पसंद हैं. इनमें एक पिता का जो शब्द-चित्र खींचा गया है, वह मुङो काफी जाना-पहचाना सा लगता है. सच कहूं तो उसमें मुङो अपने पिताजी की छवि दिखायी पड़ती है. मुङो ही क्या, आपको भी दिखती होगी. अपने पिताजी को मैं भी बाबूजी कहता हूं. बाबूजी अपने चार भाइयों में सबसे बड़े हैं. छोटी उम्र में ही जब उनके पिता, यानी हमारे दादाजी चल बसे, तब वहीं से शुरू हो गया सिलसिला मुफलिसी का. बाबूजी ने एक रिश्तेदार के घर रह कर मैट्रिक तक की पढ़ाई तो पूरी कर ली, पर आगे पढ़ाई जारी रखने में गरीबी सबसे बड़ी बाधा थी. तीन छोटे भाइयों और एक छोटी बहन की जिम्मेवारी उन पर थी.
नौकरी की तलाश में गांव से कोलकाता पहुंचे बाबूजी ने जूट मिल में नौकरी की. उनमें गजब का धैर्य और तटस्थता है जो शायद बचपन में ही अपने पिताजी को खो देने और एक विशाल संयुक्त परिवार में गरीबी और अभावों के बीच पालन-पोषण की वजह से पनपी होगी. सुख-दुख सभी हालात में एक सा बने रहना सभी के वश में नहीं होता. घर की बड़ी बहू होने के कारण मां हमेशा गांव में ही रही. उस पर सभी की देखरेख की जिम्मेवारी जो थी. बाबूजी अभी कुछ वर्ष पहले सेवानिवृत्त होकर गांव आ गये हैं. अच्छा लगता है अब मां-बाबूजी साथ रहते हैं. एक-दूसरे का दुख-दर्द बांटते हुए, एक-दूसरे को और अधिक समझते हुए. बाबूजी भाग्यशाली थे कि मां ने खुद की अनदेखी को लेकर कभी उनसे शिकायत नहीं की. कभी नहीं. कुछ नहीं.
बाबूजी हम भाई-बहनों को स्नेह तो करते रहे, पर उसे दिखाने से, प्रगट करने से हमेशा बचते रहे. शायद, इसलिए भी क्योंकि वो खुद को कमजोर नहीं करना चाहते थे. आखिर घर से, परिवार से, अपनों से दूर रहने की हिम्मत जो जुटानी होती थी. साल में दो-तीन दफा या किसी पर्व-त्योहार पर जब वे घर आते, तो कुछ दिन रह कर लौटते वक्त उनकी आंखों में उतर आयी नमी को मैं देख कर कुछ परेशान सा हो जाता था. बच्च था, इसलिए उसकी अहमियत, उसके मायने को ठीक-ठीक समझ नहीं पाता था. अब समझ पा रहा हूं, क्योंकि मैं भी पिता हूं. पिता की जिम्मेदारी निभाते हुए पिछले कुछ वर्षो में बाबूजी की प्रतिष्ठा मेरी नजर में और भी बढी है. मेरी जीवन-संगिनी कहती हैं, ‘‘तुम अपनी भावनाओं का इजहार नहीं करते.’’ बाबूजी भी तो ऐसा ही करते हैं. ठीक-ठीक बता नहीं सकता कि यह बढ़ती उम्र का असर है या मैं भी बाबूजी की तरह होता जा रहा हूं.

