सोमवार, 26 नवंबर 2012

आम आदमी (मैंगो मैन) की खास बातें

भले ही ‘खास’ लोगों की नजर में आम आदमी यानी ‘मैंगो मैन’ की कोई औकात नहीं होती हो, पर मुङो लगता है कि ‘मैंगो मैन’ होना कोई आसान बात नहीं है. अब देखिए न! अपनी गाढ़ी कमाई और काफी जुगाड़-जतन से जो उसने कभी रसोई गैस का कनेक्शन लिया था, उसका पंजीकरण बचाने के लिए अनिवार्य किये गये केवाईसी फॉर्म भरने के बाद वह खुद को ऐसा गौरवान्वित महसूस करता है मानो उसने केबीसी (कौन बनेगा करोड़पति) का एंट्री फॉर्म भर दिया हो. फ्री में मिलने वाला केवाईसी फॉर्म भी वह बगल की फोटोकॉपी सेंटर से पांच रुपये में खुशी-खुशी खरीदता है. जब उसे पता चलता है कि इस फॉर्म पर तो फोटो भी चिपकाना है, तो उसकी बांछे खिल उठती हैं. हां भई! आखिरी फोटो उसने शादी में खिंचवाई थी, जो अब घर के किसी कोने में पड़े-पड़े रंग से बदरंग हो चुकी है. अब फोटो स्टूडियो वाले की अपनी मरजी. वह भी सिर्फ एक फोटो तो खींचेगा नहीं. बोला- देखो जी! तीस रुपये में तीन फोटो दूंगा.‘मैंगो मैन’ खुश हो गया. इसी बहाने दो फोटो एक्सट्रा हो जायेंगे.

छठ-दीपावली मनाने लोगबाग अपने-अपने घर आये हुए हैं. कोलकाता-मुंबई हो या दिल्ली. बिहार आने-जाने वाली सभी ट्रेनें ठसाठस भरी हुई हैं. वैसे यह कालजयी परंपरा है. क्योंकि ‘मैंगो मैन’ ट्रेन में रिजव्रेशन (आरक्षण) नहीं करवाता. भई! ट्रेन हुई सार्वजनिक संपत्ति. मतलब जितनी तेरी उतनी ही मेरी तो भला इसमें आरक्षण क्या करवाना? वैसे भी ट्रेनों में जब तक भीड़ न हो सफर का मजा अधूरा रह जाता है. और जिसने बर्थ आरक्षित करा ही रखी है, उसको ही कौन से मजे आ रहे हैं. वह बेचारा किनारे हो कर दुबक कर बैठा है. बिना टिकट वाला उसी की बर्थ पर सो रहा है. आखिर छठ मइया का ठेकुआ खाना इतना आसान थोड़े ही न है!

‘मैंगो मैन’ की अपनी कुछ खासियत होती है. उसे सपने भी भीड़भाड़ के ही आते हैं. जैसे राशन के लिए लाइन लगा कर खड़ा है. बीमार बच्चे के इलाज के लिए अस्पताल में अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा है. रेलवे स्टेशन पर शौचालय का उपयोग करने के लिए सात लोगों के पीछे शांत हो कर पंक्तिबद्ध है..आदि-आदि. जब कोई ‘मैंगो मैन’ एक साथ इतनी जद्दोजहद कर रहा हो, तो वह भला खुद को स्विट्जरलैंड की वादियों में कटरीना कैफ के साथ गाना गाते हुए कैसे देख सकता है?

उसे तो सब्जी से लेकर शादी तक में सब्सिडी हासिल करने की लड़ाई लड़नी पड़ती है. घर से हजार-दो हजार किलोमीटर दूर रहनेवाला ‘मैंगो मैन’ ठेकुआ खाने के लिए छठ मइया के घाट पर नंगे पांव पहुंचता है. क्या यह खास बात नहीं है? इसीलिए ‘मैंगो मैन’ खास है.

