शुक्रवार, 1 मई 2009

बापू की कामांधता ने ले ली उनके पिता की जान

मात्र तेरह वर्ष की आयु में विवाह के उपरांत गांधीजी की कामांधता बेकाबू हो उठी थी, इस कामांधता से कस्‍तूरबा त्रस्‍त थीं। लेकिन इससे मुक्‍त होने के लिए 1906 तक प्रतीक्षा करनी थी, जब गांधीजी ने ब्रह़मचर्य का व्रत लिया।

गांधीजी के पिता की मौत के समय की घटना ने उनके जीवन को पूर्ण का रूप से बदल दिया और बा को भी काम के पाश से मुक्‍त कर दिया। कामांधता से विवश होकर वे अपने पिता की मालिश करना छोडकर बा से चिपटे रहे। उन्‍होंने सोती कस्‍तूरबा को जगाकर जाहिर कर दिया कि वे क्‍या चाहते थे: ' मेरे बगल में होते वह सो कैसे सकती थी।' जब तक वे अपने पिता की मालिश करने उनके कमरे में पहुंचते तब तक वे दम तोड चुके थे।

इसके फलस्‍वरुप गांधीजी में दोष भावना घर कर गई। अपनी इस भारी चूक के लिए वे खुद को कभी माफ नहीं कर पाए। उन्‍होंने इसे ऐसा 'कलंक' कहा 'जिसे मैं कभी मिटा या भूल नहीं पाया हूं।' अब वे ब्रह़मचर्य की ओर उन्‍मुख हो गये। गांधीजी को यह कदम उठाने के लिए प्रेरित करनेवाली स्‍त्री कस्‍तूरबा नहीं उनकी मां पुतलीबाई थीं। इस संबंध में बा का अपना कोई विचार नहीं था। उन्‍होंने तटस्‍थ भाव दर्शाया। बहरहाल, उन्‍हें बात माननी तो थी ही। इसलिए उन्‍होंने तुरंत सहमति दे दी। उनकी दृष्टि से देखें तो उन्‍हें आगे गर्भाधान से छुटकारा मिलने जा रहा था। गांधीजी ने अपने व्रत पालन के लिए कई उपाय किए। उन्‍होंने उसका रामबाण उपचार ठंडे पानी से नहाना बताया। अपनी सामान्‍य काम-वृति के दमन के लिए वे शक्ति से अधिक परिश्रम करते थे और खान-पान के बारे में तरह-तरह की सनकें पाल ली थीं, जिनमें दूध का त्‍याग भी था। उन्‍होंने शारीरिक संपर्क से बचने का प्रयोग किया और अलग कमरे में सोना शुरू कर दिया। फ‍िर भी छुटकारा नहीं मिला और उनके चौथे पुत्र का गर्भ में आना नहीं टल सका।

अपनी असफलताओं पर गांधीजी बहुत दुखी थे लेकिन उनकी यातना के इस पूरे दौर में बा बिल्‍कुल सहज थीं। पर गांधीजी सपने में भी परेशान हो जाते थे। गांधीजी की प्रतिज्ञा सपनों से उनकी रक्षा नहीं कर पाई और उनके सपनों में बा आती रहीं। उनके लिए ब्रह़मचर्य का पालन इसलिए और भी कठिन हो जाता था कि बा को उसके पालन में कोई परेशानी नहीं हो रही थी। उस बोझ से छुटकारा पाने में उन्‍हें सबसे ज्‍यादा खुशी होती। लेकिन अपना धर्म मानकर गांधीजी की शारीरिक भूख वे तृप्‍त करती रहीं। गांधीजी का शत्रु उनके अंदर ही बैठा हुआ था। परेशान हो उठे गांधीजी का कथन पढिये : ' इस संसार में बहुत सी कठिन चुनौतियां हैं, लेकिन विवाहित व्‍यक्ति के लिए ब्रह़मचर्य का पालन सबसे कठिन है।' जारी....