बुधवार, 15 जनवरी 2014

मन केकर-केकर राखीं, अकेले जियरा

भोजपुरी के एक पुराने लेकिन चर्चित गीत का यह मुखड़ा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर इन दिनों सटीक लगता है. खास आदमी के खिलाफ मुहिम चलाते-चलाते ‘आम आदमी’ अब पूरे देश में ‘खास’ हो चुका है. खास इस तरह की कई राज्य सरकारें अब केजरीवाल के फैसले और उनके काम करने के तौर-तरीकों की नकल करने लगी हैं. हालांकि अच्छाई को अपनाने को नकल नहीं कहा जाना चाहिए, लेकिन राजनीति में इसे नकल की ही संज्ञा दी जा रही है.
 पिछले दिनों केजरीवाल के जनता दरबार में जिस प्रकार बेतरह भीड़ जुटी उससे एक बात तो साफ हो गयी कि लोगों के पास कितनी समस्याएं हैं. और, लोग उन समस्याओं से किस तरह पके हुए हैं. केजरीवाल की सरकार दिल्ली के लोगों की उम्मीदों पर कितना खरा उतर पाती है. यह साबित होने में तो अभी वक्त लगेगा पर पूरा देश अभी आप (आम आदमी पार्टी) और अरविंद केजरीवाल को उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है. यही वजह है कि देश भर में आप का कुनबा बढता जा रहा है. कई नामी-गिरामी हस्तियां पार्टी में शामिल हो रही हैं. सदस्यों और समर्थकों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. यहां यह बता देना जरुरी है कि आप की बढती लोकप्रियता महज आकर्षण नहीं है. बल्कि यह वे लोग हैं जिनकी उम्मीदें धराशायी हो चुकी हैं.  जिन मूल्यों पर इस महादेश की आधारशिला रखी गई थी, वो टुकड़े-टुकड़े होकर राजपथ से लेकर जनपथ पर बिखरे पड़े हैं. और अफसोस ये है कि किसी को अफसोस नहीं.
 दरअसल, मनमोहन सिंह ने उदारीकरण का जो सिलिसला शुरू किया था, उससे अमीरों की अमीरी चाहे बढ़ी हो, गरीबी कम नहीं हुई. खतरा ये है कि 300 करोड़पतियों वाली संसद में गरीबों, दलितों, आदिवासियों के मुद्दों को दरकिनार किया जा रहा है. पर हमारे देश का दुर्भाग्य है कि जब किसी मौलिक विकल्प की सबसे ज्यादा जरूरत है तो हमारे पास नायक नहीं, महज विदूषक रह गए हैं. यह बात सब जानते हैं कि उन्मादी तेवर देश के मिजाज से मेल नहीं खाते. नरेंद्र मोदी के भाषण पर ताली चाहे जितनी बजती हो, लालकिले से ऐसी भाषा सुनने के लिए देश तैयार नहीं. वैसे भी, उन्माद की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वो स्थायी नहीं रहता. इसलिए उन्माद का झाग बैठते ही वोटों का सूखा पड़ जाता है. यही वजह है कि लोग केजरीवाल को उम्मीद भरी नजर से देख रहे हैं. अगर यह परिस्थति अरविंद केजरीवाल के पक्ष में है तो इसके खतरे भी कम नहीं हैं. टीम केजरीवाल आने वाले समय में किस प्रकार काम करती है. आम चुनाव में वे किस प्रकार के उम्मीदवार उतारते हैं. कांग्रेस के साथ संबंध कैसा रहता है. यह सब बातें ही तय कर पायेंगी कि देश और केजरीवाल का भविष्य कैसा होगा.