बुधवार, 7 नवंबर 2012

बाजार के ताल पर नाचतीं कठपुतलियां

पिछले दस वर्षो के अधिकतर हिट या सुपरहिट बॉलीवुड गीतों को याद कीजिए. इनमें से अधिकतर (लगभग 99 फीसदी) महिला केंद्रित हैं. ये गीत महिलाओं की पीड़ा, समस्याओं, मुद्दों को उठाने के लिए नहीं, बल्कि पुरुष मानसिकता को रिझाने या उकसाने के लिए बनाये जाते हैं. सिर्फ गीत ही क्यों? तमाम तरह के विज्ञापनों पर गौर फरमाइए, तो तसवीर और भी साफ हो जायेगी.

18 अगेन..! बाजार में पेश यह नया उत्पाद है, उन महिलाओं के लिए है जो पच्चीस-तीस-पैंतीस या शायद उससेज्यादा उम्र की हो चुकी हैं. इस उत्पाद के प्रचार के लिए दो रूपकों का इस्तेमाल हो रहा है. पूरे पन्ने के अखबारी विज्ञापन में एक पूरा खिला गुलाब और (इसके इस्तेमाल के बाद) नीचे गुलाब की ‘सख्त’ कली. यह क्रीम पूरे खिले गुलाब को ‘कली’ बनाती है. टीवी पर इसके विज्ञापन में एक महिला गाती है- ‘आइ एम 18 अगेन, फीलिंग..अगेन.’ यह एक उदाहरण मात्र है कि बाजार किस तरह हमारी जिंदगी को नियंत्रित कर रहा है. प्रोडक्ट किस तरफ हमारे निजी रिश्तों की दशा-दिशा तय करने की कोशिश में लगे हैं. शायद ही इस बात से कोई इनकार करे कि आप टेलीविजन देखते समय अपने बच्चों को आसपास नहीं रखना चाहते. क्योंकि जब आप अपना पसंदीदा कार्यक्रम देख रहे होते हैं तो इस बात का सदैव खतरा बना रहता है कि पता नहीं कब आपके टीवी स्क्रीन पर कंडोम का कोई अश्लील विज्ञापन नमूदार हो जाये. न जाने कब कोई पुरुष मॉडल किसी मल्टीनेशनल कंपनी का परफ्यूम या डियोड्रेंट लगा कर दर्जन भर युवतियों या महिलाओं को अपनी ओर ‘आकर्षित’ करने का ‘करतब’ दिखाने लगे. ऐसे में खतरा यह बना रहता है कि अगर आपके बच्चे ने ऐसे किसी भी विज्ञापन को अगर गौर से देख लिया और आपसे जिज्ञासा भरा कोई सवाल पूछ दिया तो आप क्या करेंगे? दरअसल, आज हमारी जिंदगी में रहन-सहन, संस्कृति, बोल-चाल, पर्व-त्योहार, सुख-दु:ख, हंसी-खुशी सबकुछ बाजार नियंत्रित हो गया है.

अब देखिए न दीपावली आ गयी है यह आपको बाजार बता रहा है. भारी डिस्काउंट से लदे बड़े-बड़े होर्डिग, कई-कई पेजों के अखबारी विज्ञापन, टेलीविजन पर आकर्षक विज्ञापनों की भरमार यह सबकुछ आपके लिए है. आपको यह बताने के लिए कि आप खर्च करने को तैयार हो जाइए. अभी-अभी दुर्गापूजा खत्म हुई है. मार्केट में खरीदारों की भीड़ देख कर यह भरोसा ही नहीं होता कि ये वही लोग हैं जो रसोई गैस या डीजल-पेट्रोल की कीमत बढने से गृहस्थी के डांवाडोल होने का रोना रोते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा अब खुद पर नियंत्रण रहा ही नहीं. हम किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की तरह हो गये हैं जिसे हर वह शख्स संचालित कर सकता है जिसके हाथ में रिमोट हो!

रविवार, 4 नवंबर 2012

सक्सेस होना है तो इन छह किस्म के लोगों को बनाएं मित्र

यदि आप सक्सेस होना चाहते हैं तो अपनी मित्रमंडली में छह किस्म के लोगों को शामिल करें. विशेषज्ञों का दावा है कि आपकी मित्रमंडली में छह किस्म के लोग होने चाहिए.

1. जो आपसे ज्यादा ठंडे दिमाग का हो.

2. जो आपसे ज्यादा साहसी हो.

3. जो ऐसा शख्स हो जिसकी तरह आप बनना चाहते हों.

