शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

अपनी बात

मैं अक्सर निकल जाता हूँ भीडभाड गलियों से
रौशनी से जगमग दुकाने मुझे परेशान करती हैं
मुझे परेशां करती है उन लोगों की बकबक
जो बोलना नहीं जानते

मै भीड़ नहीं बनना चाहता बाज़ार का
मैं ग्लैमर का चापलूस भी नहीं बनना चाहता
मुझे पसंद नहीं विस्फोटक ठहाके
मै दूर रहता हूँ पहले से तय फैसलों से

क्योंकि एकदिन गुजरा था मै भी लोगों के चहेते रास्ते से
और यह देखकर ठगा रह गया की
मेरा पसंदीदा व्यक्ति बदल चूका था
बदल चुकी थी उसकी प्राथमिकताएं
उसका नजरिया, उसके शब्द
उसका लिबास भी

लौट आया मैं चुपचाप
भरे मन से निराश होकर
तभी से अकेला ही अच्छा लगता है
अच्छा लगता दूर रहना ऐसे लोगों से
जिन्होंने अपना बदनुमा चेहरा छिपाने को
लगा रखा है सुन्दर सा मास्क।

3 टिप्‍पणियां:

  1. लौट आया मैं चुपचाप
    भरे मन से निराश होकर
    तभी से अकेला ही अच्छा लगता है
    अच्छा लगता दूर रहना ऐसे लोगों से
    जिन्होंने अपना बदनुमा चेहरा छिपाने को
    लगा रखा है सुन्दर सा मास्क।
    बहुत खुब जी, धन्यवाद

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  2. लौट आया मैं चुपचाप
    भरे मन से निराश होकर
    तभी से अकेला ही अच्छा लगता है
    अच्छा लगता दूर रहना ऐसे लोगों से
    जिन्होंने अपना बदनुमा चेहरा छिपाने को
    लगा रखा है सुन्दर सा मास्क।

    संवेदनशील भाव....

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  3. लौट आया मैं चुपचाप
    भरे मन से निराश होकर
    तभी से अकेला ही अच्छा लगता है
    अच्छा लगता दूर रहना ऐसे लोगों से
    जिन्होंने अपना बदनुमा चेहरा छिपाने को
    लगा रखा है सुन्दर सा मास्क।

    संवेदनशील कविता ...........

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