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

अब समझा मोदी की बात का मर्म

उस दिन मेरा साप्ताहिक अवकाश था. एक मित्र को स्टेशन छोड़ कर रात में घर लौट रहा था. घर से करीब दो सौ कदम दूर एक बंद गली से किसी प्रतिद्वंद्वी को परास्त कर या परास्त होकर तेजी से एक कुत्ता मेरी मोटरसाइकिल के अगले चक्के में घुस आया. गाड़ी फिसली और मैं धड़ाम. मुङो ठीक-ठीक इतना ही याद है. बाकी का घटनाक्रम इतनी तेजी से हुआ कि मुङो पता ही नहीं चला. मुङो आसपास के लोगों ने उठाया और मैं किसी तरह वहां से घर पहुंचा. रातभर दर्द से परेशान रहा. रातभर आपकी जगह दर्द की याद आती रही.. दूसरे दिन जब डॉक्टर से सामना हुआ, तो पता चला कि पैर में फ्रैर है. प्लास्टर करवा कर घर लौटा. मित्रों, रिश्तेदारों व जाननेवालों की तरफ से कुशलक्षेम जानने का सिलसिला शुरू हुआ. कुछ घर पहुंचे और कई ने फोन किया. अजीब लगता है, एक ही बात का रिपीट टेलीकास्ट करते रहो. किसी से विस्तृत, तो किसी से संक्षेप में. एक अलग तरह का अनुभव है यह. इस दौरान कई लोगों ने मुझसे यह भी जानना चाहा कि उस कुत्ते का क्या हुआ? वह जिंदा है या..? उसका पैर सलामत है या..? इन सवालों का सामना करते हुए शुरू में तो मुङो थोड़ा अजीब लगा, पर बाद में मैं इसे लेकर संजीदा हो गया. मैं इसे स्वाभाविक सवाल के रूप में देखने लगा.
तब मुङो याद आया नरेंद्र मोदी का वह बयान- ‘अगर हम गाड़ी चला रहे हैं या कोई और ड्राइव कर रहा है और हम पीछे बैठे हैं, फिर भी छोटा सा कुत्ते का बच्चा भी अगर गाड़ी के नीचे आ जाता है तो हमें पेन फील होता है.’ मैं सोच में पड़ गया कि मैं तो अपने दर्द से ही परेशान हूं. मुङो अपनी ही तकलीफें महसूस हो रही हैं. मैं इस बात से दुखी हूं कि मेरा आर्थिक नुकसान हुआ, स्वास्थ्य का नुकसान हुआ. मेरी छुट्टियां बरबाद हुईं. पर मुङो उस कुत्ते की एक बार भी चिंता नहीं हुई कि उसका क्या हुआ? क्या वाकई उसका भी पैर टूट गया होगा? कहीं उसकी जान पर तो नहीं बन आयी? उसकी देख-रेख कौन कर रहा होगा? वह कहां होगा, कैसे होगा? अब मुङो अपना दर्द कुछ कमतर लगने लगा. मैं सोच में पड़ गया. मुङो आत्मग्लानि महसूस होने लगी, पर मेरे सामने मुश्किल यह थी कि मैं खुद ही चल नहीं पा रहा था ऐसे में उस कुत्ते की शिनाख्त करना या उसके बारे में ठीक-ठीक पता लगा पाना मुश्किल था. बाद में मैंने खुद को दृढ़ करते हुए यह निश्चय किया कि मैं उस अज्ञात कुत्ते की सलामती के लिए प्रार्थना करूंगा. अफसोस तो मुङो भी है कि एक निदरेष कुत्ता मेरी गाड़ी के नीचे आ गया. मैं तो दोहरा गुनहगार हूं क्योंकि गाड़ी भी मेरी थी और ड्राइव भी मैं ही कर रहा था. इस पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए एक डर फिर भी मुङो परेशान कर रहा है कि कहीं फिर कोई मुझसे यह न पूछ ले कि ‘उस कुत्ते का क्या हुआ?’

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

आप से भी खूबसूरत ‘आप’ के अंदाज हैं

‘दिल्ली दूर है’ वाली कहावत झूठी साबित हो चुकी है. आम आदमी ने यह साबित कर दिखाया है कि उसे सिर्फ राजनीति का छिद्रान्वेषण करना ही नहीं, बल्कि लाइलाज हो चुके मर्ज का इलाज करना भी आता है. हालिया संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) को नयी दिल्ली में भले ही सिर्फ 28 सीटें ही मिल पायीं, पर उसने 15 वर्षो से सत्तासीन कांग्रेस को खदेड़ दिया. इस चक्कर में भाजपा कहीं की नहीं रह गयी. सबसे अधिक 32 सीटें हासिल करके भी भाजपा की स्थिति ‘सब धन 22 पसेरी’ वाली है. लेकिन यहां हम बात करेंगे ‘आप’ की. जी हां, आम आदमी पार्टी की. तमाम कयासों के बाद भी कांग्रेस और भाजपा ‘आप’ को वोटकटवा समझते रहे और जब रिजल्ट आया तो गच्चा खा गये. चुनाव परिणाम आने से पूर्व तक अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ‘को जीभर गरियानेवाली कांग्रेस अब उससे बिना शर्त समर्थन लेने की चिरौरी कर रही है. जाहिर सी बात है उसे दिल्ली के पब्लिक की चिंता नहीं बल्कि अपना हित दिख रहा है. कांग्रेस आप की सरकार बनवा कर दिल्ली के लोगों की सिम्पैथी हासिल करना चाहती है. साथ ही आप के प्रकोप से बचने का रास्ता भी ढूंढ रही है. पर केजरीवाल कांग्रेस की यह होशियारी खूब समझते हैं. वह सतर्क हैं. इधर कई टीवी चैनलों पर दिखाये जा रहे सरकार बनाने के फामरूले की तर्ज पर किरन बेदी ने भी अपनी मुफ्त सलाह हवा में उछाल दिया ‘भाजपा और आप मिल कर सरकार बनायें.’ पर इस फ्री सलाह को भी न तो भाजपा ने तवज्जो दी और न ही आप ने. इधर आयुर्वेद की महंगी दवाएं बेचने और मोटी फी लेकर योग सलाह देने वाले बाबा रामदेव ने भी केजरीवाल को एक मशविरा फ्री में दे दिया ‘जब कांग्रेस समर्थन दे रही है तो केजरीवाल को सरकार बनाने के लिए आगे आना चाहिए.’ इस सब चीजों को नजरअंदाज कर आप के लोग जंतर-मंतर पर जीत का जश्न मनाने में लगे रहे. दरअसल, राजनीति के आंगन में उतरने के बाद इसकी ‘टेढ़ी चाल’ और ‘ननु नच’ के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी आप वालों को भी हो गयी है. वे जानते हैं कि दूसरे के कंधे पर रखकर  बंदूक चलाने वालों की यहां कोई कमी नहीं है. सच तो यह है कि कई राजनीतिक धुरंधरों को ‘दृष्टि दोष’ है, पर अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी अपने दूरदृष्टि का इस्तेमाल कर रही है. दिल्ली में जीत से दोगुने हुए जज्बे के साथ आप ने लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है. उन्हें पता है दिल्ली में दोबारा चुनाव ही अब एकमात्र विकल्प है. झाड़ू आप का राष्ट्रीय चुनाव चिन्ह बन गया है. अब आपका मिशन है ‘कश्मीर से कन्याकुमारी.’ सचमूच सफाई तो जरूरी है.  इन दिनों कुछ गीत खासे लोकप्रिय हो रहे हैं- आप यहां आये किसलिए.., आप से भी खूबसूरत आप के अंदाज हैं.. आप भी इसका आनंद लीजिए.