4. जो आपके बाकी किसी दोस्त के बारे में न जानता हो.

5. जो निहायत ही ईमानदार हो.

6. जिसे आप खुद से भी ज्यादा जानते हों.

हाल ही में मेलबर्न में किये गये एक रिसर्च के बाद द पॉजिटिविटी इंस्टीट्यूट के मनोवैज्ञानिक डॉ. सूजी ग्रीन ने बताया, विविधता होना बहुत जरुरी है और यह भी बहुत जरुरी है कि जब वक्त आए तो आपको अलग-अलग सोर्स  से मदद मिल सके. ग्रीन का कहना है, ‘‘ऐसी चीजों से हम अपनी जिंदगी जिंदादिली से जीते हैं और हमारा नजरिया भी काफी अलग होता है. अलग-अलग तरह के दोस्त हमारी जिंदगी खुशियों से भर देते हैं.’’

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

सवालों के इस मौसम में एक मासूम सवाल

आज कल देश में जिसे देखो सवाल पूछता नजर आ रहा है. बाबा रामदेव से शुरु हुई यह परंपरा अन्ना हजारे से होते हुए अरविंद केजरीवाल तक आ पहुंची. अब कुछ लोग अरविंद केजरीवाल से भी सवाल पूछ रहे हैं- बताओ, आंदोलनकारी हो या उदारवादी? इस पर केजरीवाल ने तपाक से कहा-मैं एनी कोहली (प्रश्नकर्ता) को नहीं जानता इसलिए मैं उनके सवालों के उत्तर देने को जवाबदेह नहीं हूं. मेरी बेटी अक्सर मुझसे सवाल पूछती है. शुक्र है भाई केजरीवाल के पास सवाल से बचने को एक विकल्प तो है पर मेरे पास तो वह भी नहीं है. मुङो मेरी बेटी के हर सवाल का जवाब देना पड़ता है वह भी ईमानदारी से और उसी समय. वरना वह नाराज हो जाती है, और मैं उसे नाराज या दुखी नहीं करना चाहता. सवाल कभी भोलेपन से भरे तो कभी शरारत से सराबोर.

खैर, रोजमर्रा की जदोजहद से दो-चार होते कुछ सवाल मेरे जेहन में भी उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं. कभी-कभी ये सवाल इतने घनीभूत हो उठते हैं कि जवाब पा लेने को मन आतूर हो उठता है. एक वाकया पेश है- दवा दुकान पर करीब 20 साल का एक युवक अपनी मां के साथ आया. दुकान में भीड़ थी. इतने में मोबाइल की घंटी बजी उसने जेब से जैसे ही अपना मोबाइल निकाला वह जमीन पर गिरा और बिखर गया. युवक बेचैन हो उठा, अपनी मां पर चिखने-चिल्लाने लगा. दुकान पर खड़े ग्राहक उसकी ओर देखने लगे. बीमार मां असहज हो उठी. उसे समझ में नहीं आ रहा था वह उसे कैसे शांत करे. थोड़ी देर बड़बड़ाने के बाद युवक वहां से बाहर आया और अपनी पल्सर बाइक से तेजी से कहीं निकल गया. उसकी मां निढाल हो कर दुकान में रखी एक टूटी प्लास्टिक चेयर पर बैठ गयी. मेरी जिज्ञासा बढ गयी थी. मैंने पास जाकर पूछा मैडम, वह आपको यूं छोड़कर कहां चला गया. जवाब मिला ‘वह मेरा इकलौता बेटा है. मैं एक सप्ताह से बीमार हूं. बहुत कहने पर वह मुङो डॉक्टर के पास लेकर आया था. यहां उसकी महंगी मोबाइल गिरने से टूट गयी. वह उसे बनवाने गया है.’ ‘और आप?’ ‘मेरा क्या, मैं ऑटो करके घर चली जाउंगी.’ मैं सोचने लगा- क्या जिंदगी में मोबाइल की अहमियत मां से ज्यादा है? वह युवक मोबाइल खराब होने से इतना बेचैन हो उठा पर मां की तबियत खराब होने से उस पर कोई अंतर क्यों नहीं पड़ा?