यह अंश गिरजा कुमार लिखित Brahmcharya Gandhi and His Women Associates नामक पुस्‍तक से साभार है। इस पुस्‍तक का हिंदी अनुवाद विटास्‍टा पब्‍िलिशंग प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्‍ली ने महात्‍मा गांधी और उनकी महिला मित्र शीर्षक से प्रकाशित किया है। मित्रों जिन लोगों ने इस पुस्‍तक का अंग्रेजी या हिंदी वर्जन पढा है उनके लिए पुनर्स्‍मरण के तौर पर और जो अभी तक नहीं पढ पाये हैं उन्‍हें पढने को प्रेरित करने के उद़देश्‍य से इस पुस्‍तक के कुछ चुनिंदा अंश प्रस्‍तुत किए जा रहे हैं।

17 टिप्‍पणियां:

  1. अच्‍छा प्रयास है... बनाए रखें..
    - पृथ्‍वी

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  2. Alekh ke sheershak se aapatti hai
    shesh sab theek hai. vastav men mrityu
    kaa honaa tayshuda hai is baat se sahmat honge baapu ke bare men is sheershak se uthane vale vivad ko rokiye meree salah hai sheersha badalne kee .girja kumar ji kee pustak ke bare men bahut suna hai sahee bhee ho to bhee mujhe lagataa hai kitaaben vyavsaay ke liye likhi jaaji hai isakaa jeeta jagata udaharan KHUSHAVANT SINGH JI hai.

    aasha hai mujhe kshama karenge
    saadar

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  3. choonki aap ise aage bhee jaaree rakhenge to kripayaa kewal mere etaraz ko dhyan men rakhie .
    pun: kshama prarthana ke saath aapaka
    mukul

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  4. ये heading गलत है क्या गांधी जी अगर अपने पिता जी की मालिश करते तो उसनकी मौत नाही होती.........

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  5. शीर्षक पर मेरी भी आपत्ति है। पर स्वयं गांधी जी ऐसा समझते थे।

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  6. ब्‍लागर साथियों,
    यह शीर्षक मेरी सोच का परिणाम नहीं है, बल्कि अपने पिता की मौत के बाद बापू ने जिस कलंक का जिक्र किया है और उन्‍होंने जिस अपराधबोध का अनुभव किया, उसका परिणाम है। क्‍योंकि वे खुद इसके लिए अपने को दोषी मानते रहे। आशा है आप सभी सहमत होंगे।

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  7. ये बातें तो कई बार पढ़-सुन चुका हूँ, लेकिन आपका यह रिसर्च नया है- बाप का जान लेने वाली।

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  8. जहाँ तक मुझे ज्ञात है, गाँधीजी को इस बात का अपराध बोध रहा कि वे अंतिम समय में पिता के पास नहीं थे. वे पिता को बचा लेते ऐसा नहीं लगता.

    अगर आदमी खाना खा ले तो उसे खाना याद नहीं आता और वह दुसरे काम तनमयता से कर सकता अहि, और भूखा रहे तो केवल खाना याद आता है. यहीं गाँधीजी से भूल हुई. नाहक काम से लड़ना...स्वस्थ सेक्स में क्या बूराई है?

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  9. प्रिय भाई बेगाणीजी,
    मेरा उद़देश्‍य बापू को बदनाम करना नहीं, उनके उस पक्ष को उजागर करना है जिसे शायद कम ही लोग जानते हैं। यह कितनी बडी बात है कि इतना सब के बाद भी वे राष्‍ट्रपिता बने। भारत के बाहर भी उनके कद्रदानों की संख्‍या विश्‍व के कुछ गिने-चुने महापुरुषों में से है। ऐसी बातें हमारी नई पीढी के लिए कितनी जरुरी हैं जो जरा सी बात पर कुंठा का शिकार हो जाती हैं। हम अपनी गलतियों, अवगुणों को पहचाने बिना उस पर काबू नहीं पा सकते। और महान तो वही होते हैं जो अपनी गलतियों को स्‍वीकार करें। इसीलिए आज तक दूसरा कोई 'बापू'पैदा नहीं हुआ।

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  10. क्‍या हुआ और क्‍या नहीं; ये तो मुझे आपके आलेख (पुस्‍तक अंश) से ही पता चला। अल्‍पज्ञानी हूं मैं। लेकिन इतना जरूर कहना चाहूंगा कि हजम नहीं हो रहा और लेखन में मिर्च-मसाला हो तो प्रकाशक और लेखक के लिए फायदा ही फायदा।

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  11. निश्चित ही शीर्षक आपकी सोच का परिणाम न होगा किन्तु भ्रमित करता है.