शनिवार, 23 नवंबर 2013

विचारों की कब्र पर मूर्तियों की होड़

भारत में मूर्ति-निर्माण और मूर्ति-पूजा सदियों से चली आ रही है, लेकिन राजनीतिक फायदे के लिए मूर्तियों का इस्तेमाल इस वक्त जैसा हो रहा है, वैसा कभी नहीं हुआ. सरदार पटेल की राजनीतिक विरासत में सेंध लगा कर उस पर अपना हक जमाने की कोशिश के चलते नरेंद्र मोदी उनकी विशाल मूर्ति बनवा रहे हैं. तो कांग्रेस पटेल को अपनी पार्टी का नेता बता कर यह मुद्दा मोदी से छीनना चाहती है. इससे पहले भी कभी शिवाजी की बड़ी सी प्रतिमा लगा कर उनकी वीरता को सीमित अर्थो में बांधने की राजनीति की गयी, तो कभी बाबा भीमराव आंबेडकर को संविधान-निर्माता की जगह एक वर्ग का हितैषी बता कर प्रस्तुत किया गया. गांधीजी की मूर्तियां तो देश के कोने-कोने में हैं. चश्मे और लाठी के साथ उनकी मूर्तियों को उतनी ही आसानी से खड़ा कर दिया गया है, जितनी आसानी से बरगद के पेड़ के नीचे पत्थर को लाल सिंदूर लगा कर हनुमान की मूर्ति बना दी जाती है. गांधी जयंती और पुण्यतिथि पर उनकी साफ-सफाई हो जाती है, अन्यथा वर्ष भर वे उपेक्षित खड़ी रहती हैं. कभी मूर्ति का चश्मा टूटता है, कभी उसके नीचे बैठ कर मदिरापान या जुए का खेल होता है. संसद भवन में गांधीजी की जो मूर्ति लगी है, उसके सामने खड़े होकर सांसद अपना विरोध, प्रदर्शन आदि करते हैं. इस सब में गांधीजी की विचारधारा कहां दबा दी जाती है, उसकी खोज-खबर लेने वाला कोई नहीं. किसी भी महान व्यक्ति की मूर्ति लगा कर उसके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करना भावनात्मक अभिव्यक्ति का एक तरीका है,किंतु जब इसमें स्वार्थ जुड़ जाता है, तो यह तय है कि जिन विचारों और कर्मो से वह व्यक्ति महान कहलाया, उससे जनता को दूर करने की कोशिश हो रही है. भारत में मूर्तियों का इतिहास बहुत पुराना है. सिंधु घाटी सभ्यता के काल से मूतियों का वर्णन मिलता है. इनसान जिज्ञासाओं का जवाब ढूंढ़ता रहता है, और जहां वह अनुत्तरित हो जाता है, या यह महसूस करता है कि मुझसे ज्यादा कोई शक्तिशाली, श्रेष्ठ शक्ति इस ब्रrांड में विद्यमान है, तो उसे पूजना शुरू कर देता है. मूर्तियों का राजनैतिक प्रयोजन भारत में तब प्रारंभ हुआ, जब यूरोप में पुनर्जागरण हुआ. पर दुख की बात तो यह है कि निराकार को साकार करने की जगह अब साकार को ‘पाषाणकार’ किया जाने लगा है. कई मूर्तियां तो महज राजनैतिक स्वार्थो के चलते बनायी जा रही हैं. किसके नेता की ज्यादा बड़ी मूर्ति बनती है, ऐसी अविचारित होड़ देश में चल रही है. भारत में गांधी, नेहरू, भगत सिंह, शास्त्री, पटेल, आंबेडकर आदि महापुरुषों की जितनी मूर्तियां लगी हैं, अगर सचमुच उनका कोई असर होता, तो आज देश में जो वैचारिक शून्यता की स्थिति बनी है, वह कभी नहीं होती. हमें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने मूर्तियों को खड़ा कर उनके नीचे विचारों को दफन कर दिया है?