क्या मनुष्य केवल देह है जो मात्र भौतिक सुखों से संतुष्ट हो जाये? हमारे भीतर की चेतना, संवेदनशीलता, प्रेम, करुणा, दया, सहानुभूति कहां विलुप्त हो गयी? क्या भोगवादी इस अवधारणा में इन अनुभवों के लिए कोई जगह नहीं है? क्या यह केवल दैहिक सुखों पर टिकी है? इन हालात पर तो कवि प्रदीप की पंक्तियां याद आ रही हैं-देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान!

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

अथ श्री जमाई कथा

बचपन से ही मुङो शादी का बहुत क्रेेज था. सोचता था जब मेरी शादी होगी मैं भी किसी का दामाद बनूंगा. खूब आवभगत होगी. मैं भी ‘दामादगीरी’ का खूब लुत्फ उठाऊंगा. पर, अफसोस कि शादी तो हुई पर ‘दामादगीरी’ का लुत्फ उठाने का वह ‘सुअवसर’ न मिल सका. इस बात का जिक्र मैं यहां इसलिए कर रहा हूं क्योंकि देश में इन दिनों एक जमाई राजा ने धमाल मचा रखा है. इस देश में तो हर जमाई, राजा होता है, तो राजा के जमाई का क्या कहना. कुछ ‘दामाद’ उनसे इसलिए खुन्नस खाये हुए हैं कि क्योंकि उनको वैसा मौका न मिला. खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर कुछ लोग उन्हें ‘राष्ट्रीय दामाद’ कह रहे हैं तो कुछ ‘सरकारी दामाद’. अजी, मैं पूछता हूं इसमें नया क्या है? सरकारी दामादों की परंपरा तो अंगरेजों के जमाने से चली आ रही है. वैसे भी बड़े-बुजुर्ग कह गये हैं—बेटियां परायी ‘धन’ होती हैं और दामाद सबसे ‘सम्माननीय’. भारतीय परंपरा में दामादों का बहुत महत्व रहा है, आज से नहीं प्राचीनकाल से ही.


जमाइयों की बात चली है तो मुङो याद आ रहा है गांव-जवार में कुछ घरजमाइयों को मैं भी जानता हूं. और कुछ हो न हो ये घर जमाई गांव-जवार के लोगों के मनोरंजन का साधन अवश्य होते हैं. इनसे हंसी-मजाक, ठिठोली करने और तंज कसने से कोई बाज नहीं आता. इनमें से कुछ तो जिंदादिल होते हैं जो यह सब ङोल जाते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो बात-बात पर बिफर जाते हैं. नतीजा झगड़ा-फसाद, बवाल और मनमुटाव. खैर ताना मारने वाले इस सबकी परवाह कहां करते हैं. दामादों को मेहमान भी कहा जाता है. अब जो दामाद घरजमाई ही बन गया वह कैसा मेहमान और कैसी उसकी मेहमानवाजी? वह खायेगा भी और खिलायेगा भी. वह सुनेगा भी और सुनायेगा भी. वह जो मरजी सो करेगा. आखिर घरजमाई जो ठहरा. वह काजू भी खायेगा और करैला भी. ‘फ्यूचर डिपेंड ऑन योर सिचुएशन’.

बहरहाल, हम जमी-जमाई अवधारणा से बाहर आते हैं और फ्रेश बात करते हैं. अगर आप शादीशुदा हैं तो सिवाय अफसोस करने के आपके पास कोई और विकल्प है नहीं. हां, खुशकिस्मत हैं वे जिनकी अभी तक शादी नहीं हुई. वह इसलिए क्योंकि उनमें अभी भरपूर संभावना बची है. सच कह रहा हूं. संभावना जमाई राजा बनने की, संभावना दामाद बनने की, संभावना घर जमाई बनने की. संभावना वह सब कुछ पा लेने की जिससे वह अभी तक वंचित हैं. मैं आग्रह और अपील करूंगा ऐसे तमाम संभावनाशील साथियों से कि अगर आपके लिए भी शादी जिंदगी में सिर्फ एक बार होनेवाली घटना है तो उसे सोच-समझ कर घटित होने दें. अपनी ‘दीन-दशा’ सुधारने के लिए रॉबर्ट वाड्रा की तरह किसी धन-संपदा से परिपूर्ण और राजनीतिक परिवार की सुयोग्य कन्या से सुनियोजित विवाह करें. तथास्तु!!!

