शनिवार, 27 मई 2017

हल्दीपोखर का सच

सच का मुलम्मा चढ़ा देने से झूठ नहीं छिपता
थोड़ा फेरबदल करके 
आप उसके नंगापन को ढंक सकते हैं 
अमली जामा नहीं पहना सकते
क्योंकि झूठ नंगा होता है

जो हुआ नागाडीह और हल्दीपोखर में
मारे गये जो लोग
बच्चा चोर तो नहीं ही थे
किसने मारा
क्यों मारा
हो रही जांच
होती रहेगी 
फिलहाल तो
कई घरों की आंच ठंडी है

बूढ़ी मां की आंखों की आखिरी उम्मीद
श्मशानी राख में तब्दील हो गयी
बहन के सपने धुएं हो गये
बच्चों की निर्दोष आंखों ने 
देखें हैं जब से हैवानियत के मंजर
मासूमियत पत्थरा गयी है  
नवब्याहता की सूनी मांग
सच और झूठ के साबित हो जाने से भी
अब सिंदूरी नहीं होगी
अंखुआने से पहले ही 
ठूंठ हो चुका दांपत्य 
अब हरियाली का गीत नहीं गा पायेगा

हाथ जोड़कर जिंदगी की भीख मांगते युवक को देख
क्यों नहीं जगी मानवता
क्यों नहीं सुगबुगायी इंसानियत
बच्चा चोरी की अफवाह में 
हत्या सिर्फ युवकों की नहीं
मानवता की भी हुई है
फिर भी शर्मसार नहीं इंसान
हे भगवान!
हे भगवान!!

- अखिलेश्वर पांडेय

(झारखंड के नागाडीह और हल्दीपोखर में पिछले दिनों बच्चा चोर की अफवाह में छह युवकों की हत्या कर दी गयी) 

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

जब तुम बोल रही थी

सुना मैंने तुम्हें
पर वैसे नहीं 
जैसे तुम कहना चाहती थी
कोशिश की मैंने बहुत
पर कम नहीं कर पाया अहम
आंखे झुका कर
नजरें गड़ा कर
सुनता रहा तुम्हें

तुम बोलती रही
मैं विचरता रहा
बिस्तर की उन सलवटों में
जो छोड़ आयी थी तुम
उस अंधेरे कमरे में
सहलाते हुए अपनी पीठ
मैं महसूस करता रहा
तुम्हारे नर्म हाथों की छूअन
बिखरे बालों को सहलाते हुए
सुना मैंने तुम्हे

तुम बोलती रही
मैं सोचता रहा
तुम्हारी हर हर्फ का
 कोई अलहदा मतलब
तुम्हारी सोच से परे
मैं था वहीं
तुम्हारे पास
जब तुम बोल रही थी
मैं सुन नहीं पाया वह
जो तुम कहना चाहती थी.

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

सच तो यही है!

मेरे दरवाजे की सांकल
मेरे पैरों की बिवाई
मेरे घिसे हुए चप्पल
मेरे अधूरे पड़े खत
मेरे कांपते हुए होठ
मेरी फटी हुई लिहाफ
सब मुझसे नफरत करते हैं
सच कहूं तो-
सिवाय तुम्हारे
कोई नहीं करता मुझसे प्रेम

मैं एक ठहरा हुआ समय हूं
अधूरे पड़े किसी मीनार की तरह
जिसे किसी शहंशाह ने
यूं ही छोड़ दिया
अपनी बेगम की याद में

तुम्हें बुरा तो नहीं लगा
मेरे बारे में जानकर
अगर हां तो-
माफ कर देना मुझे
क्योंकि सच तो यही है! 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

यह कैसा समय है!

अटालिकाओं की छाया ने
हमें बौना बना दिया है
मल्टीप्लेक्स ने छिन ली हमारी मासूमियत
हैरी पॉटर को उड़ान भरते देख
रोमांचित होते हैं हम
बच्चों को खेलने से रोकते हैं
मशीनों की शोर में
दब गयी है भाषा
बंजर हो गयी है
हमारी भावभूमि
अब उगते नहीं उसपर
सुविचार.

सोमवार, 9 जनवरी 2017

भाषा का नट

अखबारनवीस परेशान है-
अनर्गल के समुद्र में
गिर रही है वितर्क की नदियां
तलछट पर इधर-उधर
बिखरे पड़े हैं शब्द
प्रत्यय की टहनी पर बैठा है उल्लू
समास की शाख पर लटका है चमगादड़
कर्म की अवहेलना कर
बैठा है कुक्कुर
क्रिया वहीं खड़ी है चुचपाप
संज्ञा-सर्वनाम नंगे बदन
लेटे हैं रेत पर

हैरान है अखबारनवीस -
यह भाषा का कौन सा देश है
तभी अचानक
लोकप्रियता की रहस्यमयी धुन बजाते
अवतरित होता है
भाषा का नट
डुगडुगी बजाके
शुरू करता है तमाशा
सब दौड़े चले आते हैं
बनाके गोल घेरा
देख रहे अपलक
खेल रहा है भाषा का नट
उछाल रहा अक्षरों को
उपर-नीचे, दायें-बायें
तालियों से गूंज रहा चतुर्दिक
खुश है भाषा का नट.