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  12. बापू ने स्वयं बताया। यहां तो लोग बाप का गला दबा कर तीर्थ करते हैं!
    बापू का जीवन खुली किताब है - कितने लोग अपना सब कुछ खोल कर रखने का साहस करते हैं!

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  13. मेरा मत स्पष्ट है कि बापू बिलकुल दुखी थे इस घटना से सब जानते है किन्तु अब जब बापू के स्वयं स्वीकारे अपराध बोध को बाई साहब ने जिस शीर्षक से पेश किया वो तरीका अखबारी अथवा रीडरशिप बढाने वाला एक नुस्खा मात्र है रहा मेरा कथन उसे बिलकुल अन्यथा न लीजिए सच ब्लॉग इन्हीं नुस्खों से बचाते हुए विचार विमर्श का ज़रिया बनें मेरी सोच है . फिर आप जो उचित समझें मुझे कोई हक नहीं
    क्षमा याचना के साथ बता दूं "बापू हत्यारे नहीं थे न ही उनके लिए ऐसे शीर्षकों के आलेख लिखे जाने चाहियें शीर्षक भ्रमित कर रहा है इसे स्वीकारना ही होगा "

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  14. ज्ञान जी बच्चन जी ने भी कुछ खोला है याद होगा
    सादर

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  15. लिखते रहिए, पढ़ते हम रहेंगे..वादा रहा आपसे. क्यों लिखने का ढंग प्यारा है.

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  16. शीर्षक आपत्तिजनक है । इस घटना का ज़िक्र स्वंय बापू ने अपनी पुस्तक ”सत्य के प्रयोग“ में किया है । लेकिन यहां पर बात को नमक मिर्च लगा कर प्रस्तुत किया गया है । जिसका एक मात्र मकसद उक्त पुस्तक ”गांधी और उनकी महिला मित्र“ का गलत तरीके से प्रचार करना है । कमजोरियां हर इंसान में होती हैं, लेकिन महात्मा गांधी हजारों साल मंे सिर्फ एक ही पैदा होते है । बापू की जीवनी से हमे सबक लेना चाहिए कि उनके जैसा कमजोर, शर्मीला और संकोची इंसान भी देश का भाग्य निर्माता और राष्ट्रपिता बन सकता है । जितना पुरूषार्थ और त्याग बापू ने देश के लिए किया था उसका अगर हम एक प्रतिशत भी कर दें तो आज भारत विश्व का सबसे अमीर और शक्तिशाली राष्ट्र बन जाये । बापू के ऊपर भद्दी टिप्पणियां करने से उनका तो कुछ नहीं बिगडे़गा, हाॅं टिप्पणी करने वाले की बौद्धिक क्षमता पर जरूर प्रश्न चिन्ह लग जायेगा ।

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  17. बंधु
    बचपन में मैंने एक प्रेरक कथा पढ़ी थी। गांधीजी के बारे में। उसमें एक वृद्धा गांधीजी के पास आती है। और उनसे कहती है कि वे उसके पोते को गुड़ खाने से मना करे। गांधीजी मना कर देंगे तो बच्‍चा गुड़ नहीं खाएगा। गांधीजी कुछ हफ्तों तक उसे टालते रहे। एक दिन कह दिया, बेटा गुड़ मत खाया करो। फिर बताया कि अब तक मैं खुद ही गुड़ खा रहा था सो बच्‍चे को कैसे मना करता।

    मुझे नहीं लगता कि आपने गांधीजी के लेवल में सोचा भी होगा। हो सकता है मैं तल्‍ख हो गया हूं। लेकिन जब तक आप खुद उस स्‍तर पर न पहुंचे तक तक टिप्‍पणी करने या विचार को ठोस रूप में प्रस्‍तुत करने का क्‍या अभिप्राय है।

    केवल हलचल पैदा करना... तो ठीक है।


    वरना आप गलती कर रहे हैं।

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