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

पति बनने से पहले करोड़पति बनना जरूरी

मेरे एक अविवाहित मित्र हैं. उन्हें देख कर मुङो खुद पर बड़ी कोफ्त होती है. उनसे जब भी शादी की बात करो, तो बोलते हैं,‘‘अभी तैयारी कर रहा हूं.’’ एक दिन मैंने उनसे पूछ ही लिया. मित्र आखिर इतने वर्षो से आप तैयारी ही कर रहे हो, आखिर यह ‘तैयारी’ है क्या? बोले,‘‘महंगाई का जमाना है. गृहस्थी जमाने के लिए पैसे इकट्ठे कर रहा हूं. पति बनने से पहले करोड़पति तो बन जाऊं.’’ मैं सोच में पड़ गया कि कितना मूर्ख हूं, बिना करोड़पति बने ही पति बन गया. नतीजा सामने है. आटा-दाल के भाव की रोज-रोज की चिंता में सिर के बाल उड़ गये.

अभी इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि टीवी पर बिग बी का बहुचर्चित शो कौन बनेगा करोड़पति शुरू हो गया. पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर इस कार्यक्रम के धुआंधार प्रचार का मेरी श्रीमती जी पर भयानक असर हुआ है. एक दिन देखा कि जनरल नॉलेज की ढेर सारी पुस्तकें खरीद कर ले आयी हैं. सुबह-शाम जब देखो उसी में डूबी रहती हैं. अक्सर घर के कोने में पड़ा रहनेवाला उपेक्षित अखबार भी उनको भाने लगा. मुङो घोर अचरज हुआ. यह चमत्कार हुआ कैसे? लेकिन यह बदलाव अच्छा भी लगा. सोचा, छोड़ो कम से कम पढ़ने में रुचि तो हुई, वरना पहले तो हमेशा सास-बहू वाले टीवी सीरियल में आंखें गड़ाये रहती थीं.

उस दिन मेरा साप्ताहिक अवकाश था. सुबह के नौ बज रहे होंगे. मेरी बेटी ने मुङो जगाते हुए पूछा, ‘‘हू इज प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया?’’ मैंने करवट बदलते हुए कहा, ‘‘मम्मी के पास जाओ.’’ पर वह डटी रही, बोली-‘‘नहीं पापा, आप ही बताओ.’’ मैंने कहा,‘‘डॉ मनमोहन सिंह.’’ बोली, ‘‘यू आर राइट़ अच्छा अब नेक्स्ट क्वेश्चन..’’ मैंने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ‘‘बेटा अभी जाओ, सोने दो.’’ खैर वह चली गयी, पर मेरी नींद गायब हो गयी. थोड़ी देर बाद मैं उठा और आदतन अखबार ढूंढ़ते हुए बालकनी में पहुंचा. इतने में दूसरे कमरे से श्रीमती जी अखबार लहराते हुए निकलीं और लाल-पीला होते हुए सवाल दागा,‘‘सलमान खान की हालिया रिलीज सुपर-डुपर हिट फिल्म टाइगर के डाइरेक्टर का नाम बताओ?’

मुङो झुंझलाहट हुई कि आज सुबह-सुबह मां-बेटी को आखिर हुआ क्या है. सवाल पर सवाल किये जा रही हैं. इतने में श्रीमती जी बरस पड़ीं,‘‘अखबार में नौकरी करने से जिंदगी नहीं चलने वाली. अपने पड़ोसी सिन्हा जी को देखो, कौन बनेगा करोड़पति से 27 लाख जीत कर लौटे हैं. आज से रोज सुबह चाय के साथ अखबार के बदले ये जनरल नॉलेज की किताबें पढ़ना शुरू कर दो. इस सीजन में बिग बी के सामने हॉट सीट पर तुम्हें बैठना ही होगा.’’ उस दिन से कोशिश जारी है, ‘करोड़पति’ बनने की. आप सभी की दुआ चाहिए.