बुधवार, 4 जनवरी 2017

नये साल का एक सुखद अहसास

नये साल पर मुझे कई बधाई संदेश मिले, मैंने भी कई लोगों को 'हैप्पी न्यू इयर' का मैसेज भेजा. स्मार्टफोन आने के बाद किसी भी खास अवसर पर शुभकामनाएं देना अब बड़ा ही सहज काम हो गया है. चिट्ठी पत्री, ग्रीटिंग्स कार्ड और तो और फोन कॉल करने से भी छुटकारा. एक ही मैसेज सबको फॉरवर्ड करो और काम खत्म. स्मार्टफोन युग से पहले इतने लोगों को शायद ही कभी शुभकामनाएं भेजे जाने का चलन रहा हो! टेक्नोलॉजी ने हमें औपचारिक तो बनाया पर हमसे हमारी असली वाली फिलिंग्स छिन ली. कोई चित्र, विडियो क्लीप, कोई साधारण सा मैसेज, कोई ऑडियो क्लीप जो अमूनन कहीं से आया होता है उसे ही हम फॉरवर्ड करके अपनी औपचारिकता पूरी कर लेते हैं पर कुछ सालों पहले तक ऐसा नहीं था. हम बाकायदा फोन कॉल करके शुभकामना देते थे, भले ही वह कुछ चुनिंदा लोग हों पर अब किसी को कॉल करके 'हैप्पी न्यू इयर' बोलना अजीब लगता है, उसे कैसे लगेगा? यह सोचने के बजाय हम खुद ही इसे एक निकृष्ट कार्य मान कर इससे मुक्ति पा लेते हैं.
सामान्यत: मैं भी इसी का आदी हो गया हूं. सुबह का इंतजार कौन करे, 31 दिसंबर की रात 12 बजे से ही सभी को मैसेज करना शुरू कर दिया (सूची लंबी जो थी). इस बीच कुछ नये लोगों के भी मैसेज आते रहे, उनको भी यथायोग्य जवाबी बधाई संदेश की प्रक्रिया चलती रही. शाम होते-होते मैं निश्चिंत हो चुका था कि चलो यह रस्म भी पूरी हो गई. तभी अचानक हरिवंश सर का फोन कॉल आया. हालांकि निजी तौर पर मेरे लिए यह खुश होने की बात थी पर मैं चौक गया. क्योंकि यह अनप्रीडेक्टिबल था. मेरे हेलो कहते ही दूसरी तरफ से 'हैप्पी न्यू इयर अखिलेश' सुनायी पड़ा. मैंने भी उन्हें नये वर्ष की बधाई दी फिर सामान्य शिष्टाचार के तहत दूसरी बातें भी हुईं, पर यह पहली दफा था जब मैं उनसे बातचीत करते हुए खुद को असहज महसूस कर रहा था. मैं ग्लानि महसूस कर रहा था. मुझे लग रहा था कि किसी ने मेरी चोरी पकड़ ली हो. मैं कोई अपराध करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया हूं!
इस बातचीत के कई घंटे हो चुके हैं पर अभी तक उनकी बातें मेरे कानों में गूंज रही है. 'खुश रहो! अच्छा लगा, तुमसे बात करके.' तब से यही सोच रहा हूं - काश! यह फोन उन्हें मैंने ही कर लिया होता. पर क्या मैं उतना ही सहज हो पाता, जितना वे थे?
पीढ़ियों का अंतर कई बार हमें कई महत्वपूर्ण कामों से पीछे धकेल देता है. हम यंत्रवत खड़े रह जाते हैं और वक्त आगे निकल चुका होता है. क्या यह सच नहीं कि मैसेजिंग में वह फिलिंग्स नहीं जो लाइव बातचीत में है. पर यह फिलिंग्स पीढियों में उत्तरोत्तर कम होता जा रहा है. आज के बच्चे मम्मी-डैडी से भी फोन कॉल के बजाय वाट्सएप, एसएमएस पर ही सहज होते हैं. घर से दूर रहने वाले बच्चे सुबह एक मैसेज मम्मी-डैडी को करके दिनभर की छुट्टी पा जाते हैं, पर बड़े-बुजुर्गों का मन तो बिना आवाज सुने भरता नहीं है.
सलाम है उनकी इन आदतों को. शायद हम नयी पीढ़ी को उनकी इन आदतों ने ही बचाया हुआ है. तभी तो हम अपने अभिभावकों को फोन करें न करें उनके फोन आने पर खुशी जरूर महसूस करते हैं. कभी-कभी अफसोस और ग्लानि भी कि कॉल हमने क्यों नहीं किया? इतनी भी फिलिंग्स बची रहे तो, बची रहेंगी पीढ़ियां, बचे रहेंगे रिश्ते, प्रेम, समाज और हम.

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

सहा भी नहीं जाता, रहा भी नहीं जाता

सच कहिये तो इ राजनीति भी ससुरी बड़ी टूच्ची चीज है. सहा भी नहीं जाता, रहा भी नहीं जाता. लोकतंत्रवासी जानबूझ के मक्खी निगलने के आदी हो चुके हैं. निकम्मे नेताओं को खुद ही वोट देते हैं और फिर पांच बरिस तक गाली देते रहते हैं. अरे, नेता लोगन पर गोसाने से क्या फायदा? उ काहे काम करेगा, संसद हो या बाहर. ओके मरजी, नहीं करेगा काम. किसके डर से करेगा काम. न लोग (जनता) का डर है लोक (संसद) का. सत्ता पक्ष बरजोरी कर रहा और विपक्ष जोकरई. संसद में भूकंप न आ जाये इस डर से राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अकेले में मिलते हैं. पर उ कहे या बताये क्या? मालूम नहीं चल पाता. इ तो गजबे हो गया भईया! दुनिया में एह से बढ़कर अचरज और का होवेगा कि संगीन आरोप लगावे के डूगडूगी पीटे वाला आदमी आरोपी के कान में बुदबुदा के हंसत-खेलत घर आ गवा. असल भूकंप त एही है! अब आप अगर अइसा सोचते हैं कि काम नहीं तो पइसा नहीं (संसद के शीतकालीन सत्र में एक भी दिन काम नहीं हुआ तो सांसदों को उतने दिन का वेतन नहीं मिलना चाहिये) तो सोचते रहिये. किसने मना किया है. टाइम तो आखिर आप ही के पास है. उन लोगन जइसन आप बिजी थोड़ी न हैं! 

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

रोया नहीं एक बार भी

जिंदगी का बोझ उठाया न गया तो
लाश ही कंधे पर उठा ली उसने
सब सोच रहे-
कठकरेजी होगा वह
रोया नहीं एक बार भी
बीवी के मरने पर रोना तो चाहिये था
कैसे रोता वह-
बीवी तो बाद में मरी
मर गयी थी इंसानियत पहले ही
उसके लिए
कैसे रोता वह-
बिटिया जो साथ थी उसके
सयानी सी
उम्र और मन दोनों से
कैसे रोता वह-
दिखावा थोड़े न करना था उसे
मुआवजा थोड़ी न मांगनी थी उसे
शिकायत थोड़ी न करनी थी उसे
कैसे रोता वह
क्यों रोता वह-
जब बीवी ही मर गयी
जब खो दिया उसने आधी जिंदगी
जब जीना ही है बिटिया के लिए
दीना मांझी नहीं, इंद्रजीत है वह
सीख लिया है उसने
कैसे लड़ी जाती है अपनी लड़ाई
दुनियावी बेहयाई को नजरअंदाज करके.

