गुरुवार, 14 मई 2009

रिश्‍तों की नई दुनिया

अंतरराष्‍ट्रीय परिवार दिवस पर विशेष


यूं तो अब तक न जाने कितनी ही बार इस विषय पर हमारे ब्‍लागर साथियों ने अपने-अपने ढंग से बातें की हैं, फ‍िर भी संदर्भ मौजू है। मैं बात कर रहा हूं सोशल नेटवर्किंग की। हमारी नयी पीढी इंटरनेट के जरिए अपना नया समाज बनाने में मशगूल है। ई मेल, ब्‍लाग के माध्‍यम से दोस्‍तों व जानकारों से सलाह मशविरा करने में व्‍यस्‍त न्‍यू जेनरेशन क्‍या अपने सगे-संबंधियों से दूर होता जा रहा है।

कैरियर को नई ऊंचाइयां देने, भागदौड की जिंदगी में लगातार समय की कमी हमारी नयी पीढी की आम समस्‍या है। खासकर शहरी युवाओं के पास रिश्‍ते को निभाने के लिए समय का अभाव है। दूर के रिश्‍तेदारों को कौन कहे बच्‍चे अपने मां-बाप के साथ भी काफी कम समय बिता पाते हैं। ऐसे में उनकी संवेदनाएं रिश्‍ते के प्रति खत्‍म होती जाती है। कई बार मां-बाप के पास भी बच्‍चों के लिए समय न होने के कारण बच्‍चे इंटरनेट को अपना साथी मानने लगते हैं। हर जिज्ञासा, हर समस्‍या के लिए उनको इंटरनेट से बढिया साथी कोई दूसरा नहीं लगता।
यही वजह है कि सोशल नेटवर्किंग साइट- आरकूट, यू-टयूब, ब्‍लाग और ई मेल दोस्‍ती की पींगे बढाने, किसी समस्‍या के लिए सलाह-मशविरा करने और आम राय बनाने के लिए न्‍यू जेनरेशन को सबसे आसान राह नजर आता है। अगर देखा जाये तो इसमें कुछ गलत भी नहीं है, पर इस सबके बीच न्‍यू जेनरेशन अपनों से काफी दूर होता जा रहा है। उसे नहीं पता कि उसके घर में क्‍या हो रहा है, उसके मां-बाप किस समस्‍या से गुजर रहे हैं, उसके लिए उसके रिश्‍तेदार क्‍या धारणा रखते हैं, उसे कभी-कभार अपने सगे संबंधियों का हालचाल भी जानना चाहिए। इसका असर तत्‍काल भले न दिखे पर हमारी निजी जिंदगी पर पडता जरूर है। परिवार एक अमूल्‍य निधि है इसे बचाये व बनाये रखना हमारा पुनीत कर्तव्‍य है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. ... प्रभावशाली अभिव्यक्ति।

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. घर परिवार की कीमत पर तो नए रिश्ते नहीं बनाने चाहिए...हाँ पारिवारिक और इन रिश्तों में सामजस्य,,बिठाया.. जा सकता है...

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