शनिवार, 9 नवंबर 2013

तुम्हारा दाग मेरे दाग से बड़ा कैसे?

अभी चुनावी मौसम है. जिसे देखो वह राजनीति की बातें कर रहा है. गांव हो या शहर, घर हो या बाहर, स्कूल हो कॉलेज, मंदिर हो या मसजिद सब जगह बस राजनीति की ही बातें हो रही है. वैसे तो लोकसभा चुनाव में अभी कुछ महीने वक्त है, पर इन दिनों पांच राज्यों में विधानसभा की चुनावी सरगरमी है. वो कहावत है न.. बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना. वही हाल हमलोगों का भी है. चुनाव है छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली और मिजोरम में, और बावले हुए जा रहे हैं हम. रोज नये-नये सर्वे की लत लग गयी है. आज का नया सर्वे क्या है? किस पार्टी को ज्यादा सीटें मिल रही हैं, किसको कम? यह जानने की उत्कंठा में टीवी का रिमोट घिसे जा रहे हैं या अखबारों के पन्ने चाट रहे हैं. हालत यह है कि जब पटना में सीरियल बम ब्लास्ट हुए, कई लोग मरे, कई घायल हुए. तब भी हमारे अंदर की संवेदना घास चरने गयी थी. हम इस बात में उलङो रहे कि कौन सांप्रदायिक है और कौन नहीं. हम यह भूल गये कि ब्लास्ट में जो मरे वह इंसान भी थे. पता नहीं हम किस राजनीति की बातें करते हैं, कैसे करते हैं? एक तरफ तो हमारे नेता ऐसे हैं जिनको जनता के बजाय अपनी जान की फिक्र ज्यादा है. विस्फोट होता है कई निदरेषों की जान चली जाती है, कई बेगुनाह जख्मी होकर वहीं पड़े तड़पते रहते हैं, पर इन नेताओं को तो फिक्र है अपनी. खुद की सुरक्षा के लिए बड़े लाव-लश्कर, एसपीजी सुरक्षा, ब्लैक कमांडो, कई-कई राज्यों की पुलिस..और न जाने क्या-क्या?
वैसे, राजनीति है बड़ी अजीब. यहां वैसे तो कोई दूध का धुला है नहीं, पर सब एक-दूसरे को दागदार बताने में मशगूल हैं. हाल यह हो गया है कि बस सब एक-दूसरे के दाग ढूंढ़ते फिर रहे हैं. दागी सभी हैं, पर अब लड़ाई इस बात की है कि कोई कम दागी है तो कोई अधिक दागी है. जो खुद को कम दागी समझता है, वह दूसरे को अधिक दागी बता कर ही ईमान की लड़ाई जीतना चाहता है. जो कम दागी है, वह अधिक दाग वाले प्रभावशाली व्यक्तित्व से जलन करता है. इतने बड़े-बड़े घोटाले के दाग देख कर वह अपने छोटे घोटालों वाले दागों पर शर्मिदा हो रहा है. कुछ लोग हैं जो दागी तो हैं, पर खूबसूरती से उसे कमीज के नीचे छिपाए हुए हैं. लोग देखते हैं तो बस सफेद ही सफेद ही नजर आता है. इस सफेदी के पीछे छिपा वह स्याह चेहरा लोग देख ही नहीं पाते, जो उसका असली चेहरा है. वोट मांगने के लिए यह एक कारगर हथियार है. वैसे वोट मांगने के और भी कई तरीके हैं. इस सीजन में कई बड़े नेता अपनी दादी, पिताजी, मां, चाचा, भाई-भाभी, बेटा-बेटी आदि के नाम पर भी वोट मांगते देखे जा रहे हैं. आखिरकार, यह लोकतंत्र है, वोट मांगना उनका अधिकार है और देना आपका. आप राजनीति या नेताओं को पसंद करें या न करें, नजरअंदाज नहीं कर सकते.