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

घर से भागी हुई लड़कियां

फिल्मकार आनंद एल राय की एक फिल्म आ रही है हैप्पी भाग जाएगी. दर्शकों की रोचकता बढ़ाने के लिए इन दिनों सोशल मीडिया पर रोज नये-नये पोस्टर व फिल्म का टीजर रिलीज किया जा रहा है. जैसा कि फिल्म के टाइटल से ही जाहिर है कि यह फिल्म नायिका के भागने के कथानक पर आधारित है. बॉलीवुड में पहले भी नायिकाओं के भाग जाने पर कई फिल्में बन चुकी हैं. पता नहीं हैप्पी भाग जाएगी में नया क्या है? इसके लिए तो हमें फिल्म के रिलीज होने तक की प्रतीक्षा करनी ही पड़ेगी. पर, यहां बात लड़कियों के भागने के मुद्दे पर.
हर दिन न जाने कितनी हैप्पी भागती है. वह भागती है हैप्पीनेस को पाने के लिए, हैप्पीनेस ढूंढने के लिए, हैप्पीनेस को जीने के लिए, हैप्पीनेस को जानने के लिए. कुछ को मिल जाता है, कई को नहीं मिलता. लड़कियों का भागना हमारे समाज में नयी घटना नहीं है. फिर भी जाने क्यों हर बार इस पर बात उतनी ही शिद्दत से होती है. लेखक, पत्रकार, फिल्मकार, समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी सब के सब हर बार इस मुद्दे पर बात ऐसे करते हैं जैसे कुछ नया या पहली बार हो रहा है. हर दिन के समाचार पत्रों में किसी न किसी लड़की के भाग जाने की खबर जरूर होती है. बल्कि उसके मुकाबले लड़कों के भाग जाने की खबर उतनी नहीं होती. शायद इसलिए क्योंकि घरवाले लड़कों के मुकाबले लड़कियों के भागने पर चिंतित ज्यादा होते हैं. इस वक्त मुझे जाने-माने कवि आलोक धन्वा की मशहूर कविता भागी हुई लड़कियां की कुछ पंक्तियां स्मरण हो रही है-
अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा
कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है.
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कितनी-कितनी लड़कियां
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे अपनी डायरी में
सचमुच की भागी लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है.
वैसे तो भागना एक क्रिया है पर कई बार परिस्थतियोंवश यह कर्म भी बन जाता है. जब कोई लड़की भागती है, लोग उसके कारणों पर कभी नहीं सोचते. सीधे लांछन लगाते हैं उसके चरित्र पर. बिना यह जाने कि जब कोई लड़का भागता है तो हम ऐसा ही क्यों नहीं सोचते. हम आधुनिकता का चाहे जितना भी लबादा ओढ़ लें वैचारिक दरिद्रता हमारा दामन नहीं छोड़ती. क्योंकि पुरुषवादी समाज की सोच ओढ़ते-पहनते हैं हम. यह हमें विरासत में ही मिलता है. सच तो यह है कि किसी भी लड़की के लिए घर से भागने का निर्णय आसान नहीं होता. बार-बार सोचना और काफी कुछ छोड़ना पड़ता है. बावजूद इसके अगर वह भागती है तो सामान्य तौर पर यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि किन कठिन परिस्थितियों में यह निर्णय उसने लिया होगा. तो फिर क्यों घर से भागी हुई लड़कियों के प्रति लोगों की सोच बदल जाती है?
क्या मां-बाप को भूल जाती हैं घर से भागी हुई लड़कियां. या भूल जाती हैं वह भाई की कलाई पर बांधी हुई राखी को. मां के आंचल में छिपकर सुबकना भी नहीं भूलती घर से भागी हुई लड़कियां. देवता-पितर के आगे सिर नवाना भी याद रहता है उन्हें. घर से भागी हुई लड़कियां नहीं भूलतीं रूमाल पर टांकना गुलाब का फूल जिसे सिखाया था मां ने. यकीन मानिये, बूरी नहीं होतीं घर से भागी हुई लड़कियां. बूरा तो हमारा समाज है, जो लड़कियों के भागने पर हौआ खड़ा कर देता है. इस सहज बात को भी इतना जटिल बना दिया जाता है कि घर से भागी हुई किसी लड़की के लिए उसके घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं. जबकि किसी भागे हुए लड़के के लौटने पर ऐसा नहीं होता.
लड़कियां भागती क्यों हैं, इसपर चिंता करना जरूरी तो है पर उससे भी जरूरी यह है कि हम एक ऐसे समाज व परिवार का निर्माण करें कि कभी किसी लड़की को भागना नहीं पड़े. और अगर भागना भी पड़े तो घर वापस लौटने के बारे में सोचना नहीं पड़े. अगर ऐसा हो पाया तो कभी कोई लड़की नहीं भागेगी. भागेगी क्यों, अपनों से भी भागता है कोई भला...?