रविवार, 9 सितंबर 2012

माई पापा इज माई एटीएम

माई पापा इज माई एटीएम.. बिष्टुपुर के कमानी सेंटर में एक हमउम्र युवक का हाथ पकड़ कर घूम रही युवती के टी-शर्ट पर यही लिखा था. सात वर्षीय मेरी बेटी ने उस स्लोगन को पढने के बाद मुस्कराते हुए मेरा ध्यान उसकी ओर आकृष्ट कराया तो मेरे चेहरे से मुस्कराहट गायब हो गई. पापा जो बचपन में हमारा ख्याल रखते हैं. पापा जो युवावस्था में हमें सही मार्ग दिखाते हैं और दुनिया से बचाते हैं. वही पापा एक दिन हमारे लिए ‘वस्तु’ हो जाते हैं. वस्तु, जी हां क्योंकि किसी वस्तु का ही हम उपयोग करते हैं. जिनसे हमें प्यार होता है, उनके लिए तो हमारे दिल में सम्मान और समर्पण की भावना होती है, लेकिन आधुनिकता की होड़ में शामिल युवा पीढी में मां-बाप को सिर्फ ‘वस्तु’ बनाने की होड़ है. मानसिकता सिर्फ पाने की, बदले में कुछ देने की नहीं. माई पापा इज माई एटीएम.. महज टी-शर्ट पर लिखा एक स्लोगन भर नहीं है. यह यंग जेनरेशन की सोच को प्रतिबिंबित करता एक वाक्य भी है जिसके गंभीर निहितार्थ हैं.

एक भयावह तथ्य से आपको वाकिफ कराता चलूं. केवल जमशेदपुर ही नहीं झारखंड व बिहार के दूसरे शहरों तथा कोलकाता के साथ-साथ दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई, पुणो, चेन्नई, कटक, भुवनेश्वर सब जगह युवाओं में आत्महत्या की प्रवृति में बेतहासा वृद्धि हो रही है. जमशेदपुर में तो महीने के तीसो दिन यानि, औसतन हर रोज आत्महत्या की कोई न कोई घटना जरू र होती है. कभी पॉकेटमनी के लिए, कभी खेलने से मना करने पर, कभी स्कूटी न खरीदने पर, कभी नये मोबाइल के लिए.. और न जाने कितने बेवजह कारण. हद तो यह कि मां-बाप की जरा-सी भी बात बरदाश्त नहीं होती. संवादहीनता का दायरा व्यापक होता जा रहा है. दोस्तों से फोन पर घंटों बातें करने में कोई गुरेज नहीं रखने वाले बच्चों को अपने अभिभावकों से बात करने में जाने कैसी हिचक होती है. हां, इनकी जिंदगी में सबसे अहम कोई चीज है तो वह है मनी (पैसा). पावर और पैसे के पीछे भाग रही यह पीढी रिश्ते-नाते सबको पीछे छोड़ती जा रही है. सोचा, आखिर यह दिशाभ्रम क्यों है? तभी टीवी पर आ रहे एक विज्ञापन का जिंगल मेरे कानों में गुंजने लगा- ‘हर एक फेंड्र जरू री होता है.’ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन आज खुशहाल जीवन के नुस्खे बांट रहे हैं, जिसकी कीमत एक निश्चित रकम से तय होती है. इन विज्ञापनों की कोशिश ‘पैसा बोलता है’ जैसे मुहावरे को जायज ठहराने के साथ उसे स्थापित करने की भी होती है. पैसे के बोलने का मतलब स्नेह, ममता, प्रेम जैसे शब्दों का बाजारीकरण है. क्या सचमूच हमारी जिंदगी में माता-पिता, दादा-दादी, भैया-दीदी, चाचा-चाची के लिए कोई स्थान नहीं रहा. यह क्षरण हमें कहां ले जाएगा?  क्या 'पिज्जा'  हमें ‘पकवान’ से दूर करता जा रहा है?