शनिवार, 2 नवंबर 2013

रिश्तों की मिठास : कुछ खास है, कुछ बात है

वर्षो बीत गये दीपावली और छठ में घर गये. जब भी यह अवसर आता है, घर की बहुत याद आती है. याद आती है इस त्योहार के उत्साह की, उमंग की, सामूहिकता की और बचपन की भी. जीवन की आपाधापी में आप चाहे जितना भी आगे चले जायें, मन में एक कोना ऐसा अवश्य होता है जहां जिंदगी के कुछ खुशनुमा पलों की यादें रची-बसी होती हैं.  ये यादें ऐसी धरोहर होती हैं, जो आपके जमीर को मरने नहीं देतीं. ये यादें ही जमीर को जिंदा रखती हैं और आपको ऊर्जावान व संजीदा बनाये रखती हैं. अभी शहर से लेकर गांव तक दीपावली-धनतेरस को लेकर बाजार गरम है. कोई साजो-सामान खरीद रहा तो कोई गिफ्ट,  कोई पूजा-पाठ की तैयारियों में मग्न है तो कोई व्यापार में तल्लीन. प्रशासन चाहे कितना भी आगाह कर ले, लाखों-करोड़ों रुपये के पटाखे हवा में उड़ाये जाएंगे. यह जानते हुए भी कि यह न सिर्फ पैसे की बरबादी है बल्कि प्रदूषण की वजह भी. कोई मानता नहीं है. मेरी बेटी तेज आवाज वाले पटाखों से तो डरती है पर फुलझड़ी और रंग-बिरंगी रोशनी वाले आइटम उसे बेहद पसंद हैं. मुङो याद है, मैंने भी बचपन में खूब पटाखे चलाये हैं. छोटे चाचाजी (काका) कोलकाता से मेरे लिए ‘स्पेशल’ पटाखे लाते थे. साथ में ढेरों टॉफियां भी, जिन्हें मैं मित्रों को भी खिलाता था. हम सफल होने की जल्दबाजी में जो सबसे महत्वपूर्ण चीज खो रहे हैं वह है रिश्ते-नाते. आप सफलता की चाहे जितनी सीढ़ियां चढ़ लें, कुछ रिश्ते आपको सदा ही लुभाते हैं. मेरे बचपन की स्मृतियों में भी कुछ ऐसे ही रिश्ते बसे हैं. मैं अपने पिताजी के बजाय चाचा लोगों के बहुत करीब रहा. पेशे से शिक्षक रहे बड़े चाचाजी से मिला अपार स्नेह आज भी मेरी जिंदगी की धरोहर है. मैं सोचता हूं क्या हम अपने बच्चों को संयुक्त परिवार के स्नेह की वह खुशबू दे पा रहे हैं! एकल परिवार की व्यवस्था में यह सब शायद एक सपने की तरह है. भाई और बहनों से भरा-पूरा परिवार, दादी का लाड़-प्यार सब कुछ आज एक सपना ही तो है. छठ के अवसर पर मां के हाथ का बना ठेकुआ का स्वाद आज के किसी भी महंगी मिठाई में मिलना नामुमकिन है. मां के साथ शाम और सुबह के अघ्र्य के वक्त छठ घाट जाने में जो खुशी मिलती थी वह किसी पर्यटन स्थल पर जाकर हासिल नहीं हो सकती. रिश्तों के स्मरण की बात चल रही है तो एक हालिया घटना का जिक्र छेड़ना जरूरी हो जाता है. चार दिन पहले की बात है, रायपुर में रह रहे मेरे बचपन के एक मित्र सुबोध (राणा) ने फोन किया. बोला पहचान रहे हो या नहीं? मैं थोड़ी देर के लिए हतप्रभ रह गया. मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या प्रतिक्रिया दूं. अचानक से ढेर सारी स्मृतियां उमड़ने-घुमड़ने लगी. लंबी बातचीत के बाद मैंने उसे फोन करने के लिए धन्यवाद दिया. वाकई, रिश्तों का रिनुअल करना कितना अच्छा है, जरूरी है! आइये, इस दीपावली एक खूबसूरत पहल करें.