रविवार, 3 जुलाई 2016

यादों की तितलियां

मीडिया की नौकरी में अमूमन इतवार नहीं होता. यह दिन भी सामान्य दिनों की तरह ही होता है. फिर भी जाने क्यों, इतवार आते ही खुद पर एतबार बढ़ जाता है. इसलिए मेरे लिए इतवार का दिन एतबार का दिन होता है. आशी (बेटी) को स्कूल नहीं जाना होता, सो मेरे इस पूरे एक दिन पर जैसे वह अपना हक मानती है. न खेलकूद, न पढ़ाई. हर वक्त मेरे आसपास तितली की तरह उड़ती-मंडराती रहती है. आज सुबह से हो रही अनवरत बारिश के बीच अलसायी सुबह कब बीत गयी थी और दोपहर सिर पर कब आ गया पता ही नहीं चला. प्याज के पकौड़े और चाय की चुस्कियों के बीच अचानक माहौल नॉस्टैल्जिक हो गया. एक फोटो एलबम को पलटते हुए आशी बार-बार कभी हम दोनों तो कभी उस एलबम के फोटो को देख रही थी.
उसने अपनी मम्मी से कहा-
तुम पहले कितनी सुंदर थी न.
सब चुप थे...
थोड़ी देर बाद...
पापा, तुम पहले अजीब लगते थे...!
अब अच्छे लगते हो.
मैंने कहा- मतलब?
देखो, कहते हुए उसने एलबम मुझे दे दिया. दरअसल, वो जो एलबम देख रही थी, उसमें मेरे कॉलेज के समय की तसवीरें थीं. कुछ शादी के तुरंत बाद की भी. एलबम पलटते हुए मैं भी पुरानी यादों में खो गया. बाहर बारिश हो रही थी. कभी धीमी, कभी तेज. रंग-बिरंगी तितलियों का एक समुह खिड़की के रास्ते कमरे में दाखिल हो चुका था. आशी तितलियों को पकड़ने की चेष्टा में मग्न हो गयी.

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

पानी उदास है

नानी के बिना कहानी उदास है
रोजगार के बिना जवानी उदास है
टूट गये सपने, उम्मीदें उदास है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है

गंगा में चाहे डूबकी लगाओ
महाकुंभ में जाकर जितना नहाओ
रो रही धरती, सुबकता आकाश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है

छिज गया भरोसा हमारा-तुम्हारा
परहित की बातें नहीं हैं गंवारा
पॉलिटिक्स हुई डर्टी, न कोई आश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है

सुखे जलाशय, सुख रही नदियां
पैसों की भूखी है ये देश-दुनिया
क्रिकेट में हो रहा पानी का नाश है
मेरे देश की आंख का पानी उदास है.

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

सुनो लड़कियों!

दीपा करमाकर (ओलंपिक में क्वालीफ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिला जिमनास्ट) को समर्पित एक कविता.

शोर नहीं
धीमे बोलो
ऊंची आवाज
शोभा नहीं देता तुम्हें
इतना तेज चलने की आदत
ठीक नहीं तुम्हारे लिए

ये क्या
अभी तक रोटी सेंकना भी
सीखा नहीं तुमने
अरे बाप!
आलू के इतने बड़े टूकड़े
कोई पुरुष पसंद नहीं करता

जाओ
गिलास में पानी भरके
बाप-भाईयों को पिलाना सीखो
शरबत, चाय, कॉफी बनाना
अच्छा हुनर है, लुभाने के लिए
यह तो आना ही चाहिए

जींस-टी शर्ट पहनकर
रिश्तेदारों के सामने
आना भी मत कभी
जाओ
सलवार-शूट
साड़ियां पहनना सीखो

जब कोई बोले
'जी' बोलो-हौले से
नजरें झुकी हो
जब कोई हो सामने
मुंह खोलकर हंसना
अच्छा नहीं माना जाता

जाओ, जाकर
करो शिव आराधना
तभी मिलेगा
तुम्हें अच्छा वर
अच्छा दांपत्य चाहिये तो
पूजो भगवान विष्णु को

और ये हर समय
हाथ में मोबाइल
क्या ठीक लगता है तुम्हे?
फेसबुक, वाट्सअप
क्या करना इन सबका
औरत ही रहो तो अच्छा

पढ़ो, नौकरी करो
शादी करो
बच्चे पैदा करो
खूब मेहनत करो
सबको खुश रखो
इतना ही करना है तुम्हें

सुनो लड़कियों!
बचपन से बुढ़ापे तक
यही तो सिखाया जाता है तुम्हें
क्या वाकई
इन सब बातों से
सहमत हो तुम...?


सोमवार, 28 मार्च 2016

ओ मेरी गौरेया

फूदक-फूदक कर
आंगन में
करती ता-ता थैय्या
ओ मेरी गौरैया...
बचपन के दिन हों
या अब के
है तू वैसी की वैसी
तुझे दिखा दादी कहती थी
मुझको बाबू-भैय्या
ओ मेरी गौरेया...
मोबाइल से फोटो खींचे
बिस्किट तुझे खिलाती
मेरी बेटी
नित दिन तुझको
कहती सोन चिरैय्या
ओ मेरी गौरेया...
तेरा आना
तेरा गाना
मुझको बहुत सुहाये
तेरे बिन झुठा लागे
शोहरत व रुपैय्या
ओ मेरी गौरेया...
आती रहे तू
गाती रहे तू
हम सबको
चाहे सताती रहे तू
तू है मेरी मैय्या
ओ मेरी गौरेया...
खबरदार सबको
कोई न बोले
ढीठ चिरैय्या
ओ मेरी गौरेया...
- अखिलेश्वर पांडेय

सोमवार, 18 जनवरी 2016

जो कहना है मुझे

मुझे इल्म है इस बात का
तुम नहीं जानती कुछ भी
न यह कि 
तुम हो बेहंतहा
खूबसूरत
नाजूक फूलों सी
इठलाती/ इतराती
प्यार की खुशबु फैलाती
अनायास मेरी जिंदगी में
न यह कि
तुम्हारा होना ही
मेरा होना है
तुम्हारी हंसी ही
मेरी मुस्कान
इतना वक्त बीत जाने पर भी
कहां कह पाया मैं
सोचता रहा/ दिलासा देता रहा
खुद को मन ही मन
पर अब नहीं
अब नहीं चुप रहना मुझे
कह देना चाहता हूं
सब कुछ
तुमसे/सिर्फ तुम्हीं से
क्योंकि कहना जरूरी है
न कहना ठीक नहीं
बोल देना जरूरी है
यह जानते हुए भी
बचेगा नहीं कुछ इसके बाद अब
न कहने को/ न सुनने को
हो शायद ऐसा भी
तुम सुन ही न पाओ
जो कहना है मुझे
खो दूं तुम्हें मैं
तो भी कोई बात नहीं
तुम्हारे न होने में भी
होगा तुम्हारा होना
मैं कुछ कहना चाहता हूं
मैं तुम्हें खोना चाहता हूं...