रविवार, 12 अगस्त 2012

अब, प्रकाशित करें अपनी प्रेम कहानी

क्या आप कोई कहानी लिखने की सोच रहे हैं, और वह भी प्रेम कहानी? बिल्कुल लिखिये क्योंकि इसे आप आसानी से प्रकाशित करा सकते हैं. अपनी प्रेम कहानी प्रकाशित कराने के लिए आपकी उम्र 18 साल या इससे अधिक होनी चाहिए. आपकी प्रेम कहानी गतिशील, प्रेरक, दिल को छू लेने वाली होनी चाहिए और वह भी कम से कम 3,000 शब्दों में.
पेंगुइन इंडिया एक स्पर्धा लव स्टोरीज दैट टच्ड माई हार्टआयोजित कर रहा है. पुरस्कार के लिए प्रविष्टियों का चयन कैन लव हैप्पन ट्वाइजके बेस्टसेलिंग लेखक रविन्दर सिह और पेंगुइन के संपादक करेंगे. पुरस्कृत कहानियां संकलन के तौर पर दिसंबर तक प्रकाशित की जाएंगी. पेंगुइन बुक्स इंडिया की वरिष्ठ संपादक वैशाली माथुर ने प्रेस ट्रस्ट से कहा ‘‘हम इस स्पर्धा के माध्यम से नए लेखकों की खोज की संभावना से रोमांचित हैं. यह स्पर्धा नए लेखकों के लिए अपनी रचनाएं प्रकाशित कराने का अच्छा मौका है.’’ (भाषा)

शनिवार, 11 अगस्त 2012

यशप्रार्थियों के लिए अनुकरणीय हैं राधे मां

धन के साथ नाम भी हो, ऐसी ख्वाहिश अमूमन हर शख्स पालता है. ‘नाम’ और ‘नामा’ एकसाथ बहुसंख्य लोगों की किस्मत में नहीं होते. कुछ ताउम्र धन कमाने में ही संलग्न रहते हैं, नाम कमाने की उनमें इच्छा ही नहीं होती. कुछ भद्रजन केवल नाम ही कमाना चाहते हैं. खुद नाम न पैदा कर सके तो पैदा किए हुए से उम्मीद पालते हैं- मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राजदुलारा. शोहरत जब बुलंदियों को छूती है, तो आदमी को लगता है कि उसका जीवन सार्थक हुआ. गली की प्रधानी से लेकर देश की प्रधानी के पीछे यही दीवानगी है. कवि-लेखक नाम चमकाने के चक्कर में मसि-कागद के सिलबट्टे पर अक्ल घिसते हैं. हालांकि टन भर अक्ल खर्च करने के बाद यह नाचीज प्राणी छटांक भर इज्जत ही अर्जित कर पाता है. वह भी जरूरी नहीं कि जीते जी मिले. कइयों का नंबर मरणोपरांत आता है. आजीवन कहीं न छप पाने के क्षोभ में कई कवि/लेखक बाद के दिनों में प्रकाशक बन गये. इन्होंने नाम और नामा का महत्व समझा और छपने की खुजली से त्रस्त कई नामचीनों को दाम लेकर नाम दिया.

हाल के वर्षो में कुछ चेहरों ने जिस तरह से नाम ‘कमाया’ है, वह अनुकरणीय हो या न हो, ‘स्मरणीय’ अवश्य है. इनमें मॉडल पूनम पांडेय, पोर्न स्टार सनी लियोनी, निर्मल बाबा और अध्यात्म जगत की नयी सनसनी राधे मां का नाम उल्लेखनीय है. वास्तविकता तो यह है कि एक खास तबका इन नये अवतारों का सर्वाधिक मुखर प्रशंसक और समर्थक है. वैसे भी इस उम्रवालों को ‘मन-मन भावे मुड़िया हिलावे’ वाली डिप्लोमेसी आती ही नहीं.

दरअसल, राधे मां ने ख्याति का वो शार्टकट अपनाया है, जहां कामयाबी के गंतव्य तक पहुंचना असंदिग्ध और न्यूनतम जोखिम से भरा होता है. वह इस रास्ते की न तो निर्माता हैं, न कोलंबस सरीखी अन्वेषक ही. यह शार्टकट तो सदियों से वहीं का वहीं है बस इसे अब एक नाम मिल गया है. इतिहास गवाह है कि हर युग में समाज दुस्साहसियों की तीव्र आलोचना और विरोध के साथ सराहना और अनुसरण भी करता आया है. समय चाहे जितना बदल चुका हो, राधे मां को चाहने और दुत्कारने वाले दोनों हैं. राधे मां के ‘आइ लव यू फ्रॉम द बॉटम ऑफ माइ हार्ट’ जैसे जुमलों पर अमेरिका से लेकर अमृतसर तक और मुंबई से लेकर मुरी तक के ‘भक्त’ जान छिड़क रहे हैं.