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

ये सोना अगर मिल भी जाये तो क्या है?

दुर्गापूजा का उफान फैलिन तूफान से भी फींका नहीं पड़ा. रेनकोट पहने और छाता लगाये श्रद्धालुओं का रेला जगह-जगह मेलों में देखा जा सकता था. धर्म-अध्यात्म के जानकार बताते हैं कि ऐसे त्योहारों, आयोजनों के दौरान लोगों का उत्साह दोगुना हो जाता है. ‘कुंडलिनी’ जाग्रत हो जाती है. मैंने भी इसे ‘महसूस’ किया. महिलाओं-बच्चे, बीमार- स्वस्थ, बड़े-बूढ़े सभी उत्साह से लबरेज दिखे. यहां तक कि चोर-उचक्के भी. दुर्गापूजा के दौरान लौहनगरी में चोरी-लूट की घटनाएं भी बढ गयी थीं. किसी का पर्स चोरी, तो किसी का जेवर. किसी की स्कूटी चुरा ली, तो किसी की कार गायब कर दी.
मेला देखने के जोश में होश खो बैठी श्रीमती जी का मंगलसूत्र किसी उचक्के ने उड़ा लिया. उन्हें दुखी देख कर मैंने समझाने की कोशिश की- ‘इसमें इतना अफसोस करने की क्या बात? त्योहार का दिन है, इंज्वाय करो.’ वह बोलीं- ‘क्या खाक इंज्वाय करूं, माता के दरबार में आयी थी और ऐसा हो गया.’ मैंने कहा- ‘कोई जरूरतमंद रहा होगा, माता ने उसकी सुन ली. अब चलो, दूसरा ले लेना.’ श्रीमती जी मां चंडी की तरह मुझ पर बरस पड़ीं- ‘दूसरा कहां से ले लेंगे. इस महंगाई में दो वक्त की सब्जी तो खरीद नहीं पाते, जेवर कहां से खरीद लेंगे?’
मैंने अपना ज्ञान (या शायद अज्ञान) बघारने की कोशिश की. सोचा कि शायद इससे बात बन जाये. बोला- ‘देखो, उन्नाव (उत्तर प्रदेश) में 1000 टन सोना मिलने वाला है. आज के बाजार मूल्य के मुताबिक, इस सोने की कीमत तीन लाख करोड़ रुपये होगी. हमारे रिजर्व बैंक के पास 550 टन सोने का रिजर्व है और वह इस मामले में दुनिया में 11वें नंबर पर है.  खजाने से मिलने वाले सोने को जोड़ देने पर आरबीआइ दुनिया में 8वें नंबर पर आ जायेगा. इससे हमारे रु पये की आंतरिक कीमत भी बढ़ जायेगी. कुल मिला कर कहें, तो हमारा देश अमीर हो जायेगा. सोने की कीमत घट जायेगी. इस प्रकार इसे आम आदमी भी आसानी से खरीद पायेगा.’ पर वह कहां मानने वाली थीं. बोलीं- ‘जिस देश में आालू-प्याज आम आदमी की पहुंच से दूर हो, वहां सोना किस प्रकार सहजता से उपलब्ध होगा? कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाले इस देश में आज चिड़िया जितना भी सोना नहीं रहा.’ मैं चुप हो गया. मुङो इसी में अपनी भलाई लगी.
अब भला उन्हें कौन समझाये कि हमारा देश साधु-संतों का देश है. संत जो कह दें, वह पत्थर की लकीर होती है. आखिर शोभन सरकार ने जो सपना देखा है, वह गलत तो नहीं होगा. हम ताउम्र देखे-अनदेखे सपनों को पूरा करने के लिए ही तो भागते रहते हैं. वैसे राजनीति के जानकार यह भी कह रहे हैं कि इस सोने की खुदाई के पीछे नेताजी (मुलायम सिंह यादव) का दिमाग है. आगामी लोस चुनाव में ‘मोदी प्रकोप’ से बचने के लिए नेताजी का यह ‘खोदी दावं’ है.