मुझे इल्म है इस बात का
तुम नहीं जानती कुछ भी
न यह कि 
तुम हो बेहंतहा
खूबसूरत
नाजूक फूलों सी
इठलाती/ इतराती
प्यार की खुशबु फैलाती
अनायास मेरी जिंदगी में
न यह कि
तुम्हारा होना ही
मेरा होना है
तुम्हारी हंसी ही
मेरी मुस्कान
इतना वक्त बीत जाने पर भी
कहां कह पाया मैं
सोचता रहा/ दिलासा देता रहा
खुद को मन ही मन
पर अब नहीं
अब नहीं चुप रहना मुझे
कह देना चाहता हूं
सब कुछ
तुमसे/सिर्फ तुम्हीं से
क्योंकि कहना जरूरी है
न कहना ठीक नहीं
बोल देना जरूरी है
यह जानते हुए भी
बचेगा नहीं कुछ इसके बाद अब
न कहने को/ न सुनने को
हो शायद ऐसा भी
तुम सुन ही न पाओ
जो कहना है मुझे
खो दूं तुम्हें मैं
तो भी कोई बात नहीं
तुम्हारे न होने में भी
होगा तुम्हारा होना
मैं कुछ कहना चाहता हूं
मैं तुम्हें खोना चाहता हूं...

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

गाय, गीता और गप वाले देश में

माननीय प्रधानमंत्री जी. आप देश की जनता से हर महीने मन की बात करते हैं. आज मैं भी अपने मन की कुछ बातें आपसे कहना चाहता हूं. यह जुमला तो आपने सुना ही होगा कि इस देश में तीन चीजें खूब बिकती हैं - सिनेमा, सेक्स और सियासत. पर अब यह जुमला पुराना हो गया. अब इस देश में जो तीन चीजें खूब चर्चित हैं वह है - गाय, गीता और गप. जरा गौर फरमायें तो ये तीनों चीजें भारतीय संस्कृति में सनातन काल से रची-बसी हैं. कोई भी इससे अनभिज्ञ नहीं. पर इन दिनों ये तीनों चीजें नये कारणाें से चर्चा में हैं. अचानक से इस देश में कई लोगों के लिए गाय महत्वपूर्ण हो गयी है. इतनी कि सियासत भी पाकिकस्तान से लौटी भारतीय बेटी गीता के मुकाबले गाय को ज्यादा तवज्जो दे रही. यही कारण है कि इसे लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के गपों का सिलसिला जारी है. जब कभी भी सोशल मीडिया पर गप का दौर तेज होता है सरकार के माथे पर पसीना आने लगता है.उसे तरह-तरह की चिंता सताने लगती है और फिर सोशल मीडिया पर पाबंदी और निगरानी जैसी कवायद शुरू हो जाती है.
  आपको तो मालूम ही है कि हमारे देश में कई राज्य ऐसे हैं, जहां गाय को बिना अनुमति के नहीं मार सकते. लेकिन भैंसों को मार सकते हैं, उनका मांस खा सकते हैं और उनके चमड़ों से बैग बना सकते हैं. यहां तक कि एक गाय को मारने पर भारतीय दंड संहिता के मुताबिक शराब पीकर गाड़ी चलाने, छेड़छाड़, किसी को गंभीर चोट पहुंचाने या इनकम टैक्स चोरी जैसे अपराधों से कहीं ज्यादा सजा मिलेगी- वहीं बिना पलक झपकाए एक भैंस को मार सकते हैं. क्या गाय महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यओं से ज्यादा महत्वपूर्ण है. मार्च 2015 में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने लोकसभा में बताया था कि महिलाओं पर बलात्कार और हमलों के मामलों में इजाफा हुआ है. महिलाओं और बच्चों के प्रति यौनहिंसा, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति जातीय हिंसा की बढ़ती घटनाएं क्या कम महत्वपूर्ण है.  क्या इंसान पशुओं से भी ज्यादा बदतर है?
   एक बात और, गीता को जब पाकिस्तान में लावारिस हालत में पाया गया तो सबसे पहले उसे लाहौर के अनाथालय में भेज दिया गया. मूक-बधिर इस बच्ची को वहां नाम दिया गया फातिमा. कुछ दिन बाद इस बच्ची को वहां से ईधी फाउंडेशन के सदस्य और बिलकीस के पुत्र फैजल अपने साथ कराची ले आए. पहली बार जब उन्होंने उस बच्ची को अपनी मां बिलकीस से मिलवाया तो उसनेे हाथ जोड़े और बिलकीस के पैर छुए. बिलकीस तुरंत बोल पड़ीं कि यह बच्ची तो हिंदू है. और उन्होंने तुरंत उसका नाम फातिमा से बदलकर गीता रख दिया. यह वाकया यह बताने के लिए काफी है कि पड़ोसी मुल्क या दुनिया के दूसरे देश भारतीय संस्कृति के बारे में कितनी बारीक जानकारी रखते हैं, इसके बारे में कितना जानते हैं. तो क्यों न अब हम उन्हें अपने बारे में कुछ और भी बतायें. और हां, गप की चिंता न करें तो ही अच्छा. कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...!