राधे मां महामंडलेश्वर रहें या ना रहें, इससे उनके चहेतों को कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं है. यकीनन उनके चाहने वालों का बहुमत उनके साथ है. पूनम पांडेय और राधे मां सरीखे नाम कमानेवाले यशस्वियों को आप सराहें या कोसें, पर भुला नहीं पायेंगे. वह अनेक संघर्षरत यशप्रार्थियों के लिए प्रेरणादायक हैं और अनुकरणीय भी!

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

खाली ‘तरकश’ से मेडल नहीं मिला करते

ओलिंपिक के लिए जाने से पहले से भारतीय तीरंदाजों को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे. पर वे उन्हें हकीकत में बदलने में पूरी तरह नाकाम रहे. इससे ज्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है कि जिन स्टार खिलाड़ियों से गोल्ड की उम्मीद की जा रही थी, वे क्वालिफाई करने में भी नाकाम रहे. हमारे खिलाड़ियों के लिए जब खेल से ज्यादा अपने हित महत्वपूर्ण होने लगें, जिम्मेदारी व अनुशासन का कोई दायरा उन्हें बांध न सके, तो फिर भला जीत की उम्मीद कैसे की जा सकती है? जीत मिल गई, तो अपनी ताकत की वजह से कम, सामने वाले की कमजोरी से अधिक.

अतिआत्मविश्वास ने डूबोया

भारतीय तीरंदाजी टीम ने लंदन ओलिंपिक में करोड़ों खेल प्रेमियों को जिस तरह से निराशा किया है वह निंदनीय है. क्वालिफाइंग राउंड से ही खासकर महिला तीरंदाजों में न तो एकाग्रता नजर आई और न ही वह कूबत जिसकी उम्मीद भारतवासी कर रहे थे. हमारे सभी
धुरंधरतीरंदाज अपने प्रतिद्वंदियों के सामने ढेर होते नजर आए. सबसे ज्यादा निराश किया महिला तीरंदाजों ने. उसमें भी लोग दीपिका से कुछ ज्यादा ही दुखी हैं, क्योंकि वह तो दुनिया की नंबर एक तीरंदाज हैं. यह खिताब ओलिंपिक में जाने से कुछ दिन पूर्व ही उन्हें हासिल हुआ था. अफसोस कि दीपिका ने उसकी गरिमा को बरकरार नहीं रखा. आत्मविश्वास तो ठीक है, लेकिन अतिआत्मविश्वास ने दीपिका को डूबो दिया. ओलिंपिक के लिए रवाना होने से पूर्व दीपिका ने कहा था ओलिंपिक कोई भूत नहीं है, जिससे डर लगेगा.अब शायद उन्हें यह अहसास भली भांति हो गया होगा कि ओलिंपिक क्या बला है. जीत का दंभ भरने और जीतने में फर्क भी उन्हें मालूम हो गया होगा. उन्हें यह भी मालूम हो गया होगा कि ओलिंपिक का मेडल पाने के लिए लक्ष्य भेदना पड़ता है सही निशाना लगाना पड़ता है. इसके लिए तीरंदाज के तरकश में कैसा तीरहोना चाहिए. भारतीय तीरंदाजों का तरकशतो खाली था, उन्हें भला मेडल कैसे मिलता? यह सवाल वे जब खुद से करेंगे तो इसका जवाब उन्हें खुद-ब-खुद मिल जाएगा कि क्या उनके तरकश में संकल्प का तीर था, मनोबल का तीर था, एकाग्रता का तीर था, जोश का तीर था. जवाब है नहीं.

ले डूबा अहंकार

काश, भारतीय खिलाड़ी थोड़ा और ज्यादा प्रेशर ङोलने का माद्दा रखते, तो आज ओलिंपिक मेडल लिस्ट में भारत के नाम के आगे लिखे मेडल की संख्या कुछ ज्यादा होती. काश, हमारे तीरंदाज अपनी अभ्यास को और धार देते और एकाग्रता को बनाये रखते तो आज कुछ और बात होती.