शनिवार, 16 मई 2015

भरी दुपहरी में चिंता पर छोटा सा चिंतन

भरी दुपहरी में मौसम को गरियाते हुए श्रीमतीजी को बाइक पर बिठा कर चला जा रहा था. अचानक ऐसा लगा कि कोई ‘रुको! रुको!’ की आवाज दे रहा है. मैं इधर-उधर देख ही रहा था कि पीछे से श्रीमतीजी ने झकझोरा- ‘सो रहे का जी. तब से रुकने को कह रही हूं सुन ही नहीं रहे.’ मैंने बाइक सड़क किनारे रोक दी. वे उतर कर मुङो आने को कहते हुए खुद सब्जी की दुकान पर चली गयीं. मैं भी बेमन से पीछे-पीछे चल पड़ा. सब्जियां लेने के बाद जब हम चलने लगे, तो दुकानदार ने कहा- ‘भइया! आज धूप बहुत है, डॉक्टर प्याज ले लीजिए न.’ मैंने चौंक कर कहा, ‘डॉक्टर प्याज!’  सब्जी दुकानदार ने श्रीमतीजी की तरफ देखते हुए कहा, ‘क्या भइया आप डॉक्टर प्याज नहीं जानते? अरे इका पाकिट में रखने से लू-गरमी नहीं लगती है इसीलिए इसे डॉक्टर प्याज कहते हैं.’ हमने कहा भाई प्याज बेचने का आइडिया तुम्हारा अच्छा है. एकदम मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ जैसा. वह बोला, ‘हम सच में कहत हैं भइया. इ सफेद वाला प्याज जो आप देख रहे हैं न इसे पाकिट में रख कर कितना भी धूप में निकलिए कुछो नहीं होगा. जो जानत हैं इसके बारे में वो जरूर खरीदत हैं.’ मैंने कहा, ‘इतना ज्ञान देने के लिए शुक्रिया. पर हमें नहीं चाहिए. क्योंकि हमें पता है कि लू कैसे नहीं लगती.’ वह बोला, ‘कोई बात नहीं, आप मत लीजिए, वैसे हम तो आप ही के लिए कह रहे थे.’ चिलचिलाती धूप ने कम, उस सब्जीवाले ने मेरा पारा ज्यादा चढ़ा दिया था. मैंने श्रीमतीजी से कहा, ‘अगर मैं एक मिनट भी और यहां रुका, तो मुङो लू जरू र लग जायेगी. चलो यहां से.’ रास्ते भर मैं उस सब्जी वाले की बातों पर हंसता रहा.
उस सब्जीवाले की लू से बचके तो मैं घर आ गया, पर जिस तरह उसने मेरे प्रति भरी दुपहरी में लू को लेकर चिंता जतायी थी, उस चिंता ने मुङो चिंतित कर दिया. चिंता करना एक राष्ट्रीय समस्या बन गयी है. इस समस्या ने हर किसी को जकड़ रखा है. दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल इस चिंता में हैं कि मीडिया को कैसे काबू में किया जाये. कोई प्रधानमंत्री की विदेश यात्र की अधिकता से चिंतित है, तो कोई भाजपा को जिता कर चिंता के मारे अंदर ही अंदर घुट रहा है. कोई कांग्रेस की पतली हालत से दुखी है तथा उसके भविष्य की चिंता में चिंतित है. तो कई लोग जनता परिवार के एकीकरण को लेकर चिंतित हैं. चिंता एक स्वाभाविक गुण है. लेकिन, क्या हर समस्या का हल केवल चिंता ही है? कई लोग तो महज इस बात के लिए चिंतित हो जाते हैं कि आज उनके मोबाइल पर एक मिस्ड कॉल तक नहीं आया. कई लोग अत्यधिक फोन आने से चिंता के मारे डायबिटीज के मरीज बन जा रहे हैं. और तो और कई युवा मित्र अपने मोबाइल की बैटरी जल्द खत्म हो जाने की परेशानी से चिंतित हो उठते हैं. चिंताओं की कमी नहीं, बिना ढूंढ़े ही हजार मिलती हैं. बचके रहिएगा!

बुधवार, 6 मई 2015

कह दो नाखुदाओं से तुम कोई खुदा नहीं

किसानों की मौत पर घड़ियाली आंसू बहाने व गंदे हथकंडे अपनाने वाले राजनीतिक दलों! तुम्हें क्या कभी इस बात पर भी रोना आया कि तुम्हारे अंदर की संवेदनाएं दिन-ब-दिन मर रही हैं. गांव का किसान अपने पड़ोसी से खेत की मेढ़ काटने का मुकदमा लड़ते-लड़ते जवानी खोकर बुढ़ापे की दहलीज में कब प्रवेश कर जाता है उसे खुद ही मालूम नहीं पड़ता. खाद-बीज और सिंचाई के मकड़जाल में किसान की जिंदगी इस कदर उलझी होती है कि उसकी बेटी सयानी होकर ब्याह करने लायक हो गयी, इस बात का भान उसे आस-पड़ोस वालों के ताने सुन कर ही होता है. वह करे तो क्या करे? जवान बेटी के अरमानों की डोली उठने का ख्वाब पाले उसके कानों में बिस्मिला खान की शहनाई नहीं बल्कि घरवाली की कर्कश आवाज गूंजती रहती है ‘तोहरे चेंट में पइसा ना हवे त हमार गहना-गुरिया बेचके एकर बियाह करी द.’ घर में बैठी बेटी के मुस्कान उसके चेहरे में ही कहीं खो गयी है. दिल का दर्द दबाते-दबाते होंठ काले पड़ गये हैं. उसके हाथ की लकीरों में क्या है, उसे भले ही न पता हो पर उसे इस बात का गुमान अवश्य है कि ये नेता उसकी तकदीर नहीं बदल सकते. ज्यादातर किसान लोकसभा-राज्यसभा चैनल नहीं देखते. उन्हें इस बात का इल्म नहीं है कि संसद में बैठे माननीय कभी ‘बेटा बूटी’ तो कभी ‘सांवली औरत’ जैसी ऊटपटांग बातों में देश का वक्त जाया कर देते हैं. वह तो यह भी नहीं जानते कि इस देश के प्रधानमंत्री की पत्नी को अपने अधिकारों की लड़ाई आरटीआइ के माध्यम से लड़नी पड़ रही है. खुद कहानी गढ़ने, खुद किरदार बनाने और खुद इल्जाम तय कर खुद ही जज बन जाने का ये गजब दौर है. गुमशुम अटल, न लाल-न कृष्ण, मझधार में मांझी, न नीति-न ईश, डगमगाते विश्वास का दौर..! किसके पास जाएं, किससे करें फरियाद. कौन होगा मददगार, कौन तारणहार..! ऐसे में इस देश के किसानों के मन में यह सवाल जरू र उठता है - न राज है न नाथ है. कोई पप्पू है, कोई फेंकू है. जनता अनाथ है तो नेता कहां है? कौओं की टोली में हंस को ढूंढ़ने का क्या फायदा?
   सच्चई तो यह है कि इस देश के किसान भोले-भाले जरू र हैं पर वे खुद के नाथ हैं. उन्हें भरोसा है अपने हाथ पर. कर्म को सवरेपरि मानने वाला किसान किस्मत और किसी खेवनहार के सहारे की उलझनों से अब बाहर आना चाहता है. ऐसे में अगर कोई किसान शायरी लिखने लग जाये तो उसका पहला शेर यही होगा - कश्तियां ना सही हौसले तो साथ हैं/ कह दो नाखुदाओं से तुम कोई खुदा नहीं. अब राजनीतिक आकाओं को यह बात समझनी ही होगी कि वो दिन चले गये जब छलावे की राजनीति और डपोरशंखी घोषणाओं से किसानों को बहलाया जा सकता था. किसी को कुछ करना ही है तो वह करोड़ों किसानों का दिल जीते..उसका सच्च दोस्त बन कर.

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

12 दिनों में कितना कुछ बदल गया!

नेपाल और आधे भारत में जानलेवा भूकंप. बिहार-झारखंड में आंधी-बारिश से जानमाल की भारी तबाही. 56 दिनों की लंबी छुट्टी के बाद राहुल गांधी की ‘घर वापसी’. जनता परिवार का एक होना और सीपीएम का नेतृत्व सीताराम येचुरी के हाथ में जाना. ये कुछ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की घटनाएं हैं जिनका मैं टीवी-अखबार के जरिये गवाह न बन सका. भतीजी की शादी में शिरकत करके गांव से 12 दिनों बाद लौटने पर इन सभी खबरों से वाकिफ हुआ. घर में जब बेटी की शादी हो तो देश-दुनिया की फिक्र कहां रह जाती है? इंटरनेट, फेसबुक, ब्लॉग, ट्विटर, अखबार, टेलीविजन सबसे दूर..12 दिन. बीते 12 दिनों के अखबार पलटते हुए लग रहा है कि इतने दिनों में वाकई कितना कुछ बदल गया है. हवाई यात्र के लिए चर्चित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के मेट्रो ट्रेन में सफर करने लगे हैं. यह अलग बात है कि पहली बार दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल ने जब मेट्रो का सफर किया था तो भाजपा समेत अन्य राजनीतिक दलों ने इसकी खूब आलोचना की थी. कहा था कि यह प्रचार पाने का हथकंडा है. यह अच्छी बात है कि अब उन सभी आलोचकों के ज्ञान चक्षु खुल गये हैं और वह यह समझ गये हैं कि किसी बड़ी शख्सियत का मेट्रो में सफर करना प्रचार पाने का उपक्रम नहीं है. तभी तो सभी चुप हैं. ऐसी ही एक अन्य विस्मयकारी राजनीतिक घटनाक्रम के तहत सोशल मीडिया के ‘पप्पू’ (राहुल गांधी) अब संसद में कुर्ते की आस्तीनें चढ़ाये बिना भाषण देने लगे हैं. यह जानने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा कि 56 दिनों के अज्ञात प्रवास से लौटे राहुल गांधी क्या लोकसभा चुनावों के दौरान बिखरे-बिखरे लगने वाले राहुल से अलग हैं? नयी दिल्ली में ‘आप’ की किसान रैली के दौरान राजस्थान के किसान द्वारा आहत्महत्या कर लेने के बाद राजनीतिक दलों का जो चेहरा सामने आया है वह बेहद निराशाजनक है. भाजपा-कांग्रेस की तो मौकापरस्त राजनीति की पुरानी आदत है, पर आम आदमी पार्टी भी..! राजनीति में कदम पड़ते ही एक कवि (कुमार विश्वास) और पत्रकार (आशुतोष) का भी दंभी और गैर जिम्मेदार हो जाना अनहोनी है. इन दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद, शाहरुख खान अभिनीत फिल्म ‘कल हो ना हो’ से प्रेरित बॉलीवुड शैली के एक संगीत वीडियो में भारत में जर्मनी के राजदूत माइकल स्टेनर की पत्नी ऐलिसे के साथ डांस करते नजर आ रहे हैं. इन सभी घटनाक्रम को देख-जान कर वाकई लगता है कि भूकंप आया है. सब कुछ हिलता हुआ लग रहा है. उथल-पुथल मची हुई है. बाहर भी, भीतर भी. भूकंप सिर्फ धरती के नीचे नहीं आता है, धरती के ऊपर वालों के भीतर भी आता है. उसके लौट जाने के बहुत बाद तक हम हिलते रहते हैं. बेटी को उसके ससुराल विदा करते हुए एक भूकंप मेरे भीतर भी आया है.. अभी तक हिल रहा हूं.

सोमवार, 23 मार्च 2015

इंतजार में जुबिली पार्क हो गया हूं!

तुम एनएच 33 की तरह व्यस्त रहती हो और मैं तुम्हारे इंतजार में जुबिली पार्क हो गया हूं. जब मैं तुम्हारे इंतजार में थक जाता हूं तो उन 86 बस्तियों सा महसूस करने लगता हूं जिन्हें आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है. फिर भी नसों में उम्मीदों का उबाल इतना तगड़ा है कि सांसे टूटती नहीं हैं. हां, कभी-कभी यह भी लगता है कि हमारी जिंदगी में मानगो पुल सा जाम लगने के कारण ठहराव आ गया है और कभी-कभी गरमी की तपती दोपहरी में टेल्को एरिया की सड़कों जैसी वीरानगी छा जाती है. फिर भी मैं सालाना आयोजन ‘फ्लावर शो’ की ताजगी और रंगीनियों जैसी ही खुशी देने वाले तुम्हारे इंतजार में हर दिन संस्थापक दिवस मनाता रहता हूं. सच तो यह है कि जब तुम बिष्टुपुर में होती हो तब मैं मानगो सा महसूस करता हूं. यह ‘खास’ और ‘आम’ होने का अहसास नहीं बल्कि समयानुकूल सच्चाइयों का सामना करना भर है. तुम्हारे साथ जब छप्पनभोग में स्वादिष्ट मिठाइयां खा रहा होता हूं तो तुम मुङो रसगुल्ला जैसी लगती हो, पर तन्हाइयों के वक्त मैं गोलगप्पा के उस फुचके जैसा हो जाता हूं जिसकी वैल्यू मसाला पानी के बिना नहीं होती. तुम्हारा स्वभाव मुङो कभी-कभी जलेबी जैसा भी लगता है. जिसे गरम खाओ तो मुंह जलता है और ठंडा खाने पर बेस्वाद लगता है. सीरियसली, जुबली पार्क मुझमें इस कदर बस गया है कि मैं तुम्हारे साथ साकची जाते वक्त स्टेडियम की तरफ से न जाकर जुबिली पार्क की तरफ से ही जाता हूं. उसकी खुली हवाओं को अपने नथुनों में भरते हुए. हरे-भरे पेड़ों और फूलों की ताजगी को मन ही मन समेटते हुए. जब तुम मेरे साथ होती हो मेरा मन साकची के मंगल बाजार की तरह गुलजार रहता है. जिसमें महंगी और ब्रांडेड चीजें नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में काम आनेवाले जरूरी सामान बहुत किफायती दामों में मिल जाते हैं. क्या हमारा प्यार सचमुच जमशेदपुर जैसा है? इतने त्योहार, इतने सेलिब्रेशन, इतने आयोजन होते हैं कि पता ही नहीं चलता कि कौन असली है और कौन बनावटी. मिश्रित संस्कृति ने शहर की पहचान छीन ली है. न कोई अपनी भाषा, न कोई अपना स्वभाव. लोग यहां होकर भी यहां के नहीं होते. यहां सबका मालिक एक है, पर सब खुद भी मालिक हैं अपनी मरजी के. दिखने में आयरन, पर अंदर बज रहा सायरन! अब छोड़ो भी. क्या रखा है इन शिकवा-शिकायतों में. मेरे मन में तुम्हारे प्रति वैसी ही अगाध श्रद्धा है जितनी शहरवासियों के मन में जमशेदजी टाटा के लिए. हां, एक बात मैं जरू र कहूंगा कि तुम अपने पहनावे से बागबेड़ा जैसी लगती हो. सीएच एरिया से बिष्टुपुर वाले रोड जैसा नया लुक  आजमा कर देखो. बेहद खूबसूरत लगने लगोगी. मुङो उम्मीद है कि तुम इस प्रपोजल को मेरीन ड्राइव के मॉल और मल्टीप्लेक्स जैसा लटकाने के बजाय टाटा वर्कर्स युनियन के चुनाव जैसा शीघ्र ही मूर्त रू प में परिणत कर दोगी.

बुधवार, 11 मार्च 2015

ट्रैफिक सिगनल वाली मलाला

नयी दिल्ली के किसी रेड सिगनल पर जैसे ही गाड़ियों का काफिला रुका कई बच्चे दौड़ते हुए कारों के बंद शीशे खटखटाने लगे. किसी के हाथ में लाल गुलाब का गुलदस्ता तो किसी के पास खिलौने. कई के पास किताबें भी थी. वे बारी-बारी से बिना प्रतीक्षा किये सभी के पास जा रहे थे. एक 12-14 साल की लड़की हाथ में कई किताबें लिए मेरे  पास भी आयी और एक किताब ‘आइ एम मलाला’ को मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोली-‘शांति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त पाकिस्तान की इस बहादुर लड़की की किताब ले लो साहब.’ मेरी निगाह उस किताब के बजाय उस मासूम-सी लड़की पर टिक गयी थी. लाल फीते की दो चोटियां उसके कंधे पर लटक रही थी. गेहुंआ रंग, गोल चेहरा, इकहरा बदन, मोतियों जैसे दांत. साधारण से कपड़े में भी वह बहुत खुबसूरत दिख रही थी. मुङो लगा जैसे उसमें मलाला की रूह उतर आयी हो. उतनी ही निश्चल, उतनी ही मोहक लग रही थी वह.  इतने में उसने अमर्त्य सेन की किताब ‘ऐन अनसरटेन ग्लोरी : इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन’  दिखाते हुए कहा ‘तो ये ले लो साहब. अच्छी है.’ मैं अपलक उसे देख ही रहा था. उसने यह भांप लिया कि मैं उसकी किताबें नहीं खरीदूंगा. यह सच था. मेरे पास उस वक्त उतने पैसे नहीं थे कि मैं किताब ले पाता. लगा वह जाने वाली है. मैंने पूछा- तुम स्कूल नहीं जाती, तुम्हारे मां-बाप क्या करते हैं, तुम्हारा नाम क्या है?  चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान बिखेरते हुए कहा ‘आइ एम मलाला.’ और भीड़ में कहीं गुम हो गयी. सिगनल ग्रीन हो चुका था, गाड़ियां आगे की ओर सरकने लगी थीं. मलाला की नन्ही-सी कलम बड़े-बड़े हथियारों के सामने जिस ताकत से खड़ी रही और आकर्षक जीत हासिल की उसने हर लड़की को विपरीत हालातों में मुस्कुराने का हसीन जज्बा दिया है. बधाई मलाला! यह मसाल जलती रहनी चाहिए. पर, दुख होता है यह देख कर दिल्ली जैसे महानगर में ट्रैफिक सिगनल पर मासूम लड़के/लड़कियां इस तरह पेट पालने के लिए विवश हैं. बच्चों के आर्थिक उत्पीड़न की समाप्ति तथा सभी बच्चों के शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने की जो लड़ाई मलाला ने पाकिस्तान के एक प्रांत से शुरू  की थी, अब वह ग्लोबल हो चुकी है. दुनिया के लगभग हर मुल्क में मलाला के प्रशंसक हैं. तो क्या जो लड़की मुङो ट्रैफिक सिगनल पर किताबें बेचती मिली थी वह यह सब नहीं जानती? उसके हाथ में तो ‘आइ एम मलाला’ नामक किताब भी थी. तो फिर कैसे पूरा होगा मलाला का वह सपना जो उसने दुनिया भर की लड़कियों की बेहतरी के लिए देखा है. क्यूंकि मलाला अब एक लड़की का नाम भर नहीं, वह एक प्रतीक बन गयी है. भारत में ऐसे बच्चों की संख्या भी बहुत है जिनके मां-बाप अपनी तरक्की के लिए उन्हें पढ़ने नहीं देते. रोजी-रोटी उनकी पहली प्राथमिकता है. क्या यहां भी कोई मलाला आकर रोशनी फैलायेगी?